Friday, November 09, 2018

आपका क्या होगा जनाबे अली


तीन मीटर दूरी पर रखे रेडियो पर यह गाना बज रहा है। बार बार कह रहा है -'आप का क्या होगा जनाबे अली।' जैसे हमी से सवाल कर रहा हो। मन किया उठकर जाएं और उमेठ के बंद कर दें कहते हुए -'बड़ा आया पूछने वाला -आप का क्या होगा जनाबे अली।'
लेकिन आलस्य ने बरज दिया। आलस्य को लोगों ने 'बेफालतू' में बदनाम किया है। आलस्य के चलते तमाम 'हिंसाबाद' रुक जाता है। किसी को पटककर मारने की मंशा उठाने, पटकने और फिर मारने में लगने वाली मेहनत को सोचकर स्थगित हो जाती है। दुनिया में आलस्य के चलते न जाने कितने बुरे काम होने से बचे हैं। आलस्य की महिमा अनंत है। चुपचाप भले काम करता रहता है यह बिना अपना प्रचार किये।
रेडियो को लगता है हमारे गुस्से की भनक मिल गयी। इसीलिए 'पान पराग' का हल्ला मचाने लगा। बदमाश है रेडियो। जैसे आजकल मीडिया एक बवाल को दबाने के लिए दूसरे बवाल की बाइट फुदकती है वैसे ही रेडियो ने भी 'जनाबे अली' से ध्यान बंटाने के लिए 'पान पराग' चला दिया।
बहरहाल पान पराग की बात पर हंसी आई। सुबह-सुबह की चाय के बाद पान पराग कौन खाता है। चाय वह भी अदरख वाली। लेकिन 'पान पराग' का कॉन्फिडेंस है भाई। सबेरे डंके की चोट पर पान पराग का हल्ला मचा रहा है। वैसे इस कॉन्फिडेंस की वजह है। किसी कनपुरिये मसाला भक्त को कोई अमृत भी दे मसाला खाने के बाद तो मुंह में मसाले के आनन्दातिरेक में आंख बंद करके कहेंगे -'अभी मसाला खाये हैं।' मल्लब मसाले के बाद अमृत कैसे पी लें, मसाले का अपमान होगा।
बहरहाल बात चाय की हो रही थी। सुबह से तीसरी चाय पी। अदरख वाली। पहली चाय में अहा, अहा। दूसरी में ठीक , ठीक। तीसरे कप तक मामला आते आते चाय की इमेज वही हो गयी जो लोकतंत्र में सरकारों के तीसरे चुनाव तक हो जाते हैं। एंटीइनकंबेंसी फैक्टर हर जगह होता है। चुनाव की सुविधा होती तो एक ही केतली की तीसरी चाय पीने के बजाय दूसरी केतली की चाय ही पीते, भले ही पीने के बाद वह पहली से घटिया लगती।
हम और कुछ सोंचे तब तक रेडियो सिटी ने हल्ला मचा दिया कि सीसामऊ में 'ए टू जेड' में सब कुछ मिलता है। दुकान न हुई डिक्शनरी हो गयी। वैसे ये डिक्शनरी भी एक लफड़ा है। पहले तो देखते थे। आजकल तो सब आनलाइन है।स्पेलिंग के हाल बेहाल हैं। जिन शब्दों के साथ बचपन और जवानी में उठते-बैठते रहे उनकी तक याद धुंधला जाती है अक्सर। अक्सर भूल जाते हैं कि किसी शब्द में 'आई' लगेगा कि 'वाई'। 'ई' 'एल' के पहले आएगा या बाद में। इस चक्कर में डॉक्टरों की तरह गड्ड-मड्ड लिख देते हैं। बिना सीपीएमटी किये डाक्टर बन जाते हैं। हमने तो लिख दिया 'गोलिया' के। झेलें पढ़ने , टाइप करने वाले। हड़काने का मौका अलग से मिलता है-'तुमको यह तक नहीं आता। कौन स्कूल में पढ़े हो।'
कभी सोचते हैं कि शब्द भी अगर बोल-लिख सकते और अपने साथ रोज होते दुर्व्यवहार की शिकायत 'मीटू' अभियान के तहत करते तो अनपढ़ों के अलावा दुनिया के सब लोग कटघरे में खड़े होते।
हम और कुछ सोचते तब तक गाना बजने लगा :
'सावन आया रे
तेरे मेरे मिलने का मौसम आया रे।'
हमने हड़काया रेडियो को। हमको हनीट्रैप में फंसा रहा है। जैसे विकसित देश पिछड़े मुल्कों को अपनी पुरानी तकनीक नई कहकर टिका देते हैं वैसे ही ये मुआ रेडियो सावन बीत चुकने के बाद सावन के आने की खबर सुना रहा है। मीडिया की तरह हरकतें कर रहा है। सावधान न रहते तो सही में मिलने के लिए हाथ में गुलदस्ता लेकर निकल लेते।
बहरहाल बाल बाल बचे। अब आगे का किस्सा फिर कभी। अभी चलते दफ्तर। देर हुई तो सही में सुनना पड़ेगा -आप का क्या होगा जनाबे अली।

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Wednesday, November 07, 2018

त्योहार बाजार की गोद में बैठकर आता है


कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.
अभी-अभी पैदा हुआ बच्चा झालर बनाने में लग गया। कूदते हुए कहीं चोट लग जाये तो कौन जिम्मेदार होगा। बालश्रम का सरासर उल्लंघन है यह कानून।
दीपावली एक बार फ़िर आ गई ! पूरे फ़ौज फ़ाटे के साथ आई है। साथ में बाजार को लाई है। आजकल हर त्योहार बाजार के साथ ही आता है। हर त्योहार का बाजार से गठबंधन हो रखा है।
जैसे लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों ने चैनल , अखबार खरीद रखे हैं वैसे ही बाजार ने त्योहार खरीद लिये हैं।
त्योहार आजकल बाजार पर पूरी तरह आश्रित हो गये हैं। उसने अपनी सारी ताकत बाजार को सौंप दी है।त्योहार बिना बाजार के आने से डरता है। उसको लगता है कि बाजार के बिना उसको कोई पूछेगा नहीं। आजकल त्योहार बाजार की गोद में बैठकर आता है। सारे त्योहार बाजार-बालक सरीखे हो गये हैं। लोकतंत्र में सरकारें कारपोरेट के इशारे पर नाचती हैं। त्योहार बाजार की धुन पर थिरकते हैं।
जैसे बिना पैसे चुनाव नहीं लड़े जाते वैसे ही बिना बाजार त्योहार नहीं मनता। बिन बाजार त्योहार है सून।
राजा महाराजाओं की सवारी निकलती थी तो सबसे पहले हरकारे हल्ला मचाते हुये निकलते होंगे - ’होशियार, खबरदार, शहंशाहों के शहंशाह, बादशाहों के बादशाह जिल्लेइलाही, महाराज पधार रहे हैं।’
बाजार आज का बादशाह है। शहंशाहों का शहंशाह है। जिल्लेइलाही है । महाराज है। हर त्योहार पर उसकी सवारी निकलती है। अपना जलवा देखने के लिये वह निकलता है। जहां-जहां से उसकी सवारी निकलती है , वहां-वहां रोशनी की बौछार हो जाती है। उसके रास्ते की हर सड़क चमक जाती है।
लोकतंत्र में मंत्रियों के दौरे की सूचना के पोस्टरों से शहर पट जाते हैं। त्योहारों पर बाजार का दौरे होते हैं। इसकी सूचना हर आम और खास को शुभकामना संदेशों के जरिये दी जाती है। त्योहारों पर दिये जाने वाले शुभकामना संदेश बाजार के हरकारे होते हैं। वे घोषणा करते हैं-’ होशियार, खबरदार, शहंशाहों के शहंशाह, जिल्लेइलाही बाजार जी पधार रहे हैं।’
शुभकामना संदेश आपको त्योहार के मौके पर लुटने के लिये तैयार करते हैं। संदेश पाकर आप खुशी से उत्तेजित हो जाते हैं। इन्ही उत्तेजना के क्षणों में बाजार आपसे मनमानी करता है। आपको लूट लेता है। लूटकर फ़ूट लेता है। आप लुटने के बाद ’मीटू’ घराने की शिकायत भी नहीं कर सकते। करेंगे भी तो बाजार यह कहकर बच जायेगा-’ये सहमति से बने संबंध थे।’
शुभकामना संदेश भी बाजार अपने हिसाब से बनवाता है। इस बार जो संदेश टहल रहे हैं उनमें से एक में एक नल से गिन्नियां निकल रही हैं। सारी गिन्नियां हाथ में समाती जा रही हैं। बगल में कमल खिला हुआ है। मतलब कमल देख रहा है, नल से गिन्नियां निकल रही हैं। किसी अनजाने के हाथ में समाती जा रही हैं। हाथ हिल तक नहीं रहा है। निठल्ला है। बिना मेहनत की कमाई निठल्ले हाथ में समा रही है। कोई कुछ बोल नहीं रहा है।
कायदे से यह मामला आय से अधिक संपत्ति का बनता है। जीएसटी चोरी का बनता है। काली कमाई का बनता है। लेकिन कोई कुछ बोल नहीं रहा है। बोले भी कौन ? सीबीआई , रिजर्व बैंक ईडी सब अपने लफ़डों में फ़ंसे हैं। लोग भी एक दूसरे को भेज रहे हैं यह बिना मेहनत की कमाई। लेकिन यह आभासी कमाई है। इसके झांसे में बाजार आपकी जेब से क्या लूट ले गया आपको हवा तक नहीं लगेगी।
कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.
बिना मेहनत, बिना रसीद के गिन्नियां गिरकर समा रहीं हैं हाथ में। कोई शिकायत नहीं कर रहा है। सब चुपचाप देख रहे हैं।
दूसरा संदेश आज ही चलन में आया है। एक स्केच बनता है। स्केच से एक बच्चा निकलता है। निकलते ही वह बच्चा बेचारा बल्ब और उसकी झालर बनाने निकल लेता है। झालर बनाते हुए जब कूदता है बच्चा तो मेरा जी यह सोचकर दहल जाता है कि कहीं गिर गया तो चोट लग जायेगी। झालर बनाकर बच्चा उसके शुभकामना संदेश बनाता है। घर-घर बांटता है।
भले ही एक स्केच हो लेकिन है तो अभी-अभी पैदा हुआ दुधमुंहा बच्चा ही। पैदा होते ही बिना सोहर सुनाये बच्चे को काम में जोत दिया गया। उसकी अम्मा अपने बच्चे को दूध भी न पिला पाई। पक्का उसका दूध भी बिक गया होगा डब्बे में बन्द होकर। क्या पता बच्चे का बनाया ग्रीटिंग कार्ड और दूध का डिब्बा किसी माल में एक साथ बिक रहा हो।
एक दुधमुंहे बच्चे को उसकी मां के दूध से वंचित करके झालर और बल्ब सजाने , शुभकामना संदेश बनाने के लिये लगा देना कहां की इंसानियत है भाई। बजर गिरे ऐसे बाजार पर। नठिया कहीं का।
बाजार तो जो कर रहा है वह कर ही रहा है। वह तो है बदमाश। अपनी बढोत्तरी के लिये वह हर जायज-नायाजज हरकते करता ही है। लेकिन हम भी तो बिना जाने-बूझे उसको बढावा दे रहे हैं। हाल ही में पैदा हुये बच्चे से ग्रीटिंग कार्ड बंटवा रहे हैं। यह बालश्रम कानून का भयंकर उल्लंघन है। वो तो कहिये सुप्रीम कोर्ट अभी सीबीआई, राफ़ेल, राममंदिर में उलझा हुआ है वर्ना इस मसले का स्वत: संज्ञान लेकर नोटिस दे देता तो आप ग्रीटिंग भेजना भूलकर मेसेज कर रहे होते -’ भाई साहब, सुप्रीम कोर्ट के किसी वकील से जान पहचान हो तो बताइये।’
इसीलिये हम इन सब फ़र्जी और मुफ़्तिया शुभकामना संदेशों के झांसे में नहीं आते। अपने मन के कारखाने में बनी शुद्ध बधाइयां भेजते हैं। शुभकामनायें साथ में नत्थी कर देते हैं। बधाइयां और शुभकामनायें पक्की सहेलियां हैं। साथ -साथ खुशी-खुशी चली जाती हैं।
आपको भी भेजी हैं, बधाई और शुभकामनायें। दीपावली मुबारक हो, मंगलमय हो।

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