Wednesday, May 31, 2017

मानहानि

आजकल मानहानि का दौर चल रहा है। बेइज्जतियों की मारकाट मची हुई है। जिसे देखो वही लपका जा रहा है अदालत की तरफ़। मानहानि का दावा पेश करने के लिये। अदालतों की भी नाक में दम हुआ पड़ा है। एक से एक चिरकुट लोग अपनी मानहानि का मुकदमा धांसे पड़े हैं अदालतों में। हाल यह कि जो जितना बड़ा चिरकुट उसका उतना ही बड़ा मानहानि का दावा। मतलब मानहानि के दावा चिरकुटई की के समानुपाती है।


अदालतें हलकान हैं। व्यस्तता के आंसू रो रही हैं। उनका भी मन करता होगा -’कोई अदालत हो जहां वे अपनी इस बेइज्जती के खिलाफ़ दावा कर सकें।’


मानहानि पर कुछ कहने से पहले इसका मतलब तय कर लिया जाये। मानहानि से मोटा मतलब निकलता है कि कोई व्यक्ति जैसा खुद को समझता है , कोई दूसरा व्यक्ति उसको उससे अलग बताये। उदाहरण के लिये कोई अपने को ईमानदार समझता है। समाज में भी अपनी ईमानदारी का भौकाल बनाये हुये है।  ऐसे किसी व्यक्ति को कोई सरेआम बेईमान कह दे।  लाखों, करोड़ों के घपले का इल्जाम लगा दे। अगला इस इल्जाम को बजाय दिल्लगी के गम्भीरता से ग्रहण कर ले। फ़िर हल्ला मचा दे-’हमारी मानहानि हो गयी।’ अदालत में मानहानि का दावा करने की धमकी दे दे। इसके बाद मानहानि का दावा कर भी दे। बस शुरु हो गया मानहानि का मीटर। 

दुनिया में जित्ती भी बड़े काम हुये सबमें मानहानि का योगदान है। सत्यनारायण की कथा में देवता को लगा उसकी मानहानि हुई। देवता  रूठ  गये। दुखवर्षा कर दी भक्त पर। जजमान ने उनको पटाया। मान दिया। देवता खुश। ऋषिगण जहां अपमान महसूस हुआ नहीं कि  फ़ौरन कमंडल से पानी छिड़ककर शाप जारी कर देते थे। पुराने-जमाने में राजा-महाराजाओं को जैसे ही मानहानि की भनक मिली, वैसे ही हमले का पिपिहरी  बजा देते थे। बदनामी से बरबादी भली। भले ही इतिहास की किताब में भी जगह न मिले लेकिन मानहानि के महल में रहना गवारा नहीं।


मानहानि के इतने प्रकार के होते हैं कि उनकों शब्दों में बयान करना मुश्किल है।’अविगत गति कछु कहत न आवे’ टाइप मामला होता है। गणित में कहा जाये तो मानहानि के प्रकारों की संख्या दुनिया के कुल लफ़ड़ों की संख्या से एक अधिक होती है। कहने का मतलब कि अगर संसार में अगर 100 तरह के लफ़ड़े हैं तो मानहानि के प्रकार 101 होंगे। सूत्र रूप में कहें तो Y=X+1 (यहां X= दुनिया के कुल लफ़ड़े, Y=मानहानि के प्रकार)


बेइज्जती के प्रकारों की गणित के पायजामें में घुसेड़ने के बाद आइये आपको मानहानि के कुछ पहलू दिखाते हैं। समझने में आसानी होगी आपको।


मानहानि जो है न वह लक्ष्मी की तरह चंचला होती है। कब किस रूप में हो जाये पता नहीं चलता। सीधी मानहानि का उदाहरण हमने आपको ऊपर बताया जिसमें किसी ईमानदार को बेईमान बता दिया जाये। उल्टी मानहानि भी होती है। जैसे किसी अरबों के घोटालेबाज को टिकियाचोर बताया जाये। पूरी दुनिया में जिसके हरामीपने का डंका पिटता हो उसको गली मोहल्ले के छिछोरेबाज की तरह बताया जाये।  मानवमांस भक्षी ईदी अमीन की तुलना खेल-खेल में एक-दूसरे को नोच लेने वाले बच्चों से की जाये।


साहित्यिक हलके में भी उलटी मानहानि के नमूने मिल सकते हैं। अपने लेखन की खुद ही प्रसंशा करने वाले को कवि भूषण के समान बताया जाये। विसंगति की शिकायत करने पर समझाइश दी जाये -’अरे भाई, भूषण जी तो सिर्फ़ कवि थे। आप तो भूषण और शिवाजी/छत्रसाल के कम्बो पैकेज हो।’ अगला इतने पर मान जायेगा। न माने तो उसको उसकी विधा का देवता घोषित करके गेंदे की माला पहना दी जाये। अगला बेचारा ’स्तुति-स्नेह-सरोवर’ में छप्पछैंया करते आशीष देने के अलावा और कुछ कर भी न पायेगा।


आजकल पैसे ने मानहानि के पाले में कबड्डी खेलना शुरु कर दिया है। करोड़ों के दावे होते देख बाजार मानहानि के हलके में प्रवेश करने के लिये  अंगड़ाई ले रहा है। बड़ी बात नहीं कल को बाजार में मानहानि कराने और उससे निपटने के पैकेज आ जायें। बाजार में बेइज्जती करवाने और उसके बाद मानहानि का दावा पेश करने की इस्कीमें चलने लगें। मेडिको-लीगल केस की तर्ज पर मानहानि-लीगल वकीलों के अलग बस्ते खुल जायें। बाजार की कुछ इस्कीमें इस तरह की हो सकती हैं:

१.       घर बैठे बेइज्जती करायें। मानहानि का दावा करें। तुरंत भुगतान पायें।
२.       बिना बेइज्जती के मानहानि दावा करें। भुगतान दावा पाने के बाद।
३.       मनचाही मानहानि करायें। भुगतान किस्तों में। कैसलेस सुविधा उपलब्ध।
४.       बेइज्जती में इज्जत का एहसास। आपके घर के एकदम पास। सुविधायें झकास।
५.       बिना पिटे पिटने का एहसास पायें। मानहानि का दावे के लिये प्रमाण पायें।

मानहानि का बाजार चल निकलने के बाद तरह-तरह की मानहानि और उससे निपटने के तरीके बाजार में चल निकलेंगे। तरह-तरह  से मानहानि करने के तरीके बताये जायेंगे जिससे आदमी की इज्जत भी उतर जाये और अगला प्रमाणित भी न कर पाये कि उसकी बेइज्जती हुई है।  कुछ-कुछ गांधी डिग्री वाली पुलिस की पिटाई की तरह जिसमें पिटने वाला चोट को जिन्दगी भर महसूस भले करे लेकिन साबित नहीं कर सकता कि वह पुलिस-प्रेम का शिकार हुआ है।


आप किसी ख्यातनाम लेखक से कह सकते हैं जित्ता खराब आप लिखते हैं उससे ज्यादा खराब तो मैं अपने बायें हाथ से लिख सकता हूं। लेखक अगर इसको अपनी मानहानि समझता है और अदालत में घसीटने की धमकी देता है तो आप उसको समझा सकते हैं कि -’ आपके समझने में गलती हुई। मैं तो आपके लेखन की तारीफ़ कर रहा था। मैं बायें हाथ से लिखता हूं। मेरे कहने का मतलब यह था कि मैं कितना भी अच्छा लिखूं लूं पर वह आपके लेखन से खराब ही होगा।’  
मानहानि महसूस होने पर होती है। मानो तो मानहानि। वर्ना आम बात। वो सेल्स मैन वाला किस्सा आपने सुना होगा। एक सेल्समैन ने कुछ दिन की सेल्समैनी के बाद त्यागपत्र दिया। उससे दुकान मालिक ने नौकरी छोड़ने का कारण पूछा-’ क्या बात है? तन्ख्वाह कम है? कोई शिकायत है?’ नौकरी छोड़ने वाले ने कहा-’कोई शिकायत या पैसे की बात नहीं लेकिन सेल्समैनी में ग्राहक जिस तरह बात करते हैं उससे बेड़ी बेइज्जती महसूस होती है।’ मालिक ने बड़े आश्चर्य के साथ कहा-’ यार ये तुमने नई बात बताई। हमने भी जिन्दगी भर सेल्समैनी की है। हमको लोगों ने गालियां दी, दफ़ा हो जाने के लिये, पीटने की धमकी दी, कुछ ने अमल भी किया लेकिन हमारी बेइज्जती आज तक नहीं हुई। ’


अपने देश की आम जनता भी इसी दुकान के मालिक की तरह है। तरह-तरह के लोग इसको धोखा देते हैं, सेवा करने के नाम पर ठगते हैं, लूटते हैं , हाल-बेहाल करते हैं लेकिन जनता इसे अपनी मानहानि नहीं मानती। वह सोचती है यह तो आम बात है।


आपको इत्ता पढना पडा बेफ़ालतू में। कहीं आपकी शान में तो कोई गुस्ताखी नहीं हुई। मने पूछ रहे है। हो तो बता दीजियेगा। किसी की मानहानि करने का अपना कोई इरादा नहीं है।

















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Friday, May 26, 2017

जंतर-मंतर पर घंटा भर


सबेरे टहलने निकले। जंतर-मंतर ठहरने की जगह के पास ही है। सामने वेधशाला। बगल में जंतर-मंतर रोड़ पर धरना-प्रदर्शन की जगह। वेधशाला बगल में होने के चलते शायद यहां हुये धरने की आवाज दूरबीन से दूर तक पहुंचती होगी।
धरना स्थल पर कई धरना वीर दिखे। एक भाई साहब मच्छरदानी को अपने चारो तरफ़ लपेटे हुये बैठे-बैठे सोते हुये धरना दे रहे थे। उनके पीछे जो बोर्ड लगा था उससे लगा शायद सवर्णों के लिये आरक्षण की मांग कर रहे हों।
बगल में उघारे बैठे डॉ रमा इन्द्र समाजवाद के लिये भूख हड़ताल पर बैठे थे। बताये कि जे यन यू में रिसर्च स्कॉलर थे। फ़िर दिल्ली विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. किये। छठी शताब्दी के दोहों की किसी किताब पर। पंजाबी में पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च करने के लिये तैयारी कर रहे हैं। एक मोटी किताब ध्यान से बांच रहे थे। किताब में पंजाबी के बहुउत्तरीय प्रश्न-उत्तर थेे।
एक बांह कुछ टूटी दिखी। बताया कि पुलिस ने तोड़ दी। मंत्री के सामने धरना देने का ’इनाम’ मिला। केस चल रहा है। ’अबकी बार , सबकी सरकार ’ समाजवाद से हमको गोरखपांडेय की कविता याद आ रही थी:
समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई
हाथी से आई, घोड़ा से आई
अँगरेजी बाजा बजाई
बगल में देश भर में शराबबंदी कराने के लिये द्रो युवा धरने पर बैठे हुये थे। तमिलनाडु के रहने वाले दोनों युवाओं के पिता भयंकर पियक्कड़ थे। डेविड कन्याकुमारी से और प्रकाश त्रिची से आये हैं धरना देने। डेविड सेना में नौकरी करते थे। प्रकाश त्रिची से इंजीनियरिंग किये हैं। हमारी फ़ैक्ट्री है वहां। डेविड से कन्याकुमारी की बातें हुईं।
धरने के दौरान खाना गुरुद्वारे में खाते हैं। सामुदायिक शौचालय, स्नानागार में निपटान होता है। शायद इसीलिये जंतर-मंतर धरने के लिये मुफ़ीद जगह है।
धरना देने से शराब बंद होगी कि नहीं पता नहीं लेकिन शराब से न जाने कितने घर आये दिन बरबाद होते हैं। दो दिन हुये हमारे बंगले में रहने वाला शाम को खूब दारू पीकर सोया तो फ़िर उठा ही नहीं। पता चलने पर फ़ौरन अस्पताल ले जाने पर पता चला कि बहुत पहले ’शान्त’ हो गया। बहुत अच्छे स्वभाव का व्यक्ति अपने होनहार बच्चों को अनाथ करके और पत्नी को दुनिया का सामना करने के लिये छोड़ गया।
एक महिला धरने पर बैठे हुई थी। बताया कि उसकी बच्चे और बहन अगवा करके लोग ले गये हैं। गया, बिहार के एक गांव की रहने वाली है महिला। यहां गुरुद्वारे और बाबा रामपाल के धरनास्थल पर मिलने वाला खाना सूट नहीं करता। परेशान है। अगवा करने वालों के खिलाफ़ शिकायत करने पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। उसका कहना है- "सब लोग ताकतवर लोग अपराधियों के साथ मिले हैं।"
बाबा रामपाल का धरनास्थल सबसे वीआईपी धरनास्थल है। पानी के टैंकर, टैंट और खाने-पीने की सुविधाओं से लैस। टैंकर से टिकी रामलाल की फ़ोटो पर लोग मत्थाटेकते हुये जा रहे थे। एक आदमी जबलपुर से पत्नी सहित आया था। बाबा की पेशी में अदालत गया था। हमने कहा - ’बाबा जी तो अंदर हैं।’ उसका कहना था -’बाबा भले अंदर हों लेकिन उनका दिया ज्ञान तो हमारे साथ है।’ हमने पूछा क्या ज्ञान दिया बाबा ने तो उसने बताया नहीं। लपकते हुये चला गया।
वहीं दो महिलायें आपस में झगड़ रहीं थीं। झगड़े का कारण पता नहीं चला लेकिन एक पुलिस वाला उनको समझाता हुआ झल्ला रहा था-’ अरे माई चुप हो जा। जब आयेगा तब पूछताछ करेंगे। पुलिस कहीं भागी थोड़ी जा रही है।’ इसके बाद भुनभुनाते हुये कहने लगा-’ खाना-पीना मुफ़्त में मिल जाता है। कोई काम-धाम है नहीं। बस बैठे हैं धरने पर। उस पर भी चैन नहीं तो झगड़ते हैं आपस में। पुलिस की नाक में तो दम है।’
अधेड़ पुलिसवाले के चेहरे पर झुर्रियां पड़ना शुरु हो गयी थीं। सामने के दो दांत गोल हो गये थे। धैर्य से समझाते हुये वह पुलिस वाला कम एक समझदार इंसान ज्यादा लग रहा था।
चाय की दुकान पर चाय पीते हुये लोग उत्तर प्रदेश में हुई हालिया लूटपूट और बलात्कार पर बातें कर रहे थे। अखबार में खबर छपी थी। एक का कहना था-
’आदमी कहीं सुरक्षित नहीं है।’
चाय की दुकान के पास ही बताया गया वह पेड़ था जिसमें एक व्यक्ति ने ’आम आदमी पार्टी’ की सभा के दौरान फ़ांसी लगा ली थी। एक ने बताया- ’उसको आत्महत्या थोड़ी करनी थी। वह दिखावा कर रहा था। उधर मंच पर नेता दिखावा कर रहे थे। पेड़ से पैर फ़िसलगया। फ़ांसी लग गई। मर गया।’
चाय की दुकान वाले जीवानंद जोशी अल्मोड़ा के रानीखेत के रहने वाले हैं। 34 साल पहले दिल्ली आये थे। लड़का बीए करके अपना कुछ काम करता है। तीन लड़कियां हैं। उनमें से दो जुड़वां। तीनों की शादी करनी है। जब ऊपरवाला चाहेगा , होगी। पहाड़ छोड़कर आने की बात पर बोले- ’भगवान ने पेट दिया है। उसको भरने के लिये घर छोड़ना पड़ा। मजबूरी है।’
छुटकी सी चाय की दुकान जोशी जी सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक चलाते हैं। दुकान बंद करने के बाद चाय का सामान वहीं खड़ी एक मित्र की कार में रख देते हैं। दिन भर जोशी जी कार की रखवाली करते हैं। रात को कार उनकी दुकान को आसरा देती है।
लौटते हुये एक बाबा जी फ़ुटपाथ पर लेटे हुये दिखे। पास में वजन नापने की मशीन और एक हाथ गाड़ी में बक्से में रखा कुछ सामान। वजन वाली मशीन 800 रूपये में खरीदी थी। बनारस के रहने वाले हैं। लालचन्द नाम है। दस साल पहले दिल्ली आये थे। इसके पहले पल्लेदारी करते थे।अब मेहनत नहीं होती तो बाबा बन गये।
बाबागिरी सबसे सुरक्षित और सहज जीविकोपार्जन का जरिया है अपने देश में। कुछ साल पहले जमीन पर दंड पेलने कुछ समझदार बाबा लोग तो अरबों-खरबों के ऊपर दंड़पेलते हुये कपालभाती करते हैं आजकल।
होटल वापस लौटते हुये संतोष त्रिवेदी को फ़ोन किया कि आये नहीं जंतर-मंतर चाय पीने, धरने में सहयोग देने। इस पर उनका कहना था - ’हम समझे मजाक कर रहे हो।’ मतलब हमको कोई सीरियसली लेता ही नहीं। हम खुद भी कहां लेते हैं।लोकतंत्र में बहुमत के साथ रहने में भलाई है।
है कि नहीं?
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Wednesday, May 24, 2017

फ़ुटपाथ, सड़क के किनारे आम आदमी के रैन बसेरे हैं






आज सबेरे सूरज भाई राजा बेटा की तरह आसमान पर बिराजे हुये थे। साहब लोगों के राउंड के समय स्टॉफ़ मुंडी फ़ाइल में घुसा देते हैं। उसी तरह एकदम अनुशासित ओढ लिया सूरज भाई ने। थोड़ी शराफ़त भी पोत ली।
बाहर निकले। हैंडल दायीं तरफ़ घुमाया आज। घुमाया क्या घूम गया अपने आप। आजकल दांये घूमने में ही बरक्कत है। बायीं तरफ़ रहने में बवाल है। कोई जरूरी नहीं कल को सड़क पर भी दायें चलने का आदेश आ लागू हो जाये।
घर के पास की दरगाह पर एक मोटरसाइकिल रुकी। एक आदमी डाउनलोड हुआ। खरामा-खरामा चलते हुये दरगाह में बिना ’मे आई कम इन सर’ बोले घुस गया। गेट पर बैठे भिखारी उसको अन्दर जाते हुये देखता रहा। इसके बाद सड़क ताकने लगा।
मोड़ के आगे एक महिला तेज-तेज चलती हुई आती दिखी। उसको सड़क पर मन्दिर दिखा। चप्पल नाली के किनारे उतारकर उसने वहीं से काली माता को प्रणाम किया। फ़िर चप्पल पहनकर चल दी।
सड़क के दोनों तरफ़ रिक्शेवाले, टेम्पोवाले अपने-अपने वाहनों पर सोते दिखे। जो कोई गद्दी को सिरहाना बनाये तो कोई पिछली सीट पर गुड़ी-मुड़ी होकर। एक आदमी बैटरी रिक्शे की छत को चरपैया बनाये सो रहा था। जगह-जगह चाय-बिस्कुट की दुकाने खुली हुई थीं। जग गये लोग वहां बैठे चाय पी रहे थे। नये दिन को गुडमार्निंग कर रहे थे।
कुछ बच्चियां जल्दी-जल्दी बतियाते हुये सड़क पर चली जा रही थीं। लगता है घर से बाहर बतियाने के निकली हैं। घर पहुंचने से पहले अपनी सब बातें कर लेना चाहती हों।
चौराहे से आगे घंटाघर की तरफ़ बढे। एक जगह सड़क के किनारे तमाम सीवर लाइनें रखी हुईं थी। कुछ लोग उन सीवर लाइनों के सिंहासन पर बैठे थे। पास ही कुर्सी पर ’गुम्मा (कुर्सी) हेयर कटिंग सैलून’ पर लोग हजामत बनवा रहे थे। फ़ोटो खैंचने पर बुजुर्गवार के साथ वाले ने कहा:
-अखबार में फ़ोटो देखेंगे तब योगीजी इनको बुलायेंगे।
मसालामुखी बुजुर्गवार मुस्कराते हुये सुनते रहे। बोलते तो मसाला निकलजाता। पास ही थोड़ा ऊपर बरामदे में लोग सोये हुये थे। हमने पूछा -’ये रैन बसेरा है क्या’?
’अरे ये रैनबसेरा नहीं है। ये सब चोरकट हैं।’- साथ वाले ने कहा। ऊपर खड़े लोगों ने सुनते हुये भी इसको अनसुना किया। बुरा नहीं माना।
आगे एक ट्रक से कोम्हड़ा उतर रहा था। पास ही एक दुकान पर खुले में रखे पेठे से चिपकी हुई तमाम मक्खियां भिनभिनाती हुई गुडमार्निंग कर रहीं थी।
घंटाघर चौराहा एकदम्म गुलजार था। एक चाय की दुकान के सामने बुजुर्गवार अखबार बेंच-बांच रहे थे। चाय की दुकान वाले ने बताया कि दुकाने 1932 की हैं। वह वहां 1995 से दुकान चला रहा है। बगल वाला भटूरे बनाते हुये कमेंट्री करता रहा:
’जब चुनाव होते हैं। कोई दौरा होता है तब दुकानें बन्द कर दी जाती हैं। सरकार की जो मर्जी आये करे। सब कुछ तो सरकार ही करती है न। सड़क बनती है तो घर गिरा दिया जाता है कि नहीं। आप क्या करोगे- ’हल्ला मचाओगे, कोर्ट-कचहरी करोगे। सालों लडोगे तो पांच हजार मुआवजा थमा दिया जाता है कि नहीं। वही हाल यहां का भी है।’
चाय की दुकान वाले से मजे लेते हुये बोला-’ इनकी बीबी पुलिस में है। उसकी ड्रेस बनवानी पड़ती है इनकों। न बनवायें तो डंडा खायें। डंडे में बहुत ताकत होती है।’
प्लास्टिक के ग्लास में छह रुपये की चाय कुल्हड़ में पीने पर 12 रुपये की पड़ी।
लौटते में एक जगह ताजी सब्जी दिखी। खरीद लिये। 15 रुपये किलो तरोई। 20 रुपये किलो पालक। 20 रुपये किलो चुकन्दर। तय किया कि अब घर से निकलेंगे तो झोला लेकर।
लौटते हुये जगह-जगह लोग सोते-ऊंघते-जगे-अधजगे दिखे। सामुदायिक शौचालय, सामूहिक स्नानागार भी। मंदिरों के सामने की सड़क पर मांगने वाले ऐसे बैठे थे जैसे घर के आंगन में बैठे हों। एक बच्चा-बैल चेहरे और सींग पर गेंदे की बासी मालायें धारण करे अपने मालिक को मांगने में सहायता करता दिखा।
सागर मार्केट के पास एक मोबाइल रिपेयर की दुकान पर एक आदमी सोता हुआ दिखा। सुबह होने पर दुकान खुल जायेगी। भीड़ बढ जायेगी। बाजार गुलजार हो जायेगा।
काउंटर पर लिखा था -’फ़ोटोकापी डाउनलोडिंग होती है।’ हमको लगा कि हम समाज के समाज-आदमी के पतन से बेकार-बेफ़ालतू हलकान हैं। हमको समझना चाहिये कि समाज-आदमी पतित नहीं हो रहा है। वास्तव में वह डाउनलोड हो रहा है। तकनीक का समाज के विकास में उपयोग किया जाना चाहिये। आदमी को पतित नहीं डाउनलोड होता बताया जाना चाहिये। पतन से लगता है कुछ गड़बड़ हो रहा है। डाउनलोड होने से उन्नति का एहसास होता है। एक बार फ़िर लगा कि तकनीक के सहारे विकास कितना आसान काम है।
फ़ूलबाग के सामने सड़क पर तमाम पैकेट का दूघ बेचने वाले दिखे। कुछ महिलायें भी थीं। आगे ओईएफ़ के पास सड़क किनारे रैनबसेरा बना था। वहां कोई आदमी बसेरा करता नहीं दिखा। सच तो यह है कि फ़ुटपाथ, सड़क के किनारे आम आदमी के रैन बसेरे हैं। दुकानों के बाहर सोते हुये लोग दुकानों के मुफ़्तिया चौकीदार हैं। शायद इन्हीं से शहर गुलजार है।
घर लौटकर आये तो सोचा शायद सुबह-सुबह सब्जी लाने पर शाबासी मिलेगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उल्टे पालक लाने पर उलाहना मिला-’ पालक घर में पहले ही बहुत है। बेकार ले आये।’ हम यही सोचकर चुप हो गये कि दुनिया में भलाई का जमाना नहीं।
सामने बगीचे में बन्दर चिंचियाते हुये, किकियाते हुये जो पेड़-पौधा हाथ लगा उसको नोचते-उखाड़ते हुये अपनी सुबह गुलजार कर रहे हैं। भगाने पर थोड़ा दूर जाने पर वापस घुड़कते हैं। फ़िर भी ये सब किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं से कम अराजक हैं। आदमी के मुकाबले बन्दर बहुत कम डाउनलोडित हुये हैं।
सुबह हो गयी। अब चला जाये दफ़्तर ! आप मजे कीजिये और कुछ धरा नहीं है दुनिया में।
शब्द संख्या -925

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Monday, May 22, 2017

जरा मुस्कराइये तो सही खूबसूरत लगेगा


आज सबेरे ही निकल लिये। साइकिल पहली ही ’किक’ में स्टार्ट हो गयी। खरामा-खरामा चली पहले। फ़िर सरपट। हिन्दी में कहें तो पहले ’राग विलम्बित’ में चली फ़िर ’द्रुत गति’ में आ गयी। अधबने पुले ने सामने से नमस्ते किया। हसन अली की दुकान बन्द थी। गंगाघाट पुलिस चौकी के बाहर एक पुलिस वाले भाई 100 नंबर वाली गाड़ी पर पोंछा मार रहे थे। दूसरे भाई कुर्सी पर गुड़ी-मुड़ी हुये, अधमुंदी आंखों से सुरक्षा व्यवस्था संभाले हुये थे।
सड़क दोनों तरफ़ सोई हुई थी। दो महिलायें टहलती हुय़ी बतियाती जा रही थीं। एक युवती हाथ में डंडा थामे कुछ बड़बड़ाते चली जा रही थी। पुल की शुरुआत का कूड़ा कुछ पतला दिखा। पुल पर दो लोग घुटन्ना पहने मृदु मंद-मंद, मंथर-मंथर चले जा रहे थे। नीचे नदी सबेरे की नींद की मलाई मार रही थी। अलसाई सी हवा की लहरों के साथ आगे बहती हुई।
बगल के पुल पर ट्रेन जा रही थी। उसके निकलने के बाद पटरी पर दो कुत्ते भागते चले जा रहे थे। लगता है शुक्लागंज में उनका कोई फ़ेवरिट खंभा है। वहीं जाकर टांग उठायेंगे।
नीचे नदी में लोग नहा रहे थे। नाव भी चल रही थी। बायीं तरह के मकानों की छतों पर लोग सोये हुये थे। पुल पार करते ही चौराहे की चाय की दुकान पर लोग दिखे। पहली चाय बना रहा था चाय वाला। चाय छानने के बाद केतली की टोंटी टेड़ी करके गैस चूल्हे के गर्म लोहे पर चाय की धार डाली। प्रसाद की तरह। ग्राहकों को पन्नी, ग्लास में चाय बांटने लगा।
दुकान के बाहर तमाम हॉकर साइकिल पर अखबार सजा रहे थे। एक भाईसाहब के दोनों हैंडल में झोलों में अखबार गंजे हुये थे। दायें हैंडल के झोले को देखकर बोले- ’ये गड़बड़ हो गया।’ पता चला हैंडल की रगड़ से झोला एक तरफ़ फ़ट गया था। आज उसका मुंह दूसरी तरफ़ हो गया था। ऐसे ही रहता तो दूसरी तरफ़ भी झोला मुंह बा देता। झोले को उलटकर सीधा किया। इससे एक बार फ़िर लगा कि चाहे आदमी को या झोला जो जिधर फ़टा होता है उसके उसी तरफ़ फ़ाड़ने की साजिश होती है।
एक हॉकर ने उधर से गुजरते हुये एक बुजुर्ग को प्रणाम निवेदित किया। उन्होंने उसे ग्रहण करते हुये किसी बात पर बधाई देते मिठाई का आग्रह किया। उसने कहा-’ आपका आशीर्वाद है। इसीलिये पांव छूते हैं।’ बुजुर्ग ने कहा-’ आशीर्वाद तो रोजै है। बढे चलो।’
बढे चलो को लपकते हुये साइकिल पर अखबार बांधते हुये भाईसाहब बोले-’ कहां से बढिहैं। तीन साल से तौ बैक गियर मां चलि रहे हैं।’
गंगाघाट के पहले मिली युवती तब तक पुल पार करके लपकती, बड़बड़ाती हुयी चाय की दुकान पर पहुंच गयी। चाय वाले ने बिना कुछ पूछे उसको एक प्लास्टिक की ग्लास में चाय थमाई। वह ’गन्दे लोग, शरम नहीं आती गन्दी हरकत करते हुये’ जैसी बातें बुदबुदाती हुयी रेलवे क्रासिंग की तरफ़ चली गयी। दुकान से बाहर निकलते ही आधी चाय उसने सड़क पर गिरा दी और चलते-चलते एकाध चुस्की लेकर ग्लास सड़क पर फ़ेंक दिया।
चौराहे पर दो-तीन गायें और एक गाय जैसा ही दिखता सांड़ खड़े थे। सांड़ को कुछ समझ में नहीं आया तो वह गाय की पूंछ सूंघने जैसा चला गया। गाय ने थोड़ा पूंछ हिलाई और टहलते हुये आगे चली गयी। सांड वहीं खड़ा दूसरी गायों की तरफ़ ताकता रहा।
वापस लौटते हुये पुल पर एक आदमी आटे की गोली बनाकर नदी में फ़ेंकता दिखा। मन नदी से पुल की ऊंचाई पता होती तो वहीं खड़े-खड़े आटे की गोली किस गति से नदी से टकराती हैं इसकी गणना कर डालते। पुल के बगल से जाते पाइप लाइन पर बैठी एक चिड़िया बैठी ही रही। उसके देखते-देखते एक दूसरी चिड़िया उड़ती हुयी आई और कई टुकड़ों में पाइप पर बैठते-उड़ते पुल पार कर गयी। कवि यहां कह सकता है कि रास्ते चलने से पार होते हैं-बैठे-बैठे नहीं। लेकिन कह नहीं रहा क्योंकि कवि को भी पता है कि सुबह-सुबह कवि का मुंह कोई नहीं देखना चाहता भाई।
लौटते हुये देखा पुलिस चौकी पर जवान चुस्तैद हो गये थे। हसनअली का घर दुकान में बदल रहा था। एक बुजुर्ग महिला दुकान के सामने झाड़ू लगा रही थी। पुल के पास कूड़ा बीनने निकली एक युवती एक युवक से कुछ बतिया रही थी। चलते समय मसाला मांग खाया।
रास्ते में कहीं सूरज भाई नहीं दिखे। लेकिन घर पहुंचते ही देखा कि आसमान में विराजे हुये थे। जैसे देर से आने वाले लोग दफ्तारिये साहब के पहुंचते ही कुर्सी पर चुस्त बैठे मिलते हैं उसी तरह सूरज भाई किरणें और प्रकाश बिखराते हुये मिले। गर्मी मुफ़्त में।
हमने सूरज भाई की इस अदा पर मजे लेते कहा- ’सूरज भाई टाइम पर आया करो। यहां भी बायोमेट्रिक लगा हुआ है। देरी से आये तो आधे दिन की कैजुअल कट जायेगी।’
इस पर सूरज भाई मुस्कराने लगे। मुस्कराते ही और खूबसूरत बोले तो हैण्डसम लगने लगे। हमें भी मजबूरन मुस्कराना पड़ा। अब आप भी मुस्कराईये। क्योंकि सुबह हो गयी है। वैसे भी मुस्कराते हुये लोग खूबसूरत लगते हैं। आप भी लगेंगे , जरा मुस्कराकर देखिये तो सही।


https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10211468209554365

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Sunday, May 21, 2017

बाद में लाइफ़ झिंगालाला

बड़ा बवाल है इधर-उधर,
जिधर देखो लफ़ड़ा उधर।
हर खबर में घुसा घपला,घोटाला,
फिर बाद में लाइफ़ झिंगालाला।
वो सिर्फ़ खबरें बुरी दिखाता है,
खुशी से मानो 36 का नाता है।
हल्ला बहुत गर्मी का सब तरफ़,
पर कोलतार अभी पिघला नहीं।
अभी तो बाकी हैं लू के जलवे,
पारा अभी तो और उचकना है।
-कट्टा कानपुरी

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बालक का लपककर खुद हवा भरना बालश्रम की श्रेणी में आएगा कि नहीं





साइकिल आ गई जबलपुर से। हवा पिछले पहिये में कुछ कम लगी। भरवाने निकले तो कई जगह हवा भरने की दुकाने बंद मिलीं। लौटने ही वाले थे कि एक ने कहा पीछे देख लो। पटरी के पास।
दुकान पहुंचे। हवा भरने के लिए कहा तो दुकान के पास बैठी चारपइया पर बैठे बालक ने उछलकर , जैसे संवाददाता लोग सवाल पूछने वाले श्रोता के मुंह से माइक सटा देते हैं, उसी तरह हवा भरने वाला पाइप लपककर साईकिल के पिछले पहिये की छुच्छी से सटा दिया। हवा भरते हुए मेरी तरफ देखता रहा। हमने उसकी फोटो खैंच ली।
बालक ने हवा कुछ ज्यादा ही भर दी। लेकिन हमने निकाली नहीं। फिर अगले पहिये में भी भरी हवा बालक ने। हमने पैसे पूछे तो बोला -'तीन रूपये।'
तीन रूपये का हिसाब पूछ्ते हुए बालक का नाम पूछा। जिस तेजी से बताया उससे ऐसा लगा जैसे पार्टी से निकाला गया कोई नेता अपनी पुरानी पार्टी के घपले उजागर कर रहा हो। समझ ही नहीं आया। बाद में पता चला बालक का नाम हसन अली है। वह कोई और नाम भी बताता तब भी हम मान लेते।
स्कूल जाते हो पूछने पर बालक ने सरपट बताया -'हाँ। अभी एलकेजी में हैं। फिर केजी में फिर एक में जाएंगे।'
लौटते हुए हमने सोचा कि हवा भरने की दुकान पर (जो कि घर भी है दुकान वाले का ) बैठे बालक का लपककर खुद हवा भरना बालश्रम की श्रेणी में आएगा कि नहीं।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10211464724907251

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Monday, May 15, 2017

टेलीफ़ोन

टेलीफ़ोन से पहली मुलाकात अपन की किताबों में ही हुई। सामान्य ज्ञान के तहत पता चला कि ग्राहम बेल ने खोज की इसकी। प्रयोग के पहले सिनेमा में देखते रहे, कहानी में पढते रहे, गाने में सुनते रहे :
मेरे पिया गये रंगून
किया है वहां से टेलीफ़ून
तुम्हारी याद सताती है !
याद सताती है यह बताने के लिये पिया रंगून निकल लिया। बगल के कमरे में जाकर चिल्लाकर भी कह सकता था। लेकिन नहीं रंगून ही जायेंगे। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि पहले के लोग याद के नाम पर कित्ती फ़िजूलखर्ची करते थे।
बचपन में जहां रहते थे वहां दूर-दूर तक कोई फ़ोन रहा हो याद नहीं आता। बड़े होने तक किसी को फ़ोन करने की याद तक नहीं है। बाद में जब नौकरी में आये तो फ़ोन के दर्शन हुये। प्रयोग करने पर पता चला कि फ़ोन भी दो तरह के होते हैं। एक जिसमें लोकल बात होती है, दूसरे जिसमें विदेश बात हो सकती है मने एस.डी.टी.। पहली बार जब विदेश बात किये तो बहुत देर तक सोचते रहे कि बात क्या करेंगे? जब मिला तो भूल गये कि सोचा क्या था बात करने। बाद में ध्यान ही नहीं रहा कि बतियाये क्या?
बहुत दिन तक फ़ोन विलासिता टाइप बने रहे। एस.टी.डी. फ़ोन धारी अफ़सर विधायकों में मंत्रीजी टाइप लगते। लोग फ़ोन पर ताला लगाकर रखते। डायल करने के लिये छेद में बेडियों की तरह ताला लगाकर जाते।
लेकिन जहां चाह वहां राह। ताला लगे फ़ोन में डायल घुमाने की जगह हम लोग खटखटाकर फ़ोन मिलाने की कोशिश करते। 234 मिलाना हो तो पहले 2 बार खटखटकरते, जरा सा रुककर 3 बार खटखटाते फ़िर रुककर चार बार खटखटाते। 10 में 2 बार फ़ोन न मिलने पर वर्जित फ़ल चखने का रोमांच हासिल होता।
बाद के दिनों में पीसीओ का चलन बढा। घंटो इंतजार करके बातें करते। अब वह भी गये जमाने के किस्से हुये।
शुरुआती दिनों में टेलीफ़ोन के बतियाने के काम आया था। बाद के दिनों में तो टेप , भण्डाफ़ोड़ और सरकार गिराने, बनाने में काम आने लगा।
हॉट लाइन नाम सुनते तो लगता कि फ़ोन से कान जल जाते होंगे इसीलिये लोग हॉटलाइन पर कभी-कभी ही बात करते हैं।
मोबाइल में फ़ोन होता है लेकिन टेलीफ़ोन का मजा ही कुछ और है। मोबाइल में आवाज आते-आते चली जाती है। सेंन्सेक्स की तरह उछलती-कूदती रहती है आवाज। लेकिन टेलीफ़ोन में बातचीत स्थिर रहती है। जो मचा टेलीफ़ोन से बतियाने में है वह मोबाइल में कहां। घंटो बतियाने पर भी बैटरी की कोई चिन्ता नहीं।
टेलीफ़ोन में विविधता के दर्शन होते हैं। तरह-तरह के आकार के टेलीफ़ोन दिखते हैं। मोबाइल ने विविधता खत्म कर दी। साइज में भले छोटे-बड़े दिखें लेकिन आकार वही चौकोर। एकरस टाइप की मामला।
टेलीफ़ोन में गुस्से की इजहार करते हुये लोग रिसीवर को पटक देते। रिसीवर भी पुराने जमाने के जीवन साथी की तरह इसका बुरा नहीं मानता। आज मोबाइल कोई पटककर कोई गुस्से का इजहार नहीं करता। एक बार पटका मतलब गया मोबाइल।
टेलीफ़ोन का सबसे मजेदार बात क्रास कनेक्सन मिल जाना हुआ। घर में फ़ोन मिलाना और पता चला बात किसी सहेलियों की सुनाई पड़ने लगी। बैंक फ़ोन लगाओ तो रिसीवर उठे रेलवे इन्क्वायरी में। यह सब तो ठीक। लफ़ड़ा तो तब जब किसी अजीज मठाधीश को फ़ोन मिलाओ और मिलते ही जब आप उसके गुणगान शुरु करो तो वह खुश न होकर उस बातचीत के बारे में सवाल पूछने लगे जो आपने उसको फ़ोन मिलाने के पहले अपने अजीज से उसकी लानत-मनालत करने के पहले की है और जो उसने गलती से क्रास कनेक्शन होने के चलते की है। ऐसा होता तो बहुत कम है लेकिन होता तो है ही। ऐसा एक सच्चा किस्सा सुनाने का मन है लेकिन वह फ़िर कभी।
फ़िलहाल तो आप अपना फ़ोन उठाइये और अपने किसी अजीज से बतियाइये। अच्छा लगेगा।

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Tuesday, May 09, 2017

दिल्ली में साइकिलबाजी


आज सबेरे बहुत दिन बाद साइकिल चलाई। दिल्ली में। जंतर-मंतर के सामने धरना दे रहे एक भाई बोले- ’ दिल्ली देश का दिल है। कलाट प्लेस दिल्ली का दिल है।’ इस लिहाज से तो हमने देश के दिल पर साइकिल चला दी। लेकिन मोहब्बत से चलाई। इसलिये सब माफ़।
सबेरे होटल से टहलने निकले। दरबान से बतियाने लगे। दरभंगा के उमाकान्त पांच साल पहले दिल्ली आये थे। यहां दरबानी करते हैं। 15-17 हजार मिलते हैं। बारह घंटे की ड्यूटी आंखों में बजी हुई लग रही थी। हर आने वाले गाड़ी पर बैरियर खोलना। बन्द करना।
और कोई काम नहीं मिला पूछने पर बोले- ’दिल्ली आये तो चार-पांच साल बरबाद कर दिये इधर-उधर। अब 35 साल के हो गये। और कोई क्या काम मिलेगा।’
गेट पर ही साइकिलें खड़ी थीं। पता चला घूमने ले जा सकते हैं। एक साइकिल इशू कराई। निकल लिये। पता चला पास में इंडिया गेट है। उधर ही बढ गये।
सड़क पर फ़ुटकर मार्निंग वाकर दिख रहे थे। एक बुजुर्ग की बनियाइन पर लिखा था - ’लिव हैप्पिली।’ एक महिला अपनी सहेली के साथ फ़ुर्ती के साथ टहल रही थीं। हाथ का डंडा इत्ती फ़ुर्ती से लपलपा रहीं थीं कि चर्बी डर के मारे पास न फ़टके।
हैदराबाद हाउस के पास मोड़ पर एक बुजुर्ग दम्पति से हमने इंडिया गेट का रास्ता पूछा। उन्होंने मोहब्बत से फ़ुल तसल्ली के साथ समझाया। देर तक और दूर तक देखते रहे कि हम सही जा रहे हैं कि नहीं।
बुजुर्गों से बतियाने का यह उत्तम उपाय है उनसे कुछ पूछते रहो। भले ही अमल में मत लाओ। उनके पास जो जानकारी होती है उसको पताकर उनको सुकून मिलता है। दफ़्तर में बॉस को भी बरतने में यह उपाय अमल में लाया जा सकता है। साहब को जो आता हो उनसे पूछो। साहब को ज्ञान प्रदर्शन का मौका मिलेगा। उसको खुशी मिलेगी। आप भी खुश रहोगे।
इंडिया गेट पर लोग वर्जिश कर रहे थे, टहल रहे थे, गपिया रहे। कोई अपने शरीर दोहरा कर रहा था। कोई दांये-बांये हिला रहा था। सबेरे वाली धुन बज रही थी। पानी और आइसक्रीम के ठेले लगे हुये थे। चाय का जुगाड़ कहीं नहीं दिखा। पता लगा टहलकर बेचने वाले आते हैं चाय वाले। हम लौट लिये।
लौटते हुये सूरज भाई हमको चारो तरफ़ से लपेटकर रोशनी से पूरा नहला दिये। हम खुश। पूरे शरीर से पसीने की बूंदे किरणों से मिलने के लिये बाहर निकल आई। दोनों के मिलते ही हवा भी चलने लगी। मजेदार मामला हो गया।
चौराहे पर देखा एक मोटरसाइकिल पर एक महिला बड़ा सा डंडा थामे चली बैठी थी। हमें लगा -’कहां लट्ठ चलाने जा रही हैं ताई।’ लेकिन फ़िर देखा कि डंडे के नीचे झाड़ू भी बंधी थी। मोटर साइकिल वाला उनको ड्यूटी की जगह पर छोड़ने जा रहा था।
सड़क के दोनों तरफ़ झाड़ू लगा रहे थे लोग। आहिस्ते-आहिस्ते। एक लड़का ठेले पर सब्जी बेचने निकला था। जिस ठेले में कूड़ा उठता है उसी तरह के ठेले में सब्जी बिकती देखकर थोड़ा अटपटा लगा। लेकिन फ़िर सोचा- ’यह दिल्ली है मेरी जान।’
जंतर-मंतर के पास फ़ुटपाथ पर एक चाय की दुकान दिखी। वहीं चाय पीते हुये बतियाये। सतीश मित्तल नाम है दुकान मालिक का। 37 साल बाद फ़ुटपाथ पर चाय की दुकान जुगाड़ पाये हैं। पर्ची कटती है। जब मन आये भगा दिये जाते हैं।
पास में ही धरना देने वाले लोग बैठे थे। पता चला कि रामपाल के समर्थक हैं। महीनों से रामपाल की गिरफ़्तारी का विरोध कर रहे हैं। उनको छुड़वाने के लिये धरना दे रहे हैं।
चाय की दुकान पर एक आदमी चाय पीने आया। बोला-’ चाय पिलाओ यार, आज अभी तक रामपाल की चाय आई नहीं।’ पता चला कि रामपाल के धरने में शामिल लोगों के लिये चाय-पानी का इंतजाम होता है। उनके लिये चाय आती है तो बाकी लोग भी पी लेते हैं।
हम रामपाल के धरने का जायजा लेने के पहले वहीं पर अकेले धरने पर एक और भाई जी से बतियाने लगे। अपनी बुजुर्ग मां के साथ धरना दे रहे भाई जी का कहना है कि उनके पास ऐसी स्कीम है जिससे देश के लोगों के हाल सुधर जायेंगे। गरीबों का भला होगा। अपनी बात कहने के लिये महीनों से धरने पर बैठे हैं लेकिन सरकार सुनती ही नहीं। हर जगह चिट्ठी लिख रखी है। कोई जबाब ही नहीं देता।
बुजुर्ग महिला अस्सी के करीब की उमर की होंगी। सांस की तकलीफ़ भी लगी। मेहरौली से उनका बेटा देश के सुधार के लिये जबरियन धरने पर लाकर बैठा दिया। हमने माता जी के हाथ सहलाये और तबियत पूछी तो वे भावुक होकर अपने बेटे से कहने लगीं -’ये क्या कह रहे हैं?’ धरना -भाई ने हमसे चाय पानी करके जाने का आग्रह किया लेकिन हम निकल लिये। शुभकामनायें देकर।
आगे रामपाल की रिहाई के लिये तमाम लोग धरने पर बैठे थे। हमने पूछा तो लोग रामपाल की महिमा ऐसे बताने लगे जिससे हमें लगा कि अगर हमने थोड़ी देर और सुनी महिमा तो हम भी अपना काम-धाम छोड़कर यहीं धरने पर बैठ जायेंगे। मजे की बात लोग आते जा रहे थे। हमारे साथ में दस-बारह महिला-पुरुषों का समूह आया और राम-राम कहता हुआ धरने पर बैठ गया।
एक धरनावीर ने मुझे बताया कि उनको कैंसर था। बाबा जी ने ठीक कर दिया। इसीलिये वह धरने पर है। उनकी रिहाई के लिये। बाद में एक कार्ड भी दिखाया उसने जिसके हिसाब से वह राजस्थान पुलिस की नौकरी में है। रामपाल भक्तों का कहना है - ’जिस तरह राम, कृष्ण, मीरा को पहले लोग मानते नहीं थे। बाद में उनका महत्व समझा गया उसी तरह रामपाल की अहमियत अभी लोग समझते नहीं हैं।’
एक ने बताया - ’रामपाल आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। पुलिस से आजादी की लड़ाई, अदालत से आजादी की लड़ाई, नेताओं से आजादी की लड़ाई।’
हमने पूछा -’ इस लड़ाई के लिये पैसा कहां से आता है।’
वह बोला -’ लोग सहयोग करते हैं।’
हमको चाय की दुकान पर बैठे आदमी की बात याद आई। वह कह रहा था -’इन लोगों को विदेश से पैसा मिलता है। सरकार के खिलाफ़ हल्ला मचाने के लिये।’ हमको समझ नहीं आया कि किसकी बात सच मानें। इसलिये हम आगे बढ लिये।
आगे और तरह-तरह के लोग धरने पर बैठे थे। एक भाई अररिया, बिहार से आये थे धरना देने। वे कश्मीर को भारत का अंग मानने के लिये, पाकिस्तान का विरोध करने के लिये धरने पर बैठे थे। हमने फ़ोटो खींचने के लिये कैमरा ताना तो वे अपना तख्ती जिसमें नारे लिखे थे एक हाथ में लेकर दूसरे से मुट्ठी तानकर पोज देने लगे। हमने उसी पोज में उनका फ़ोटो लिया।
अब्दुल गफ़ूर तूफ़ानी का कहना है कि इस्लाम में हिंसा हराम है। वे यह भी बोले कि हम नकली धरना देने वाले नहीं हैं कि सुबह बैठें दोपहर को फ़ूट लें।
हमको वापस लौटने की जल्दी थी इसलिये हम फ़ूट लिये। लेकिन लौटते हुये एक आइडिय़ा हमारे दिमाग में आया कि व्यंग्य की हालिया स्थिति से हलकान लोगों को भी दिल्ली के जंतर-मंतर में धरना पर बैठ जाना चाहिये। क्या सीन बनेगा जब कोई तख्ती लिये दिखेगा। हमारी मांगे हैं।
1. व्यंग्य को मठाधीशी से मुक्त कराना।
2. व्यंग्य को सपाटबयानी से मुक्त कराना।
3. व्यंग्य से गाली-गलौज को बाहर करना।
4. व्यंग्य में 'कदम ताल' को बैन किया जाना।
5. व्यंग्य में बाजारू लेखन बैन करना।
और मांगे धरना देने वाले अपने हिसाब से सोच सकते हैं। होटल में आये और चाय चुस्कियाते हुये पोस्ट ठेल दी।
आपको कैसी लगी। बताइयेगा।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10211352307496886

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व्यंग्यकारों के संग दिल्ली में


आज सुबह जैसे ही दिल्ली का रोजनामचा पोस्ट किया वैसे ही रमेश तिवारी ने धर लिया। मिलो वरना धरने पर बैठ जाएंगे। हम इसी डर के मारे कल दिल्ली का रोजनामचा नहीं लिखे। दफ्तरी काम से निकलने पर कब वापस लौटना हो कोई ठिकाना नहीं। कल लौटते-लौटते रात हो गयी थी।
दिल्ली में इतने मित्र हैं कि सबसे मिलने के लिए महीना कम पड़ेगा। अकेले द्वारका के आयुध विहार में हमारे कई वरिष्ठ , रिटायर्ड अधिकारी रहते हैं जिनसे मिलना हर बार स्थगित हो जाता है यह सोचकर कि अगली बार तसल्ली से आएंगे तब पक्का मिलेंगे।
आज एक ही दफ़्तर जाना था। लगा कि 11 बजे तक फ्री हो जाएंगे। लेकिन फ्री होने में 12 बज गए। इसके बाद रमेश तिवारी के निर्देशानुसार सुभाष जी के दफ्तर पहुंचे। सुभाष जी से मिलने का मन होने के अब्बी अब्बी दो कारण और याद आ गए:
1. अगले व्यंग्य के इतिहास में अपने लिए थोड़ी और जगह का जुगाड़ करना।
2. भविष्य की इनाम वाली जुगत में अपने लिए कम से कम सुभाष जी का वोट पक्का करना।
ये बातें चूंकि हमने सुभाष जी को बताई नहीं थीं क्योंक उस समय ऐसा कोई इरादा नहीं। सिर्फ मिलने की इच्छा नहीं थी। मिलने के बाद सुभाष जी जिस तत्परता से बढ़िया खाना खिलाया और जबरियन पैसे भी खुद दिए उससे मुझे उनसे आशाएं बढ गयी हैं।
बातें खूब हुई। मठाधीशी, माफियागिरी, गदहापचीसी पर। सुभाष जी ने हमारे रिपोर्ताज, संस्मरण की तारीफ़ की। इसका इशारे में मतलब यह था कि व्यंग्य हम दो कौड़ी का लिखते हैं।  लेकिन हमको पूरी आशा है कि लिखें हम भले ही कैसा भी लेकिन कुछ दिन बाद सुभाष जी हमारे लेखन की तारीफ़ करने करने लगेंगे। आशा पर ही दुनिया टिकी हुई है। है कि नहीं।
रमेश तिवारी ने किसी बहाने से व्यंग्य संकलन की उपयोगिता की चर्चा की। हम समझ गए -'कवि यहाँ विनम्रता पूर्वक अपने किये काम की स्वयं तारीफ़ करना चाहता है।' हमने इस बात को कहा भी। रमेश जी की भलमनसाहत कि उन्होंने इस बात से इंकार नहीं किया। वरना आजकल लोग सच कहां स्वीकार करते हैं। कई मित्रों ने बताया मुझे कि इनाम में उनका नाम कटवाने वाले लोग बाद में मिलने पर बताते है -'हमने तो बहुत कोशिश की आपके समर्थन में लेकिन बाकी लोग अड़ गए कि इनको नहीं मिलना चाहिए।'
वैसे भी आजकल जब हर जगह स्वयंसेवा का चलन बढ़ रहा है तो साहित्य का क्षेत्र इससे अछूता कैसे रह सकता है। लोग तारीफ़ में फुल आत्मानिर्भर हो रहे हैं। तारीफ़ में कमी लगी तो अपने खिलाफ हुए अन्याय के वर्णन की मात्रा बढ़ा दी। आत्मप्रसंशा और अपने साथ हुए अन्याय के वर्णन के गठबंधन से लेखक और लेखन का स्तर अपने आप उछल जाता है।
सुभाष जी, रमेश जी और उसके बाद आलोक पुराणिक से मिलने के बाद के लेख का सटीक शीर्षक होना चाहिए था -' मेहनती व्यंग्यकारों से मुलाकात'। तीनों लोग अपने-अपने इलाके के धुरन्धर मेहनती लिक्खाड़ हैं। सुभाष जी ने तो 'व्यंग्य का इतिहास' लिखने में ही इतनी मेहनत कर डाली की अब लिखने के नाम पर टिप्पणियां तक 'मिनी टाइप' करते हैं। रमेश तिवारी ने इस साल कई व्यंग्यकारों के संकलन निकाले। आने वाले समय में शायद रमेश जी व्यंग्य संकलक, व्यंग्य आलोचक और व्यंग्य लेखक के रूप में (सु/कु)ख्यात हों। आलोक पुराणिक का कहना ही क्या । वे व्यंग्य के क्षेत्र में आजकल सबसे ज्यादा पसीना बहाने वाले मेहनती लेखक हैं। इत्ते मेहनती कि सामान्य बुराई-भलाई के लिए भी समय नहीं निकाल पाते। साथ के लेखकों की बुराई भलाई भी न की जाए तो काहे का लिखना और काहे का पढ़ना। आलोक जी को गर्मी की छुट्टियों में कोई कायदे का बुजुर्ग/समकालीन सहज निंदक साथी पकड़कर बुराई-भलाई करना सीखना चाहिए। आगे चलकर काम आएगी।
आलोक पुराणिक जी से मिलना तय हुआ था मण्डी हाउस में। लेकिन सुभाष जी ने विस्तार से जो लंच कराया और लंच में बाद में रसगुल्ले का जो पञ्च था उसमें समय रपट्टा मारकर आगे सरक गया। फिर आलोक जी से मुलाकात हुई नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के फ़ूड प्लाजा में। लस्सी पीते हुए हालिया व्यंग्य लेखन पर बातों की जलेबियां छानी गयीं। समय यहाँ भी स्पीड से गुजरा और देखते देखते ट्रेन का समय हो गया। हम निकल लिए।
और तमाम लोगों से मिलना है दिल्ली में। इस बार मिल नहीं पाये लेकिन जैसा मेरे एक बहुत अजीज ने कहा था बहूत पहले -' मुलाकात नहीं हुई लेकिन मिला हुआ समझना।'

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10211357284101298

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Sunday, May 07, 2017

बस मुस्कराते रहें


अक्सर इधर-उधर पढ़ने को मिल जाता है- मुस्कराते रहें।
मुस्कराते रहें मतलब कीप स्माइलिंग।
वैसे भी मुस्कराते हुये लोग कित्ते खूबसूरत लगते हैं। मिलकर मुस्कराते हुये तो और अच्छे। और खूबसूरत।
आपके हाथ में, हाथ में क्या चेहरे पर भी, बस यही बचा है जो आप धारण कर सकते हैं। मुस्कराते रहें। इसमें न कोई खर्चा है, न कोई टैक्स। बस चेहरे पर धारण करें और धरे रहें।
मुस्कराने से न जाने कित्ते काम अपने आप हो जाते हैं। चेहरा खिला रहता है। तनाव नहीं होता। तनाव नहीं होगा तो और बवाल भी नहीं होंगे। खूबसूरत दिखेंगे। देखा-देखी और लोग भी मुस्कराने लगेंगे। वे भी खूबसूरत दिखेंगे। बाजार में चीनी माल की तरह सब तरफ़ खूबसूरती ही खूबसूरती पसरी मिलेगी।
अब कोई मुस्कान विरोधी कह सकता है कि चीनी माल की तरह बिखरी मुस्कान तो घटिया क्वालिटी की होगी। जल्दी चटक जायेगी। न जाने कब अपना तम्बू उठाकर चल दे चेहरे से। क्या फ़ायदा ऐसी मुस्कान धारण करने से जो अस्थाई हो।
लेकिन कहने वाला ये थोड़ी कहिस है कि आप अच्छे से मुस्कराओ। वह तो सिर्फ़ यह कहता है मुस्कराते रहो। आपको ज्यादा कुछ सोचना ही नहीं है। बस बिना सोचे-विचारे मुस्कराते रहिये। जैसे उड़नबालायें मुस्कराती हैं। जैसे नायिकायें मुस्कराती हैं। जैसे परेशानियां मुस्कराती हैं। जैसे मंहगाई मुस्कराती है। जैसे नेता मुस्कराते हैं। जैसे ये मुस्कराते हैं। जैसे वो मुस्कराते हैं।
वैसे भी मुस्कराने में कोई खर्चा तो लगता नहीं। खर्चा नहीं लगता तो सरकार इसमें सब्सिडी भी नहीं दे सकती। सब कुछ आपको खुद ही करना होगा। जरा सा मेहनत करना होगा। चेहरे की कुछ मांसपेशियां हिलाना होगा। हल्का सा होंठ इधर-उधर करना होगा बस हो गया काम। एक मुस्कान, बनाये बिगड़े काम।
वैसे सरकारों की तरफ़ से मुस्कराने की व्यवस्थायें भी करने के प्रयास हो रहे हैं। जिन लोगों को न मुस्कराने की आदत है उनको बता-बताकर मुस्कराने के लिये टोका जाता है। जैसे क्लास/ मीटिंग में सोते हुये बगल वाला कोहनिया के जगाता -अबे जाग तुझसे सवाल पूछा जा रहा है वैसे ही आजकल हर शहर वाला आपको शहर में घुसते ही मुस्कराने के लिये मजबूर करेगा। बड़ी-बड़ी होर्डिंग लगी हैं। घुसते ही आपको दिखेगा। मुस्कराइये कि आप लखनऊ में हैं, मुस्कराइये कि आप जयपुर में हैं, मुस्कराइये कि आप यहां हैं, मुस्कराइये कि आप वहां हैं।
अरे भाई कोई जबरदस्ती है। हम आपके कहने से मुस्करायेंगे? हम अपने आप मुस्करायेंगे- कीप स्माइलिंग का डोज लिये हैं।
वैसे सरकार चाहे तो सबके मुस्कराने का इंतजाम कर सकती है। एक ठो सर्कुलर कर दे कि सरकार से कोई भी सुविधा पाने के लिये मुस्कराना अनिवार्य होगा। जो भी मुस्कराये, सुविधा पायेगा। ये नहीं कि हल्ला मचा रहा है, चिल्ला रहा है और कह रहा है -हमारी मांगे पूरी करो। मांगे पूरी करने के लिये मांगकर्ता को मुस्कराना होगा। बात करते समये मुस्कराते रहना होगा। काम होते ही खिलखिलाना होगा।
सरकार के हर कदम का आपको मुस्कराकर स्वागत करना होगा। तेल के दाम बढ़ते हैं, मुस्कराना होगा। घटते हैं, डबल मुस्कराना होगा। चीन वालों ने तम्बू तान दिये मुस्कराये, चले गये डबल मुस्कराइये। कोई घपला सामने आ गया, मुस्कराइये। जांच बैठ गई डबल मुस्कराइये। जांच चलने के दौरान मुस्कराते रहिये। बीच-बीच में मन करे तो हंस-हंसा लीजिये।अपराध हुआ, मुस्कराइये। अपराधी पकड़ गये, और मुस्कराइये। उनको संदेह का लाभ मिला फ़िर से मुस्कराइये।
मतलब अब आप समझ रहे होंगे एक मुस्कराते रहने के सर्कुलर मात्र से देश के हाल एकदम प्रफ़ुल्लित टाइप हो सकते हैं। हैप्पीनेस इंडेक्स अंतरिक्ष तक पहुंच सकता है जिसका आप सर उठाकर दीदार करते रह सकते हैं ताजिंदगी।
अब आप मेरी बात से सहमत हो रहे होंगे कुछ-कुछ और मुस्करा रहे होंगे। हैं कि नहीं।
ठीक है- मुस्कराते रहिये, बोले तो कीप स्माइलिंग।

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कड़ी निंदा

’कड़ी निंदा’ टाइप करते ही परसाई जी का ’निंदा रस’ याद आ गया। ’निंदा रस’ को जमाकर कड़ा कर दिया जाये तो ’कड़ी निंदा’ हो जायेगा। लेकिन ’निंदा रस’ से ’कड़ी निंदा’ तक की यात्रा में लिंग परिवर्तन टाइप हो गया। अब इसे उपलब्धि कहें या बवाल। यह अलग से एक सवाल।
कोई पूछे कि ’निंदा’ और 'कड़ी निंदा' में क्या फ़र्क होता है तो हम तो न बता पायेंगे। ज्यादा हुआ तो गूगल करके खोजेंगे लेकिन हमको अगर नेट कनेक्शन न मिला तो गूगल भी क्या घुंइया बतायेगा ? इसलिये खुद से सोचना चाहिये। हर बात के लिये गूगल पर भरोसा करना ठीक नहीं। कोई हमको घर में घुस के पीटने लगे तो क्या हम गूगल करके पता करेंगे कि पिटते रहें या अपन भी लगायें दो-चार हाथ?
'निंदा' के साथ लफ़ड़ा यह है कि यह दिखती नहीं है। अमूर्त टाइप होती है। दिखती तो छूकर/दबाकर पता कर लेते कि मुलायम है कि कड़ी। कम कड़ी होती तो थोड़ा कड़ापन और बढा देते। भट्टी में पकाकर जैसे लोहे की हार्डनेस बढाई जाती है वैसे ही निंदा की भी बढा लेते।
हमारी समझ में 'निंदा' और 'कड़ी निंदा' में अंतर कड़ेपन का ही होता होगा। पानी और बर्फ़ के अंतर की तरह। किसी ग्लास में रखा हुआ पानी चार हाथ दूर तक फ़ेंककर मारा जा सकता है लेकिन उसी की जमी हुई बर्फ़ फ़ेंककर चालीस हाथ दूर तक चोट पहुंचा सकती है। इससे लगता है कि जो 'निंदा' दूर तक मार करती है वह ’कड़ी निंदा’ होती है।
वैसे भी 'निंदा' और 'कड़ापन' महसूस करने वाले पर है। सूरज जो इत्ता डम्प्लाट है कि उसमें साठ हजार धरती समा जायें और जो दुनिया भर को सुलगाने में लग रहते हैं उसको हनुमान जी ने मधुर फ़ल जानकर लील लिया था। हम अपने पडोसी दुश्मन की हरकतों की ’कड़ी निंदा’ करते रहते हैं लेकिन वह हमारे लिये और ’कड़ी निंदा’ करने का इंतजाम करता रहता है। क्या फ़ायदा ऐसी ’कड़ी निंदा’ का।
लेकिन अपन की भी मजबूरी है कि जो स्टॉक में होगा वही तो सप्लाई किया जायेगा। अब हम कहां से लायें अमेरिका वाली धमकी मिली 'कड़ी निंदा' कि कह सकें कि - ’जो हमारे साथ नहीं है वह दुश्मन के साथ है।’ बल्कि यह कहने में एक डर यह भी है कि जहां हम कहें - ’जो हमारे साथ नहीं है वह हमारे दुश्मन के साथ है’ तो दुनिया के तमाम मुल्क भाभी जी की तरह कहने लगें - ’सही पकड़े हैं।’
सरल शब्दों में कहा जाये तो लाउडस्पीकर पर की गयी 'निंदा' , 'कड़ी निंदा' कहलाती है। कोई हमको मारकर भाग गया तो उसको कहां तक दौड़ाया-पकड़ा जाये। लगाकर माइक कर दी 'कड़ी निंदा'। सस्ते में काम बन गया। मारपीट में कहीं अगला फ़िर मारने-पीटने लगा तो चोट-चपेट का डर अलग से। इसलिये 'कड़ी निंदा' दुश्मन को निपटाने का सस्ता और सुलभ उपाय है।
’निंदा’ और ’कड़ी निंदा’ हिंसा के अहिंसात्मक विकल्प हैं। ’कड़ी निंदा’ से लड़ाई बचती है। लड़ाई में एक दिन में हजारों करोड़ रुपये रोज फ़ुंक जायेंगे। ’कड़ी निंदा’ में माइक के खर्चे में काम बन जायेगा। चाय-पानी का खर्चा निकाल कर हजार रुपये में मामला निपट जायेगा। बचे हुये पैसों से देश का विकास होगा। भाई-भतीजों के खाने-पीने के काम आयेंगे। सबका साथ होगा। सबका विकास ’एट्टोमेटिकली’ होगा।
इसके बाद भी अगर कहीं गरीबी, भुखमरी या पिछड़ापन दिख गया तो ऐसी ’कड़ी निंदा’ करेंगे उसकी कि सर पर पांव रखकर भागेंगे सब कड़बड़-कड़बड़। हम उसको देखकर कहेंगे देखो कैसे डरकर भाग रहीं हैं गरीबी और भुखमरी। जो डर गया सो मर गया। हमने ’कड़ी निंदा’ से गरीबी, भुखमरी और पिछड़ेपन का खात्मा कर दिया।
जो लोग कड़ी निंदा की ताकत को कम करके आंकते हैं उनको वीर रस के कवियों को सुनना चाहिये। जिस तरह से वीर रस के कवि माइक पर पाकिस्तान को हड़काते हैं उससे लगता है कि अगर माइक लगाकर सीमा रेखा पर रस का कवि सम्मेलन करवा दिया जाये तो पाकिस्तान अपने फ़ौज-फ़ाटे समेत रोज सौ मीटर पीछे खिसकता चला जाये।
यह व्यवस्था हो जाने पर मीडिया की खबरों की शीर्षक बनेंगे-’ पाकिस्तान ने सीमा रेखा पर फ़ायरिंग की। उसको सबक सिखाने के लिये वीर रस के कवियों का दल सीमा रेखा की तरफ़ रवाना। पाकिस्तान में दहशत। पाक सेना सरेंडर की तैयारी में जुटी।
हमको कड़ी निंदा का सार्थक उपयोग करने के लिये उसमें थोड़ा वीर रस भी मिलाना चाहिये। किसी वीर रस के कवि को अपना प्रवक्ता बना देना चाहिये। तोप का एक पिद्दी सा गोला बनाने तक में महीना खिंच जाता है लेकिन ’कड़ी निंदा’ का ’आशु बम’ कवि के मुंह खोलते ही निकल पड़ेगा। प्रवक्ता माइक संभालते ही पूछेगा - ’पाकिस्तान को निपटाऊं कि निपटाऊं चीन के लाल को।’
लेकिन ऊपर वाले उपाय में लफ़ड़ा यही है कि माइक को संभालने के दौरान ही उसको कहीं माइक पर ही ’मेड इन चाइना’ दिख गया तो वह दहल जायेगा। चीन से तो निपटने के उपाय हो सकते हैं लेकिन चीनी माल को कैसे निपटाया जा सकता है। उसके लिये सारे देश को एक साथ मिलकर मेहनत करनी पड़ेगी। लेकिन अपने देश के लोग तो अभी मंदिर-मस्जिद, रोमियो ब्रिगेड, गो रक्षा आदि जरूरी मुद्दों से निपटने में लगे हैं इसलिये उधर ध्यान ही नहीं दे पाते।
’कड़ी निंदा’ अभी शुरुआती दौर में है। एक बार चलन में आ जाने पर देश में सब समस्याओं के हल कड़ी निंदा में खोजे जायेंगे। भ्रष्टाचारी अपने बचे हुये समय में भ्रष्टाचार की ’कड़ी निंदा’ करेंगे, दंगाई लोग दंगा-फ़साद करने के बाद सांप्रदायिकता की ’कड़ी निंदा’ करेंगे, बलात्कारी लोग मां-बहनों की इज्जत न करने वालों की ’कड़ी निंदा’ करेंगे, दिन रात गुटबाजी करने वाले कवि-लेखक गुटबाजी की कड़ी निंदा करेंगे। मतलब जो जिस काम में लगा है वह उसकी ’कड़ी निंदा’ करने लगेगा। कालिदास बनने की ललक में जो जिस डाल पर बैठा है वह उसको ही काटने की कोशिश करेगा। अब यह बात अलग है कि उसके हाथ में कुल्हाड़ी की जगह फ़ूल झाडू सरीखी कोई चीज होगी जिससे डाल को कोई खतरा नहीं है।
भविष्य में लागू होने वाले चलन की तर्ज पर मैं अपने लिखे इस लेख ’कड़ी निंदा’ करता हूं।

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Wednesday, May 03, 2017

चप्पल चालीसा, जूता पुराण


पिछले दिनों चप्पल खूब चर्चा में रही। हर तरफ़ चप्पल चलती दिखी। मीडिया ’चप्पल चालीसा’ गाता रहा। अखबार ’जूता-पुराण’ बांचते रहे। सोशल मीडिया चप्पलायमान रहा। हर तरफ़ जूते गूंजते रहे। हाल यह कि देश की सारी बहस चप्पल पर केन्द्रित हो गयी। भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण आदि सारी समस्यायें सहमी सी सन्न, सहमी सी खड़ी हुई चप्पल लीला देखती रहीं। इस डर से उनके मुंह से आवाज तक नहीं निकली कि कहीं चूं किया तो जूते चप्पल उनके मूं पर पड़ने लगेंगे। इधर किया चूं, उधर लाल मूं !
एक बार फ़िर एहसास हुआ कि अपने देश में हर तरफ़ जूतम-पैजार है। चप्पलबाजी की बहार है। इसके सिवाय और कुच्छ नहीं है यहां।
जूते/चप्पल का प्रधान कर्तव्य अपने मालिक पैरों की रक्षा करना होता है। जो अपने कर्तव्य का निर्वहन न कर सके, चलते-चलते पैर को बचाने के लिये अपने सीने पर ठोकरें न खा सके , धूलि-धूसरित न हो सके वह चप्पल कैसी? जूते के नाम पर कलंक है ऐसा जूता जो पैरों की रक्षा करते-करते फट न गया। किसी तुक्कड़ कवि ने सही ही कहा होगा-
जो चला नहीं है राहों पर, जिस पर चिप्पी की भरमार नहीं,
वह जूता नहीं तमाशा है, जिसको मालिक पैरों से प्यार नहीं।
जैसे भारत में जब भी भ्रष्टाचार की बात चलती है, नेताओं का जिक्र आता है वैसे ही जब भी पादुकाओं का जिक्र होता है राम की खड़ाऊं सामने आ जाती हैं।
बड़े चर्चे हैं राम की खड़ाऊं के। भरत वन जाते हुये राम की खड़ाऊं अपने लिये मांग लाये थे। उसे सिंहासन पर रख लिया था और चौदह साल चलाते रहे राजकाज!
भरत के मांगने और राम के देने के पीछे तो तमाम कारण रहे होंगे। राम का भाई के प्रति प्यार। पुराने जमाने में घर परिवारों में छोटे भाई के पल्ले बड़े भाइयों की उतरन ही पड़ती थी। भरत ने कहा होगा भैया तुम जा ही रहे हो अपनी खड़ाऊं देते जाऒ। या उन दिनों शायद खड़ाऊ शायद बहुत मंहगे मिलते होंगे सो रामजी ने सोचा होगा कि चौदह साल जंगल में रगड़ने अच्छा है इसे यहीं छोड़ जायें। यहां भरत पॉलिश- वॉलिस करवाते रहेंगें। यह भी हो सकता है कि उनके पांव के जूते काटते हों यह सोचकर छोड़ गये होंगे कि जंगल में दूसरे मिल जायेंगे! चौथा और सबसे अहम कारण यह होगा कि राम सिंहासन के लिये अपनी खड़ाऊं इसलिये छोड़ गये होंगे ताकि भरत को सिंहासन पर बैठने की आदत न लग जाये। वे अपनी खड़ाऊं उसी तरह सिंहासन पर रखने के लिये छोड़ गये जैसे लोकल ट्रेन में डेली पैसेंजर सीट पर रूमाल रखकर अपना कब्जा जमाते हैं। खड़ाऊं उन्होंने सिंहासन पर कब्जे के लिये छोड़ीं।

बहरहाल यह तो उन महान भाइयों के बीच की आपसी बात है। सच क्या है यह वे ही जानते होंगे। लेकिन मुझे राम की खड़ाऊं से अधिक नाकारा और कोई खड़ाऊं नहीं लगतीं। राम की पादुकायें जूते/चप्पल के इतिहास का सबसे बड़ा कलंक हैं।
पादुकाओं का काम पैरों की धूल-धक्कड़, काटें-झाड़ियों से पैरों की रक्षा करना होता है। ऐसे में राम खड़ाऊं उनके पैरों से उतरकर सिंहासन पर बैठ गयीं। यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसे कि सरकार गिरने का आभास होते ही जनप्रतिनिधि आत्मा की आवाज पर दल परिवर्तन कर लेते हैं। अपराधी जैसे जेल जाने का नाम सुनते अस्पताल में भरती हो जाते हैं वैसे ही राम की खड़ाऊं जंगल जाने की खबर उड़ते ही जुगाड़ लगाकर उचककर सिंहासन पर बैठ गयीं।
राम की खड़ाऊं को जंगल में जाकर राम के पैरों की रक्षा करना था। खुद ठोकर खाते हुये राम के पैर बचाने थे। लेकिन वे काम से मुंह चुराकर सिंहासन पर बैठ गयीं। भरत ने उसे पूजा की वस्तु बना दिया। शोभा की चीज बना दिया। आराधना करने लगे। कामचोर, कर्तव्य विमुख, नाकारा, अप्रासंगिक, ठहरी हुयी पादुकायें पूजनीय बन गयीं। वंदनीय हो गयीं।
हमारे देश में यह हमेशा से होता आया है कि जो अप्रासंगिक हो जाता है, ठहर जाता है, चुक जाता है वह पूजा की वस्तु बन जाता है। जो जितना ज्यादा अकर्मण्य, ठस, संवेदनहीन होगा वह उतना ही अधिक पूजा जायेगा। क्या बिडम्बना है।
जूते की जब भी बात होती है तब जुतियाने की जिक्र भी होता है। जुतियाने के सौंदर्य शास्त्र का गहन विश्लेषण रागदरबारी में श्रीलाल शुक्लजी कर चुके हैं। वे बताते हैं-
"जूता अगर फटा हो और तीन दिन तक पानी में भिगोया गया हो तो मारने में अच्छी आवाज़ करता है और लोगों को दूर-दूर तक सूचना मिल जाती है कि जूता चल रहा है। दूसरा बोला कि पढे-लिखे आदमी को जुतिआना हो तो गोरक्षक जूते का प्रयोग करना चाहिए ताकि मार तो पड़ जाये, पर ज्यादा बेइज़्ज़ती न हो। चबूतरे पर बैठे-बैठे एक तीसरे आदमी ने कहा कि जुतिआने का सही तरीक़ा यह है कि गिनकर सौ जूते मारने चले, निन्यानबे तक आते-आते पिछली गिनती भूल जाय और एक से गिनकर फिर नये सिरे से जूता लगाना शुरू कर दे।"
इसके वैज्ञानिक पक्ष का अध्ययन किया जाये तो पता लगा है जूता दिमाग में भरी हवा निकालने के काम आता है। आपने देखा होगा जहां हवा भर जाती है वहां कसकर दबाने से समस्या हल हो जाती है। पेट की गैस बहुत लोग पेट दबाकर निकालते हैं। ऐसे ही दिमाग में हवा भर जाने से व्यक्ति का दिमाग हल्का होकर उड़ने सा लगता है। व्यक्ति आंय-बांय-सांय टाइप हरकतें करने लगता है। ऐसे व्यक्ति के उपचार के लिये कुछ लोग मानसिक रोग शाला जाना पसंद करते हैं। अपने लिये हो तो मानसिक चिकित्सालय जाने की बात समझ में आती है। लेकिन दूसरों के लिये आदमी सरल उपाय ही खोजता है और जूते से मार-मार कर हवा निकाल देते हैं।
जूतेबाजी का मतलब है दिमाग को जमीनी हकीकत का अहसास कराना! चढ़े हुये दिमाग को धरती पर लाने। इसका असर वैसे ही होता है जैसे विद्युत धारा के धनात्मक और ऋणात्मक आवेश वाले तारों को एक साथ मिला देना। सर से जूते के मिलन होते ही सारे दिमाग का फ्यूज भक्क से उड़ जाता है। दिमाग में घुप्प अंधेरा छा जाता है। दिन में तारे दिखने लगते हैं। फिर बाद में धीरे-धीरे स्थिति पर नियंत्रण होता है।
वैसे जूते की एक खासियत होती है। लोग भले जूते अपनी औकात के अनुसार खरींदे लेकिन जूता पैरों की औकात देख कर अपना काम नहीं करता। एक साइज का जूता एक ही तरह से व्यवहार करेगा, चाहे पहनने वाला अरबपति हो या खाकपति। जूता केवल पैर का साइज देखता है, पैर की औकात नहीं। जूता इस मामले में आदमी से ज्यादा साम्यवादी होता है!
अब आप कहोगे कि साम्यवाद तो अब सिमट रहा है। अप्रासंगिक हो चुका है। इस पर हम कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं सिवाय इस बात के अब चप्पलचर्चा भी थम गयी है। आजकल बाहुबली का हल्ला है। हर आदमी इस सवाल को हल करने में जुटा है - "बाहुबली को कटप्पा ने क्यों मारा?" सारा समाज इसी सवाल को हल करने में जुटा है।
बाकी सारे सवाल, समस्यायें बाहुबली बनी मस्ती से ऐश कर रही हैं। शायद यह कहते हुये:
हमको मिटा सके ये किसी कटप्पे में दम नहीं
ये सारे कटप्पा हमसे हैं, कटप्पे से हम नहीं।
आप क्या कहते हैं इस बारे में?

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