कल लखनऊ में जलवायु विहार स्थित अपना घर देखने गए। इंदिरा नगर से जलवायु विहार का कैब का किराया ढाई सौ से ऊपर बता रहा था। हमने मेट्रो से जाना तय किया। टहलते हुए स्टेशन पहुंचे। चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट के लिए सीसीएस एयरपोर्ट लिखा देखकर फिर लगा कि चौधरी जी का जलवा सीसीएस ने चूस लिया है।
दिल्ली-एनसीआर की मेट्रो में सुबह भीड़ होती है। लखनऊ मेट्रो एकदम खाली थी। कहीं भी बैठ जाओ। पचास रुपये में ट्रांसपोर्ट नगर पहुँच गए। वहाँ से जलवायु विहार तीन किलोमीटर था। ऑटो का किराया पचास रुपए। सोचा पैदल ही चलें। पचास रुपये की बचत के साथ पैदल चलने का टार्गेट भी पूरा हो जाएगा। चल दिए।
तेज धूप में थोड़ी देर बाद पसीना भी आ गया। अभी तक हम धूप और पसीना के साथ को सहज संगत समझते थे। लेकिन कल लगा कि यह पसीने से धूप का लगाव लैंगिक आकर्षण है। स्त्रीलिंग धूप के पीछे पुरुष लिंग पसीना लगा रहता है। जहाँ धूप में चले वहाँ पसीना हाज़िर हो गया।
घर के काम धाम करके वापस लौटे। विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पहुँच कर याद आया कि यहाँ पुस्तक मेला लगा है। उतर गए। कई युवा मिले रास्ते में। कुछ अपनी सहेलियों-दोस्तों के साथ बतियाते। हमने रास्ते में कई युवाओं से रास्ते पूछा। सबने ठहरकर या बातचीत रोककर रास्ता बताया। एक लड़की ने बहुत उदास, थके स्वर में बताया -"सीधे चले जाइए, आगे ही लगा है पुस्तक मेला।" मन किया उससे पूछे -"तुम इतनी उदास क्यों हो?" लेकिन जब तक मन की बात पर अमल करें तब तक वो बच्ची गेट पार कर गई थी।
वैसे भी 'मन की बात' मन में ही रखने के लिए होती हैं।अमल में लाने के लिए थोड़ी होती हैं।
पुस्तक मेले में लेखक मंच पर चंद्रकांता सीरियल में क्रूर सिंह का अभिनय कर चुके अभिनेता अखिलेंद्र सिंह अपनी किताबों पर चर्चा कर रहे थे। अपने बारे में बता रहे थे। नाट्य शास्त्र और और अपनी कविताओं का जिक्र कर रहे थे। हमें अपने ज्ञान पर अफ़सोस हुआ कि हम इतने प्रभावी अभिनेता, कवि और लेखक के नाम से परिचित नहीं। बहुत बड़े पंडाल में लगभग सौ लोग उनकी बातचीत सुन रहे थे। हम भी ऊँघते हुए सुनते रहे। बातचीत सुनने के बाद उनको पहले से न जानने का अफ़सोस कम हो गया।
लेखक मंच हम पीछे बैठे थे। एक दिन पहले हमने पंकज प्रसून Pankaj Prasun और Lalitya Lalit की एक बड़े गुलदस्ते के साथ फोटो देखी थी। कौन किसको दे रहा था गुलदस्ता यह पता नहीं चला लेकिन यह अंदाज़ लगाया जा सकता था कि नेशनल बुक ट्रस्ट के माध्यम से पैसा देश के आम नागरिक का ही लगा होगा। हमको डर था कि कहीं सामने पढ़ने पर हमको भी न कोई बचा हुआ गुलदस्ता थमा दिया। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं बच जाने का सुकून हासिल हो गया। कोई फूल, माला, गुलदस्ता देता है तो मैं सही में असहज होता हूँ। मुझे लगता है यह बेकार का खर्च हुआ।
फूल, माला, गुलदस्ता के बहाने परसाई जी के पंच याद आए :
"-कई गर्दनें मैंने ऐसी देखी हैं जैसे वे माला पहनने के लिये ही बनी हों। गर्दन और माला बिल्कुल ’मेड फ़ार ईच अदर’ रहती हैं। माला लपककर गले में फ़िट हो जाती है।
- फ़ूल की मार विकट होती है। कई गर्दनें, जो संघर्ष में कटने के लिये पुष्ट की गयीं थीं, माला पहनकर लचीली हो गयी हैं। एक क्रांतिकारी इधर रहते हैं जिनकी कभी तनी हुई गर्दन थी। मगर उन्हें माला पहनने की लत गयी। अब उनकी गर्दन छूने से लगता है, भीतर पानी भरा है। पहले जन-आन्दोलन में मुख्य अतिथि होते थे, अब मीना बाजार में मुख्य अतिथि होते हैं।
- फ़ूल की मार बुरी होती है। शेर को अगर किसी तरह एक फ़ूलमाला पहना दो तो गोली चलाने की जरूरत नहीं है। वह फ़ौरन हाथ जोड़कर कहेगा – मेरे योग्य कोई सेवा !"
कार्यक्रम खत्म होने के बाद लालित्य ललित जी से मुलाक़ात हुई। अपने साथियों , लाव-लश्कर के साथ पुस्तक मेले का इंतजाम देखते।
लेखक मंच पर दर्शकों में Samiksha Telang भी बैठी हुई थी। कार्यक्रम के बाद उनसे देर तक बातें होती रहीं। आज उनका अनुवाद पर कार्यक्रम है। कंचन Kanchan और स्वाति Swati की भी स्त्री अस्मिता पर बातचीत है। जाएँगे सुनने।
पुस्तक मेले के बहाने लेखकों, कलाकारों से बातचीत का इंतजाम होता है। दूर-दूर से आते हैं लोग बोलने। लेकिन उत्तर भारत में लोग सुनने नहीं आते। कोलकता, पुणे में जरूर आते हैं लोग। दर्शकों, श्रोताओं के बिना बोलने वालों को मजा नहीं आता होगा। खराब लगता होगा। मुझे लगता है जिस तरह राजनीतिक पार्टियां अपने श्रोता साथ लेकर रैली करती हैं उसी तरह से पुस्तक मेले में श्रोताओं का भी इंतजाम करना चाहिए।
500 प्रतिदिन के हिसाब से अगर सौ श्रोता बुलाये जाएँ तो पचास हज़ार रुपये प्रतिदिन का खर्च कोई ज़्यादा नहीं है। पढ़े-लिखे श्रोता बुलाकर उनसे सवाल भी पुछवाये जा सकते हैं। दस दिन चलने वाले पुस्तक मेले में पाँच लाख रुपये दर्शकों के इंतजाम के लिए खर्च करना कोई बुरा नहीं। जनता के पैसे का उपयोग जनता के मनोरंजन और अस्थाई रोजगार के लिए होने पर किसी को एतराज भी नहीं होगा।
आपको मेरा सुझाव बेवक़ूफ़ी का लग रहा होगा। लेकिन अमल में लाए जाने वाले तमाम सुझाव शुरू में बेवक़ूफ़ी के ही लगते हैं।लेकिन अमल में आने के बाद वही आइडिये क्रांतिकारी लगते हैं। बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य अद्भुत होता है।
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