Saturday, July 10, 2021

अंधकार निरोधक अध्यादेश

 

कल सुबह टहलने निकले। बहुत दिनों के बाद। सड़क पर चलता पहला इंसान ऊंघता हुआ दिखा। बेमन से टहलता। चेहरे पर उबासी लादे चलता। फुटपाथ की ठोकर से सहम कर चौकन्ना हो गया। ठोकरें हमको चौकन्ना बनाती हैं, सावधान करती हैं।

दो दरबानों में से एक की ड्यूटी ख़त्म हो गयी थी। वह अपनी वर्दी बदलकर जाने की तैयारी कर चुका था। अपने रिलीवर के इंतजार में था। घर जाने की बेताबी चेहरे पर हावी थी।
एक महिला दूसरे के घर खिले फूल उचककर तोड़ रही थी। जल्दी-जल्दी फूल तोड़कर झोले में डालती जा रही थी। हड़बड़ी में एकाध फूल नीचे गिर गए। चोट लगी होगी नीचे गिरे फूल को। लेकिन उससे बेखबर महिला फूल तोड़ती रही। अपनी पहुंच तक के सारे फूल तोड़कर महिला आगे बढ़ गयी। तेजी से।
उसी जगह एक बच्चा आसपास गिरे आम बीन रहा था। एक पालीथिन में। छोटे-टपके आम। दो-तीन किलो आम होंगे। पालीथिन में इकट्ठा आम नीचे गिरने पर टूट-फूट गए थे। किसी का मुंह घायल, किसी का पेट फटा, किसी की टांग टूटी, सिर्फ गुठली सलामत। सारे आम पालीथिन में किसी शरणार्थी कैम्प में भीड़ की तरह जमा थे।घर से उखड़े-उजड़े के यही हाल होते हैं।
सड़क पर टहलते लोग दिखे। कोई तेजी से, कोई आहिस्ते-आहिस्ते। कोई अकेले, कुछ लोग साथ में। एक बच्ची अपने घरवालों के साथ जाते हुए कोरोना से बचाव के सबक याद कर रही थी। बोली- 'मास्क, दूरी, सफाई-कोरोना से बचाव की पक्की दवाई'। उसके चेहरे पर तेजी से चलने के कारण पसीना सैनिटाइजर की तरह चमक रहा था। हमने उससे पूछा -' लेकिन तुम तो मास्क लगाये नहीं हो।'
'टहलते हुए मास्क लगाना जरूरी नहीं'-कहते हुए बच्ची आगे चली गयी।
मैदान पर तमाम लोग अपने-अपने हिसाब से मशगूल थे। दो बच्चियां बैडमिंटन खेल रहीं थीं। कुछ महिलाएं जमीन पर बैठी अनुलोम-विलोम कर रहीं थीं। कुछ लोग कसरत कर रहे थे। उठक-बैठक करता हुआ आदमी इतनी तेजी से बैठ रहा था मानो जमीन को जबरियन नीचे दबा रहा हो। जमीन दब नहीं रही थी तो गुस्से में और दबा रहा था।
कुछ लोग समूह में योग कर रहे थे। एक आदमी निर्देश दे रहा था, बाकी उसका अनुसरण कर रहे थे। जब हमने देखा तो लोग एक पैर पैर खड़े , दूसरे को ऊपर उठाये तथा हाथ दोनों ओर पंखे की तरह फैलाये हुए थे। एक पैर पर जहाज मुद्रा में खड़े थे लोग। कुछ लोग लड़खड़ाकर दोनों पैरों पर हो गए। फिर एक पैर पर खड़े होकर जहाज बनने की कोशिश करने लगे।
बात यहां कसरत तक ही सीमित थी। सही में जहाज बनते तो तेल के बढ़ते दाम के कारण साइकिल बनने की कोशिश में जुट जाते। जहाज मुद्रा की जगह साइकिल मुद्रा अपनाते।
हम सब इसी तरह जहाज बनते हुये सन्तुलन बनाने की कोशिश करते हुए लड़खड़ाते रहते हैं। लडखडाते हैं, सम्भलते हैं, स्थिर हो जाते हैं। जरूरत के हिसाब से स्टैंड, आसन बदलते हैं।
एक बच्चा पालीथिन में आटा लिए जगह-जगह डालता जा रहा था। जहाँ छेद दिखा , चीटिंयों का सुराग मिला, वहां आटा डाल दिया। रामनगर से आता है। घर से निकलता है आटा लेकर। जगह-जगह चींटियों के लिए आटा डालता चलता है। चीटियां कभी उसको न धन्यवाद देती हैं, न कोई वोट। उसको संतोष मिलता है, इसलिये वह यह काम करता है। सब कुछ अपनी ही कामना के लिए प्रिय होता है- 'आत्मनस्तु वै कामाय सर्वंम प्रियम भवति।'
आसमान में सूरज भाई अंधकार निरोधक अध्यादेश की तरह चमक रहे थे। कोई भी अंधेरे का टुकड़ा दिखे, फौरन उसका संहार करो। सूरज भाई की शक्ल देखते ही अंधकार अपने कुनबे समेत फूट लेता होगा।
मन किया सूरज भाई से पूछें -'ठीक है भाई आप चमको लेकिन अंधकार ने कौन तुम्हारी भैंस खोली है जो तुम उसको देखते ही कत्ल कर दो। आखिर उसका भी जीने का हक है।'
लेकिन फिर पूछे नहीं। क्या पता सूरज भाई बुरा मान जाएं। हमको अपने दोस्ती के पद से इस्तीफा देने को कहे और नए दोस्त अपने मित्रमंडल में शामिल कर लें। कोई भरोसा नहीं आजकल सूरज भाई का। बड़े बमक रहे हैं आजकल गर्मी में। गुस्से में बमकते साथी को कोई सलाह नहीं देनी चाहिए। वैसे भी सूरज भाई आसमान के राजा हैं। महाभारत में कहा गया है- ' राजाओं को बिना मांगे सलाह नहीं देना चाहिए।'

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Monday, July 05, 2021

हमको छोटी-छोटी खुशियों का आनंद उठाना सीखना चाहिए

 हमको छोटी-छोटी खुशियों का आनंद उठाना सीखना चाहिए।

हमारे आसपास तमाम बहुत अच्छे लोग हैं।
हमको अपने आप को भी प्यार करना चाहिए।
इसी तरह की और इसके साथ कुछ खूबसूरत कविताएं भी सुनिए इस बातचीत में। बातचीत में शामिल है हमारे छोटे सुपुत्र Anany Shukla

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Sunday, July 04, 2021

प्यार के बगैर दुनिया मौत की तरह सूनी है

 *इंसान को मुसीबतजदा लोगों की तरफ से जरूर लड़ना चाहिए, लेकिन अगर वह लड़ाई के सिवा हर चीज में दिलचस्पी लेना बंद कर दे तो लड़ाई का क्या फायदा?

*प्यार के बगैर दुनिया मौत की तरह सूनी है और हमेशा इंसान की जिंदगी में ऐसा वक्त आता है जब वह कैद से, अपने काम से, कर्तव्य परायणता से ऊब जाता है, और सिर्फ एक ही चीज की तमन्ना करने लगता है - किसी प्रिय चेहरे की, प्यार भरे किसी दिल की गरमी और जादू पाने की।
*इंसानों में घृणा करने योग्य बातों की अपेक्षा प्रशंसनीय गुण अधिक मात्रा में हैं।
अल्वेयर कामू के उपन्यास ' प्लेग' से।

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हारा वही जो लड़ा नहीं

 "कोई लक्ष्य

मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं,
हारा वही जो लड़ा नहीं।"
-कुंवर नारायण

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Friday, July 02, 2021

जहां-जहां उपस्थित हो तुम

 जहां-जहां उपस्थित हो तुम ,

वहां-वहां बंजर कुछ नहीं रहना चाहिए ,
निराशा का कोई अंकुर फूटे,
तुम्हें ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए|
-भवानी प्रसाद मिश्र

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Tuesday, June 29, 2021

कबूतर का कैटवॉक- गैर इरादतन घुमक्कडी के किस्सों की दास्तान

 

इंसान की तरक्की में सबसे अधिक योगदान उसकी किस प्रवृत्ति का रहा इसके बारे में आंकड़ें जुटाये जायें तो यायावरी अव्वल नम्बर पर आयेगी। मनुष्य शुरु से ही आदतन घुमक्कड़ रहा है। इधर से उधर घूमता रहा, प्रगति करता रहा। जीने के साधन बेहतर हुये तो ज्ञान की खोज में टहलता रहा। दुनिया के तमाम बड़े ज्ञानी कहलाये जाने वाले खलीफ़ा वस्तुत: घुमक्कड़ ही रहे- फाह्यान, ह्वेन सांग, इत्सिंग, इब्न बतूता, अलबरुनी, मार्कोपोलो, बर्नियर, टेवर्नियर सब यायावर ही थे। कोलम्बस , वास्कोडिगामा ,कैप्टन कुक भी सब मूलत: घुमक्कड़ ही तो थे। दुनिया में जो आज जो भी देश आगे हैं , उसके पीछे उनके देश के लोगों यायावरी का भी बड़ा योगदान होगा।
किसी देश, प्रदेश , जगह के बारे में कई पोथियां पढकर भी जो ज्ञान हासिल होता है उससे कहीं सटीक समझ वहां घूमने से बनती है। इसीलिये तो घुमक्कड़ी को जीवन की सबसे बड़ी जरूरत बताया गया है:
सैर कर दुनिया की गाफ़िल, जिन्दगानी फ़िर कहां,
जिन्दगानी गर रही तो नौजवानी में फ़िर कहां?
समीक्षा जी भी आदतन घुमक्कड़ हैं। जब, जहां मौका मिला निकल लीं घूमने। बचपन में उत्तराखण्ड से शुरु हुयी यात्राओं का अध्याय जो शुरु हुआ तो पत्रकारिता के दिनों की घुमक्कड़ी अबूधाबी , दुबई और फ़िर वापस अपने देश में जारी है। घुमक्कड़ी के साथ लिखा-पढी भी करती रहने से इनके किस्से दर्ज भी होते रहे। अब इन किस्सों का भी हक बनता है कि ये समीक्षा जी के निजी लेखन की दुनिया से पाठकों की दुनिया तक पहुंचें। समीक्षा जी के सहज , गैरइरादतन घुमक्कड़ी के किस्सों की दास्तान है यह यायावरी दस्तावेज –’कबूतर का कैटवॉक।’
जैसा समीक्षा जी बताया कि ऊंची-ऊंची इमारतें निहारने की बजाय उनको प्रकृति की संगति ज्यादा आकर्षित करती है। यायावरी के समय की छोटी-छोटी घटनायें, सूचनायें समीक्षाजी के जेहन में किसी जहाज के ’ब्लैक बॉक्स’ की तरह रिकार्ड होती जाती हैं जिसे बाद में वे तफ़सील से बयान करती हैं। इनके किस्सों की रेंज में कबूतर, बिल्ली, टिटिहरी, बिल्ली से लेकर अठारह लेन वाली सड़क को पार करके वॉक करते समय मिलने वाली सहेली से होते हुये ’चेंज योर हसबैंड’ के विज्ञापन भी हैं। यह अलग बात है कि अपना घुमक्कड़ जीवनसाथी इनको इतना पसंद है कि इस विज्ञापन को देखते ही खारिज कर देती हैं।
यायावरी के किस्सों को बयान करते हुये समसामयिक समाज की पड़ताल करती चलती हैं समीक्षा जी। शुरुआत शुक्रवारी यात्राओं के किस्सों से होती है। अरब देशों के शुक्रवार बाकी दुनिया के इतवार जैसे होते हैं। शुक्रवार मतलब छुट्टी का दिन। घर-परिवार के साथ छुट्टी के दिन घूमते हुये उनका तसल्ली से वर्णन मौजूद है शुक्रवारी यात्राओं के किस्सों में। इन किस्सों में आसपास की घटनाओं का बयान करते हुये उनको दुनियावी अनुभवों से भी बखूबी जोड़ती हैं समीक्षा जी। इन अनुभवों के बयान में उनकी नजर एक साथ लोकल और ग्लोबल होती है। कुछ उदाहरण देखे जायें:
- जो एक्सपर्ट होते हैं, वे अपने जाल में सब तरह की मछलियों को आसानी से फंसा लेते हैं।
- यहाँ के लोगों की गाड़ियाँ बड़ी होने का फ़ायदा ये होता है कि वे अपने साथ आधी गृहस्थी ले आते हैं। फिर वो बारबिक्यू हो या फ़ोल्डिंग साइकल। जब मन हो वैसा कर लो। कौन सा हाथों को पीड़ा देनी है।
- मरुस्थल में हरियाली पैदा करना दुश्वर काम है। पर देखने के बाद लगता है कि मनुष्य यदि चाहे तो वह कुछ भी कर सकता है, अपनी इच्छाशक्ति के दम पर। बशर्ते इच्छा और शक्ति (पैसा) का सही उपयोग हो। कम से कम यहाँ खाऊपन मतलब भ्रष्टाचार खुली आँखों से तो नहीं दिखता। अंदर की बातें कोई नहीं जानता।
- यूएई की ख़ासियत ये है कि कोई भी चौराहे देख लीजिए, आप एक नहीं, सैकड़ों फ़ोटो निकालने को मजबूर हो जाएँगे। सब अलग अलग थीम पर बने होते हैं। हरियाली की कोई कमी नहीं। वहाँ जाकर हमारा आदमी (भारतीय) मेहनत बहुत करता है। रेगिस्तान को हरा भरा बनाना, हरे-भरे कबाब बनाने जैसा आसान काम नहीं है। ईमानदारी चाहिए ऐसे कामों में। हमारे देश की ईमानदारी वहाँ ख़रीदी जाती है।
-- क्षितिज को देखना सच में रोमांच पैदा करता है। वो क्षितिज जिसका कहीं अंत ही नहीं। मतलब जब हम समुद्र की यात्रा कर रहे होते हैं, तो वो क्षितिज ही है, जो हमें अंतहीन यात्रा पर ले जाता है। जैसे ब्रम्हाण्ड की यात्रा हो। ढेरों रहस्य। और हम केवल तुच्छ प्राणी। जो केवल प्राणवायु के लिए जीते हैं।
’कबूतर का कैटवॉक’ घूमते फ़िरते हुये अपने समय और समाज की सहज पड़ताल की कोशिश है। विदेश में घूमते हुये अपने देश की परिस्थितियों से अनायास तुलना है। समीक्षा जी के घुमक्कड़ी के किस्सों की रेंज बड़ी है। इसमें कैब ड्राइवर और कामवाली की परेशानी हैं तो जैनमुनि की जीवनशैली भी। इसी में गर्मी में योग की लफ़ड़े भी बयान हो गये। ’शिक्षा का मायका’ माने जाने वाले पुणे के बनिस्बत उत्तर भारतीयों की सहज मनोवृत्ति हो या दक्षिण की महिलायें सब समीक्षा जी के राडार की रेंज में हैं। अपने से जुड़े लोगों के भी आत्मीय संस्मरण भी शामिल हैं इसमें।
अपने पहले व्यंग्य संग्रह – ’जीभ अनशन पर है’ के माध्यम से हिन्दी के व्यंग्यकारों में अपनी पहचान बनाने वाली समीक्षा जी के यायावरी किस्सों का संकलन आना सुखद है। घुमक्कड़ी की कहानियां कम ही लिखी गयी हैं हिन्दी में। इस कमी की कुछ भरपाई जरूर होगी ’कबूतर के कैटवॉक’ से। समीक्षा जी को शुभकामनायें। वे ऐसे ही घूमती रहें, लिखती रहें।
अनूप शुक्ल
शाहजहांपुर

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समीक्षा तैलंग के निर्देशन में कबूतरों का कैटवॉक

 

जरूरी बात कहनी हो, कोई वादा निभाना हो,
उसे आवाज देनी हो, उसे वापस बुलाना हो ,
हमेशा देर कर देता हूं मैं -मुनीर नियाजी
लिखा-पढ़ी के मामले में अपन पर मुनीर नियाजी साहब का यह शेर बखूबी लागू होता है, खासकर दोस्तों की किताबों के बारे में लिखने के मामले में | कई मित्रों की किताबों के बारे में लिखना बकाया है |
अमूमन हमारी किताबें खरीद कर पढ़ने की आदत है| लेकिन कुछ दोस्तों ने तो किताबें भी भेजी हैं , गोया अपन कोई बड़े लेखक हो गए हों| ऐसी किताबों में से अधिकतर के हाल भी वैसे ही हुए जो नामचीन लेखकों के यहां पहुंची किताबों के होते हैं - 'वे अपने पढ़े जाने के इंतजार में हैं|'
दोस्तों की किताबें पढ़ने में देरी का कारण ऐसा नहीं कि अपन बहुत व्यस्त रहते हैं या बहुत जरूरी काम में उलझे रहते हैं| समय की कमी बिल्कुल नहीं अपन के पास | पूरी 24 घंटे अलाट होते हैं रोज हमको भी| कुछ जरूरी काम निपटाने के बाद बाकी बचा समय गैर जरूरी कामों में उलझाकर निपटा देते हैं| लिखने पढ़ने की बात अक्सर टल जाती है| लगता है कि तसल्ली से लिखा जाएगा| इसके पीछे वली असी साहब के शेरों की साजिश है :
"मैं रोज मील के पत्थर शुमार (गिनती) करता था
मगर सफ़र न कभी एख़्तियार (शुरू)करता था।
तमाम काम अधूरे पड़े रहे मेरे
मैँ जिंदगी पे बहुत एतबार (भरोसा)करता था।"
जिंदगी पर बहुत भरोसा रखने के चलते तमाम काम अधूरे रह जाते हैं अपन के| कुछ किताबों पर तो लिखने के मजनून मय टाइटल दिमाग में जमा हैं| लेकिन वही मामला एतबार में अटक जाता है|
जिन किताबों के बारे में लिखना अभी तक नहीं हो पाया उनके लिए इतनी बहाने बाजी के बाद अब बात उस किताब की जिसके बारे लिखने के लिए इतनी भूमिका बांधी|
पिछले दिनों, जब देश के तमाम हिस्से लाकडाउन की गिरफ्त में थे , दोस्तों की कुछ किताबें भी आईं| इन्हीं में एक समीक्षा तैलंग Samiksha Telangकी किताब भी शामिल रही - 'कबूतर का कैटवॉक' आमतौर पर इस तरह ध्यानखैचू शीर्षक हमारी किताबों के नाम रखने वाले 'व्यंग्य पुरोहित' आलोक पुराणिक रखते हैं| समीक्षा जी की किताब का शीर्षक आकर्षक रहा| कवर पेज भी|
इस किताब के पहले समीक्षा जी का व्यंग्य संग्रह 'जीभ अनशन पर है' दो साल पहले आया, धूमधाम से आया| काफी चर्चा हुई उसकी| सम्मान वगैरह भी मिले| इस बीच उनको व्यंग्यकार के रूप में प्रतिष्ठा भी मिली| जल्दी ही समीक्षा जी का अगला व्यंग्य संग्रह भी आएगा| समीक्षा जी की दोनों किताब भावना प्रकाशन से छपी है| एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से दो साल के अंतर में दो किताबें प्रकाशित होना रचनाकार के जलवे की कहानी कहता है |
संयोग से 'जीभ अनशन पर है' के विमोचन के मौके पर मैं भी मौजूद था| उस पर लिखने की बात कहते हुए बार-बार टालता रहा जिसकी बहाने बाजी ऊपर पहले ही की जा चुकी है| उसे दोहराना ठीक नहीं|
समीक्षा तैलंग से परिचय 'व्यंग्य की जुगलबंदी' के दिनों से हुआ| लगातार दो साल हर हफ्ते 'व्यंग्य की जुगलबंदी' के बहाने तमाम लेखकों ने लेख लिखे| कुछ लोगों ने लिखने की शुरुआत की , कुछ स्थापित लेखकों ने इसी बहाने फिर से लिखना शुरू किया| करीब 600-700 लेख तो लिखे गए होंगे| समीक्षा जी ने भी उसमें लेख लिखे| फिर उनकी किताब 'जीभ अनशन पर है' आई| इसके बाद यह 'कबूतर का कैटवॉक ' |
'कबूतर का कैटवॉक' किस्सागोई/संस्मरण घराने के लेख हैं | इसकी भूमिका लेखकों में दामोदर खड़के जी के साथ अपन भी शामिल हैं| लिहाजा कह सकते हैं कि किताब छपने से पहले ही इसके लेख पढ़ चुके थे|
किताब में शामिल लेखों का ताना-बाना आबूधाबी से हिंदुस्तान तक फैला है| आबूधाबी का शुक्रवार हिंदुस्तान के इतवार की तरह होता है -साप्ताहिक अवकाश का दिन | कई शुक्रवारी किस्से शामिल हैं किताब में| कबूतरों के साथ कौवे, तोता , गौरैया और दूसरे पक्षियों के भी जमावड़े हैं| कुछ रोचक व्यक्तिचित्र भी हैं |
127 पेज की 200 रुपये की किताब की छपने की सूचना मिलते ही हमने इसे खरीदने का इरादा बनाया तब तक समीक्षाजी की संदेश आया कि वे खुद इसे हमें भेजेंगी| भूमिका लेखक होने के कारण 200 रुपये बचे| समीक्षा जी ने मुझे किताब भेजते हुए लिखा है - 'आपकी भूमिका ,आपकी पुस्तक'|
अब जब किताब ही हमारी हो गई तो सिवाय तारीफ के क्या कहा जाए| किताब की छपाई शानदार है| प्रूफ की गलतियां भी नहीं दिखीं | फ़ोटो अलबत्ता श्वेत-श्याम होने के चलते कहीं -कहीं उतने आकर्षक नहीं दिखते जीतने रंगीन होने पर होते| लेकिन रंगीन होने पर किताब के दाम बहुत ज्यादा हो जाते |
किसी रचनाकार की किताब जब आती है तो उसको उसकी तारीफ सुनने की उत्सुकता होती है| लेखक चाहे नया हो दशकों पुराना, किताब छपने पर उसके हाल उस स्कूली बच्चे जैसे होते है जो अपनी पाठक रूपी अध्यापक से ए ग्रेड की ही अपेक्षा करता है | कुछ बुजुर्ग लेखक तो किसी कमी की तरफ ध्यान दिलाए जाने पर पाठक की समझ को ही खारिज करने पर आमादा हो जाते हैं -'तुमको पढ़ने की तमीज नहीं है'|
समीक्षा जी से अलबत्ता इस तरह का कोई खतरा नहीं है इसलिए ही किताब के बारे में सिवाय
बधाई
और तारीफ के और कोई सुर सध नहीं रहा|
अपने लेखन की शुरुआत पत्रकारिता से करने वाली समीक्षा जी व्यंग्यकार के रूप में पहचान बना चुकी हैं| जब दशकों से व्यंग्य के स्थापित लेखक आलोक पुराणिक Alok Puranik सरीखे लोग अपने को अभी भी व्यंग्य का विद्यार्थी मानते हैं तो समीक्षा जी जैसे दो साल पहले लेखन के इस अखाड़े में उतरने वाले रचनाकार को तो बहुत कुछ सीखना है, नया करना है , नई उपलब्धियां हासिल करना है|
'कबूतर का कैटवॉक' के प्रकाशन की बधाई देते हुए कामना करता हूं कि समीक्षा जी लेखन के क्षेत्र में नित नए आयाम छुए, नई सफलताएं हासिल करें| इस किताब में कबूतर कैटवाक करते हुए हिंदुस्तान पहुचें| आने वाले समय में इन कबूतरों के पंखों की फड़फड़ाहट पूरी दुनिया में पहुंचे|
नोट : किताब की भूमिका के रूप में लिखा मेरा लेख अगली पोस्ट में | लिंक यह रहा https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10222596552235977

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10222596358991146

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Saturday, June 19, 2021

दुकान पर शटर के मास्क

 कल सुबह बाहर निकले। गाड़ी से। लाकडाउन खुल गया है। शहर उससे भी ज्यादा खुल गया।

सड़कों पर लोग आ-जा रहे थे। जितने लोग मास्क लगाए थे उससे ज्यादा लोग मुंह खोले घूमे रहे थे।
गांवों में लोग सड़क पर ऐसे बैठे थे जैसे पीढ़े पर बैठे हों। सड़क की तरफ पीठ करके बैठे होने से लग रहा था मानों गतिमान जिंदगी के खिलाफ अनशन किये बैठें हों। भागता रहे सड़क पर समय, अपन तो यहीं ठहरकर बैठे हैं। समय को खूंटे पर बांधकर अपने सामने मुर्गा बनाकर बैठे हैं।
एक बुजुर्ग प्लास्टिक की खाली बोतल को हिलाते हुए बहकता हुआ सड़क पर चला जा रहा था। 'दिव्य निपटान' की जंग जीतने की खुशी उसके चेहरे पर झंडे की तरह फहरा रही थी।
गांवों के बाहर सड़क किनारे उपलों के त्रिभुजाकार चट्टे लगे थे। छप्परों से पानी गुजरकर जमीन गीली कर रहा था। पानी जमीन की छाती में घुसकर घरवापसी का सुख लूट रहा होगा। जमीन के चेहरे पर वात्सल्य की आभा दिख रही थी।
शहर की सब दुकाने बन्द थीं। दुकानों के शटर दुकानों के चेहरे पर मास्क की तरह लगे हुए थे। मजाल कि कोई दुकान बिना शटर मास्क के दिख जाए। इंसान से ज्यादा समझदार दुकानें हैं। इसीलिए किसी भी दुकान को कोरोना होने की खबर नहीं आई।
बसस्टैंड पर एक बच्ची रस्सी पर चलने का करतब दिखा रही थी। सर पर मिट्टी के घड़े रखे , सन्तुलन के लिए हाथ में लाठी पकड़े वह रस्सी पर चल रही थी। रस्सी उसके हर कदम पर हवा में ऊपर नीचे हो रही थी। इधर-उधर बिखरे लोग उचटती निगाहों से बच्ची के इस करतब को देख रहे थे।
एक बच्ची जिसको उसकी उम्र के हिसाब से स्कूल में होना चाहिए था , अपने परिवार का पेट पालने के लिए , जान जोखिम में डालकर करतब दिखा रही थी। लोग भी अनमने भाव से ही सही उसको देखा, अनदेखा करते हुए इसको चलने दे रहे थे। एक समाज के लिए इससे बुरी बात क्या होगी कि उसके बच्चे पेट की आग बुझाने के लिए जिंदगी दांव पर लगा दें। अफसोस कि हम लोग इस सबको सामान्य मानकर अनदेखा करते रहते हैं।
हमने भी ऐसा ही किया। उचटती निगाह से बच्ची के करतब को देखते हुए आगे निकल गए।
सड़कों के दोनों ओर लोग आमों के ढेर लगाए बैठे थे। दशहरी आम। आसपास के गांवों के लोग होंगे वे। सड़क पर गुजरते लोग इनसे आम खरीद रहे थे। जवान, तगड़े, गबरू आम ढेर में जमा अपने बिकने का इंतजार कर रहे थे।
आपने आम खाये इस बार ? न खाये हों तो खाइये। बारिश के बाद आम कम हो जाएंगे। लेकिन आम खाने के बाद पानी मत पीजियेगा। ठीक।

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Thursday, June 17, 2021

ब्लागर दोस्तों से बतकही

 

कल ब्लागर दोस्तों के साथ बतकही हुई। क्लबहाउस कोई नया बतकही का अड्डा है। उसमें जुड़ने में ही समय निकल गया। अड्डे पर पहुंचे तो दोस्त लोग बतियाने में जुटे थे। ब्लागिंग से जुड़ी यादें , बहुत दिन बाद मायके पहुंची सहेलियों की तरह साझा कर रहे थे।
ब्लागिंग में अपन 2004 में आये। 2010 तक सक्रिय रहे। इसके बाद फेसबुक पर आ गए। ब्लाग अनियमित हो गया। लेकिन अभी भी जब भी मौका मिलता है फेसबुक की पोस्ट्स ब्लाग पर डालते रहते हैं ताकि सनद रहे और सुरक्षित रहें। फेसबुक पर पुरानी पोस्ट्स को खोजना मुश्किल है, ब्लाग के मुकाबले। ब्लाग पर लिंक करना, फोटो लगाना, ऑडियो , वीडियो सब फेसबुक के मुकाबले बेहतर है। लेकिन फेसबुक पर एक मॉल की तरह की तेजी है। एक के बाद एक बहुत सारी पोस्ट्स देख सकते हैं, लाइक, टिप्पणी कर सकते हैं। ब्लॉग पर एक समय में एक ब्लॉग पर रहना होता है।
लेकिन ब्लागिंग के समय जो दोस्तों से जुड़ाव हुआ वह आगे फिर दूसरे माध्यमों में नहीं हुआ, या कहे कम हुआ। ब्लॉग हम लोगों की पहचान थी। हमको लोग अनूप शुक्ल से ज्यादा फुरसतिया के नाम से जानते हैं। समीरलाल उड़नतश्तरी ज्यादा लोगों के लिए हैं। पूजा उपाध्याय लहरें वाली पूजा हैं। देवांशु अगड़म-बगड़म-स्वाहा। अभिषेक ओझा उवाच हैं।
लगभग सभी लोगों ने बताया कि उनकी जिंदगी में ब्लागिंग ने बहुत अहम किरदार निभाया। अपन की तो सारी लिखाई ही ब्लागिंग की देन है।
बातचीत के दौरान अशोक पांडेय Ashok Pande के कबाड़खाना की याद कई लोगों ने की। रवीश कुमार Ravish Kumar के कस्बा बलाग के भी किस्से आये। Vineet Kumar की हुंकार भी आई चर्चा में। पंकज उपाध्याय, दर्पण शाह , संजय व्यास , मनीष भट्ट , कमल ने अनेक यादें साझा कीं। अपन ने सबके बलाग खोलकर देखे। मन किया कि ब्लॉग नियमित लिखेंगे। मौका मिलने पर चिट्ठाचर्चा भी करेंगे।
ढाई घण्टे चली इस चर्चा में न जाने क्या-क्या बातें हुईं। जो याद रहीं वो यहां लिख दीं। बाकी याद आने पर।
देखते हैं क्या होता है। 🙂

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10222525781506753

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