कल दिन भर अपनी कविताएँ बटोरते रहे। सोचा सबको इकट्ठा करके एक कविता संग्रह हो जाएगा। हो भी गया। भूमिका भी लिख गई। देखा कि कविता संग्रह में हर तरह की कविताएँ हैं। एकाध अच्छी, दो चार कम अच्छी, बाकी सब ऐसी ही। कविता संग्रह ऐसा लग रहा जैसे किसी लोकतंत्र की सरकार हो। ज्यादातर गुंडे, मवाली, डिफाल्टर टाइप के लोग।
हमारे एक दोस्त से हमने कविताओं के बारे में राय पूँछी तो उसने बेबाक राय बताई -"कविताओं में गहराई नहीं है। ऊँची कविताओं वाले गुण नहीं हैं इनमें।"
हमने कहा -"ऊँची कविता मतलब?"
उसने कहा -"ऊँची कविता का मतलब कविता बिना समझाये समझ न आए। बिम्ब विधान ऐसा हो कि एक बिम्ब इधर से आए एक बिम्ब उधर से आए, सर के ऊपर से निकल जाये।"
हमने कहा - "ये बात तो है। उतनी ऊँची तो नहीं हैं अपनी कवितायें।"
तुम्हारी कविताओं की सबसे बड़ी कमी यह है कि सब तुरंत समझ में आ जाती हैं। ऐसी कविता को कोई कविता नहीं मानता। जब तक कविता को तीन-चार लोग मिलकर न समझें तब तक कविता ऊँची नहीं मानी जाती। तुलसी, कबीर जैसे कवि इसीलिए महान माने जाते हैं क्योंकि उनकी कविताएँ समझने-समझाने में सैकड़ों मास्टर, प्रोफ़ेसर आलोचक लगे रहते हैं। पूरी जिंदगी समझते हुए रिटायर हो जाते हैं लेकिन कविता समझ नहीं पाते। उनके रिटायर होने के बाद नए प्रोफ़ेसर फिर से समझने की कोशिश करते हैं। इसी 'समझ के घपले' के चलते सरकारों ने मास्टरों की भर्ती बंद कर दी। मास्टरी का काम दिहाड़ी पर उठा दिया।
अपनी बात कहकर दोस्त चला गया। जाते-जाते कह गया लेकिन कविता संग्रह छपवा ज़रूर लो। कूड़ा निकाल दो। सफ़ाई हो जायेगी।
हमने उसके जाने के बाद कवितायें समेटना जारी रखा। कट्टा कानपुरी की ज्यादातर कवितायें ख़ुराफाती हैं। एकाध को पढ़ने से ऐसा तो ऐसा लगा कि कई सरकारी योजनायें हमारी कविता पढ़कर बनीं हैं। जैसे कि ये :
"पाव भर राशन लो उसमें,
फ़ेंटों किलो भर भाषण।
बच्ची जनता को चटाओ ,
मजे से करो अन्नप्रासन।"
-कट्टा कानपुरी 21.04.2014
आने वाले समय में कोई 'सुधी आलोचक' कहेगा कि सरकार द्वारा 80 करोड़ लोगों को अन्न बाँटने की योजना 'कट्टा कानपुरी' का यह कलाम पढ़कर ही शुरू हुई। पाव भर को योजना बनाने वाले अधिकारी समझ नहीं पाये होंगे तो 'पाव भर' को 'पाँच किलो' कर दिया होगा। योजना बनी और चल पड़ी। भारत के अस्सी करोड़ लोगों को और उसके चलते बचे रहने के लिए सरकार को कट्टा कानपुरी का एहसान मंद होना चाहिए। लेकिन कौन होता है -"मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं।"
इसी तरह इस कविता से दुनिया में प्रेम का महत्व कितने सहज तरीके से बताया गया है :
भला हो इश्क का , जो उनको निकम्मा कर दिया,
वर्ना वो भी किसी कौम के, रहनुमा हो गये होते।
उचकते फ़िरते दुनिया भर , चिरकुटों की तरह,
घूम-फ़िर कर किसी गैंग के ,सरगना हो गये होते।
- कट्टा कानपुरी
(08.02.2013)
कविताएँ जमाने के बाद उनके साथ उनका लिखने का समय खोजने में समय लग रहा। आशा है जल्द ही आ जाएगा कविता संग्रह। नाम बता ही चुके हैं -" अंधेरे का बड़प्पन।"
किताब आने के बाद सबको सूचना देंगे। ठीक न!
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