Wednesday, October 12, 2005

जहां का रावण कभी नहीं मरता

http://web.archive.org/web/20140419102347/http://hindini.com/fursatiya/archives/59

[आज दशहरा है। दशहरा के अवसर पर ठेलुहा नरेश के पिताश्री डा.अरुण प्रकाश अवस्थी से सुने मौरावां के रावणों के बारे में संस्मरण और अवसरानुकूल एक कविता आपके लिये पेश हैं। ये संस्मरण निरंतर के अक्टूबर अंक के लिये अभी तक बचा के रखे गये थे। अब लगता है कि आज ही सबसे बढ़िया मौका है इनको पेश करने का।देशी-प्रवासी मित्रों को दशहरा के अवसर पर तमाम शुभकामनाओं समेत ]
रावण

रावण
मौरावां की रामलीला प्रसिद्ध है। यहां का रावण कभी नहीं मरता। रामलीला मैदान में बड़ा विशाल रावण बना है। मौरावां के रावण के कुछ इतिहास रहे हैं। जिन लोगों ने मौरावां में रावण का अभिनय किया है ,उनके बारे तमाम कथायें प्रसिद्ध हैं।
एक रावण का पार्ट करने वाले थे पंडित दुर्गादीन बाजपेयी । लंबा-चौड़ा सात फुटा शरीर। देखने में विशालकाय सचमुच के रावण लगते। ऊंची गरजदार आवाज। उस जमाने में माइक तो थे नहीं। लेकिन उनकी आवाज तीन किलोमीटर दूर पिंजरा तक जाती। अंग्रेज कलक्टर उनका अभिनय देखने आता था।
एक बार जब वो रामलीला में पार्ट कर रहे थे तो जिसको अंगद बनना था वो बीमार हो गया। अब क्या किया जाये ? रात को रामलीला थी। तो वहीं गांव में एक महावीर भुजवा थे। उन्होंने कहा -”मुझे अंगद का पाठ याद है। मैं कर दूंगा।” लोग बोले ठीक है किसी तरह काम संभाल लो।
रामलीला शुरु हुई । अंगद के वेश में महावीर भुजवा रावण के दरबार में आये । दुर्गादीन जी रावण बने थे। वे पहाड़ की तरह तो थे ही। दस सिर वाला मुकुट लगाते।बीस हाथ। वो तलवार लेकर एकदम गरज के बोले- कौन हो तुम?
गरज सुनकर अंगद का पाठ करने वाला घबड़ा गया। सिटपिटाकर बोला-महाराज हम महावीर भुजवा अहिन ,तुम्हार परजा।
तो अइसे-अइसे लोग थे।
एक शिवनारायन शनीचर थे। कुसुम्भी के थे। वे सीता का पार्ट करते थे।मौरावां के राजा शंकरसहाय ने उस जमाने में उनको सीता का पार्ट करने के लिये बनारस से साढ़े तीन सौ रुपये की साड़ी मंगा के दी थी। आज वो पांच हजार रुपये में भी नहीं मिलेगी।
एक बार रामलीला के दौरान जैसे ही अशोक वाटिका में दुर्गादीन दादा पहुंचे और गरज के तलवार लहराते हुयेकहा-
मास दिवस जो कहा न माना,
तौ मैं मारब काढ़ि कृपाना ।

आवाज की गरज और तलवार के पैंतरे से घबरा जाने से सीता का पार्ट करने वाले शिवनारायन जी की धोती गीली हो गयी।
झूला

झूला
रावणों के इतिहास में हमारे भैया भी थे। हमारे भैया जब रावण बनते थे तो दुर्गादीन मिसिर विभीषण बनते थे। एक बार रावण के दरबार से विभीषण को लात मारके निकालने का अभिनय करते समय भैया ने वो लात मारी कि दुर्गादीन मिसिर पड़े रहे तीन महीना । उनकी कमर की नस ही नहीं उतरी तीन महीना। फिर उन्होंने विभीषण का पार्ट करना ही छोड़ दिया।
भैया का रावण अंग्रेजी भी जानता था। विभीषण को लात मार के कहते-गेट आउट फ्राम माई दरबार।
एक्टिंग में भैया दुर्गादीन दादा से बेहतर थे। लेकिन आवाज की बुलंदी और भयंकरता में दुर्गादीन दादा का कोई जोड़ नहीं था। अंग्रेज डी.एम. उनका पार्ट देखने आता था। कहता था कि पंडित दुर्गादीन का पार्ट हो तो हमको जरूर बुलाना।
एक और रावण का पार्ट अदा करने वाले थे -पंडित रामिकिसुन। रामकिसुन जी ट्यूशन करते थे। दूसरे-तीसरे दर्जे के बच्चों को पढ़ाते थे। गांव में एक थे बलभद्दर बनिया। उनके बच्चों के लिये मैंने पंडित रामकिसुन का ट्यूशन लगवा दिया।यह कह कर कि पैसे आप लोग आपस में तय कर लेना। यहां का क्या हिसाब है मैं नहीं जानता।
ट्यूशन तय हो गया। वे जोर से पढ़ाते थे। पढ़ो -’क’ माने कबूतर।बच्चे जब कहते ‘क’ माने कबूतर तो वे कहते- “जोर से कहो। अभी तुम्हारे बाप ने नहीं सुना। घर के भीतर घुसा हुआ है।”
लड़का जोर से बोलता- ‘क’ माने कबूतर। जब वे देखते बलभद्दर नहीं हैं तो वे डंडा लहराते हुये ,कभी उसके मुंह में लगाते हुये कहते-“अरे बनिया, ब्याचै क सार हरदी-नून औ ससुर वेद पढ़ी! वेद पढ़ै क आवा है। न ससुर कबहूं सीधा देय न कुछ। मारब सारे तौ दांत भीतर हुइ जइहैं।”
जहां देखें कि बलभद्दर आ रहे हैं तो बोलें- पढौ़ ‘ख’ माने खरगोश।
एक बार जोर से पढ़ा रहे थे। ध्यान से उतर गया कि पूरब में निकलता है । तो बोले-‘सूरज पश्चिम में निकलता है।’
लड़के से कहा, जोर से बोलो- सूरज पश्चिम में निकलता है। लड़का बोला। बलभद्दर ने सुन लिया। भागते हुये आये। बोले- वाह रे महाराज!यहै पढ़ावति हौ? सूरज पच्छिम मां निकरत है?
रामकिसुन महाराज घूम के बैठ गये। बोले- ये बनेऊ, देंय का चार ठौ रुपया। चार रुपया मां सूरज पच्छिम मां न निकरी तो का पूरब मां निकरी? अगले महीना जौ पैसा न बढायेव तो अबकी दक्खिनै मां निकारव।
अगले महीने उनकी फीस चार रुपये से बढ़ के पांच रुपये हो गयी। सूरज पूरब में निकलने लगा। तब से अभी तक निकल रहा है। पैसा न बढ़ते तो शायद सूरज पूरब में न निकलता।
रामकिसुन महाराज हारते हुये भी जीत गये।
इसी तरह के तमाम संस्मरण हैं मौरावां की रामलीला के जहां का रावण कभी नहीं मरता। उनके बारे में बाकी फिर कभी।
पुनश्च : कभी न मरने वाले रावण के बारे में पूर्णिमाजी ने जानकारी चाही थी कि यह किस संदर्भ में कहा गया है कि मौरावां का रावण कभी नहीं मरता ? जानकारी करने पर डा.अवस्थी ने बताया कि मौरावां के राजा चन्दन लाल ने २०१ वर्ष पूर्व मौरावां में रावण की पत्थर की मूर्ति बनवाई थी। सिंहासन पर बैठे रावण की मूर्ति की ऊंचाई करीब ६-७ मीटर है। जहां मूर्ति है वह जगह लंका के नाम से तथा वहां के शिवजी लंकेश्वर महादेव के नाम से जाने जाते हैं। रावण की हर साल रंगाई-पुताई होती है। कुछ लोग व्यक्तिगत तौर पर रावण की पूजा-आरती भी करते हैं। वहीं लेटे हुये कुंभकर्ण की भी मूर्ति बनी है। कुंभकर्ण, जो कभी नहीं जागता।

मेरी पसंद

इस बार रामलीला में
राम को देखकर-
विशाल पुतले का रावण थोड़ा डोला,
फिर गरजकर राम से बोला-
ठहरो!
बड़ी वीरता दिखाते हो,
हर साल अपनी कमान ताने चले आते हो!
शर्म नहीं आती,
कागज के पुतले पर तीर चलाते हो।
मैं पूछता हूं
क्या मारने के लिये केवल हमीं हैं
या तुम्हारे इस देश में जिंदा रावणों की कमी है?
प्रभो, आप जानते हैं
कि मैंने अपना रूप कभी नहीं छिपाया
जैसा भीतर से था
वैसा ही तुमने बाहर से पाया है।
आज तुम्हारे देश के ब्रम्हचारी,
बंदूके बनाते-बनाते हो गये हैं दुराचारी।
तुम्हारे देश के सदाचारी,
आज हो रहे हैं व्याभिचारी।
यही है तुम्हारा देश!
जिसकी रक्षा के लिये
तुम हर साल-
कमान ताने चले आते हो।
आज तुम्हारे देश में
विभीषणों की कृपा से
जूतों दाल बट रही है।
और सूपनखा की जगह
सीता की नाक कट रही है।
प्रभो,
आप जानते हैं कि
मेरा एक भाई कुंभकरण था,
जो छह महीने में
एक बार जागता था।
पर तुम्हारे देश के ये
नेता रूपी कुंभकरण
पांच बरस में एक बार जागते हैं।
तुम्हारे देश का सुग्रीव
बन गया है तनखैया,
और जो भी केवट हैं
वो डुबो रहे हैं देश की
बीच धार में नैया।
प्रभो,
अब तुम्हारे देश में
कैकेयी के कारण
दशरथ को नहीं मरना पड़ता है,
बल्कि कम दहेज लाने के कारण
कौशल्याओं को
आत्मदाह करना पड़ता है।
अगर मारना है
तो इन जिंदा रावणों को मारो
इन नकली हनुमानों के
मुखौटों के मुखौटों को उतारों।
नाहक मेरे कागजी पुतले पर तीर चलाते हो
हर साल अपनी कमान ताने चले आते हो।
मैं पूछता हूं
क्या मारने के लिये केवल हमीं हैं
या तुम्हारे इस देश में जिंदा रावणों की कमी है?
-डा. अरुण प्रकाश अवस्थी

15 responses to “जहां का रावण कभी नहीं मरता”

  1. sarika
    बहुत अच्छा लेख लिखा है। यूं तो हम भारत में रह कर भी कभी दशहरा देखने नहीं जाते थे पर आपके ये वर्णन सुन कर लगा कि ये मेले देखने लायक होते होंगे।
    डा. अरुण प्रकाश अवस्थी की कविता बहुत अच्छी लगी
  2. Laxmi N. Gupta
    फुरसतिया जी,
    बढ़िया लिखा है। चित्र भी अच्छे हैं और शब्दचित्र और भी अच्छे हैं। कविता भी बहुत सामयिक और उत्तम है।
  3. जीतू
    क्या गुरु, याद करा दी, रामलीला की बात, इस बार सोचा था, रामलीला वाले प्रसंग पर लिखेंगे, लेकिन सही मूड नही बन सका,चलो आगे कभी। हम भी मोहल्ले की रामलीला खेलते थे,हमे सुषमा आंटी जबरद्स्ती सीता का रोल टिकाय दिये रही, अब मरता ना क्या करता, निभाना पड़ा।
    रावण कभी नही मरता। यदि मरता तो हर साल वापस ना आता। मारना है तो हमारे दिलो मे बसे रावण(भावना) को मारो,जो ईर्ष्या,द्वेष और अन्य विकार उत्पन्न करती है। उस सोच को मारो जो लोगों को लोगो से भेद करना सिखाती है। शायद यही संदेश देने के लिये हर साल रामलीला का मंचन किया जाता हैं।
  4. Atul
    जीतू भाई
    रामलीला की कहानी सभी सुनना चाहेंगे। अगली बार हाईकू या गजल चेंपने की जगह रामलीला पर लिख मारियेगा।
    शुकुल जी यह झूला दो तरह का होता था। एक तो फेरी व्हील जो आपने दिखाया है, दूसरा लकड़ी का जो काफी चूँ चूँ की आवाज करता था। लगता है अब वह विलुप्त हो गया।
  5. आशीष
    मुझे ये संसमरण (अंगद वाला )पढा हुवा लग रहा है, शायद कादम्बिनी मे.
    मजा आ गया.
    आशीष
  6. अक्षरग्राम  » Blog Archive   » उसका शब्दमेघ मेरे शब्दमेघ से कड़कदार कैसे?
    [...] �� कभी नहीं मरता। उनके बारे में बाकी फिर कभी। यह विषयान्तर हो गया.इस बारे में फ� [...]
  7. फुरसतिया » अपनी फोटो भेजिये न!
    [...] जोशीजे बताया कि उन्होंने मेरे लेख हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा और जहां का रावण कभी नहीं मरता पढ़ रखे हैं। इन दोनों लेखों से ही उन्होंने अन्दाजा लगा लिया कि हम कोई लेखक टाइप के आइटम होंगे। और उन्होंने हमारी फोटो मांगी संग्रह के लिये। [...]
  8. नीरज दीवान
    मस्त वर्णन हुआ है. आस्था के साथ भाईचारे के लिए उपयुक्त परंपराएं हैं.. हम सभी को ऐसे आयोजनों में बढ़-चढ़कर भाग लेना चाहिए।
  9. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] 3.कमजोरी 4.मुझसे बोलो तो प्यार से बोलो 5.जहां का रावण कभी नहीं मरता 6.हमारी उम्र तो शायद सफर में गुजरेगी [...]
  10. सन्तोष त्रिवेदी
    …महावीर भुजवा का प्रसंग जबरदस्त रहा !
    सन्तोष त्रिवेदी की हालिया प्रविष्टी..चींटी और हाथी !
  11. amit srivastava
    मौरावां का क्या , अब तो सब जगहों का रावण कभी नहीं मरता |
    amit srivastava की हालिया प्रविष्टी.." कच्ची रसीद………"
  12. वीरेन्द्र कुमार भटनागर
    रावण का रोल करने वाले कलाकारों से सम्बन्धित संस्मरण बहुत रोचक बन पड़ें हैं। आपका लेख एक बार पढ़ना शुरू करने पर पूरा पढ़े बिना छोड़ा नहीं जा सकता। डा॰ अवस्थी की कविता सोने पर सुहागा है। बधाई।
  13. रावणजी के बहाने कुछ इधर-उधर की
    [...] दशहरा मनाया। सबेरे-सबेरे फ़ेसबुक पर सात साल पहले की पोस्ट का लिंक चस्पा करके आज का स्टेटस सटाया: [...]
  14. देवांशु निगम
    बढ़िया है जी !!!!
    दस रूपया दई दिहिन होते तो चारँव ओर सेने सूरज निकाल दिहन होते पंडीजी !!!! :) :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..The “Talented” Culprit Since 1992
  15. : विदा होना एक दुर्लभ व्यक्तित्व का
    [...] मौरावां के रावण के बारे में बताया जो कि कभी नहीं मरता।मौरावां की लाइब्रेरी के बारे में भी [...]

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