कल कॉलेज के जमाने के कुछ दोस्तों से मुलाक़ात हुई। 40 साल पहले निकले थे कॉलेज से। कुछ दोस्तों से बाद में भी मुलाक़ात, बातचीत होती रही। बाकी लोगों के समाचार मोनेरेको- 85 नाम से बने व्हाट्सएप ग्रुप से मिलती रही। इसी ग्रुप के कुछ लोगों ने दिल्ली-NCR नाम से अलग ग्रुप बनाया है। महीने-दो महीने में पार्टी करते रहते हैं। पार्टी में बतकही, खाने-पीने, डांस-गाने के अलावा पार्टी में न आने वाले लोगों को गरियाना (की जगह फ़ोनियाना) *और कुछ को फ़ोन पर हड़काना (अगली बार आने के लिए मनाना) * मेन एक्टिविटी रहती है।
* संशोधन संजय अग्रवाल के एतराज पर
मिलने की जगह महिपालपुर का Dee मार्क्स एंड रिजार्ट था। संजय वर्मा ने हमारी उपस्थिति कन्फ़र्म करने के लिहाज़ से आने का तरीक़ा भी सुझा दिया -"संजय अग्रवाल के साथ आ जाना। पास ही रहता है, सेक्टर 45 में।"
हमारे फ़ोन करने के पहले ही संजय अग्रवाल का फ़ोन आ गया। तय हुआ कि हम संजय के घर जाएँगे। वहाँ से आगे निकलेंगे। पौने ग्यारह पहुँचना था हमें संजय के घर। संजय पौने ग्यारह बजे तैयार होकर हमारा इंतज़ार कर रहे थे। हम ठीक सवा ग्यारह बजे उनके पास पहुँचे। 40 साल बाद मुलाक़ात में आधा घंटा देरी चलती है।
आधे घंटे की देरी बरकार रखते हुए, रास्ते में बाकी लोगों को समय पर पहुँचने की हिदायत देते हुए, उनको देरी के लिए हड़काते हुए हम तय समय से आधा घंटा बाद घटनास्थल पर पहुंचे। सुधाकर वर्मा को छोड़कर बाकी सब लोग आ चुके थे। थोड़ी देर बाद सुधाकर भी पहुँच गए।
सबके आने के बाद यादों का पिटारा खुला। दोस्तों के मिलने पर यादें सबके सामने रखें मटर के ढेर सरीखी होती हैं। सब अपने-अपने हिसाब से छीलते जाते हैं। कॉलेज के जमाने की तमाम यादें साझा हुई। तमाम दोस्तों, उनसे जुड़ी घटनाओं को याद किया गया।
संयोग की बात कल Wife Appreciation Day था। पत्नी तारीफ़ दिवस। मुझे छोड़कर बाकी दोस्त अपनी अपनी जीवन संगिनी के साथ आए थे। लंबे दांपत्य जीवन के बाद , अकेले में जीवनसाथी की तारीफ़ जरा मुश्किल काम होता है। लेकिन संगठन में शक्ति होती है यह सोचकर सारे दोस्त मिलकर अपनी-अपनी जीवन संगिनी के साथ इस काम को करने के लिहाज़ से लिए पिकनिक के लिए रिसार्ट में आए थे।
बातचीत के साथ स्नैक्स, ड्रिंक, स्टारटर चलते रहे। जिन लोगों के हाल ही में जन्मदिन बीते थे। उन लोगों ने 'बिलेटेड केक' काटे। हमारा भी जन्मदिन 16 सितंबर को बीता था। हमने भी केक काटा। खाना-पीना हुआ।
'गेट टूगेदर' में तय हुआ था कि लोग अपने-अपने जीवन साथी के साथ गाना भी गायेंगे। शुरुआत संजय अग्रवाल से हुई। संजय अग्रवाल कॉलेज के दिनों में लोगों को मुफ्त की रेडीमेड व्यावहारिक समझाइश देने के लिए जाने जाते थे। अपना वह अंदाज़ अभी भी वे बरकरार रखें हैं। हमारे ज़ेहन में संजय की जो छवि है वह हमारे साथी विनय अवस्थी को तिलक हास्टल के सामने के लॉन में कुछ समझाते हुए की है। कल संजय ने भाभी जी के साथ गाना गया:
"प्यार हुआ इकरार हुआ , प्यार में फिर क्यों डरता है दिल"
पूरे गाने के दौरान संजय डरे-डरे रहे। शायद उनको किसी ने बताया होगा कि यह गाना डरते हुए ही गाया जाता है।
अगला गाना सुबीर संगल और भाभी जी ने गाया। सुबीर कॉलेज के दिनों में अंग्रेजी वादविवाद प्रतियोगिताओं के नियमित, सफल, डिबेटर थे। हमारे बेटे अनन्य की जन्मकुंडली में उसके बारे में लिखा था He will not require podium for his speech ( उसको अपनी स्पीच के लिए पोडियम की जरूरत नहीं पड़ेगी)। यह पढ़कर मुझे सुबीर की याद आई थी। कल, चालीस साल बाद, उनकी जीवन संगिनी के साथ गाना सुना। गाने के बोल थे :
"एक अजनबी हसीना से यूं मुलाकात हो गई।"
हसीना कौन थी पूछने पर सुबीर ने भाभी जी की तरफ इशारा करते हुए बताया - और कौन हो सकती है। 'पत्नी तारीफ दिवस' पर इतना तो चलता है।
विनोद अग्रवाल से पिछले साल ही मुलाकात हुई थी। पुस्तक मेले में। लौटते में दिल्ली पुस्तक मेले से नोएडा तक विनोद और भाभी जी साथ आए थे। रास्ते में अपनी नौकरी से जुड़े अनुभव साझा किए थे।विनोद और भाभी जी हमारे लेखन की तारीफ करके हौसला बढ़ाते रहते हैं। उन्होंने गाना गाया:
बादल बिजली चंदन पानी, ऐसा अपना प्यार।
लेना होगा जनम हमें कई कई बार।
सुधाकर वर्मा ने गाना शुरू तो किया भाभी जी के साथ लेकिन फिर उठकर डांस का काम संभाल लिया। उनकी जगह गाने का काम संजय वर्मा और दोस्तों ने संभाल लिया।।संजय वैसे भी सभी के गाने में अपना गला लगाते रहे। सुधाकर वर्मा ने गाना चुना था :
अजीब दासतां है ये कहां शुरू कहां खत्म
राजीव ऐरन ने माइक संभालने के बाद कहा कि गाना गाने के पहले वे अपनी श्रीमती जी की कायदे से तारीफ करेंगे। वैसे यह लाजिमी भी था क्योंकि इस पिकनिक का आइडिया श्रीमती राजीव ऐरन का ही था। राजीव ने बहकते हुए भाभी जी की तारीफ की फिर गाना शुरू किया:
दो लफ़्ज़ों की है दिल की कहानी
या है मोहब्बत या है जवानी।
आख़िरी गाना संजय वर्मा का था। संजय तिलक हॉस्टल में A विंग में रहते थे। खेल में तेज दौड़, फ़ास्ट बोलिंग करते थे। डांस का शौक पूरा करने के लिए A विंग और C विंग के बीच में स्पीकर लगाकर घंटों डांस करते। शायद मोती एनसीआर को सक्रिय रखने में संजय का काफी योगदान है। संजय से कॉलेज के बाद कानपुर में भी मुलाक़ात होती रही। जबलपुर जब वे गए थे उसके कुछ दिनों बाद मैं वापस कानपुर आ गया था। फ़ोन पर बता होती रहती। मुलाक़ात काफ़ी दिन बाद हुई। संजय वर्मा और भाभी जी ने गाना सुनाया :
मेरे महबूब क़यामत होगी,
आज रुसवा तेरी गलियों में मोहब्बत होगी।
संजय वर्मा के गाने के बाद हमको माइक थमा दिया गया। इसके पहले बताया गया कि कॉलेज में हम विनय अवस्थी और संजय अग्रवाल 'सृजन वाल पत्रिका' निकालते थे जिसे लड़के समझ नहीं पाते थे और नोटिस बोर्ड से फाड़ देते थे। हमने इस बात की सच्चाई बताई कि लड़के लोग 'सृजन' को फाड़कर रूम में ले जाकर पढ़ते थे। मैंने यह भी कहा कि दोस्तों की समझ का ख्याल रखते हुए ही अब मैं 'कट्टा कानपुरी ' के रूप में सरल कविताएँ करता हूँ।
संजय अग्रवाल ने यह भी पूछा -" कॉलज में जब तुम लोग आल इंडिया साइकिल टूर पर गए थे तो तीन महीने की अटेंडेंस का जुगाड़ कैसे किया था।" हमको याद आया कि उस साल तीन महीने साइकिल टूर पर रहे थे फिर दीवाली, दशहरा की छुट्टियों के अलावा करीब एक महीने कालेज बंद रहा था एक लड़के के मर्डर हो जाने के कारण। कुल जमा महीने भर क्लास की थी उस साल। किसी ने अटेंडेंस के लिए पूछा नहीं। आज का 75% कंपलसरी हाजिरी का समय होता तो शायद साइकिल टूर न जा पाते या फिर साल बर्बाद हो जाता।
पत्नी तारीफ़ दिवस का लिहाज़ रखते हुए हमने अपनी कविता 'ओस की बूँद' सुनाई। इसके साथ ही शेर सुनाया :
तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह,
भीग तो पूरा गए लेकिन हौसला बना रहा।
इसके बाद कट्टा कानपुरी का कलाम सुनाया :
मोहब्बत की बात की , सब दोस्त टोंकने लगे,
ये हम कर लेंगे, तुम कुछ और काम देख लो।
मोहब्बत की पाठशाला का ये मजेदार चलन है यारों ,
जो कभी पढ़ा नहीं, सलाहें देता है हेडमास्टर सरीखी।
आज मन में फ़िर उठी है ,मोहब्बत की तमन्ना,
दांत हिल रहे सारे, मन कर रहा कि चूसे गन्ना ।
घरैतिन से हम बोले, मोहब्बत का कोई गीत गुनगुनाओ
झोला थमा के वो बोली, जाओ भाग के सब्जी ले आओ।
यह कलाम सबकी समझ में आ गया। लोगों ने तारीफ़ भी की। इसके बाद हमने अंसार कंबरी की कविता - "फिर उदासी तुम्हें घेर बैठी न हो, शाम से ही रहा मैं बहुत अनमना" गाकर सुनाई।
इसके बाद सबने खाना खाया। जाने के पहले MOTi NCR का समूह गान हुआ। "यादों की बारात निकली है दिल के द्वारे" इस गाने पर सबने डांस किया।
चलने के पहले एक बार फिर सबके फोटो हुए। लोगों ने बारी-बारी से अपने जीवन साथियों के साथ फोटो खिंचाए। जोड़ों के फोटो होने के बाद कहा गया -"लड़कों का ग्रुप फ़ोटो भी होगा।" साठ साल आसपास के लड़कों का ग्रुप फोटो हुआ।
लौटते समय मुझे संजय अग्रवाल के साथ ही आना था। लेकिन पास में ही रहते योगेन्द्र पाठक का फ़ोन आ गया तो हम उनसे मिलने चल दिए। पाठक और हम इलाहाबाद के बाद बीएचयू में साथ पढ़े। नियमित संपर्क बना रहा। पाठक हमारे साथियों में सबसे युवा हैं। GeM की स्थापना में उनका अहम योगदान रहा। नवंबर में रिटायर होंगे।
पाठक के यहाँ मिठाई, समोसे, चाय हमारा इंतजार कर रहे थे। पहुंचते ही पूछा गया -"डिनर में क्या खाओगे ?" हमने बताया कि भाई अभी खाकर आए हैं। अब शाम को खाएँगे नहीं। आज का कोटा पूरा हुआ। वजन का सवाल है।"
पाठक और भाभी जी के साथ तमाम इधर-उधर की बातें, यादें साझा की। चलते समय सोचा कि पास ही स्थित आयुध विहार में रहने वाले अपने ऑर्डनेंस फैक्ट्री के सीनियर्स के दर्शन कर लिए जायें। मेट्रो जाती है वहाँ लेकिन पाठक ने अपने कार चालन का हुनर दिखाने का मौक़ा हाथ से जाने न देने की मंशा से जबरियन हमको कार में बिठाया और आयुध विहार के गेट पर छोड़ दिया।
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