Wednesday, April 25, 2018

एटीएम में नकदी


हल्ला मचा हुआ है कि एटीम से पैसा फ़रार है। जैसे ही खबर दिमाग तक पहुंची उसने दिल से पूछा -’बताओ इस खबर को सच मानें कि अफ़वाह? इसे दुख के खाने में धरें कि आनन्द महल में बैठायें?’
आम तौर पर बेवकूफ़ी की बात कहने के लिये बदनाम दिल ने समझाइश दी -’ ’ आज के समय में सच और अफ़वाह में कोई अंतर नहीं रहा । अफ़वाह कब सच में बदल में जाये और सच कब अफ़वाह साबित हो जाये इसे कोई जानता नहीं। इसलिये दोनों ही मानो इसे। जैसा मौका आये वैसा उपयोग करे।’
’सच और अफ़वाह एक कैसे हो सकते हैं भाई !’ - दिमाग ने तार्किक होने की कोशिश करते हुये पूछा।
अरे भाई जब गुंडे-बदमाश- माफ़िया लोग जनता की सेवा कर सकते हैं तो सच और अफ़वाह एक क्यों नहीं हो सकते। सच आखिर क्या है- ’डंके की चोट पर बोला जाने वाला झूठ ही तो। जो झूठ वायरल हो जाता है वही तो सच का बाप कहलाता है।’
हम इस सिरीमान दिल की ऊंची बात छोड़कर एटीएम से बतियाने लगे। उससे पूछा -’ ये नोट आपके पास टिकते क्यों नहीं हैं ? कहां चले जाते हैं?’
’आजकल जिसे देखो उसे बाजार पहुंचने का चस्का लगा है। हर आदमी बाजार पहुंचना चाहता है। बिकता चाहता है। फ़िर बाजार तो नोट का मायका होता है। जहां मौका मिलता है उछलते हुये पहुंच जाता है बाजार।
’पहले और आजकल के नोट के व्यवहार मेंं कोई अंतर आया है क्या?’ - हमने एटीएम से पूछा।
अरे पहले के नोट बड़े संस्कारी टाइप होते थे। दो-दो, तीन-तीन दिन साथ रहते थे। आजकल के नोटों की तो पूछो ही मती। इनकी हरकतें देखकर लगता है सही में जमाना बड़ा खराब आ गया है। आज के नोट बहुत मनचले टाइप के होते हैं। जहां एटीएम में आये नहीं बाहर भागने के लिये उतावले रहते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है नकदी नकदी न होकर जेल आया कोई वीआईपी हो जिसकी जेल बाद में होती है, बेल पहले होती है। आजकल का पैसा इतना मनचला होता है कि आते भी जाने का जुगाड़ खोजता है।
’लेकिन अगर एटीएम तो हमेशा नकदी निकालने के लिये होते हैं। नोट अगर एटीएम में न रहे तो एटीएम का उपयोग क्या ?’ -हमने एटीएम से पूछा।
आप तो समझदारों की तरह सहज बेवकूफ़ी की बात कर रहे हैं। आज के समय में जिसका जो काम होता है वह करता कहां है? अपना काम करना आजकल के फ़ैशन के खिलाफ़ है। फ़िर एटीएम से आप कैसे आशा करते हैं कि उसमें पैसे रहेंगे?
’अच्छा पैसे जब एटीएम में रहते नहीं तो कैसा लगता है आपको? ’ -हमने एटीएम जी से पूछा।
लगता कैसा है कैसे बतायें? आप ऐसा समझ लो कि अगर बगल के एटीएम में पैसे हुये और अपन खाली हुये तो ऐसा लगता है जैसे किसी किसी विधायक को मंत्री पद मिलने पर उसके साथ के विधायक को लगता होगा। जब बगल वाले में भी पैसे नहीं होते तो ऐसा लगता है जैसे किसी पार्टी के मार्गदर्शक मंडल के सदस्यों को महसूस होता है।
हम एटीएम से बतिया ही रहे थे कि किसी ने अपना कार्ड उसके मुंह में ठूंस दिया। एटीएम का मुंह बंद हो गया। मन किया कि ठहरकर देख लें कि उसका पैसा निकला कि नहीं लेकिन फ़िर देखा नहीं। देखने में सच और अफ़वाह में कोई एक सही साबित हो जाता। हमारे जीने के सहारों में से एक कम हो जाता। हमारी ताकत आधी हो जाती। अभी तो सच भयावह लगता है तो उसको अफ़वाह मान लेते हैं। अफ़वाह मन को सुकून देती है तो उसको सच मानकर खुश हो लेते हैं। दोनों में से कोई एक भी न रहा तो बवाल हो जायेगा। जीना और मुश्किल हो जायेगा। है न !

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Sunday, April 22, 2018

अगली बार एमलाइट लेते आना

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और बाहर
मंदिर के बाहर माँगने वाले
मुसम्मी छीलता आदमी
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सबेरे सड़क पर निकले। सड़क खाली थी। कोई आये, कोई जाये। लोग आ-जा रहे थे। जब तमाम लोग घरों में बैठे बातें और घुइंया छील रहे होंगे उस समय ठेलिया पर फ़ल सजाये फ़ल वाला मुसम्मी छील रहा था। उसको पता है कि उसको रोटी मुसम्मी छीलने से ही मिलेगी। एक मोटर साइकिल वाला तख्त पर बैठा मोटर साइकिल के सामने सर झुकाये मोबाइल में डूबा हुआ था। शायद मोबाइल पर मोटरसाइकिल से चैटिंग कर रहा हो।


कान फ़ड़फ़ड़ाता कुत्ता
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एक कुत्ता अचानक अपने दोनों कान फ़ड़फ़ड़ाते हुये सड़क पर आ गया। शायद अपनी धूल झाड़ रहा हो। धूल झाड़कर वह सड़क पर घिसटने लगा। उसके पिछले पैर जमीन पर घिसट रहे थे। शायद किसी गाड़ी की चपेट में आ गया था। जिन्दगी ऐसे ही गुजरेगी उसकी अब। आदमी के इलाज में तो आफ़त है। कुत्तों का इलाज कौन करायेगा?
रंग-बिरंगे कपड़े पहने भिखारी
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तिवारी स्वीट्स से पंकज जी के लिये जलेबी, दही और समोसा तौलवाकर आगे बढे तो वृहस्पति मंदिर के पास दो भिखारी बैठे दिखे। लोग आना शुरु नहीं हुये थे। एक मांगने वाले ने रंग-बिरंगे कपड़े धारण किये हुये थे। हमको खड़े देखा तो टहलते हुये पास आते हुये बोला-’ चाय पिलाओ।’ हम भी उसको टहला दिये कि लौट के आते पिलाने। वैसे सोचा भी यही था कि लौटते हुये रुकेंगे लौटते हुये। अभी तो भगवती प्रसाद दीक्षित के अंदाज में -’आगे के मोर्चे हमको आवाज दे रहे रहे।’
न्यूनतम भीख का सवाल
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आगे पीपल कोठी के पास दो अखबार वाले सड़क पर जमें अखबार बेंच रहे थे। बहिष्कार के हल्ले के बावजूद सबसे अधिक संख्या में दैनिक जागरण अखबार रखा था दुकान में। शायद लोगों ने न खरीदा हो इसलिये बचा हो। आगे फ़िर एक मंदिर दिखा। वहां भी कुछ भिखारी ड्यूटी पर तैनात थे। मुझे लगता है धर्मस्थलों के बाहर भीख मांगकर गुजारा करने वालों की संख्या करोडों में तो होगी। क्या पता कल को भीख को भी रोजगार का दर्जा मिल जाये। फ़िर तो धर्मस्थलों के हिसाब से रजिस्ट्रेशन होने लगेगा मांगने वालों का। पीएफ़ वगैरह कटने लगे। छुट्टियां भी मिलने लगें। न्यूनतम भीख का भी प्रावधान होने लगे। उससे कम भीख मिलने पर भुगतान की जिम्मेदारी धर्मस्थलों होने लगे। सरकारी भिक्षालयों और प्राइवेट भिक्षालयों की गुणवत्ता की तुलना होने लगे।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग खड़े हैं और बाहर
अबकी बार आना तो एमलाइट लेते आना
भोजनालय अपना है लेकिन उधार बंद है
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आगे स्टेशन के पास एक भोजनालय दिखा। उसमें लिखा था ’अपना भोजनालय लेकिन उधार बन्द है’। शायद पैसों वालों के बैंक से पैसे लेकर फ़ूट लेने की घटनाओं से सावधान होकर दुकान वाले ने यह कदम उठाया हो। बीच सड़क पर रिक्शे में सरिया लादे हुये एक आदमी आगे बढने के पहले सुर्ती फ़टकते हुये चलने की तैयारी कर रहा था। बीड़ी सुलगाने के बाद वह आगे बढा। दो रिक्शेवाले एक ही रिक्शे में गुड़ी-मुडी होकर बतिया रहे थे। उनके अंदाज-ए-गुफ़्तगू से लग रहा था कि उसकी वार्ता खत्म होते ही देश की दो-चार समस्यायों के हल तो पटापट गिरेंगे ही आगे।


हम फ़ेल नहीं हुये थे
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पंकज बाजपेई ठीहे पर बैठे थे। देखते ही लपककर मिले- ’बोले आ गये। आ गये। हम आपका इंतजार कर रहे थे।’ नाम पूछते ही बताया -’अनूप।’
हमने पूछा -’दाढी क्यों नहीं बनाई?’
बोले- ’कोमल और संजय के मामा नहीं रहे तो इसलिये दाढी नहीं बनाई। आज बनायेंगे। शोक पूरा होने के बाद।’
जलेबी, दही, समोसा कब्जे में लेने के बाद बोले- ’हलवाई को पैसे मत देना। उसने बर्फ़ी नहीं दी थी। पिछली बार सौ रुपये दे गये थे वो बकाया हैं।’
हमने कहा -’इसका हिसाब करेंगे अभी। बताओ चाय पी कि नहीं?’
बोले-’ सुबह पी थी। एक। अभी पियेंगे। ’
हमने पूछा -’किसके यहां पियोगे? मामा के यहां कि भाभी के यहां?’
बोले-’ मामा के यहां पियेंगे।’
मामा के यहां चाय पीते हुये हमने पूछा -’अच्छा बताओ तुमने कित्ते तक पढाई की है? डिग्री कहां है?’
बोले-’ हमने बीए किया है। हम फ़ेल नहीं हुये थे। वो रामशंकर श्रीवास्तव फ़ेल हुये थे। हम पास थे। डिग्री मम्मी के पास है। तुमको दिखायेंगे।’
बेवकूफ़ी की बात और दिमाग की फ़टकार
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हमने कहा-’ अच्छा कोई उपन्यास, कहानी, कविता की याद हो तो बताओ।’
बोले- ’उपन्यास नहीं पढते थे। केवल कोर्स की किताब पढते थे।’
हमने पूछा था- ’अच्छा कोई कविता याद हो तो सुनाओ बचपन की।’
बोले-’अभी याद नहीं । फ़िर सुनायेंगे। सुना देंगे।’
हमने कई कविताओं की याद दिलाई-’ उठो लाल अब आंखे खोलो, हठ कर बैठा चांद एक दिन, हिमाद्रि तुंग श्रंग से, रणबीच चौकड़ी भर-भरकर, बुन्देलों हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी।’ कोई भी कविता याद नहीं आई उनको। हमने फ़िर झंडा गीत के बोल सुनाये वह भी गोल। वन्दे मातरम और राष्ट्रगान भी नहीं याद।
उसी समय हमने सोचा कि क्या पता कभी अनिवार्य हो जाये कि देश के सब लोगों को वन्देमातरम और राष्ट्रगान गाना अनिवार्य है। जो न गा पायें वे ’देश-बदर’ हो जायें। ऐसी हालत में पंकज बाजपेयी जैसे लोग किधर जायेंगे।
आगे हम इस पर कुछ और सोच पायें तबतक दिमाग ने बहुत तेज डांट दिया- ’क्या बेवकूफ़ी की बातें सोचते हो।’ हम चुप तो हो गये लेकिन फ़िर मिनमिनाते हुये दिमाग से कहने की कोशिश किये-’ इतनी बेवकूफ़ी की हरकतें रोज-डेली हो रही हैं उनको देखते हुये इसके बारे में सोचना क्या इतना बड़ा गुनाह हो गया कि इत्ती जोर से डांट दिये हमको सुबह-सुबह।
दिमाग ने हमको प्यार से लड़ियाते हुये पुचकारा और कहा कि गुनाह अपने आप कोई बड़ा-छोटा नहीं होता बाबू। यह तो सजा सुनाने वाला तय करता है कि गुनाह कैसा है? आये दिन अनगिनत अपराधी छूट रहे हैं, निर्दोष सजा पा रहे हैं। जमाना बड़ा खराब है इसीलिये तुमको समझाये। तुमको प्यार करते हैं न इसलिये डांटा।
हमारे पास दिमाग की बात का कोई जबाब नहीं था। इसलिये चुप हो गये।

चार बीबियों वाले पंकज बाजपेयी
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इसबीच पंकज बाजपेयी से पूछा -’शादी करा देते हैं तुम्हारी। करोगे।’
’हमारी तो शादी हो गयी। चार बीबियां हैं।’ नाम भी गिनाये पंकज जी ने- ’सुषमा, विपाशा, रेखा, राधिका।’ आठ बच्चे भी बताये। साथ में यह भी कि ’उनके दो बच्चे कोहली उठा ले गया था।’
मिठाई की दुकान वाले ने बताया कि उसके यहां से रोज मिठाई खाते रहे पंकज। 150 रुपये हुये हफ़्ते भर के। हमने पूछा तुम तो कह रहे थे कि मिठाई दी नहीं दुकान वाले ने। इस पर लजाते हुये बोले पंकज- ’ये ताजी वाली बर्फ़ी नहीं देते।’
चलते हुये दस रुपये जेब खर्चे के मांग लिये। बोले - ’शाम को चाय पियेंगे।’
हमने पूछा - ’पांच-पांच के सिक्के दें कि दस का सिक्का?’
बोले-’पांच-पांच के सिक्के दे देव।’
पैसे देकर अपन चले आये। पंकज बोले- “मामी को पांव छूना कहना। अगली बार एमलाइट लेते आना। बढिया दवाई है गैस की। “
एमलाइट की बात याद दिलाने पर हमें याद आया- ’इस्स, इसे तो हम भूल ही गये थे।’

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Tuesday, April 17, 2018

नरोना चौराहे की सुबह


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, साइकिल और बाहर
नरोना चौराहे पर सुबह नींद लेते रिक्शेवाले
सबेरे-सबेरे बंदर बगीचे में आ गये। हर खाली जगह पर आसन जमाने लगे। देखते ही हमने उनको दौड़ाया। वे पूंछ उठाकर फ़ूट लिये। उपद्रवियों को देखते ही दौड़ा लो तो ठीक। वर्ना वे दौड़ायेंगे जमने के बाद।
सड़क पर निकले। सामुदायिक शौचालय के बाहर तख्त पर एक आदमी बैठा अखबार पढ रहा था। साथ की महिला झुककर , खबर की तरह अखबार से चिपकी हुई थी। अखबार में शायद हत्या, बलात्कार, दुष्कर्म की खबरें देखकर अखबार से बाहर निकल आई। सड़क ताकने लगी। शायद कुछ बेहतर दिखे।
दो कुत्ते एक-दूसरे पर भौंकते हुये आपस में खेल रहे थे। मित्रता-पूर्वक लड़ते भी जा रहे थे। भौकते हुये एक-दूसरे को दांत भी दिखा रहे थे। उनको आपसे में भौकते देखकर लगा मानो किसी टेलिविजन चैनल में जारी बहस में विरोधी पार्टियों के प्रवक्ता अपना मत जाहिर कर रहें। कुछ देर भौंकने, गुर्राने, लड़ने और खेलने के बाद दोनों कुत्ते इधर-उधर हो गये।
चौराहे पर कुछ रिक्शे वाले अपने रिक्शों पर सुबह की नींद-मलाई चांप रहे थे। एक मां अपनी बच्ची को हाथ पकड़कर स्कूल भेज रही थी। बच्ची के आंख में काला चश्मा था। हाव- भाव से लग रहा था कि उसको दिखता नहीं है। लेकिन वह सर उठाकर इधर-उधर देखते हुये अपनी मां के साथ आगे बढ रही थी।
एक बुजुर्गवार अपनी पत्नी के साथ टहल रहे थे। महिला को चलने में परेशानी हो रही थी। एक कदम चलने के बाद चार कदम ठहरते हुये चल रही थी। पास ही के घर में रहते हैं दोनों। महिला को चलने में कष्ट था लेकिन वह मुस्करा रही थी। पुरुष को तकलीफ़ नहीं लेकिन उसके चेहरे से भन्नाहट झलक रही थी। शायद सुबह-सुबह पत्नी के साथ जबरियन टहलने की दुख चेहरे पर चिपका हुआ था।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, वृक्ष और बाहर
1941 की इमारत अभी भी बुलंद है
कोने की बिल्डिंग पर नाम लिखा था 'शफ़ी बिल्डिंग'। 1941 में बनी थी। मने भारत छोड़ो आन्दोलन के एक साल पहले। 77 साल की बुजुर्ग इमारत अभी भी मजबूत दिख रही थी। पुताई-सुताई हो जाये तो चमकने भी लगे। मोहन खस्ता भण्डार और चाट पैलेस की तरह।
चौराहे पर राधा ठंडा पानी की ठेलिया खड़ी थी। एक रुपये का पाउच। राधा पाउच अकेले बिक रहा था। श्याम पाउच नदारद। पीछे कोने की जमीन पर पीपलेश्वर मन्दिर काबिज हो गया था। किसी की रोजी-रोटी का जुगाड़ हो गया होगा इस अतिक्रमण से। अब तो मन्दिर हो गया। जुगाड़ स्थाई हुआ समझा जाये।
गणेश शंकर विद्यार्थी जी मूर्ति के पास बैठा एक आदमी किसी से फ़ोन पर बतिया रहा था। विद्यार्थी जी बेचारे चुपचाप सामने बिछी गिट्टी, कोलतार और सड़क को देख रहे होंगे। आते-जाते न जाने कितने नजारे देखते होंगे। अपनी छतरी के नीचे अनगिनत अवैध काम होते देखते हों। साम्प्रदायिक बातें सुनते हों। लेकिन मूर्ति में बदल जाने के चलते अब लिख नहीं पाते होंगे। शायद अफ़सोस करते हों।
महापुरुषों के साथ यह त्रासदी होती है। उनके जाने के बाद उनके ही अनुयाई उनका जुलूस निकालते हैं। महापुरुष जैसे तो बन नहीं पाते। महापुरुष को अपने जैसा बना लेते हैं।
महापुरुषों वाली यह यह बात शायद समाज के हर तबके में लागू होती है। साहित्य में भी। बड़े साहित्यकारों के चेले साहित्यकारों के गुजर जाने के बाद उनके नाम ऐसा गदर काटते हैं कि साहित्यकार बेचारा शर्मा जाये। जिस बात के लिये कभी साहित्यकार से डांटे जाते होंगे उसके जाने पर उससे भी गड़बड़ हरकतें उसके प्रति प्रेम में डूब करते हों। उसके नाम पर इनाम स्थापित करके जुगाडू पिछलग्गुओं में बांटते हैं। साहित्यकारों से नजदीकी को सीढियों के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
आसमान ऐसे दिख रहा था जैसे हवाई यात्राओं में जहाजों से दिखता है। किसी बहुत बड़े टब में घुले घोल की तरह। टब के वासिंग पाउडर में सारी दिशाओं को धो-फ़ींचकर सूरज भाई फ़ैला देते होंगे।
बड़ी होर्डिंग में अक्षय कुमार फ़ार्चून तेल बेंचते दिखे। तेल बेंचने के लिये वे कह रहे हैं- ’फ़ार्चून में हर खाना घर का खाना होता है।’ इससे लगता है आदमी लोगों ने किचन संभाल लिये हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। बाजार पुरुषों के इस्तेमाल की चींजे महिलाओं से बिकवाता है। महिलाओं के काउंटर पर आदमियों को खड़ा कर देता है। पहले सब सामान केवल महिलायें बेंचती थीं। सेविंग क्रीम से लेकर ट्रक के टायर तक। अब सौंदर्य के हलके में आदमियों को भी प्रवेश मिलना शुरु हुआ है। आदमियों ने तेल बेंचना शुरु कर दिया।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर
मार्गदर्शक इमारत में दाना पानी। बुजुर्गा इमारत के सामने अपन की साइकिल सुंदरी।
नुक्कड़ की इमारतें सौ साल से पुरानी हैं। एक में 'खाना-पानी' रेस्टोंरेंट खुला है। दूसरी में 'दाना-पानी।’ मतलब रेस्टोरेंट भी लगता है तुक्कड़ कवियों के हैं।
एक आदमी बताता है- ’सौ साल से पुरानी हैं ये बिल्डिंगे। पारसियों की थीं। अब सब छोड़कर चले गये। दो-ढाई हजार पारसी परिवार बचे होंगे देश भर में।’ हमने संख्या पर एतराज जताया कि इतने कम नहीं होंगे। लेकिन वह दो-ढाई हजार से आगे बढने को राजी ही नहीं हुआ। हम चुप हो गये।
एक इमारत पर जो लिखा था उससे लगता है वह सन 1822 की है। मतलब इमारतों के कुनबे के हिसाब से ’बिल्डिंग नातियों वाली’ कही जायेगी। 

चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर
1822 की जमुना बिल्डिंग में खाना-पानी
बुजुर्गा इमारत पर नाम लिखा था - ’जमुना कोठी प्रोप्राइटर एच डी भार्गव।’ 1822 की बनी है बिल्डिंग। मतलब चार साल बाद अपना दो सौंवा जन्मदिन मनायेगी। बर्थ डे केक काटेगी।
एक कोने में पान मसाले के खिलाफ़ नारा लिखा है:

"जर्दा खाकर थूक रहा है,
मौत के आगे कूद रहा है।"

मतलब जर्दा खाना मौत के आगे कूदने जैसा है। लेकिन यह इश्तहार ऐसी जगह है कि आम इंसान को पढने में न आयें। क्या पता लोग बिना पढे इसी पर जर्दे थूकते हों।

आगे सुरेन्द्र नाथ सेन बालिका विद्यालय की बच्चियां स्कूल आ रही थीं। बच्चियों के सभी संस्थानों की तर्ज पर स्कूल का मुख्य द्वारा बंद था। बच्चियां छोटे गेट से स्कूल के अंदर जा रहीं थी।

एक स्कूल के रिक्शे में कुछ बच्चे स्कूल जा रहे थे। दो बच्चे रिक्शे के पटरे पर चौकीदारों की तरह खड़े थे। बगल से गुजरते हुये हमने पूछा-’ तुमको बैठने को नहीं मिला। बच्चे शर्माने और फ़िर मुस्कराने लगे।’

लौटते हुये सुबह देखा कि सूरज भाई आसमान पर मुस्तैद च चुस्तैद हो चुके थे। सुबह हो चुकी थी।

( नरोना चौराहे का यह क़िस्सा Alok Puranik की इस बात को ध्यान में रखते हुए कि किसी एक जगह पर ठहरकर डिटेलिंग का मजा है। Anoop Shukla से अनुरोध की जमुना कोठी और अन्य बुजुर्गा इमारतों का कुछ किस्सा पता तो बताएं।।  )

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Monday, April 16, 2018

रंगों के बदलते मायने

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, साइकिल, वृक्ष और बाहर
पेड़ पर पुराने कपड़ों का झूला, फुटपाथ पर बैठी सड़क देखती बच्ची। सड़क पर स्कूल जाता बच्चा।
सबेरे घर के बाहर बैठे। चाय पीते हुए चौतरफा 'नजर मुआयना' किया। सूरज भाई की अगवानी के लिए आसमान तैयारी कर रहा था। सूरज भाई के 'विराजने' की जगह को लाल कर रहा था। वीआईपी कुर्सी सजा रहा था सूरज भाई के लिए। जो रंग है सूरज भाई का उसी रंग से उनके बैठने की जगह 'लीप' रहा था।
ऊपर लाल लिखते हुए पीछे दिमाग से आवाज आई 'लाल' की जगह 'अरुणाभ' लिखो, इम्प्रेशन पड़ेगा। हम लिखने लगे तब तक खुपड़िया से हल्ला मचा 'अबे रक्ताभ' लिख।
हम सहम गए। रंग के मतलब भी डराने लगे हैं आजकल। एक ही रंग के अलग मतलब। बलिदान के प्रतीक रहे रंगों के सहारे दंगे होने लगे हैं। प्रेम का झंडा फहराने वाला रंग अपराधियों के कब्जे में चला गया है।
बहरहाल, सूरज भाई का भौकाल देखने के बाद बगीचे की तरफ देखा। बन्दर पूरे बग़ीचे में बमचक मचाये हुए था। एक बन्दर पेड़ पर चढ़कर हिलाकर नीचे उतर आता। फिर दूसरा चढ़कर हिलाता। मासूम पेड़ बेचारा चुपचाप अपना अंगभंग होता देखता रहता।
एक बन्दर की एक टांग कुछ चोटिल थी। तीन टांग पर उछलता हुआ बन्दर मेरे सामने से सरपट निकल गया। तीन टांग होने पर बंदरों की दुनिया में पता नहीं उसको विकलांग का दर्जा मिला कि नहीं। मिला भी होगा तो क्या फायदा? बंदरों की दुनिया में कोई सरकारी नौकरी तो होती नहीं। क्या पता होती हो। हम उनकी दुनिया के बारे में जानते ही कितना हैं।
सड़क पर टहलने निकले तो देखा कि एक आदमी फुटपाथ पर लेटा उठने के पहले की फाइनल अंगड़ाई ले रहा था। बगल में कई कद्दू उसके 'सुरक्षा सैनिकों' की तरह तैनात थे। अंगड़ाई लेकर उठने के बाद उसने अपना कम्बल से कद्दुओं को ओढ़आ दिया। आदमी और कद्दू दोनों एक-दूसरे की सुरक्षा के लिए सहज समर्पित।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: पौधा, वृक्ष, घास, आकाश, बाहर और प्रकृति
बगीचे की घास पर पसरी हुआ सूरज भाई की बच्चियां
एक लड़की पेड़ पर कपड़ों-लत्तों की रस्सी के झूले पर झूला झूल रही थी। उसके घर का आदमी वहीं फुटपाथ पर पक्की नींद सोया था। सड़क पर चलते ट्रैफिक से उसकी नींद को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। कुछ देर झूलकर बच्ची फुटपाथ के किनारे बैठ गयी। सड़क पर आते-जाते लोगों को देखती हुई। शायद स्कूल जाते बच्चे को देखते हुए सोंचती भी हो - 'ये भैया सुबह-सुबह कहाँ चले जा रहे हैं। इनके यहां झूले नहीं पड़े क्या?'
सड़क पर एक घोड़ा लगभग बीच मे खड़ा था। शायद अनशन के मूड में रहा हो। सड़क पर उसके खड़े होने के बावजूद काफी जगह थी इसलिए लोग उसके बगल से निकलते जा रहे थे। चलने फिरने में अड़चन होती तो उसके अनशन को तुड़वाने की व्यवस्था होती। या तो उसकी तुड़ाई होती या कोई बीच का समझौता। वैसे अनशन में अकेले होने पर तुड़ाई का योग ही बनता है। यही चलन है आजकल देश में।
एक आदमी कूड़े के बोर को पीठ पर लादे ऐसे चला जा रहा था जैसे बच्चे किताबों के बोझ को लादे हुए स्कूल जाते हैं।
रिक्शे पर स्कूल जाती दो बच्चियां जिस तेजी और तल्लीनता से बतिया रहीं थीं उससे लग रहा था मानों सारी बातें वे स्कूल पहुंचने से पहले साझा कर लेना चाहतीं हों।
एक स्कूटी अपनी सवारियों समेत सड़क पर लुढ़क गयीं। महिला सवारियों को चोट नहीं लगी शायद। मुस्कराती हुई उठकर चल दीं।
सड़क किनारे कई जगह चाय की दुकानें दिखीं। पंडित चाय, पहलवान चाय, आरिफ टी स्टाल। सबके सामने आठ दस 'चयासे' जमें हुए थे। हर चाय की दुकान से अपने पास रुकने का लालच दिया। लेकिन हम अपने बुजुर्गवार न्यूटनजी के जड़त्व के नियम की इज्जत करते हुए जब तक रुके तब तक दुकान पीछे छूट गयी। मजबूरन हम आगे बढ़ते गए और अंत में जब रुके तो वह जगह घर ही थी।
घर भी तो एक पड़ाव ही होता है। कहीं से आने के बाद का पड़ाव और कहीं के लिए निकलने के पहले की जगह। घर से अब दफ्तर जाने का समय हो गया।
इसलिए निकलते हैं। आप मज्जे करो। दिन शुभ हो।

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Sunday, April 15, 2018

जलेबी दही नहीं लाये

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, खड़े रहना और बाहर
धूप के सामने शर्माते हुए पंकज बाजपेयी

कल अर्से बाद मिलना हुआ पंकज बाजपेयी से। मिलते ही शिकायत-’ बहुत दिन बाद आये। कहां चले गये थे?’
हमने कहा - ’गये कहीं नहीं थे लेकिन आ नहीं पाये।’
बोले-’जलेबी नहीं आये?’
हमने कहा-’ आज भूल गये। कल आयेंगे तो लेते आयेंगे।’
बोले -’हां बढिया वाली जलेबी लाना। दही भी साथ में।’
हमने कहा- ’अच्छा मेरा नाम बताओ देखें याद है कि नहीं?’
बोले-’अनूप, अनूप।’
दो बार बोलकर कन्फ़र्म किया कि उनको याद है मेरा नाम।
सेहत के बारे में पूछने पर बोले-’हफ़्ते भर गैस्टिस की बीमारी हो गयी थी। अब ठीक है। अबकी बार आना तो मेटजिल लेते आना। गैस की बहुत बढिया है।’
’लेते आयेंगे।’ हमने कहते हुये पूछा-’चलो चाय पिलाते हैं।’
बोले -’चाय नहीं पियेंगे। बर्फ़ी खिलाओ।’
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग खड़े हैं और बाहर
मेटजिल लेते आना जलेबी दही के साथ -पंकज बाजपेयी
पास की ही दुकान से बर्फ़ी दिलाई। झोले में धर ली। हमने कहा -’खा लो।’ बोले -’घर में खायेंगे।’
फ़िर हमने कहा -’जलेबी भी खा लो।’
बोले-’जलेबी इसकी बढिया नहीं होती है। तुम कल बढिया वाली लाना।’
मतलब क्वालिटी में कोई समझौता मिठाई प्रेमी पंकज जी का। फ़िर चलते हुये फ़ल की दुकान से अंगूर के लिये दस रुपये धरा लिये कि अंगूर खायेंगे।’
सब शिकायतें गायब मिठाई के आगे। न कोहली, न बच्चे उठाने वाला, न कनाडा का अपराधी। चलते हुये बोले-’जल्दी आना कल हम इंतजार करेंगे।’
आज गये तो फ़ल वाले की शिकायत करते बोले- ’इन्होंने अंगूर नहीं दिये थे। अंगूर की जगह केला दे दिये थे।’
जलबी-दही लेकर झोले में धर लिये। बोले- ’घर में खायेंगे।’ यह भी बोले-’ समोसा नहीं लाये?’ मेटजिल के बारे में भी पूछा। भाभी की घर की माल वाली मिठाई न लाने की भी शिकायत की।
हमने कहा -’अगली बार लायेंगे।’
बोले-’अब कब आओगे?’
हमने कहा-’ इतवार को आयेंगे।’
हमने मिठाई वाले से कहा कि इनको रोज मिठाई खिला दिया करो। पैसे हम इतवार को दे दिया करेंगे। उसने मान लिया। उसका फ़ोन नम्बर भी ले लिया। हाल-समाचार भी मिलते रहा करेंगे पंकज भाई के। नाम आज भी बताया दोहराते हुये-’ अनूप, अनूप।’
’दाढी काहे नहीं बनाई? कल भी नहीं बनाये थे।’- हमने पूछा तो बोले-’ आज बनायेंगे।’
देश दुनिया के हाल के बारे में पूछा तो बोले सब ठीक है। हमने कहा - ’आजकल बच्चियों के साथ गन्दे काम की खबर बहुत आ रही है।’
बोले-’ हम सब ठीक करा देंगे। तुम चिन्ता मत करो।’
चलते हुये पूछा - 'चाय पियोगे?
बोले - ’अभी नहीं। शाम को पियेंगे।’
फ़िर बोले - ’तुम पैसे दिये जाओ। हम पी लेंगे।’
हमने कहा -’कित्ते रुपये ?’
बोले- ’दस दे देव।’
हमने कहा - ’दस काहे, चाय तो छह रुपये में मिलती है?’
बोले -’हमको वो पांच रुपये में देता है। दो पीयेंगे।’
इतवार को मिलने का वादा करके हम चले आये। चलते-चलते फ़िर याद दिलाई- ’मेटजिल लेते आना। भूलना नहीं। भाभी को पांव छूना कहना। ’

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शहर में इधर-उधर घूमते हुये


चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग बैठ रहे हैं और बच्चा
लूडो खेलता परिवार
कल पंकज बाजपेयी से मिलकर वापस लौटे अफ़ीमकोठी की तरफ़ से। सामने जो सड़क दिखी उसमें घुस गये। जगह-जगह चाय और रोजमर्रा के सामान की दुकानें। एक गाड़ी में तमाम मुर्गे फ़ड़फ़ड़ा रहे थे। मुर्गों के पंख पकड़कर लड़के गाड़ी से उतारकर पिंजड़ों में बंद कर रहे थे। पिंजरे में पहुंचकर मुर्गे शान्त होकर कुकडूंकूं टाइप करने लगे।
एक गली में घुस गये। मोहल्ले का नाम दिखा दलेलपुरवा। जिन्दगी में पहली बार इस मोहल्ले आये। ऐसा मेरे ख्याल से सबके साथ होता है। जिस शहर में जिन्दगी बिता दी उसके सब मोहल्ले नहीं घूमे होते हैं। सब सड़कें नहीं नापी होती हैं।
कई हफ़्तों से मैं सोच रहा हूं चमनगंज जाकर वहां की सड़क पर एकाध घंटे टहलूं। चाय-शाय पिऊं। लेकिन हर बार टलता जाता है मामला। सोचा तो यह भी था कि मोहल्लों के नाम जो हैं वो क्यों पडे इनके बारे में जाना जाये। अब यह काम हमारे नामराशि Anoop Shukla बढिया से कर सकते हैं। वे कानपुर के चलते-फ़िरते-टहलने इनसाक्लोपीडिया हैं। उनसे अनुरोध करेंगे कि वे सिलेसिलेबार मोहल्लों के नामकरण का इतिहास लिखें। इसकी फरमाइश बहुत पहले Indra Awasthi मुझसे कर चुके हैं।

बहरहाल कल मूलगंज की से गुजरते हुये चौराहे पर लोगों की भीड़ देखी। ये मजदूर थे जिनको रोजगार की तलाश थी। लोग मोलभाव करके उनमें से कुछ को अपने साथ ले जा रहे थे। मुझे अंसार कंबरी का यह शेर याद आया:
“अब तो बाजार में आ गये हैं कंबरी
अपनी कीमत को और हम कम क्या करें?”
एक आदमी अपने दोनो हाथ पीछे विश्राम की मुद्रा में बांधे लगातार चला रहा था। करीब आधा किलोमीटर उसके पीछे चलते हुये मैंने देखा कि उसके हाथ पीछे ही रहे। संतुलन बनाने के लिये वह गर्दन एक तरफ़ झुकाये हुये था। आगे चलते हुये गर्दन झुकाये हुये वह विश्राम मुद्रा में ही एक गली में गुम हो गया। उसके मुडने के पहले मन में आया कि कहीं से राष्टगान बज जाये तो शायद वह विश्राम से सावधान मुद्रा में आ जाये। लेकिन तब शायद हमको भी फ़टाक से गाड़ी से निकलकर बाहर आ जाना पड़ता। इसलिये लगा अच्छा ही हुआ कि कहीं राष्ट्रगान नहीं बजा।
चौराहे के आगे एक आदमी सड़क किनारे अपनी साइकिल धरे उसकी आड़ में अपने नोट गिन रहा था। कुछ देर में नोट गिनकर उसने अपने कुर्ते की जेब के हवाले किये और चल दिया। हम भी आगे बढे।
एक जगह एक लड़का ऊंघाया हुआ मुर्गा बेंच रहा था। हममें उसको कोई ग्राहक सा दिखा। वह चैतन्य सा हुआ। उसकी चैतन्यता की इज्जत रखते हुये हमने मुर्गे के गोस्त के दाम पूछ लिये। उसने बताये साठ रुपये किलो। यह भी बताया कि हर मुर्गा लगभग दो किलो का है मतलब 120/- रुपये का। हमको फ़ोकटिया समझकर वह बालक फ़िर ऊंघनें तल्लीन सा हो गया।
एक झोपड़ी के पास दो बच्चियां अपने भाईयों और शायद अपनी मां के साथ बैठी लूडो खेल रही थीं। हम कुछ देर उनको खड़े देखते रहे। बच्चियों की गोटियां खुल गयीं थी। आगे बढ रहीं थीं। बच्चे और उसकी मां का खाता खुला नहीं था। वे पांसे को बार-बार हिलाकर 'लूडो की पिच ' पर डाल रहे थे। जैसे ही उनका खाता खुला वे चहकने लगे। महिला के हंसते हुये 45 डिग्री ऊपर की तरफ़ उठे पीले दांत ऐसे लग रहे थे जैसे किसी पान की गुमटी का पल्ला ऊपर उठ गया हो। खाता खुल जाने के बाद वे सब फ़िर अपनी-अपनी गोटियों को आगे बढाने में लग गये। हम चल दिये।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग बैठ रहे हैं, साइकिल और बाहर
कल नुमाईश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान हूँ।
दोपहर को एक आदमी करेंट बुक डिपो के सामने सड़क पर दिखा। तिपहिया पर सो रहा था। कपड़े एकदम मैले। नाखून बढे। बिजली का एक गले में होल्डर माला की तरह पहने हुये। उसके पास कुछ देर तक खड़े रहे। बात करने की कोशिश की। लेकिन उसने कोई ’लिफ़्ट’ नहीं दी। हम दुष्यन्त कुमार का यह शेर दोहराते हुये आगे बढ गये:
"कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।"
घर से कुछ दूर जाने के लिये पैदल निकले। बाहर ही रिक्शे वाला मिल गया। हाथ में कुष्ठ रोग है। हाल-चाल बोहनी-बट्टा के बारे में पूछा तो बोला-’ दस रुपये कमाई हुई। 28 रुपये खर्च हो गये खाने-पीने नाश्ता करने में। हमने कहा -’तो अब यहां आराम काहे कर रहे। सड़क पर निकलो। कुछ सवारी मिलेंगी।’
बोला-’ आज छुट्टी का दिन सवारी नहीं मिलेंगी। स्कूल भी बन्द है।’
उसके सवारी न मिलने वाले दावे को खारिज करते हुये हमने पैदल जाना स्थगित कर दिया। खुद सवारी बन गये। वह लगभग बेमन से हमको लादे हुये चौराहे तक ले गया। हमने उसको उसको पैसे देकर कहा- ’थोड़ी देर रुको तो हम वापस चलेंगे। कोई और सवारी मिले तो चले जाना लेकर।’
लेकिन बुजुर्ग रिक्शेवाला किसी सवारी को लादने के मूड में नहीं था शायद। बोला -’अब वापस जाकर वहीं आराम करेंगे। यहां धूप बहुत है। ’
थोड़ी देर बाद वापस लौटकर देखकर कि बुजुर्ग रिक्शेवाला रिक्शे में गुड़ी-मुड़ी होकर सो रहा था। हालांकि सर्दी नहीं थी लेकिन जगह की कमी के कारण जिस तरह पैर को सिकोड़े सो रहा था मुझे दुष्यन्त कुमार का शेर याद आया:
न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और लोग बैठ रहे हैं
न हो कमीज तो पावों से पेट ढंक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।
शाम को शहर में जाम टाइप लग गया था। फ़ूलबाग में अम्बेदकर जयन्ती कार्यक्रम हो रहा था। हमने स्मार्टनेस दिखाते हुये एक गली में गाड़ी धंसा दी। सोचा कि फ़ूलबाग चौराहे पर निकलेंगे जाकर। गली आगे जाते हुये संकरी होती गयी। कहीं-कहीं तो इतनी कि गाड़ी की चौड़ाई भर की जगह बमुश्किल बची थी।
उसी गली के दो छोर पर दो बच्चियां प्लास्टिक के रैकेट टाइप लिये खड़ी थीं। गाड़ियों की आवाजाही के बीच सड़क खाली होने का इंतजार करती हुई बैडमिंटन टाइप कुछ खेल रहीं थीं। हमारी भी गाड़ी जब आगे निकल गयी तो देखा कि वे खेलने में मशगूल हो गयीं थीं। गली से निकलती गाड़ियों से उनका खेल प्रभावित नहीं हो रहा था।

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बाहर
ड्रम का रूप बदलते कामगार
आज एक जगह प्लास्टिक के तमाम ड्रम देखे। कोपरगंज में। केमिकल के ड्रम खाली होने के बाद पानी और दीगर सामान रखने के ड्र्मों में बदले जा रहे थे। एक लड़का ऊपर का ढक्कन आरी से काट रहा था। दूसरा छेद कर रहा था। तीसरा लड़का ढक्कन को लगाते हुये रिबेट लगा रहा था। हमने पास खड़े होकर उनसे बतियाने की कोशिश की। वे अपने काम में जुटे रहे। फ़िर हमने उनसे पूछा कि इन बने हुये ड्रमों की कीमत कितनी होती होगी? फ़िर अपनी तरफ़ से अनुमान उछाल दिया - ’100-200 रुपये।’
ड्रम की कीमत 100-200 रुपये सुनते ही तीनों काम छोड़कर एक साथ हंस दिये। एक ने कहा- ’सौ-दो सौ में तो आजकल बाल्टी तक नहीं आती।’ फ़िर बताया -’साढे आठ सौ में बिकता है यह ड्रम।’
अपने बेवकूफ़ी के अनुमान पर उनकी हंसी की याद करके लगा कि जब नेता गण जनसभाओं में पांच-दस साल में सबको अनाज देने और सबको घर देने के वादे करता होंगे तो जनता कैसे हंसती होगी।
ऊपर की बात से परसाईजी की रचना चूहा और मैं भी याद आई जिसमें एक चूहा परसाई जी परेशान करके अपने लिये खाना सुनिश्चित करता है और परसाई जी लिखते हैं:
"मगर मैं सोचता हूँ - आदमी क्याई चूहे से भी बदतर हो गया है? चूहा तो अपनी रोटी के हक के लिए मेरे सिर पर चढ़ जाता है, मेरी नींद हराम कर देता है।
इस देश का आदमी कब चूहे की तरह आचरण करेगा?"
(लेख का लिंक कमेंट बाक्स में। यह मजे की बात कि बदलाव के लिये उकसाता यह लेख बाल साहित्य में संकलित है।)
यह किस्सा कल और आज की घुमाई का। बाकी का किस्सा फ़िर जल्ली ही। तब तक आप मजे कल्लें। ठीक न !

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10214178597472369

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Wednesday, April 11, 2018

भीगी हुई सुबह औऱ बच के चलता आदमी

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, मुस्कुराते लोग, स्टेज पर लोग, वृक्ष, आकाश, बाहर और प्रकृति
दुकान साफ करता बालक

आज सबेरे अलार्म बजने के पहले छत बजी। बारिश हो रही थी। हल्की बारिश मतलब बूंदा-बांदी। लोकतंत्र में सरकारें चुनाव के ऐन पहले कल्याणकारी घोषणाओं की बारिश करने लगती हैं। मौसम भी ऐसे ही सुबह के पहले मेहरबान टाइप हो गया। हालांकि मौसम को चुनाव नहीं लड़ना। लेकिन तमाम बेमतलब काम देखा देखी भी काम होते हैं। तमाम लोग बेमतलब अपराध करते हैं। घर भरा है लेकिन बेमतलब , आदतन , गैर इरादतन भ्रष्टाचार करते हैं।


सड़क पर मानो पानी का छिड़काव किया गया है। क्या पता इन्द्र देव के यहां इसके लिये बादलों ने वर्षा वाउचर लगा रखे हों। क्या पता बूंदा-बांदी करके वहां झमाझम बारिश का बिल पेश कर दिया हो। कभी इस सबकी जांच हो तो क्या पता वहां भी बारिश घोटाला, पानी घोटाला सामने आये।
स्वर्ग में लगता है सूचना का अधिकार अभी लागू नहीं हुआ है। हुआ होता तो अब तक अनगिनत घोटाले सामने आते। अभी लगता है कि स्वर्ग की पत्रकारिता ’खाता न बही, जो नारद जी कहें वही सही’ वाले मोड में है। विपक्ष का भी अभाव है वहां शायद ! क्या पता आने वाले समय में स्वर्ग-सरकार के देवता विपक्ष के देवताओं पर स्वर्ग-संसद ठीक से न चलने देने का आरोप लगायें। ’चढावा-उपवास’ भी धारण करें।
ओह, हम भी कहां खुशनुमा सुबह छोड़कर घोटाला-गली में घुस गये। आसपास का कितना असर पड़ता है इंसान पर।
नुक्कड़ पर गंगापुल साइकिल ट्रैक का बोर्ड भूमिगत हुआ पड़ा था। पटरी से गुजरती ट्रेन तेज आवाज लगाती हुई लोगों को जगाने की कोशिश कर रही थी।
नुक्कड़ की गन्ने की दुकान पर एक बच्चा मग्धे के पानी से दुकान की सफ़ाई कर रहा था। हीरो के समर्थक उसके अपराधों को उसकी भलमनसाहत के पोंछे से साफ़ करते हैं वैसे ही बच्चा सलमान खान के पोस्टर पर गीला कपड़ा फ़ेरते हुये उसकी धूल पोंछ रहा था।
सलाउद्दीन नाम है बच्चे का। कक्षा तीन में पढता है। सुबह दुकान साफ़ करके स्कूल जायेगा। शुक्लागंज के ’प्राइवेट स्कूल’ में पढता है। शाम को स्कूल से आकर फ़िर दुकान पर बैठेगा। इस बीच उसके बड़े भैया दुकान देखेंगे। होमवर्क भी करना होता है बालक को।
बालक के बगल की ठेलिया खाली थी। पिछ्ली बार वहां बुजुर्ग मास्टर जी मिले थे। 26 फ़रवरी को। उनके बारे में पूछा तो पोंछा मारते हुये उसने बताया -’वो तो खत्म हो गये।’
मास्टर जी की किडनी खराब थी। अस्पताल में भरती हुये। खत्म हो गये। पिछले दिनों वित्त मंत्री जी की और उसके पहले विदेश मंत्री जी की किडनी बदलने के खबरें आईं। दोनों स्वस्थ भी हैं। लेकिन बुजुर्ग मास्टर अपनी ओरिजिनल किडनी के साथ ’शांत’ हो गये। (मास्टर से मुलाकात की पोस्ट का लिंक https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10213794764116775 )
आगे एक रिक्शे में बैठे दो लोग तन्मयता से सिगरेट पी रहे। बेड-टी की तर्ज पर रिक्शा सिगरेट। बेड टी का जिक्र ’कसप’ में ’हगन-चहा’ के रूप में है। सुबह चाय पीते हुये यह याद आया था। लिखने का मन हुआ ’हगन चहा, मगन चहा’ लेकिन थम गये। अभी फ़िर याद आया तो लिख ही गया। मतलब इंसान जो मन से कहना चाहता है वह कहने के रास्ते निकल ही आते हैं।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 3 लोग, लोग खा रहे हैं, भोजन और बाहर
दुकान के सामान को दुलराते दुकानदार। बीड़ी हाथ में। घरैतिन हमेशा की तरह नेपथ्य में
एक दुकान पर दो लोग खड़े बीड़ी पी रहे थे। उनसे बतियाये। पता चला कि सीतापुर के नैमिशारण्य से आये थे। दस साल पहले। यहां दुकान लगाई। किसी तरह जिन्दगी गुजर रही है। बच्चे लोग स्कूल नहीं जाते। खर्च कहां से उठायें?
हमने कहा -’तमाम सरकारी स्कूल हैं वहां क्यों नहीं भेजते?’
’भेजा रहन मरी कम्पनी के पास स्कूल, लड़ाई-झगड़ा हुइ गवा तो चोट-चपेट के डर ते नाम कटा दिया बच्चन का। कहुं चोट-चपेट लागि जाय तौ आफ़त।’- बच्चों की पढाई छूटना सबसे सहज काम है गरीबों में।
दुकान की फ़ोटो लेते हुये सब पन्नियां खोल दी दुकानदार ने। दुकान के सामान को दुलराने टाइप भी लगा। दुकान की महिला भी साथ आ खड़ी हुई।
लोग बारिश से बचने के लिये अपनी बरसातियां समेटते हुये दुकान सुरक्षित कर रहे हैं।
आगे गंगा पुल से गंगाजी को देखा। सदानीरा , पतितपावनी गंगा को एक कुत्ता टहलते हुये पार कर रहा था। गंगा में पानी की स्थिति पुराने जमाने के नबाबों के पास संपदा जैसी दिन-पर-दिन होती जा रही है।
साइकिल से स्कूल जाती बच्ची सीधे देख रही थी। लेकिन उसके साइकिल चलाने के अंदाज से लगा कि वह अपने चारों तरफ़ नहीं आठों तरफ़ देख रही है। सड़क पर अकेली जाती बच्ची का पूरा शरीर आंख बन जाता है। सुरक्षा के लिये जरूरी सा होता जा रहा है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: साइकिल और बाहर
टायर बंधन में जकड़े दो रिक्शे
लौटते में देखा दो रिक्शों के अगले पहिये जंजीर में जकड़े हुये थे। दाम्पत्य बंधन की तरह। दोनों पहिये जंजीर और ताले के बंधन में जकड़े एक-दूसरे के लिये बने हुये टाइप लगे।

आगे रिक्शे की आड़ में दो लोग चिलम सुलगा रहे थे। एक दियासलाई सुलगा रहा था , दूसरा चिलम थामे हुये थे। ये तो मासूम चिलमची थे। लेकिन समाज में यह काम बड़े पैमाने पर होता है। कुछ लोग नशे का जुगाड़ करते हैं, दूसरे आग लगाते हैं। समाज को सुलगाते हैं।

सड़क पार एक छोटी बच्ची अपने से भी छोटी बच्ची को साइकिल चलाना सिखा रही थी। बच्ची उलझ-उलझ जा रही थी। लेकिन दोनों की कोशिश जारी थी।
पप्पू की चाय की दुकान पर भीड़ बढ गयी थी। जाते समय एक बेंच थी। लौटते समय चारों बेंचों पर ग्राहक विराजमान थे। साइकिलों में झोले पर गेंहू और धनिया और दूसरे चुटुर-पुटुर गृहस्थी के सामान दिखे। फ़ेरी लगाने निकले हैं ये लोग। दिहाड़ी कमाने।
अपन का भी दिहाड़ी कमाने के लिये निकलने का समय हो गया। चला जाये। आप भी मज्जे करिये। मिलेंगे फ़िर कभी। जल्ली ही। अपना ख्याल रखियेगा। अपना ख्य़ाल रख लिया तो हमारा रखा हुआ समझना। ठीक न !
*पोस्ट का शीर्षक Nirmal Gupta जी की टिप्पणी के सौजन्य से।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10214152812427759

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Monday, April 09, 2018

कुछ घण्टे लाइब्रेरी में

झंडा गीत के रचयिता श्यामलाल गुप्त 'पार्षद' की स्मृति में नाम रखा गया है शायद।
कल फूलबाग वाली लाइब्रेरी गए देखने। पहली बार। लाइब्रेरी का नाम सुना था। दिमाग में छवि थी कि बड़ी लाइब्रेरी होगी। लाइब्रेरियन होंगे। हाल होगा बैठ के पढने के लिए। किताबें इशू करने के लिए काउंटर टाइप कुछ होगा। इसी तरह की और सहज कल्पनायें।
लाइब्रेरी देखते ही सभी कल्पनाओं का कत्लेआम टाइप हो गया। लाइब्रेरी में एक बुजुर्ग टाइप बैठे थे। एक बहुत 'बुजुर्ग रजिस्टर' पर पेंसिल से नाम लिखवाया। लाइबेरी दर्शन की अनुमति दे दी।
लाइब्रेरी की किताबें पहली मंजिल के बरामदे में खुली और कुछ बन्द आलमारियों जमा थीं। किताबों पर जमीं धूल इस बात की गवाही दे रही थी कि सालों से उनको छुआ नहीं गया था। 'हुएहैं शिला सब चंद्रमुखी' की तर्ज पर किताबें किसी पाठक का इंतजार कर रहीं थीं कि कोई आकर उनको उल्टे-पलटे तो कम से कम धूल तो हटे। किताबों को अस्थमा तो होता नहीं जो धूल के मारे खांस-खांस कर लोगों को अपनी उपस्थिति का इजहार कराएं।
हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू की सब मिली-जुली संस्कृति का प्रचार कर रहीं थीं। विषय भी कोई तय नहीं। हिंदी की कहानी की किताब उर्दू की इतिहास की किताब की किताब से गलबहियां थीं। 'विंस्टन चर्चिल के भाषण के संकलन' के ऊपर 'उसने कहा था और अन्य कहानियां' सवार थी। इसी तरह का और भी मिलजुलपन।
पता चला कि पहले लाइब्रेरी जिलाधिकारी के अंदर में थी। अब कानपुर विकास प्राधिकरण देखता है। लाइब्रेरी का रखरखाव केडीए उसी तरह करता दिखा जैसे नालियों, सडको का करता है।
कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.
ये धूल जमी है किताब पर
कई रोचक किताबें दिखीं। 60 के दशक की एक किताब 'पैदल दुनिया का सफर' दिखी। 2/- की किताब। इसमें लेखक ने बताया कि वह कैसे पैदल दुनिया टहलने निकला। उनको विनोबा भावे ने कहा -'या तो पूरे ख़र्च का इंतजाम करके निकलो या फिर खाली हाथ।' खाली हाथ निकलोगे तो भी जनता भूखा नहीं रखेगी।
यात्रा पर निकलने के समय उनकी पत्नी गर्भवती थीं। पत्नी ने लिखा कि अगर पेट से नहीम होती तो वो भी साथ चलती। कई देश घूमने के बावजूद एक ही किताब लिखी गयी यह ताज्जुब है। अपन तो एक शहर का हिस्सा देखते ही पन्ने भर डालते हैं। पहले के लोग 'करते ज्यादा, गाते कम थे।'
एक किताब का शीर्षक दिखा -'कंस के समय महिलाओं की स्थिति।' और भी तमाम रोचक मनोरंजक और जानकारी वाली किताबें दिखीं।
माखन लाल चतुर्वेदी रचनावली पढ़ते हुए लगा कि कितनी ओज पूर्ण भाषा में संबोधन है। साहित्यकार को लाइट हाउस बताया। आज भी साहित्यकार लाइटहाउस हैं लेकिन अधिकतर की बिजली गुल है। समाज को रास्ता बताने वाला साहित्यकार खुद रास्ता खोजने के लिए गूगल मैप का मोहताज है। रचनावली फौरन खरीदने का तय किया।
लगभग 50 हजार किताबों वाली लाइबेरी की सदस्यता लेनी है। 750/- जमा होंगे। 50/- रुपये साल का किराया। कम से कम किताब पलेटने से धूल ही झड़ेंगी किताबों की। कभी कपड़ा ले जाएंगे और धूल झाड़ेंगे भी।
फिलहाल तो दफ्तर जाना है। इसलिए इत्त्ता ही।


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Saturday, April 07, 2018

अंगूठे के नाखून पर कीड़ा




चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और बाहर
अंगूठे के नाखून पर कीड़ा
धूप में बैठे चाय पी रहे थे। साथ में मित्रों से फोनियापा भी चल रहा था। चाय और फोन दोनों 'फिनिश' हुए तो देखा बायें हाथ के अंगूठे पर टिड्डे जैसी आकृति का कीड़ा टाइप बैठा है। कीड़े की उमर का अंदाजा नहीं। यह भी नहीं पता कि वह अपनी दुनिया का नर है या मादा। लेकिन मजे से बैठा है।

उमर की बात तो अलग लेकिन 'बैठा' है लिखते ही मैं उसका 'कीड़े' का जेण्डर तय सा कर देता हूँ। पहली नजर में ही उसको नर बना देता हूँ। यह सोचते हुए कि सबेरे-सबेरे जैसे अपन निठल्ले बैठे हैं वैसे ही यह भी टहल रहा होगा। क्या पता यह अपनी दुनिया के हिसाब से 'ब्रिस्क वाकिंग' या 'मार्निंग फ्लाइंग' पर निकला हो।

कीड़ा हमारे अंगूठे के नाखून पर ऐसे बैठा है गोया किसी हेलीपैड पर हेलीकॉप्टर खड़ा हो। हमने अंगूठा हिलाया लेकिन कीड़ा हिला नहीं। जैसे धरती अपनी धुरी पर घूमती रहती है लेकिन हमको और तमाम लोगों को पता नहीं चलता उसी तरह कीड़ा भी हमारे अंगूठा हिलाने से निर्लिप्त आराम से बैठा है।

थोड़ी देर बाद कीड़े ने अंगड़ाई टाइप ली। शायद कविता याद आ गई हो उसे भी :
ले अंगड़ाई उठ हिले धरा
करके विराट स्वर में निनाद।


अंगड़ाई के बाद कीड़े ने अपने बदन को कई जगह से मोड़ा। तोड़ा-मरोड़ा। फिर तसल्ली से बैठ गया। शायद वर्जिश टाइप कुछ की हो। कपालभाति जैसी कोई क्रिया। कुछ पता नहीं। अपने आसपास के जीवों के बारे में हम कितना कम जानते हैं।

कुछ देर कीड़े को निहारने के बाद हमने उसकी फ़ोटो ली। फिर अनूठे (अंगूठे) को झटक दिया। यह इंसानी फितरत का नमूना है। काम निकलने के बाद झटक दिया। आशीर्वाद से पद पाकर सटक लिया।

कीड़ा न्यूटन के किसी नियम का पालन करते हुए जमीन पर गिरा। धप्प से गिरा या लदद से यह पता नहीं। लेकिन हमारी तुलना में वह इतना स्लिम-ट्रिम था कि वह धरती पर लैंड किया होगा। सेफली। लैंड करने के बाद किधर गया पता नहीं।

लेकिन लगता है कि कीड़ा बहादुर टाइप का होगा। यायावर भी। निकल पड़ा अकेले सुबह-सुबह। किसी को साथ लिए बिना। क्या पता अपने समाज में वापस जाकर 'नाखून आरोहण' कथा बताये जाकर। अपने इलाके का कोलम्बस, हिलेरी, तेनसिंग, वास्कोडिगामा कहलाये।

होने को हो तो यह भी सकता है कि हमारे घर की जासूसी करने आया हो। अखबार बांचकर गया हो जिसमें खबर छपी है कि सलमान को सजा सुनाने वाले जज का तबादला हो गया। शायद इस पर मेरी बाईट लेने आया हो। हमारे अंगूठे के साथ सेल्फी ली हो और अपने मन मर्जी का बयान मेरे नाम से छाप दिया हो।

यह सारा सोच कीड़े के नर होने की कल्पना के बाद का है। क्या पता है वह मादा हो। अगर ऐसा होगा तो हमारा सारा विमर्श बदल जायेगा। सौंदर्य के नए आयाम खोजे जाएंगे उसके बैठने, अंगड़ाई लेने और बेखौफ विचरने में। ऐसा 'कीड़ा समाज' वाकई बहुत उन्नत समाज होगा जहां की मादाएं बेखौफ किसी दूसरी प्रजाति के अंगूठे पर निडर बैठकर यायावरी कर सकें।

फिलहाल अपना समय-समाज इससे इससे ज्यादा लिखने की अनुमति नहीं देता। इसलिए फिलहाल इतना ही। बकिया फिर।

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Friday, April 06, 2018

भलमनसाहत प्रचार की मोहताज नहीं होती



चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति
विराट कोहली

सबेरे घर के बाहर बैठे चाय पी रहे हैं। धूप निकल आई है। बढिया वाली हवा बह रही है। आसपास के कुत्ते लगातार भौंक रहे हैं। शायद कुछ संकेत देने की कोशिश कर रहे हैं। हम समझ नहीं रहे। कौन उठकर जाए बाहर देखने।
अखबार में पहले पेज पर विराट कोहली की फोटो है। सलमान खान अंदर हैं। आधा पेज पर सलमान से सम्बंधित खबरें हैं। किस्से-कहानियां, झलकियां भी। सोशल मीडिया गंजा पड़ा है सलमान खान की खबरों से। अपनी अक्ल और तरफदारी के हिसाब से लोग बयान जारी कर कर रहे हैं। मीडिया को भी एकाध दिन की तसल्ली हुई कि नया मसाला खोजना नहीं पड़ेगा।
कुछ दिन पहले सलमान खान 'हिट एंड रन' मामले में छूट भी गए थे। तब भी खूब स्टेटस बाजी हुई थी। कोई 'फुरसतिया' दोनों समय के स्टेटस का तुलनात्मक अध्ययन कर सकता है।
पास के स्कूल से प्रार्थना और उसके बाद राष्ट्रगान की आवाज रोज सुनाई देती है। 200 मीटर की दूरी से लाऊडस्पीकर से आती 'जन गण मन' की आवाज रोज सावधान कर देती है। यह भी लगता है कि स्कूल की असेम्बली में जब सब प्रार्थनारत हैं, सब राष्ट्रगान गा रहे हैं तो फिर ध्वनिविस्तारक की आवाश्यकता क्या है? शायद देशप्रेम के भाव से ज्यादा उसका हल्ला ज्यादा जरूरी है।
स्कूल से आवाज आ रही है:
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुले हैं इसकी , ये गुलसितां हमारा।
कुत्ते अब शांत हो गए हैं। चिड़ियां बोलने लगी हैं। बोल शायद पहले भी रहीं हों लेकिन कुत्तों की आवाज के शोर में शायद उनकी आवाज दब गई थी। दुनिया में भी ऐसा ही होता है कि जब किसी हिस्से में सबसे क्रूर घटनाएं हो रही होती हैं उसी समय उसके तमाम हिस्सों में उससे कई गुना प्रीतिकर किस्से दर्ज हो रहे होते हैं। क्रूरता के हल्ले में कोमलता के आत्मीय किस्से चर्चित हो नहीं पाते । लेकिन वे घटित हो रहे होते हैं। भलमनसाहत प्रचार की मोहताज नहीं होती।
मीडिया जब हाल में दंगों के क्रूरता के किस्से बयान कर रहा था उसी समय दंगों में अपना जवान बेटा खो चुका एक बाप अपनी कौम के लोगों को यह कहते हुए हिंसा से रोकने की कोशिश कर रहा था कि अगर किसी ने इसके बदले में कोई हिंसा की तो मैं शहर छोड़कर चला जाऊंगा। दंगो के शोर में मीडिया ने इस घटना को दिखाया नहीं । लेकिन ऐसा हुआ। हो रहा है। होता रहेगा।
पास की पटरी से रेल हवा को चीरती हुई आगे जा रही है। हवा ऐसे आवाज कर रही है जैसे उसके पर्दे हिल रहे हों।
सबेरे की चाय अब खत्म हुई। अब जवान अपने काम को निकलेगा। आप भी अपने काम से लगिये। लेकिन पहले मुस्कराइए । यह सोचते हुए कि आप इस खूबसूरत दुनिया के वासिंदे हैं। देखिये की पूरी कायनात आपके साथ मुस्करा रही है और उसकी और आपकी खूबसूरती में आठ चांद लग गए हैं।

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Thursday, April 05, 2018

चश्मे की याद


सुबह दफ़्तर के लिये निकले। लगा कुछ छूट सा गया है। असुरक्षित सा महसूस हुआ। दस कदम चलने के बाद याद आया। मोबाइल चार्जिंग में ही लगा रह गया था। ’इस्स’ कहते हुये सर पर हल्की चपत लगाई। वापस लपके। मोबाइल जेब में धरा। सुरक्षा का एहसास मोबाइल के साथ ही, एक के साथ एक फ़्री वाले अंदाज में, आ गया।

मोबाइल का छूट जाना मतलब असुरक्षित सा हो जाना है। बिना मोबाइल आदमी ’जल बिन मीन’ सा हो जाता है। ऐसा लगता है बिना जिरह-बख्तर के पानीपत की लड़ाई में उतार दिये गये। बिना मोबाइल के कलयुगी इंसान की गत वही होती है जो महाभारत में बिना गांडीव के अर्जुन की होती होगी। ’लक्स कोजी’ बनियाइन का विज्ञापन आता है-’अपना लक पहन के चलो।’ बनियाइन पर भले लागू न हो लेकिन मोबाइल पर फ़ुल लागू होता है लक वाला फ़ंडा। कहीं के लिये निकलो, मोबाइल साथ ले के चलो। मोबाइल साथ में, लक आपके हाथ में।
दफ़्तर पहुंचकर राउंड के लिये निकले। सुबह-सुबह राउंड लेने से मातहत और अफ़सर दोनों को दिन भर निठल्ले रहने की छूट मिल जाती है। अफ़सर का आत्मविश्वास एवरेस्ट पर पहुंच जाता है तो मातहत का भी कंचनजंघा से नीचे तो नहीं रहता है। राउंड करते हुये अफ़सर को निपटाकर मातहत दिन भर की बला टल जाने का सुकून पाता है।
एक जगह तेजी से राउंड निपटाकर दूसरी जगह को लपकते हुये चश्मा जेब से निकालकर माथे पर लगाने की सोची। लेकिन जेब में चश्मा मिला नहीं। सर टटोला वहां भी विराजमान नहीं था चश्मा। जेब और माथे दोनों जगह चश्मा न मिलने का एहसास होते ही सामने साफ़ दिखता आदमी धुंधला दिखने लगा। सामने से आती गाड़ियों के आकार बदल गये। मतलब साफ़ था। दिमाग ने आंखों से चुगली कर दी थी -’ तुम बिना चश्मे के हो। साफ़ देखना बन्द करो।’ फ़लत: आंखें ’वर्क टु रूल’ के अनुसार काम करने लगीं। थोड़ी देर पहले साफ़ दिखने वाली चीजें धुंधला गयीं।
दिमाग की यह हरकत उसी तरह की थी जिस तरह अपराध करते कोई पकड़ा जाता है लेकिन असल अपराधी कोई और होता है। दंगा कराने वाले शांति का संदेश देते हुये अपने आदमियों को जल्दी से जल्दी बवाल फ़ैलाने के लिये आदेश देते हैं। चश्मा न होने पर आंख कुछ देर तक बदस्तूर अपनी ड्य़ूटी बजाती रही। लेकिन जैसे ही दिमाग ने उसको हड़काया -“ बिना चश्में के तुम साफ़ देख रही हो। पकड़ जाओगी।“ सुनते ही आंखों ने सकपकाकर साफ़ देखना बन्द कर दिया होगा।
बहरहाल, धुंधला देखते ही दौरा पूरा किया। आंखों को असहयोग के लिये मन किया हड़का दें। लेकिन सोचा -’ उस बेचारी की भी क्या गलती। जैसा हाईकमान बोलेगा वैसा ही तो करेगी। आंख कोई सांसद/विधायक तो है नहीं जो अंतरात्मा की आवाज के नाम पर मनमानी करे।’ इसलिये छोड़ दिया।
दफ़्तर पहुंचते ही अर्दली को चश्मा खोजने पर लगा दिया। फ़ाइल टटोलने लगे। दराज झांकने लगे। जमीन की पैमाइश भी कर डाली। फ़टाफ़ट खोजाई के बाद चश्मा मिला नहीं। शक हुआ कि जहां पहली बार राउंड पर गये थे वहां ही छूटा होगा चश्मा। और जा कहां सकता है?
अर्दली को बताया गया कि साहब सुबह राउंड पर चश्माविहीन थे। मतलब लोग राउंड करते अफ़सर के पहनावे पर निगाह रखते हैं। इसके बाद जिसने राउंड पर निकलते समय देखा था वह दिख गया। उसने भी कहा -’राउंड पर निकलने समय आप चश्मा नहीं लगाये थे।’ बाद में दफ़तर में घुसते हुये नमस्ते करने वाले ने भी बयान जारी किया कि दफ़तर बिना चश्मे के आये थे। बहुमत ने यह साबित कर दिया कि हम दफ़्तर बिना चश्मे के आये थे। सुकून हुआ कि चश्में की ही खोज हो रही हैं पतलून की नहीं। वरना कौन जानता है कि उसके बिना भी दफ़तर आने के बयान जारी हो जाते। बैठे-बिठाये कलयुगी आर्किमिडीज बन जाते।
दफ़तर से निराश होकर हमने घर पर आसरा किया। शायद घर में ही भूल गये हों। जितने कोने-अतरे हैं उससे दोगुने-तीन गुने में सघन तलाशी अभियान चलाया गया। फ़र्श पर छिपकली की तरह लेटकर बिस्तर के नीचे तलाशा गया। लेकिन चश्मा मुआ लोकतंत्र में शिष्टाचार की तरह नदारद ही दिखा। लगा कि हो न हो दफ़्तर में ही छूट गया हो।
लौटकर दफ़्तर-दफ़तर खोये चश्मे की खोज शुरू हुई। जिस भी मेज पर चश्मा दिखता लगता वह मेरा ही है। बिना चश्मे के होने के कारण यह धारणा बनाने में आसानी भी हुई। दूरी के कारण हमको हर मेज पर धरा चश्मा अपना लगता। चश्मे की तरफ़ हाथ बढाते हुये मेज पर बैठने वाले को ’चोर’ भले ने मान रहे थे लेकिन चोर से कम भी मानने का मन नहीं हो रहा था। लेकिन अफ़सोस यही कि चश्मा पास से देखते ही इस धारणा पर टिक नहीं पाते। चश्मा उसी का निकलता और हमें मजबूरन उसको शरीफ़ ही मानना पड़ता।
शाम तक पूरी कायनात में हल्ला मच गया कि हमारा चश्मा मिल नहीं रहा है। लेकिन अफ़सोस कि हमारे अलावा कोई इससे परेशान नहीं दिखा। परेशान तो सच कहें अपन भी नहीं थे क्योंकि चश्मे के साथ भी कोई बहुत साफ़ नहीं दिखता था क्योंकि चश्मा पुराना था और इस बीच हमारी नजर और गड़बड़ा गयी थी। लेकिन फ़िर भी चश्में के रहते थोड़ा सुकून का एहसास था जैसे लोकतंत्र में बावजूद अधोषित तानाशाही के जम्हूरियत का एहसास, भले ही कहने को हो, बना रहता है।
अब सड़क पर कार चलाते भी एहसास तगड़ा होता गया कि चश्मा विहीन हैं अपन। हर सामने आती गाड़ी देखकर लगता कि इसको भी पता है अपन को साफ़ दिखता नहीं। ठेलने के इरादे से आ रही है सामने से। लेकिन गाड़ी बिना ठोंके बगल से निकल जाती तो लगता कि वह मुझे सिर्फ़ धमका कर निकल गयी।
घर में आते तो लगता दफ़तर में खोया है। दफ़तर में सोचते घर में गुम हुआ। बीच में कार की तलाशी तो आते-जाते होती ही रहती।
मन किया कि हर जगह इस्तहार लगवा दें -’चश्में बेटे लौट आओ। तुम्हारे बिना आंखे सूनी हैं। नाक को तुम्हारी कमी खल रही है। तुम्हारे बिना चेहरे की रौनक दफ़ा हो गयी है। जल्दी आ जाओ।’ लेकिन चश्मे की भाषा ही नहीं पता थी तो इश्तहार कैसे छपवाते। डर यह भी लग रहा था कि इधर इश्तहार छपवायें, उधर चश्मा मिल जाये। बेफ़ालतू में पैसे बरबाद होंगे।
ऐसे ही होते करते दिन निकलते गये। लगा कि अब चश्मा रहा नहीं हमारे बीच। इस बीच एक मीटिंग की खबर आई। लगा चश्मा जरूरी है। नया बनवाया जाये। लौटते में पहुंच गये चश्मे की दुकान।
दुकान पर ’सेल्स महिला’ ने तरह-तरह के चश्मे दिखाने शुरु किये। हमने कहा अभी कामचलाऊ फ़्रेम दिखाओ। बाकी अच्छा मतलब मंहगा बीबी-बच्चे के साथ आकर पसंद करेंगे।
इस सीधी सी बात से साफ़ हो जाता है कि अपन खुद के खुद मंहगी चीजें खरीदने से बचते हैं। कामचलाऊ से ही काम चलाते हैं। दूसरी बात यह भी कि अपन को खुद की पसंद पर भरोसा नहीं। तीसरी बात यह कि ..। अब छोडिये तीसरी बात ! बात बढाने से क्या फ़ायदा। निकलेगी तो चश्मे से बहुत दूर निकल जायेगी।
चश्मे का फ़्रेम तय करते हुये हम अपने खोये चश्मे के जैसा ही फ़्रेम खोजते रहे। ऐसा नहीं कि उसमें हम बहुत हसीन लगते हों। या बहुत साफ़ दिखता हो उसमें। लेकिन जिसके साथ रह चुके उसकी आदत पड जाती है न। उससे बहुत ज्यादा अलग सोचना मुश्किल होता है। अगर आज देश के लिये कोई नयी व्यवस्था चुनने के लिये कहे तो जो चुनी जायेगी उसमें कमोवेश इत्ती ही अराजकता, इत्ती ही अनुशासनहीनता, इतना ही भ्रष्टाचार, इतनी ही भाई-भतीजावाद, ऐसा ही जातिवाद , समप्रदायवाद होगा। इससे अलग होगा तो हम शायद असहज रहें।
जल्दी ही अपने खोये चश्मे के फ़्रेम जैसा ही फ़्रेम मिल गया। बनावट, रंग और दीगर चीजों से ज्यादा उसकी कीमत पुराने चश्मे के अल्ले-पल्ले थी। इससे मुझे और कन्फ़र्म हुआ कि उस जैसा ही चश्मा है। यह बात अलग कि पुरानी फ़्रेम हमने दिल्ली से लिया था और यह दुकान कानपुर की थी।
जो फ़्रेम मैंने तय किया वह दुकान के सबसे सस्ते फ़्रेमों में था। बिक्री महिला ने हमको उससे अच्छे फ़्रेम दिखाने और उनको पसंद करने के लिये बहुत उकसाया लेकिन हम अपने निर्णय पर अडिग रहे। अपनी त्वरित निर्णय क्षमता पर हमें गर्व टाइप भी हुआ। अपने तय किये फ़्रेम से अलग उसने जो भी फ़्रेम दिखाया वह उससे मंहगा था लिहाजा हमें अच्छा नहीं लगा।
हमारे द्वारा सबसे सस्ता फ़्रेम करने को ’सेल्स महिला’ ने चुनौती के रूप में लिया। चश्मे में एंटी ग्लेयरिंग, पास और दूर के लिये अलग ग्लास तय करने की पेशकश की। हमने सबको ठुकराते हुये नजर टेस्टिंग के लिये अपनी आंखे हाजिर कर दीं।
नजर टेस्ट कराना भी बवाल है। हर बार ग्लास लगाते हुये पूछती यह अच्छा कि यह। यह अच्छा कि वह। वो तो कहो कि नजर टेस्ट कराने में पावर के हिसाब से दाम नहीं बढते। वर्ना हो सकता है कि अपन सबसे सस्ते वाले ग्लास के लिये हां बोलकर चश्मा तौलवा लेते, भले ही दिखने के उसमें देखने से बेहतर बिना उसके देखना होता।
बहरहाल, शाम को चश्मा लेने गये। लगाते ही दुनिया और खूबसूरत लगने लगी। टेस्ट करने वाली महिला भी। मन किया एक बार फ़िर चश्मा टेस्ट करवायें। लेकिन उसको घर जाने की जल्दी थी।
दुकान पर ही पता चला कि जिस दुकान से चश्मा बनवाया है वह साठ साल पुरानी है। उसके 84 साल की उमर के मालिक से भी मुलाकात हुई। चश्मा और अच्छा लगने लगा।
अब हाल यह है कि नये चश्मे के साथ नया सरदर्द मुफ़्त में मिल गया है। बीच-बीच में तारे टाइप नजर आने लगे हैं। लगता है चश्में में गूगल अर्थ फ़िट कर दिया हो जो बिना इंटरनेट के तारे-सितारे दिखा रहा है। चश्मा खरीदने में त्वरित निर्णय लेने में भले सफ़ल रहे हों लेकिन हफ़्ता भर बाद भी यह तय नहीं कर पा रहे कि गड़बड़ कहां हुई? चश्में की पावर तय करने में या चश्में के साथ सेटिंग में।
कई बार दुकान के सामने से निकल चुके हैं लेकिन अंदर जाने का मन नहीं हुआ। डर लग रहा है कि कहीं ग्लास बदलने की बात न उठ जाये। पैसे खर्च होने से बचाने की चाहत हमें इस नये चश्में के प्रति मोहब्बत पैदा हो गयी है।
पुराना चश्मा भी फ़िर से याद आ रहा है। गाने का मन हो रहा है- ’आ लौट के आजा मेरे मीत रे, तुझे मेरी आंखें बुलाती हैं।’

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