Sunday, September 14, 2025

हिंदी में चाय


 आज सबेरे चाय बनाने के लिए पानी चढ़ाया। गैस ऑन करते ही याद आया कि आज हिदी दिवस है। हमने सोचा -"आज चाय हिंदी में बनायेंगे।"

सोचने में कुछ खर्च नहीं होता इसलिए सोच लिया। लेकिन अमल में कैसे लायें समझ नहीं आया। कुछ समझ में आए तब तक चाय के पानी में चीनी मिला दी।मिलाई क्या -" करीब आधा फुट ऊपर से डाल दी।" एक तरह से चम्मच से धक्का दे दिया। जा चीनी तू पानी के साथ मजे कर।
चीनी को पानी में धकियाने के बाद मुझे डर लगा कि कहीं कोई इसकी रपट न लिखा दे -" चीनी को पानी में धकेल के मार डाला।" लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। हमें लगा -"बच गए।"
चीनी पानी से मिली तो थोड़ा कुनमुनाई लेकिन पानी फिर शांत हो गई। चाय और चीनी का मिलन देखकर लगा -कविता जरूरी है । लेकिन फिर याद आया कि कविता लिखी कहाँ जाती है -कविता तो फूटती है। यहाँ फूटती में श्लेष अलंकार है। कई मतलब हैं 'फूटती' के। बतायेंगे तो आप कहेंगे -"हमको पता है, हमको न बताओ।"
हाँ तो कविता फूटी तो इधर-उधर फूटती रही। हमने बहुत समेटा लेकिन वह भाग गई हँसते हुए। आजकल की कविताएँ भी Gen Z की जैसी हो गई। क़ाबू में नहीं आतीं। डर भी लगता है कि कहीं क़ाबू में लेने की कोशिश करो तो हुलिया टाइट कर दें। कूट दें।
चाय और पानी के बाद दूध मिलाने से उनकी निजता का उल्लंघन हुआ । पहले तो वे भन्नाये। लेकिन बाद में दूघ को भी उन्होंने अपनी दल में शामिल कर लिया। गठबंधन सरकार जैसा मामला बन गया। दूध ने तो फिर ऐसा जलवा दिखाया कि हर जगह दूध की ही छटा। एक बार जब मिलन-जूलन का ट्रेंड शुरू हुआ तो अदरख, चाय की पत्ती भी शामिल हो गई। तुलसी की पत्ती ने गठबंधन को पवित्रता का एहसास दिला दिया। चाय की पत्ती मिलते ही चाय का रंग भूरा हो गया। बिना रंग का पानी, सफेद दूध और काली लगती चाय का गठबंधन गैस की गर्मी में भूरा हो गया। ऐसे जैसे सरकारें अपने चुनावी वायदों से एकदम अलग तरीके से काम करती हैं।
अभी चाय पीते हुए सोच रहे हैं कि इसका नामकरण भी करें। नई सरकार के लिए नाम बदलना जरूरी है। कई नाम याद आए लेकिन हम आपको बतायेंगे नहीं। आजकल सरकारें बेवक़ूफ़ी के काम बिना पहले से बताये, अचानक करती हैं। हम किसी सरकार से कम बांगड़ू थोड़ी हैं।
हिंदी दिवस है तो कविता के बिना कैसे चलेगा जी? तो लीजिये कविता भी पेश है। कविता पढ़िए और बताइए कैसी है। बताते चलें कि यह कविता वही Gen Z कविता है जो हमारे पास से फूट थी और भागकर पहले वाली कविता में साष्टांग दण्डवत होकर उससे मिल गई थी। क्रांतिकारी दिखने वाले लोगों की हरकतें ऐसी ही होती हैं।
चाय पीने का मन हो तो आइए आपको चाय पिलाते हैं।
आओ साथी चाय पिलाएं
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आओ साथी चाय पिलाएं,
थोड़ा बातें-सातें हो जाएं
गप्प लड़ायें ऊंची वाली
थोड़ी लंतरानी भी हो जाये।
बिल्ली उचकती ढाई टांग पर,
सूरज की किरणें दुलरायें,
बन्दर गड़बड़ काट रहे हैं,
उछल रहे हैं डाल-डाल पर।
हमने चाय पिलाई तुमको
अब थोड़ा सा फौरन मुस्काओ
चाय और स्वादिष्ट लगेगी
सुबह और खुशनुमा हो जाये।
-कट्टा कानपुरी

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