Thursday, July 31, 2025

कमलेश पांडेय की किताब की भूमिका

 घुमक्कड़ी, यायावरी, आवारगी और सैर-सपाटा दुनिया को बदलने के सबसे बड़े कारक रहे हैं। दुनिया में जितने भी बदलाव आज तक हुए उनके पीछे घुमक्कड़ी का ही हाथ रहा है। किसी नई  जगह  की खोज में निकले यात्री रहे हों या किसी देश पर कब्जे के लिए निकले राजे-महाराजे-सुल्तान-नवाब,  सबके अंदर नई जगह को जानने का,  आवारगी का कीड़ा ज़रूर रहा होगा। आवारगी का जिंदगी और जवानी से नज़दीकी  संबंध साबित करने के  लिए  सबसे ज्यादा प्रयोग किए जाने वाला शेर है :


सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल, ज़िंदगानी फिर कहाँ,

ज़िंदगानी गर कुछ  रही तो नौजवानी फिर कहाँ?

इस शेर का आम मतलब तो यह है कि जवान रहते-रहते दुनिया घूम ली जाए। लेकिन ख़ास मकसद यह  है कि जो घुमक्कड़ है वही  नौजवान है। यायावरी मतलब ज़िंदगानी। आवारगी मतलब ज़िन्दगी। 

वैज्ञानिक बताते हैं कि ब्रह्मांड में लाखों-करोड़ों आकाशगंगायें अपने में अरबों-खरबों तारें समेटे  प्रकाश की गति से  एक-दूसरे से दूर भागती  चली जा रहीं हैं। मुझे लगता है कि दरअसल ये आकाशगंगायें भी मूलत: घुमक्कड़ ही हैं। नई-नई जगह देखने का मन लिए भागती चली जा रही हैं।  सृष्टि का महाविस्फोट भी इन आकाशगंगाओं की  अदम्य यायावरी कामना के कारण हुआ होगा। 

नौकरी पेशा इंसान के लिए घूमना मुश्किल काम होता है। आज के समय में नौकरी वह खूँटा है जो इंसान को पेट पालने  और सुरक्षित जीवन की गारंटी देता है लेकिन बदले में उससे घूमने-फिरने-आवारगी की आजादी रखा लेता है। मध्यमवर्गीय समाज के नौकरी पेशा लोगों के लिए दफ़्तर, छुट्टी और दूसरे तमाम व्यक्त-अव्यक्त कारण होते हैं जो उसको इस खूँटे से ज़्यादा  दिन तक अधिक  समय के लिए दूर नहीं जाने देते। 

कमलेश पांडेय जी सरकारी सेवा में अधिकारी होने के साथ जिज्ञासु यायावर भी रहे हैं। नौकरी की सीमाओं में रहते हुए घूमने के मौक़े निकालते हुए यात्राएँ करते रहे।  उनकी किन्नौर, लक्षद्वीप, अंडमान, चार धाम और  अरुणाचल प्रदेश की यात्राएँ इसी घराने की यात्राएँ रहीं हैं।सरकारी सेवा से अवकाश पाने के बाद तो वे  निर्द्वंद घुमक्कड़ हो गए। कनाडा गए तो अमेरिका भी टहल लिए। वहाँ से लौटे तो यूरोप पर धावा बोल दिया। उनके ये कारनामे और इरादे देखते हुए लगता है कि आने वाले समय में उनके पासपोर्ट पर कई देशों के ठप्पे लगेंगे। 

अपनी  यात्राओं के बारे में कमलेश पांडेय पत्र- पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं। किताब के रूप में यह उनका पहला 'यात्रा' वृत्तांत' हैं। तसल्ली से यात्रा करने वाले कमलेश जी के  यात्रा वृत्तांत भी तसल्ली वाली भाषा में हैं। कोई हड़बड़ी नहीं है विवरण में। आराम से लिखी बात आराम से ही पढ़ी जाने वाली होती है। इस तसल्ली वाली भाषा में खूबसूरत  गोलाइयाँ हैं और ' यूँ ही पहलू में बैठे रहो,आज जाने की ज़िद न करो' अलसाया, मनुहारी सौंदर्य। इन वृत्तांतों  में  घूमी गई जगहों अकादमिक  विवरण  नहीं बल्कि उन जगहों की हवा और सुगंध का एहसास होता है। मेरे लिए  इस मामले में ख़ास है यह यात्रा वृत्तान्त क्योंकि इसमें अमेरिका के सैंनफ़्रांसिस्को के अलावा मैंने कोई जगह देखी नहीं। इसको पढ़कर दूसरी जगहों के बारे में जानने और घूमने का मन बनाने में सुविधा होगी। 

 कमलेश पांडेय जी के  कई व्यंग्य संग्रहों के बाद इस यात्रा  वृतांत को पढ़ना सुकूनदेह  है। इसके लिए उनको बधाई। आने वाले समय में आशा है उनके और यात्रा वृत्तांत पढ़ने को मिलेंगे। 


अनूप शुक्ल 

14 सितंबर, 2025 

नोयडा 





 


Wednesday, July 30, 2025

जिंदगी :रिवर्स गियर - कनक तिवारी

कनक तिवारी (Kanak Tiwari) जी फेसबुक के उन कुछ लोगों में हैं जिनकी हर पोस्ट मैं पढ़ता हूँ। अध्यापक, वकील, कांग्रेस के भूतपूर्व कार्यकर्ता (महासचिव), मध्यप्रदेश हाउसिंग बोर्ड के चेयरमैन, छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता जैसे तमाम सांसारिक पद उनसे छूट गए हैं लेकिन इन पदों पर कार्य करते हुए जो जीवन अनुभव उनको मिले हैं वे उनके लेखन में रच-बस गए हैं।
85 पार के कनक तिवारी जी अपने जीवन के विविध अनुभवों को साझा करते हैं तो उनके स्मृति समृद्ध जीवन का अंदाजा लगता है। उनके अनुभव संसार में देश के राष्ट्रीय नायक जवाहरलाल नेहरू , शास्त्री जी, राजीव गांधी , उनके विद्या भैया, अरविंद नेताम जैसे राजनीति से जुड़े लोग शामिल हैं तो कला, समाज, पत्रकार जीवन के ऐसे तमाम लोग भी आते हैं जिनका नाम ही उनकी पहचान हैं। इनमें मायाराम सुरजन जी हैं तो शंकर गुहा नियोगी भी हैं। पर्यावरण विद अनुपम मिश्र जी हैं तो कवि उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल जी भी हैं। जुबली स्टार राजेश खन्ना हैं तो अजात शत्रु रमन सिंह जी भी हैं (जिनको यह किताब समर्पित है) । न जाने कितने लोग हैं उनके यादों के ख़ज़ाने में जिनसे उनके जीवन का अनुभव संसार निरंतर जगर-मगर करता रहता है।
कनक जी अपने बचपन से लेकर आज 85 पार की उमर तक के लोगों, घटनाओं से जुड़े अनुभव जिस भाषा में लिखते हैं वह अद्भुत है। यह भाषा उनके पास उनके अध्ययन, अनुभव और अभ्यास की तपस्या से आयी होगी और आने के बाद उनके ही पास ठहर गई। उस भाषा का और कहीं जाने का मन नहीं करता होगा। भाषा को भी लगता होगा कि और कहीं उसको इतनी इज्जत, आदर और लाड़-प्यार और दुलार नहीं मिलेगा। कनक जी के मन-आँगन में खिलखिलाती हुई मजे करती है यह भाषा। जिस तरह की भाषा अपने लेखन, संस्मरण में कनक जी प्रयोग करते हैं वह अद्भुत है, दुर्लभ है। उसका बयान नहीं किया जा सकता, उसकी नक़ल नहीं की जा सकती। बस गूँगे के गुड़ की तरह उनका आनंद लिया जा सकता है। कहते हैं कि अमेरिकन पेय कोका कोला बनाने का फार्मूला दुनिया में सिर्फ दो लोगों को पता है। लेकिन कनक तिवारी जी के लेखन की भाषा का फार्मूला तो कनक जी को भी नहीं पता होगा। वह लिखते समय, बोलते समय अपने आप उनके पास आ जाती होगी।
संविधान, आदिवासी जीवन, गांधी जी, आत्मीय संस्मरण और जीवन के विविध पहलुओं पर जितना विपुल लेखन कनक तिवारी जी ने किया है उसको देखते हुए उनको लेखन पर देश-प्रदेश के तमाम साहित्यिक सम्मान मिलने चाहिये । लेकिन शायद तरफ़ उनकी उदासीनता और सम्मान देने वाली संस्थाओं की उदासीनता दोनों ने मिलकर काम किया और अपनी साजिश में सफल रहे।
कनक जी लेखक के साथ वक्ता भी भी अद्भुत हैं। संविधान जैसे ठस-ठोस, नीरस समझे जाने वाले विषय पर भी उनके व्याख्यान सुनकर उनकी वक्तृत्व क्षमता का अंदाज़ लगता है। उनका लेखन तो विपुल मात्रा में उपलब्ध है लेकिन उनके वक्तव्य और होने चाहिए। बोलते हुए जिस चुटीली भाषा और शरारती से लगने वाले अंदाज़ में ख़ुद से, समाज के बड़े लोगों से मजे लेते हुए वे अपनी बात कहते हैं वह अद्भुत है। बानगी के लिए उनका संविधान पर एक भाषण का लिंक टिप्पणी में दिया है। सुनिए , ज्ञान के साथ आंनद वर्धन होगा।
कनक तिवारी जी अपनी लिखी किताबें ख़ुद से लोगों भेजते रहे हैं। कुछ मुझे भी भेजी हैं। कुछ मैंने खरीदी भी हैं। इसके चलते मेरे पास उनकी एकाध किताबों की दो प्रतियां भी हैं।
पिछले दिनों कनक तिवारी जी ने अपने जीवन से जुड़े कुछ संस्मरण अपनी नई किताब "जिंदगी:रिवर्स गियर" में प्रकाशित किए हैं। कुल मिलाकर 75 लेख हैं इस किताब में। इनमें से अधिकतर उनकी फेसबुक पोस्ट में पढ़ चुके हैं हम। लेकिन उनको किताब के रूप में पढ़ना अलग ही अनुभव हैं। इन संस्मरणों में उनकी चुटीली, खिलंदड़ी भाषा उनके जीवन के अनुभवों का जो इंद्रधनुष रचती है उसको बयान करना मुश्किल है। सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है।
कनक जी के लेखन की ख़ासियत में से एक यह भी है कि वे अपने मजे ख़ुद लेते चलते हैं। इसके चलते किसी दूसरे से वह अपनी बुराई का मौक़ा छीन लेते हैं।यह उनके लेखन में वकालती कौशल की ख़ूबसूरत कीमियागिरी है।
किताब की भूमिका में वे लिखते हैं :
" कोई आत्मकथा लिखे तो गांधी की तरह लिख सकेगा या नेहरू की तरह तरह की की भी आत्मकथा लिखने के लिए उसके पास जीवनानुभव हींगे भी? हम कितना भी उछलें। बैठे तो इलायची और खड़े हुए तो लौंग। इससे ज्यादा की मेरी हद या सीमा नहीं।"
"बैठे तो इलायची और खड़े हुए तो लौंग" जैसे प्रयोग कनक जी के अपने हैं। उनके लेखन में जगह-जगह दिखते हैं।
किताब में राजनीति से जुड़े तमाम किस्से भी हैं। आज की राजनीति और गए जमाने की राजनीति का अनायास तुलनात्मक विवरण है।
कनक तिवारी जी उस पीढ़ी के नुमाइंदे भी हैं जो राजनीति में रहते हुए भी सिर्फ़ अपने फायदे के लिए नैतिक मूल्यों से समझौता करने की बजाय फ़ायदे को ठुकराने का चुनाव करती है। छत्तीसगढ़ सरकार के महाधिवक्ता पद पर रहते हुए भूतपूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के खिलाफ राय देने की कांग्रेसी सरकार की इच्छा पूरी करने के बजाय उन्होंने महाधिवक्ता पद छोड़ देने का चुनाव किया।
जिस भी पद पर रहे लेकिन आत्मसम्मान, लोकजीवन से जुड़ाव , अपने प्रति विश्वास के साथ एक ठेठ इंसान की खुद्दारी कनक जी के साथ हमेशा बनी रही। इसके चलते जीवन में कई उपलब्धियों के अवसर छूटे भी। माधव राव सिंधिया से जुड़े संस्मरण को पढ़कर इसका अंदाजा होता है जब वे मंच से सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता से जोड़कर सिंधिया परिवार के समझौतापरस्त आचरण की खिंचाई कर रहे थे और मंच पर सिंधिया जी चढ़ रहे थे। तालियाँ बज रहीं थीं। यह अभी तक साफ़ नहीं हुआ कि तालियाँ सिंधिया जी के लिए थीं कि कनक जी द्वारा सिंधिया परिवार की खिंचाई के लिए। लेकिन यह जरूर हुआ कि आने वाले समय में कनक तिवारी जी के राजनीति आगे बढ़ने के रास्ते संकरे हुए और बाद में शायद बंद भी।
मोतीलाल वोरा जी को याद करते हुए उनके संस्मरण का एक अंश उनके सहज और शरारती , हास्य बोध की बानगी के रूप में :
"वोरा एक प्राइवेट कंपनी दुर्ग रोडवेज के बाद में मैनेजिंग डायरेक्टर हो गए थे। वह उनका व्यवसायिक संदर्भ है। बाद में मोतीलाल वोरा केंद्र में नागरिक उड्डयन मंत्रालय के मंत्री हुए। एक बार दुर्ग से कई प्रभावशाली लोग एक साथ रायपुर से दिल्ली हवाई जहाज़ में जा रहे थे। हम लोग आपस में हँसी मजाक करते चल रहे थे। उस दिन पता नहीं क्यों संयोग से हवाई जहाज़ से बहुत आवाज़े आ रही थीं और हवा के दबाव या अन्य कारणों से प्लेन झटके खा रहा था। कुछ ज़्यादा ही झटके खा रहा था। तब भिलाई के सबसे बड़े उद्योगपति बी आर जैन ने मुझसे ज़ोर से पूछा (क्योंकि मैं उनसे कुछ दूर बैठा था)। कहा भाई तुम तो वोरा के दोस्त हो। ये क्या हो रहा है। तब मैंने भी ऊँची आवाज़ में कहा -भाई इट इस टेक ओवर ऑफ़ इंडियन एयरलाइंस बाई दुर्ग रोडवेज। पूरे प्लेन में इतनी ज़ोर का ठहाका हुआ कि बेचारा प्लेन भी घबरा गया और उसके झटके ठहाकों से 19 हो गए।"
यह राजनीति के पुराने लोगों का किस्सा है। आज राजनीति में इस तरह के सहज हँसी-मजाक होते हैं इसके बारे में पता नहीं।
"जिंदगी: रिवर्स गियर" पढ़ते हुए कनक जी -पुष्पा जी से मिलने की इच्छा ने एक बार फिर ज़ोर मारा है। पुष्पा तिवारी जी (Pushpa Tiwari) को हम कनक जी से पहले से पढ़ते आए हैं। उन्होंने भी जबलपुर रहते हुए हमें अपनी किताबें भेजी थीं। किताबों के दाम भेजने के प्रस्ताव पर उन्होंने मुझे इतनी ज़ोर से हड़काया था कि आज तक सिट्टी और पिट्टी दोनों गुम हैं। देखिए कब मिलना होता है दोनों से। मिलने में एक बाधा कनक जी की लगाई मिलने की शर्त भी है -"अकेले मत आना।"
कनक जी को उनके घर -परिवार, प्रसंशकों, मित्रों, चाहने वालों का आदर,प्रेम, सम्मान मिलता रहता है। अबाध प्यार को पाकर भी उनका मन -'ये दिल मांगे मोर' वाले मोड में रहता है। उनके मन की मुराद पूरी होती रहे। उनकी बहू की सहेलियाँ उनके साथ शैतानी करती रहें और उनको 'सहेली ज्वैलर्स' के गिफ्ट पैक मिलते रहें (और उनको उनकी सहेलियों की याद दिलाते रहें)।
कनक जी के बारे में यह बेतरतीब बातें मेरे मन में उनके लेखन से उपजे त्वरित भाव हैं जो बिना किसी रुकावट के जैसे मन में आते गए वैसे मैं टाइप करता गया। 'मन की बात' करना अभी तक किसी विशेषाधिकार की श्रेणी में नहीं आया। कानून की इस चूक का फ़ायदा उठाते हुए यह लिख डाला।
कनक तिवारी जी का अपने लेखन, भाषण और अपनी उपस्थिति से अपने परिवेश को रोशन करते रहें। उनके और पुष्पा जी के अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुभकामनाएं।
पुस्तक का नाम : जिंदगी :रिवर्स गियर
लेखक :कनक तिवारी
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मंदिर,बीकानेर
पृष्ठ : 405
कीमत : 600 रुपये

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Tuesday, July 29, 2025

जैसे उनके दिन बहुरे


 कई दिनों से आमिर खान की 'सितारे जमीं पर' देखने का मन था। कल सुबह टिकट खरीदी। आन लाइन। 1055 का शो। पास के मॉल के पीवीआर में।

नाश्ता करके मॉल पहुंचे। मॉल अभी खुला नहीं था। लोग बाहर इंतजार कर रहे थे। लेकिन सिनेमा देखने वालों के टिकट देखकर उनको अंदर जाने दिया जा रहा था। हम भी टिकट दिखाकर अंदर पहुंचे।
अंदर सिनेमा हाल के अंदर जाने के लिए फिर टिकट देखा गया। काउंटर पर मौजूद बच्ची ने टिकट देखकर कहा -"आपका टिकट तो रात 1055 का है।"
ऐसा हमारे साथ पहले भी एकाध बार हो चुका है। नजीततन कोई भी टिकट बुक करते समय दिन, तारीख़, महीना ग़लत हो जाने की आशंका इतनी ज़्यादा रहती है कि टिकट बुक करने के फौरन बाद लगता है कि कुछ गड़बड़ हो गई है । यह आशंका टिकट का उपयोग हो जाने तक बनी रहती है।
अब टिकट हमने ख़ुद ख़रीदा था इसलिए किसी दूसरे को दोष भी नहीं दे सकते थे । हमने यह सोचकर अपने को संभाला कि बड़े-बड़े लोगों से इस तरह की चूक हो जाती है। आपदा में अवसर शायद इसी को कहते हैं। अपनी गलती पर ख़ुद को बड़ा मान लिया।
मॉल में 12 सिनेमा हाल हैं। सोचा आए हैं तो सिनेमा देख ही लें। रास्ते में सोच रहे थे कि 'सैयारा' भी देखनी है । आजकल इसके भी बड़े चर्चे हैं। सुना है कि युवा पीढ़ी इसको देखकर बहुत रो-धो रही है। बहुत रील्स बन रहे हैं इसका मजाक उड़ाते हुए।
पता चला कि कुछ देर बाद का शो था सैयारा का । ख़रीद लिया टिकट। घुस गए पिक्चर देखने। सिनेमा हाल चौथाई भरा था।
सैयारा में युवा पीढ़ी के प्रेम की कहानी है। बालीवुड को प्रेमी हीरो लफ़ंडर दिखाने का शौक है। बिना हेलमेट के चलता है हीरो, गुस्सैल है, जरा-जरा सी बात पर मारपीट कर लेता है। लेकिन हीरोइन से अच्छे से बात करता है। हीरोइन फ़िदा हो जाती है। प्रेम कहानी आगे बढ़ती है। हीरोइन के लिखे गाने गाकर हीरो स्टार हो जाता है।
हीरो के स्टार बनने के बाद कहानी में ट्विस्ट आता है। हीरोइन को भूलने की बीमारी का पता चलता है। इसके बाद हीरो अपने प्रेम का मुजाहिरा करता है। हीरोइन का ख्याल रखता है। लेकिन हीरोइन उसे छोड़कर चली जाती है ताकि हीरो के स्टार बनने के रास्ते में बाधा न बने।
हीरो नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे हीरोईन को खोजता है। वह नहीं मिलती।फिर हीरो को ध्यान आता है कि हीरोइन ने एक गाना लिखकर कहा था -"इसे सुनते ही प्रेमी दुनिया में कहीं भी होगा, भागता आयेगा।"
हीरो उस गाने को लंदन में गाता है। हीरोइन उस गाने को मनाली में दोहराते हुए दिखती है। हीरो अपना शो छोड़कर मनाली आता है। दोनों मिलते हैं। कहानी पूरी होती है। हम सत्यनारायण कथा की तरह सोचते हुए बाहर निकलते हैं -"जैसे उनके दिन बहुरे, वैसे सबके बहुरें।"
जैसा हल्ला है इस फ़िल्म के बारे में तो इसे देखकर न तो बोर हुए , न ही आँसू आए। तसल्ली से पूरी फ़िल्म देखी। जो बातें जो अच्छी लगीं :
-फ़िल्म में नायक , नायिका के साथ किया वादा हमेशा निभाता है। उसका साथ नहीं छोड़ता।
- कठिन से कठिन परिस्थिति में 'अभी कुछ पल बाकी हैं' वाला भाव बना रहा है। यह हमें अपने सूत्र वाक्य -'सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है' के अनुरूप लगा।
-हीरो जब हीरोइन से कहता है -" तुम सब कुछ भूल जाओगी तुम्हें कुछ याद नहीं रहेगा तब हम नयी यादें गढ़ेंगे। तुम एक भूलोगी , हम दस यादें गढ़ेंगे। दस भूलोगी, हम सौ, हज़ार यादें गढ़ेंगे।" हीरो का कहा हुआ यह डायलाग मुझे इस फ़िल्म का सबसे अच्छा हिस्सा लगा।
सबेरे की फ़िल्म देखने के बाद रात को खाना खाकर सुबह की गलती से बुक की गई पिक्चर 'सितारे जमीं पर' देखने गए। पूरे सिनेमा हाल में हम 'पति-पत्नी' केवल दो लोग थे। काफ़ी देर तक सोचते रहे और लोग आयेंगे, लेकिन कोई आया नहीं।
'सितारे जमीं पर' अलग तरह के उन बच्चों के ऊपर बनाई फ़िल्म है जो उम्र के लिहाज से तो बड़े हो जाते हैं लेकिन दिमाग़ी तौर पर सामान्य तरह से बड़े नहीं होते। अलग तरह से विकसित होते हैं। आमिर ख़ान ऐसे बच्चों को बालीबॉल की कोचिंग देते हैं। टीम शून्य से शुरुआत करके फ़ाइनल तक पहुँचती है। हार जाने के बाद भी टीम के खिलाड़ी विजेता टीम के साथ ख़ुशियाँ साझा करते हैं। यह देखकर आमिर ख़ान कहते हैं -"इनको हम सिखा नहीं रहे, इनसे हम सीख रहे हैं।"
पिक्चर अच्छी है लेकिन आमिर खान की ही फ़िल्म "तारें जमीं पर " जितनी अच्छी नहीं लगी मुझे।
आजकल फ़िल्मों में समाज की रूढ़ियों के विपरीत बुजुर्गों के बड़ी उम्र के प्यार को सहमति देते हुए सीन दिखते हैं। 'सितारे जमीं पर' में हीरो की माँ बुज़ुर्गियत में साथी खोजती है और इसके लिए उनको पछतावा नहीं है। ऐसे ही 'आप जैसा कोई' में भी हीरो की बड़ी उम्र की भाभी अपने पति से अलग दूसरे इंसान में अपना साथी खोजती हैं जिसे उसकी बेटी भी समर्थन देती है।
सिनेमा हाल में एक ही दिन में दो फ़िल्में देखने का पहला अनुभव रहा यह। दो फिल्मों के बीच में एक रोचक किस्सा भी हुआ। उसे सुनने के लिए थोड़ा फ़्लैश बैक में चलना होगा।
हुआ यह कि सुबह वाली फ़िल्म को देखकर लौटने के बाद खा-पीकर आराम किया। शाम को टहलने गए। रात की फ़िल्म को देखने के लिए तैयार होते हुए दूसरा मोबाइल जेब में रखने की सोची तो वो मिला नहीं। रिंग किया, घंटी बजी लेकिन घर में आवाज सुनाई नहीं दी। लगा सुबह कहीं छूट गया।
सुबह जहाँ-जहाँ गए थे, वहाँ-वहाँ की याद की। ज्यादातर जगहें मॉल में ही थीं। जल्दी-जल्दी गए मॉल। रास्ते में कैब वाले को फ़ोन करके उससे भी पूछा लिया। एक दुकान गए थे उसको भी खड़खड़ा दिया। दुकान बंद हो गई थी। दुकान वाले को बताया तो उसने कहा सुबह देख लेंगे।
मॉल पहुंचकर उस बंद दुकान के बाहर खड़े होकर फ़ोन बजाया यह सोचते हुए कि अगर मोबाइल होगा वहाँ तो चमकेगा । नहीं चमका। सिक्योरिटी वाले को बताया तो उसने परमिशन लेकर उन दुकानों के वीडियो मुझे दिखाये जिन पर सुबह हम गए, चाय-पानी के लिए। उनमें कहीं मेरा दूसरा मोबाइल नहीं दिखा।
सबेरे जिस सिनेमा हाल में पिक्चर देखी थी उसमें भी घुस गए। जिन सीटों पर हम बैठे थे उसपर दूसरा जोड़ा बैठा था। वही पिक्चर चल रही थी (सैयारा) जिसे हमने सुबह देखा था। जोड़े को डिस्टर्ब करके मोबाइल खोजा , मिला नहीं।
इस बीच हम और हमारी श्रीमती जी दूसरे खोए मोबाइल पर फ़ोन किए जा रहे थे। उस मोबाइल का नंबर बेटे के नाम सेव था। गलती से उसके नंबर पर भी कॉल हो गई। 14000 किलोमीटर दूर घंटी बजते ही बेटे ने फौरन फ़ोन उठाया। हमने फौरन कहा -"गलती से कॉल लग गई।" मतलब मोबाइल का खोना ऐसा हुआ कि बेटे को कहा जाये -"गलती से कॉल लग गई।" बेटे को फ़ोन गुम होने के बारे में नहीं बताया। बताते तो चिंता में वह भी शामिल हो जाता।
इस मौके का फायदा उठाते हुए श्रीमती जी ने मोबाइल खोज अभियान में पहले तो पूरा सहयोग दिया। लेकिन जैसे-जैसे खोज आगे बढ़ी और मोबाइल नहीं मिला वैसे-वैसे उनके रवैये में समझाईश और हमारी चूक की तरफ़ इशारा बढ़ता गया। उनका रवैया देखकर 'आपरेशन सिंदूर' में विपक्षी पार्टियों का रवैया याद आया जिन्होंने आपरेशन के दौरान पूरा समर्थन दिया सरकार को लेकिन बाद में इतने सवाल उठाए की सरकार को जबाब नहीं देते बन पड़ रहे। जबाब देने से बचने के लिए सरकार के मुखिया बाहर निकल लिए।
हमारे मामले में तो लफड़ा यह था कि सवाल पूछने वाली भी सरकार ही थी।
हम अनमने से फ़िल्म देखते रहे। जहाँ दूसरे मोबाइल की याद आती हम घंटी बजा देते। घंटी पूरी बज रही थी इससे अंदाजा लग रहा था कि मोबाइल बेचारा कहीं अकेले में अँधेरे में पड़ा ठिठुर रहा होगा। जेब में, मेज में, दराज में एम बैग में आराम से रहने वाला मोबाइल बेचारा न जाने किन अँधेरों में पड़ा होगा, सोच कर दिल काँप रहा था।
इस बीच हमारे मोबाइल की बैटरी खत्म होती जा रही थी। हमारे खोए मोबाइल में भी खत्म हो रही होगी। हम यह सोचकर हलकान हो रहे थे कि सुबह तक हम अपने साथ वाला मोबाइल तो चार्ज कर लेंगे लेकिन बेचारे हमारे दूसरे मोबाइल की बैटरी खत्म हो जायेगी तो उसकी तो साँसे थम जायेंगी।
खोए हुए मोबाइल के बारे में सोचते हुए हम उन फ़ोटो, डाटा और सूचनाओं के बारे में सोच रहे थे जो उस मोबाइल में थीं और मोबाइल न मिलने पर वे हमेशा के लिए खो जाएँगी।
फ़िल्म देखते-देखते भी हम मोबाइल बजाते रहे। प्लान बनाते रहे कि लौटकर कहाँ-कहाँ खोजेंगे। सेक्योरिटी वाले ने फ़ोन कर दिया था कि सुबह जल्दी आने दिया जाये मॉल में।
इंटरवल में एक बार फ़िर मोबाइल की घंटी बजाई। यह मेरे मोबाइल से पच्चीसवीं घंटी थी। इस बार मोबाइल उठा। पता लगा कि दूसरी तरफ़ हमारी कालोनी के सुरक्षा इंचार्ज थे। उन्होंने बताया कि मोबाइल कालोनी के पार्क में मिला था। शाम को टहलते समय पार्क में छूट गया था। मोबाइल मिलने के बाद हमारी लापरवाही के लिए उलाहने और हिदायतों में तेजी बढ़ गई। हमको दो दिन पहले का देखा हुआ वीडियो याद आया जिसमें पुलिस वाले एक आदमी को गिरने से बचाने के बाद उसको जमकर कूटते हैं।
'सितारे जमीं पर' में अलग तरह के लोग हारने के बाद भी मस्ती कर रहे थे , मिल-जुल कर खुश हो रहे थे। इधर मोबाइल मिल जाने के बाद सामान्य माने जाने वाले को लापरवाही के उलाहने मिल रहे थे।
लौटकर सुरक्षा गेट से अपना मोबाइल लिया। मोबाइल को दुलराया, सहलाया और प्यार से हड़काया यह कहते हुए -"तुमने तो मुझे डरा ही दिया था, बच्चा।"
मोबाइल मिलने के बाद हमने एक बार फिर से वही कहा तो 'सैयारा' में हीरो-हीरोईन के मिलने पर कहा था -"जैसे उनके दिन बहुरे, वैसे सबके बहुरें।"

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Sunday, July 27, 2025

राजनीति का सबसे बड़ा ठेकेदार बाजार है

 देश में ट्रक बनाने वाली दो प्रमुख कंपनियां टाटा और अशोक लेलैंड हैं। वी एफ जे में काम करने के दौरान अशोक लेलैंड के कुछ सीनियर अफसरों से मिलने पर पता चलता था कि वे अशोक लेलैंड में आने के पहले 20-30 साल टाटा में काम कर चुके थे। बाद में उन्नति के लिए उन्होंने कम्पनी बदली।

प्राइवेट संस्थानों में उन्नति के लिए कुछ साल बाद कंपनी बदलने का चलन आम बात है। नौकरी वहां 'कांट्रैक्ट मैरिज' टाइप होती है।
सरकारी नौकरियां हिंदुस्तानी विवाह की तरह होती हैं। नौकरी करने वाला इंसान हिंदुस्तानी बहुओं की तरह होता है। जिस घर मे डोली आई वहीं से अर्थी निकलने की तर्ज पर जहां ज्वाइन करता है वहीं से रिटायर मेन्ट लेता है।
पहले की राजनीति भी आमतौर पर सरकारी नौकरियों की तरह करते थे लोग। जिस दल, विचार धारा से शुरू करते थे, आमतौर पर उसी से जुड़े रहते थे।
इधर सरकारी नौकरियां तेजी से कम हुई हैं। काम चलाने के लिए कांट्रैक्ट वर्कर का चलन बढा है। ठिकाना नहीं कि कब निकाल दिए जाएं।
राजनिति में भी प्राइवेटाइजेशन बढ़ा है। लोग मौका देखकर धुर विरोधी पार्टी में शामिल होने में गुरेज नहीं करते। बल्कि मौके पर पार्टी और स्टैंड बदल लेना सबसे बड़ी समझदारी मानी जाती है। जिसको गरियाते हुए सत्ता में पाई बाद में उसी के साथ सरकार बनाना सफल और समझदार राजनीतिज्ञ की निशानी है।
देश के राजनीतिज्ञ समझदार होते जा रहे हैं। वे ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की तरह काम करने लगे हैं।जो ठेकदार रोजी-रोटी देगा उसी के जुड़कर जनता की सेवा करने पर मजबूर है।
आज राजनीति का सबसे बड़ा ठेकेदार बाजार है। क्या पक्ष क्या विपक्ष सब बाजार के इशारे पर उठते-बैठते, हिलते-डुलते हैं। बाजार के इशारे पर पक्ष-विपक्ष आपस में ग्लेडियेटर की तरह लड़ने का नाटक करते हैं। बाजार दोनों में से किसी को मरने नहीं देता। जिंदा रखता है दोनों को। आखिर दोनों को बनाने में उसका ही पैसा लगता है।
जनता बेचारी इन्हीं लोगों से अपनी सेवा कराने को मजबूर है। जिसको वह अपनी सेवा के लिए चुनती है वह अगर बाजार को पसन्द नहीं आता तो वह उसे बदल देता है। आखिर सेवक चुनने में पैसा तो उसी का लगता है। इसलिए जनता का सेवक चुनने का हक भी उसी को है।
जनता को तो बस सेवा से मतलब होना चाहिये। सेवक कौन होगा यह तय करना बाजार का काम है।

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कृष्ण बलदेव वैद

 


आज प्रख्यात लेखक कृष्ण बलदेव वैद जी का जन्मदिन है। वैद जी अगर आज होते तो आज अपना 98 वाँ जन्मदिन मनाते। इस मौके पर वैद जी की डायरी के कुछ अंश यहाँ पेश हैं :

1. "मैं एक बदतमीज, बदकलाम, बदजबान, बदनसीब , बदमिजाज बूढा बनता जा रहा हूं। लेकिन अब मैं अपना तौर तरीका बदल नहीं सकता, लाख कोशिश करूं तब भी नहीं। मुझे अपने गुस्से और गम को काम में ढालते रहना चाहिये, अपने किरदार और व्यवहार में नहीं। जैसा जीता-सोचता हूं, करीब-करीब वैसा ही लिखता हूं, जैसा लिखता हूं करीब-करीब वैसा ही जीता -सोचता हूं।
अब पढना कम कर देना चाहिये- एक तो इसलिये कि आंखें थक जाती हैं और एक इसलिये कि अब पढने से कोई फ़ायदा होता नजर आता है, न कोई खास लुत्फ़ मिलता। पढा हुआ पहले भी याद कम ही रहता था, अब और कम। अब हर क्षण खीझ को, हर अनुभव की आंच को हर ख्याल की खाक को , हर सांस की सुरसुराहट को, हर दर्द के धुयें को दर्ज करते रहना चाहिये। लेकिन क्यों?"
2. "आज अपने काम में आ गयी रुकावट के कारणों को फिर कुरेदना चाहता हूँ। मुख्य कारण तो शायद आलस्य ही है और निरन्तरता का टूट जाना, टूटते रहना। एक नागा, अपने पीछे अनेक नागों की संभावना छोड़ जाता है।'
3. "कुछ मर्दों की आंखों में उनका लिंग लहराता है।"
4. "तितलियों की बेकरारी और खामोशी के इनाम के तौर पर ही उनको उनके रंग दिए गए हैं, उनके परों पर नक्कासी की गई है।"
5. "कोई भी लम्बा सहवास कई प्रकार की आपसी तल्खियों, शिकायतों, चिड़चिड़ाहटों, बेवफ़ाइयों के बावजूद और कारण ही बना रह सकता है। सिर्फ आपसी लगाव के कारण नहीं।"
6. "बिमल इन बाग' के प्रूफ तो पढ़ डाले, लेकिन उसके प्रकाशन को लेकर उत्साहित कम हूँ, चिंतित अधिक। उत्साह की कमी का कारण प्रकाशक 'नेशनल'। वहां से प्रकाशित होकर पुस्तक शायद ही कहीं पहुंचे। चिंता का कारण यह कि लोग फिर उसकी अश्लीलता को पकड़कर बैठ जाएंगे: वैद यौन ग्रंथियों का कथाकार है, बीमार है.....। जब तक कोई प्रकाशक तैयार नहीं हुआ मैं कोशिश करता रहा। अब वह मिल गया है तो मैं ठंडा हो गया हूँ।"
7. "बुश बिल्कुल बांगड़ू नजर आता है, उसी की तरह बोलता और बिफरता है।"
8. "सेमिनारों का अपना एक संसार है -एक पूरा तंत्र। एक सेमीनार की कोख से दूसरा , दूसरे की कोख से तीसरा...... । मैं इस संसार से दूर हूँ।"
9. "पाली ने फोन पर बताया कि साहित्य अकादमी के हिन्दी पुरस्कार के लिए इस बार राजेश जोशी और मुझमें चुनाव था। अशोक, केदारनाथ सिंह और लीलाधर जगूड़ी ज्यूरी में थे। अशोक ने मेरा पक्ष लिया, बाकी के दोनों ने राजेश जोशी का। यह सब पाली को 'आउटलुक' (हिन्दी) में प्रकाशित विमलकुमार की रिपोर्ट से मालूम हुआ।"
10. "गर्मी की धमकियाँ शुरू। देश का छकड़ा ढिचकूँ-ढिचकूँ। सब नेता थके-मांदे और बिके -चुके। अधिकतर के चेहरों पर चिकनी-चुपड़ी चालाकी। यह मैं किधर भटक गया। मुझे देश के नेताओं( और अभिनेताओं) से क्या लेना-देना। मुझे 'तड़पने' के लिए साहित्य के नेता(और अभिनेता) ही काफी हैं, खासतौर पर अब जब कोई काम नहीं कर पा रहा।"
11. "इराक अमरीकी सरकार के जुनून का शिकार बनकर रहेगा, बावजूद इस हकीकत के कि दुनिया भर की अक्सरियत इस हमले के खिलाफ है। तबाही होगी। इराक टूट-फूट जाएगा। सद्दाम हुसैन बच जाए या मार दिया जाए उस से कोई फरक नहीं पड़ेगा। दहसत-पसंदगी बढ़ जाएगी। इस्लामी कट्टरवाद बढ़ेगा, भारत-पाक झमेला और उलझेगा।
12. "दिल्ली जी महदूद मिडल क्लास जिंदगी के बाहर भारत में भयंकर दुख है, दरिद्र है, बीमारियां हैं, बदसूरती है , अन्याय है जिसके बावजूद करोड़ों लोग जी रहे हैं , ऐसे जैसे सब अनिवार्य हो। दिल्ली के अंदर भी दुख कम नहीं।
13. "मैंने अपने काम में गरीबी और दरिद्र और भूख को उकेरने की कई कोशिशें की हैं, लेकिन कोई बड़ा शाहकार अभी तक इस विषय पर नहीं लिख पाया। "
14. "इराक पर हमला होने वाला है। सद्दाम हुसैन अगर पागल है तो बुश काम पागल और खतरनाक नहीं ।"
15." इराक पर चल रहे हमले की जो तस्वीरें टीवी पर देखने को मिलती हैं उन से वहां हो रही हौलनाक तबाही की तसवीर सामने नहीं आती। लगता है जैसे आतिशबाजी हो रही हो, आकाश में होली खेली जा रही हो। कोई चीखोपुकार सुनाई नहीं देती, कोई दुख दिखाई नहीं देता, एक मनसूई सी रंगीनी , एक रंगीन खेल तमाशा।"
16. "इराक पर हमला जारी है। यह लड़ाई महीनों चलेगी। खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं होगी। अमरीकी सरकार नुकसान उठाएगी। इस्लामी कट्टरपन और दहशत पसंदगी को बढ़ावा मिलेगा।"

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Saturday, July 26, 2025

पेड़ पर उल्लू आज भी बैठा है


 सबेरे नीचे उतरे तो सामने ही धुली-पुछी गाड़ियाँ लाइन से खड़ी दिखीं। सभी के वाइपर तोपों के मुँह की तरह आसमान को सलामी मुद्रा में तने हुए थे। ऊपर उठे हुए वाइपर इस बात की निशानी थे कि उनकी साफ़-सफ़ाई हो चुकी है।

सड़क पर सफाई करने वाली एक युवा सफाईकर्मी बगल में सफ़ाई कर रही बीच की उमर की महिला से बतियाती दिखी। उनके बगल से गुजरते हुए मुझे सुनाई दिया -"हमको यह बात पसंद नहीं है।" क्या बात पसंद नहीं है इसका कयास आप लगाइए। हम तो आगे बढ़ गए थे।
आगे एक आदमी अपने हाथ में काग़ज़ का जहाज और दूसरे बने हुए माडल लेकर लपकते हुए गोयनका स्कूल की तरफ़ गया। शायद अपने बेटे/बेटी का प्रोजेक्ट वर्क ले जा रहा हो।
सामने से एक युवा महिला दो तंदुरुस्त कुत्तों के पट्टे हाथ में थामे आती दिखी।ऐसा लगा जैसे कोई बड़ा पूँजीपति अपने साथ दो विरोधी राजनीतिक पार्टियों को टहलाने के बाद वापस लौट रहा हो। कुत्ते महिला के पीछे भक्ति भाव से दाँत चियारते, पूंछ हिलाते चलते हुए चुपचाप बगले में घुस गए।
सड़क किनारे घरों के बाहर कई कारें खड़ी दिखीं। कुछ कारों के पिछले पहिए पर ताला लगा था। ताले कार पर लगी बेड़ी की तरह लगे। स्टेरियरिंग पर हथकड़ी पहले से ही लगी थी। उनको देखकर अमेरिका में पकड़े गए अवैध प्रवासियों का क़िस्सा याद आ गया जिनको हथकड़ी -बेड़ी में वापस भेजा गया था। कुछ दिन तो बड़ा हल्ला हुआ इसका। अभी पता नहीं क्या हाल है? अभी तो उपराष्ट्रपति के इस्तीफे का किस्सा चल रहा है।
अमेरिका की बात चली तो चलते-चलते यूट्यूब पर किस्सा सुना बतायें आपको । किस्से के अनुसार चंद्रशेखर जी देश के प्रधानमंत्री थे। अमेरिका से रात तीन बजे फ़ोन आया। समय के अंतर के कारण अमेरिका वालों को ध्यान नहीं रहा होगा। चंद्रशेखर जी के स्टाफ़ ने कहा -"साहब सो रहे हैं।" अमेरिका से बताया गया -"जगा दो साहब को। अमेरिका के राष्ट्रपति जरूरी बात करना चाहते हैं।" चंद्रशेखर जी के स्टाफ़ ने जवाब दिया -"कोई भी बोल रहे हों। साहब सो रहे हैं। हम उनको अभी नहीं जगा सकते हैं।"
बाद में राजदूत के माध्यम से संदेश भेजा गया। वे आए। बात कराई।
यह मजेदार किस्सा सुनकर चंद्रशेखर जी का एक इंटरव्यू याद आया। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था -" देश के प्रधानमंत्री के रूप में काम करते हुए तमाम दबाब होते हैं। बहुत अधिक इधर-उधर करना संभव नहीं होता।"
उनकी बात सुनते हुए अपने वर्तमान सरकार की मजबूरी का अंदाज़ लगता है। अमेरिका के राष्ट्रपति आए दिन ऊल-जलूल बयान देते रहते हैं अपने देश के ख़िलाफ़। उनको जब कुछ समझ नहीं आता कि क्या करें तब ही भारत के ख़िलाफ़ एक बयान जारी कर देते हैं। 25 बार तो भारत-पाकिस्तान के बीच सीज फायर करवाने की बात कह चुके। लेकिन अपने प्रधानमंत्री जी खुलकर कुछ नहीं कहते। अकेले में भले हड़का चुके हों। जो लोग अपेक्षा करते हैं कि अमेरिका को इसका जवाब दिया जाना चाहिए वे सरकार की चुप्पी को उसकी कमजोरी मानते हैं। वहीं प्रधानमंत्री जी के समर्थक इस तथाकथित चुप्पी को उनका मास्टर स्ट्रोक बताते होंगे।
राजनीति अनगिनत झेमेलों, झाँसो, चालबाज़ियों, कूटनीति और न जाने किन-किन पैतरों का खेल है। आजकल देश दुनिया के तमाम देशों में एक से एक नमूने, जमूरे , सिरफिरे लोग सत्ता पर काबिज हैं जिन्होंने अपने दायें-बायें करके कुर्सियों पर कब्जा कर रखा है। लोकतंत्र के मुखौटे में तानाशाह लोग। किसी भी सभ्य समाज के नैतिक मूल्यों से रहित लोग। ऐसे देशों की बहुसंख्यक जनता उनसे त्रस्त है लेकिन उसके पास कोई उपाय नहीं है सिवाय अपने ऊपर काबिज कर्णधारों को झेलने के।
आगे एक नाई की दुकान दिखी। दुकान बंद थी। कुर्सी नाई की दुकान पर रखी मेज पर औंधी रखी थी। दुकान अभी खुली नहीं थी। मेज पर रखी लकड़ी की कुर्सी देखकर मुझे अपने दोस्त मनोज अग्रवाल Manoj Agarwal की कविता याद आ गई :
"मेरे घर के सामने
हुआ करता था एक सूखा पेड़
पेड़ पर बैठता था
एक उल्लू रोज़
एक दिन
वो
पेड़ कट गया।
और उसकी लकड़ी से बनी
एक सुविधा जनक कुर्सी
अजीब इत्तफ़ाक़ है
पेड़ पर उल्लू आज भी बैठा है ।"
सड़क से टहलते हुए पार्क में आए। पार्क में टहलते हुए कई दोस्तों से बतियाये। करीब घंटे भर टहलने के बाद घर वापस आ गए। सबेरे की कुल टहलाई हुई 9319 कदम, तय की गई दूरी 6.48 किलोमीटर, समय 82 मिनट। बाकी की टहलाई शाम को होगी।

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Friday, July 25, 2025

गोपाल चतुर्वेदी जी विनम्र श्रद्धांजलि

 


आदरणीय गोपाल चतुर्वेदी जी Gopal Chaturvedi के व्यंग्य लेख बहुत पहले से पढ़ने शुरू किए थे। दफ़्तरी जीवन पर लिखे व्यंग्य खासतौर पर उनकी ख़ासियत थे। उनसे पहली बार मुलाक़ात एक लखनऊ में हुए एक कार्यक्रम में हुई। शायद नेशनल बुक ट्रस्ट के कार्यक्रम में , जिसके लखनऊ में आयोजन का ज़िम्मा अनूप श्रीवास्तव जी पर था। उस कार्यक्रम में लोगों ने अपने व्यंग्य लेख पढ़े थे। गोपाल चतुर्वदी जी ने मेरे लेख 'आदमी रिपेयर सेंटर' की तारीफ़ करते हुए हौसला आफजाई की थी।

एक बार कुछ देर के लिए, लखनऊ के कुछ मित्रों के साथ, उनके घर भी गया था।
गोपाल चतुर्वेदी जी सहज रूप से उत्साह बढ़ाने वाली बातें करते थे। जो भी व्यंग्यकार लखनऊ जाता , उनसे ज़रूर मिलता। वे साहित्यकारों/व्यंग्यकारों के आदरणीय बुजुर्ग थे।
एक दिन 'अमृत विचार' अख़बार में छपे लेख को पढ़कर उन्होंने मुझे फ़ोन किया। लेख की तारीफ़ की। यह भी बताया कि मेरा लिखा वे पढ़ते रहते हैं। मेरे लिए यह सुखद आश्चर्य का विषय था कि उनके पास मेरा नम्बर था और उन्होंने मेरा लिखा पढ़कर मुझे फ़ोन किया। उस दिन बहुत देर तक बात हुई। नंदन जी मेरे मामा थे, यह पता लगने पर उन्होंने नंदन जी से जुड़ी तमाम यादें साझा की। मैंने तय किया था कि लखनऊ जाने के बाद उनसे मुलाक़ात करेंगे।
लेकिन आज सुबह Arvind Tiwari जी की फेसबुक वाल पर उनके निधन का समाचार बहुत अफ़सोस हुआ। कुछ दिन पहले ही उनकी जीवन संगिनी का भी निधन हुआ था। उनके निधन में अपनी जीवन संगिनी के विदा होने का सदमे का भी योग रहा होगा।
गोपाल चतुर्वदी जी का विदा होना एक वरिष्ठ व्यंग्यकार और बेहतरीन इंसान का विदा होना है। उनके निधन पर दुख और संवेदना प्रकट करते हुए उनके प्रति विनम्र श्रद्धांजलि ज्ञापित करता हूँ।

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