कल फ़िरोज़शाह का क़िला देखने गए। हमारे गाइड थे Alok Puranik , Manu Kaushal और Ira Puranik । फ़िरोज़शाह का क़िला दिल्ली का बुजुर्ग किला है। लालकिले का सीनियर। लालकिले से 300 साल पहले यह क़िला तुग़लक़ वंश के बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ने सन 1354 में बनवाया था। उनके समय में दिल्ली फिरोजाबाद के नाम से जानी जाती थी।
फ़िरोज़शाह क़िले में सम्राट अशोक द्वारा बनवाया खंभा, जामी मस्जिद, बावड़ी मुख्य इमारतें हैं। इसके अलावा यहाँ जिन्न भी रहते हैं जिनके अनेक रोचक किस्से प्रचलित हैं। इस क़िले में मुग़लबादशाह आलमगीर -2 का क़त्ल भी हुआ था। क्रांतिकारी भगतसिंह और उनके साथी इस क़िले के पास स्थित पार्क में मिलते-जुलते और अपने अभियानों की योजनाएं बनाते थे।
फ़िरोज़शाह तुग़लक (1309- 1388) सन 1351 से लेकर 1388 (37 साल) तक दिल्ली के सुल्तान रहे। कई शहर, सिंचाई परियोजनाएँ, इमारतें, मदरसे, अस्पताल बनवाये। बकौल मनुकौशल जी - ' फ़िरोज़शाह बादशाहों की PWD थे।' फ़िरोज़शाह के नक़्शेक़दम पर चलते हुए बाद में शाहजहाँ ने भी इमारतें बनवाईं। सुल्तान बनने के बाद फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ने सभी क़र्ज़े माफ कर दिए, जिसमें 'सोंधर ऋण' भी शामिल था, जो मुहम्मद तुग़लक़ के समय किसानों को दिया गया था।
इमारतों की भी क़िस्मत होती है। कोई इमारत प्रसिद्ध हो जाती है और कभी सत्ता केंद्र रही किसी इमारत में आज कुत्ते घूमते हैं। सदियों में दिल्ली में आए बदलाव का जिक्र करते हुए मनु कौशल जी ने यह शेर सुनाया :
ख़ुद हम पे जो गुज़री हमीं जानते हैं
ख़ुद अपना शहर नया-नया लगता है।
फ़िरोज़शाह तुग़तक के समय ईरान दुनिया की बड़ी ताक़त था। उसका जलवा आज के अमरीका की तरह था। जैसे आजकल के लोग टाइम मैगजीन या अमेरिका की किसी अखबार में अपने बारे में छपी ख़बर को अपने लिए डिग्री की तरह सीने से सटाये घूमते हैं वैसा ही हाल उन दिनों अरब देशों से मिली से किसी साधारण सी उपाधि के प्रति मुगल बादशाहों का था। अरब देश से मिली किसी ख़िलअत को फ़िरोज़शाह गर्व के साथ लोगों को बताता था। इस वाक़ये का जिक्र करते हुए मनु कौशल जी ने जीम जाज़िल की नज़्म सुनाई :
मुझ से ऊँचा तिरा क़द है, हद है
फिर भी सीने में हसद है? हद है !!
मेरे तो लफ़्ज़ भी कौड़ी के नहीं
तेरा नुक़्ता भी सनद है, हद है !!
तेरी हर बात है सर आँखों पर
मेरी हर बात ही रद है, हद है !!
'इश्क़ मेरी ही तमन्ना तो नहीं
तेरी निय्यत भी तो बद है, हद है !!
कभी बहुत ताकतवर रही हुकूमतों के वारिस किस कदर निकम्मे हो जाते हैं इसका जिक्र करते हुए आलमगीर -2 का किस्सा सुनाया गया । आलमगीर का मतलब होता है दुनिया का बादशाह। नाम का मतलब भले दुनिया का बादशाह रहा हो लेकिन वो बहुत कमजोर शासक थे। वो अपने वजीर इमाद उल मुल्क पर ही निर्भर रहते थे। बाद में वजीर उनको एक चमत्कारी संत से मिलाने के बहाने फिरोजशाह किले लाए और आलमगीर का क़त्ल कर दिया और क़िले की दीवार में चिनवा दिया । बादशाह के कत्ल के बाद उधर से गुजरती एक ब्राह्मणी ने जब आलमगीर का सर देखा तो उसे अपनी गोद में रखा। सुबह पता लगने पर आलमगीर को दफ़नाया गया।
आलमगीर का उनके वजीर ने क़त्ल करवा दिया। हुकूमत की यह विडंबना है। ताक़त के खेल निराले हैं।अपना ही ख़ास कब रास्ते का रोड़ा समझने लगे ,कहना मुश्किल। मनु कौशल जी ने शाहिद जकी की ग़ज़ल सुनाई :
यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे
मैं समझता था मिरे यार समझते हैं मुझे
जड़ उखड़ने से झुकाओ है मिरी शाख़ों में
दूर से लोग समर-बार समझते हैं मुझे
क्या ख़बर कल यही ताबूत मिरा बन जाए
आप जिस तख़्त का हक़दार समझते हैं मुझे
आलमगीर-2 बहुत कमजोर शासक थे लेकिन शायर बहुत ऊँचे थे। अपनी शायरी में अपने को बड़ा ताकतवर, दुनिया का बादशाह बताते थे। आलोक पुराणिक जी ने शायरों के इस गुण का जिक्र करते हुए कहा -"शायर बहुत झूठे होते हैं, गड़बड़ तब होती है जब वे ख़ुद की शायरी पर यकीन करने लगते हैं।" यह बताते हुए वे यह बात छिपा गए कि कभी वे भी शायरी का शौक फरमा चुके हैं।
फ़िरोज़शाह के क़िले से आजादी की लड़ाई में शामिल भारतीय क्रांतिकारियों का सम्बन्ध बताते हुए इरा पुराणिक ने क्रांतिकारियों से संबंधित "सर फरोशी की तमन्ना आज हमारे दिल में है" का जिक्र करते हुए बताया कि इस ग़ज़ल के रचनाकार शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी थे। काकोरी के शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ और अन्य क्रांतिकारी इसे गाते थे। जब रामप्रसाद बिस्मिल को फाँसी हुई तो उनकी जबान पर इस ग़ज़ल का मतला था। तमाम लोग इसे भ्रमवश रामप्रसाद बिस्मिल की नज़्म समझते हैं।
इरा ने क्रांतिकारियों से सबंधित गाना 'रंग दे बंसती चोला' का जिक्र करते हुए अशफाक उल्ला की शायरी भी सुनाई :
"बुज़दिलों को सदा मौत से डरते देखा।
गो कि सौ बार रोज़ ही उन्हें मरते देखा।।
मौत से वीर को हमने नहीं डरते देखा।
तख्ता-ए-मौत पे भी खेल ही करते देखा।"
इसी वर्ष काकोरी क्रांतिकारी घटना के सौ साल होने पर शहीदों की स्मृति में पंजाब से काकोरी तक यात्रा के दौरान उन शहीदों के बारे में लोगों को बताया गया।
फ़िरोज़शाह तुग़लक के व्यक्तित्व की कई पहलुओं का जिक्र हुआ वॉक में। फ़िरोज़शाह बाद में आने वाले बादशाहों के रोलमाडल बने। शाहजहाँ ने फ़िरोज़शाह की तर्ज पर इमारतें बनवाई। औरंगज़ेब ने फ़िरोज़शाह से कट्टरता की सीख ली। फिरोजशाह कट्टर सुन्नी धर्मान्ध मुस्लिम था। अपना राज्य इस्लामी नियमों के हिसाब से चलाया। डॉ॰ आर.सी. मजूमदार ने कहा है कि, "फ़िरोज़ इस युग का सबसे धर्मान्ध एवं इस क्षेत्र में सिंकदर लोदी एवं औरंगज़ेब का अप्रगामी था।’ दिल्ली सल्तनत में प्रथम बार फ़िरोज़ तुग़लक़ ने ब्राह्मणों से भी जज़िया लिया।
ब्राह्मणों पर जब फ़िरोज़शाह ने जजिया लगाया तो ब्राह्मणों ने अनशन किया और कहा -"हम पर जज़िया कर लगाया गया तो हम आग में जलकर जान दे देंगे।" इस लिहाज से देखा जाए तो गांधी जी से पहले भी अनशन का जिक्र फिरोजशाह के शासन में मिलता है। लेकिन ब्राह्मणों की अनशन की धमकी का फिरोज शाह पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने कहा -"ब्राह्मण अगर मरना चाहते हैं तो उनके लिए आग की व्यवस्था हम कर देंगे।"
जान बचाने के लिए ब्राह्मणों ने अनशन छोड़कर जज़िया देना स्वीकार किया। उनके जज़िया कर के लिये पैसे का इंतज़ाम चंदे से हुआ।
फ़िरोज़शाह ने कई तरह के कर ख़त्म किया। फिरोजशाह के पहले युद्ध में सिपाही जो लूटमार करते थे उसका 1/4 हिस्सा सिपाही को मिलता था, 3/4 हिसाब सरकारी खजाने में जमा होता था। फ़िरोज़शाह ने इसे उलट कर व्यवस्था दी कि लूट का 3/4 सिपाही को और 1/4 हिस्सा सरकार के ख़ज़ाने में जमा किया जाएगा।
जब यह जिक्र हो रहा था तो यह भी बात चली कि क्या सरकार द्वारा हाल में GST के कमी की प्रेरणा फ़िरोज़शाह से मिली है।
फ़िरोज़शाह के समय भ्रष्टाचार भी चरम पर था। फ़िरोज़शाह ने प्रशासन में स्वयं घूसखोरी को प्रोत्साहित किया था।सुल्तान ने एक घुड़सवार को अपने ख़ज़ाने से एक टका दिया, ताकि वह रिश्वत देकर अर्ज में अपने घोड़े को पास करवा सके।
फ़िरोज़शाह के समय के रिश्वत के इस किस्से सुनकर आज के समय के तमाम राज्य सरकारों के किस्से याद आते हैं जहाँ तमाम अफसर, कर्मचारी अपने जायज काम कराने के लिए अपने ही विभाग के लोगों को रिश्वत देते हैं।
फिरोजशाह के समय में 180000 ग़ुलाम थे। इनकी देखभाल हेतु सुल्तान ने 'दीवान-ए-बंदग़ान' की स्थापना की। उनमे से कुछ गुलामों को दस्तकारी का प्रशिक्षण दिया। फ़िरोज़शाह के समय में 15 तरह के नौकर हुआ करते थे । वे अलग-अलग तरह के काम करते थे। पोस्ट के साथ लगा मनु कौशल जी का वीडियो देखें।
फ़िरोज़शाह क़िले में एक बड़ा पत्थर का चिकना स्तंभ भी है। यह स्तंभ हरियाणा के यमुना नगर जिले के टोपरा कलान में मिला था। इस तरह के दो स्तंभ मिले थे टोपरा कलान में। ये स्तंभ सम्राट अशोक द्वारा बनवाये स्तंभ हैं। 273 and 236 BC में बनवाये इन स्तंभों में सम्राट अशोक के संदेश हैं।
इन स्तंभों को टोपरा से दिल्ली लाने के बारे में मिले विवरण के अनुसार :
" दोनों अशोक स्तंभों को सावधानीपूर्वक सूती रेशम से लपेटा गया था और कच्चे रेशम से बने सरकंडे के बिस्तर पर रखा गया था। इन्हें 42 पहियों वाली एक विशाल गाड़ी में 200 लोगों द्वारा सावधानीपूर्वक खींचकर उनके मूल स्थानों से दिल्ली ले जाया गया।"
टोपरा में पाए गए इन स्तंभ के बारे में पहले किसी को कोई जानकारी नहीं थी। हरियाणा के लोग इसे भीम का लट्ठ कहते थे। 'भीम के लट्ठ' के बारे में अपने हिसाब से लिखते हुए फ़िरोज़शाह के समय के बारे में लिखते हुए बर्नी और अफ़ीज ने लिखा है -" पांडवों का सबसे छोटा भाई भीम बहुत दुष्ट था। हमें विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि वह इस मीनार को लाठी की तरह रखता था। इससे मवेशियों की देखभाल का काम करता था।"
बाद में प्रसिद्ध विद्वान James Princep ने इन स्तंभों का अध्ययन का करके बताया कि हरियाणा में भीम के लट्ठ के रूप में विख्यात यह तीसरी सदी BC में सम्राट अशोक द्वारा बनवाया स्तंभ है। इसमें ब्राह्मी लिपि में उनके संदेश उत्कीर्ण हैं। भीम के लट्ठ से अशोक की स्तंभ में बदलने में इसको सैकड़ों साल लग गए। अपने अतीत को गौरवान्वित करने की इस प्रवृत्ति के बारे में मुस्ताक अहमद यूसुफ़ी ने लिखा है :
"कभी कभी कोई समाज भी अपने ऊपर अतीत को ओढ़ लेता है. गौर से देखा जाये तो एशियाई ड्रामे का असल विलेन अतीत है. जो समाज जितना दबा-कुचला और कायर हो उसे अपना अतीत उतना ही अधिक उज्जवल और दुहराये जाने लायक दिखायी देता है. हर परीक्षा और कठिनाई की घड़ी में वो अपने अतीत की ओर उन्मुख होता है और अतीत वो नहीं जो वस्तुत: था बल्कि वो जो उसने अपनी इच्छा और पसंद के अनुसार तुरंत गढ़ कर बनाया है."
क़िला परिसर में एक बावड़ी भी है। पहले इसके ऊपर एक छत भी थी। जो अब ढह गई है। सुरक्षा कारणों से अब यह बंद है और बाहर से ही इसे देखा जा सकता है।
क़िले में ही जामी मस्जिद भी है। यह सबसे प्राचीन मस्जिदों में से एक है जहाँ आज भी नमाज़ होती है। इस मस्जिद में 1398 ई. में तैमूर ने अपनी प्रार्थनाएँ की थीं। वह इसकी सुंदरता से मंत्रमुग्ध हो गया और उसने इस मस्जिद के डिज़ाइन की नकल करते हुए समरकंद के मवारन्नाहर में एक मस्जिद का निर्माण कराया। यह मस्जिद उस स्थान के रूप में भी जानी जाती है जहाँ मुगल प्रधानमंत्री इमाद-उल-मुल्क ने 1759 ई. में सम्राट आलमगीर द्वितीय की हत्या करवाई थी।
जामी मस्जिद एक बड़े प्रांगण से घिरी हुई है जिसमें मठ और एक प्रार्थना कक्ष है। अब पूरी तरह से खंडहर हो चुका प्रार्थना कक्ष कभी शाही महिलाओं द्वारा उपयोग किया जाता था। मस्जिद और इसकी वास्तुकला तुगलक वास्तुकला का एक उदाहरण है।
क़िले में एक तरफ़ सम्राट अशोक का बनवाया हुआ स्तंभ है और दूसरी तरफ़ जामी मस्जिद जहाँ तैमूरलंग ने प्रार्थना की थी। दोनों के नाम लाखों लोगों के क़त्ल का इतिहास दर्ज है। सम्राट अशोक द्वारा किए कलिंग युद्ध में लाखों लोग मारे गए। तैमूर लंग ने दिल्ली लूटते हुए लाखों लोगों को क़त्ल करवाया। यह अंतर जरूर रहा कि सम्राट अशोक को अपने किए का अफसोस हुआ और उसने बौद्ध धर्म में स्वीकार करके अहिंसा, परोपकार की शिक्षाओं का प्रसार किया। तैमूर लंग को अपने किए का कोई अफसोस नहीं हुआ।
सम्राट अशोक के बारे में चर्चा करते हुए उनके मौर्य वंश से जुड़े होने का फ़ायदा उठाते हुए मौर्य वंश के सम्राट चंद्रगुप्त के समय के अर्थशास्त्र के विद्वान चाणक्य की चर्चा भी हुई। चाणक्य की चर्चा के साथ उनके द्वारा रचित 'अर्थशास्त्र' की भी चर्चा हुई। चाणक्य के 'अर्थशास्त्र में वर्णित विभिन्न शिक्षाओं की चर्चा हुई। उनको आज के संदर्भों से जोड़कर पेश किया गया। मनु कौशल जी ने पत्नी को बस में रखने के तरीक़े विस्तार से समझाये। बाद में जब उनको याद आया कि सुनने वालों में उनकी पत्नी भी शामिल हैं तो उन्होंने गियर बदल कर चाणक्य की दूसरी शिक्षाओं पर ध्यान केंद्रित किया।
जामी मस्जिद के देखने के बाद मनुकौशल जी सम्राट अशोक में बदल गए। उन्होंने सम्राट अशोक के रूप में इतिहास टहलते हुए सैकड़ों सालों की घटनाओं का संक्षेप में नाट्यरोपांतरण किया -" मेरा नाम अशोक है लेकिन मैं शोक में डूबा हुआ हूँ। आलमगीर दुनिया को जीतने वाला है लेकिन उनको उनके वजीर ने मरवा दिया। अशोक स्तंभ पर उत्कीर्ण शिक्षाओं का जिक्र करते हुए कहा -"पत्थरों पर ज्ञान की बता लिखवाने का क्या फ़ायदा जब हमारी अक़्ल पर पत्थर पड़े हों।"
सम्राट अशोक के रूप में मनु कौशल जी ने रामधारी सिंह दिनकर की कविता का पाठ भी किया।
क़िले में जिन्नात के होने की भी चर्चा हुई। 1977 के समय वृहस्पतिवार के दिन यहाँ लोग जिन्नों से अपनी फरियादे करते थे, दुआयें माँगते थे, मुराद पूरी करने के लिए अर्जियाँ लिखते थे। वहाँ मौजूद कुछ सिक्के भी दिखाई दिए जो जिन्नों को चढ़ाये गए थे। बाद में यह बंद हो गया।
क़िले के बाहर मिले एक आदमी ने बताया कि जिन्न अभी यहाँ आते हैं। रात को घूमते हैं। अगर इंसान साफ़-सुथरा न हो तो उठाकर पटक देते हैं। तबलीक़ी जमात से जुड़े उन शख्स ने किले और दिल्ली से जुड़े कई किस्से सुनाये। यह भी बताया कि पहले वो हिंदुस्तान टाइम्स में काम करते थे, कोरोना के समय उनकी नौकरी छूट गई। अब वे एक जगह प्राइवेट काम करते हैं। उन्होंने दिल्ली का पाँच दरवाज़े भी गिनाये।
लौटते समय पास ही स्थित खूनी दरवाजा भी बाहर से देखा हम लोगों ने। यह द्वार 16वीं शताब्दी में शेरशाह सूरी ने बनवाया था। इसे "खूनी दरवाज़ा" नाम इसलिए मिला क्योंकि यह कई रक्तपात वाली घटनाओं का गवाह रहा है, जिनमें औरंगज़ेब द्वारा दारा शिकोह का सिर प्रदर्शित करना और 1857 में बहादुर शाह जफ़र के बेटों और पोते की हत्या शामिल है।
क़िले से बाहर आने के बाद वहीं मौजूद एक दुकान में बैठकर हमने चाय भी पी। हमारे साथ Kamlesh Pandey जी थे। 15 रुपए की एक चाय देने वाले दुकान दार ने चाय के साथ ब्रेड पकौड़ा खिलाने की बहुत कोशिश की लेकिन हम स्वाद के लालच में नहीं आए। चाय पीकर वापस हो लिए ।
फ़िरोज़शाह क़िले की इस इतवारी दास्तान का यह किस्सा संक्षेप में बयान किया। फोटू कुछ हमारी हैं, कुछ दोस्तों की ली हुई। फोटू के साथ के वीडियो भी देखिए। मजा आयेगा, जानकारी मिलेगी।
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