Monday, August 01, 2016

फ़ैशन अपने में भेड़चाल है

घर लौट रहे थे दफ़्तर से कल। फ़टफ़टिया फ़र्राटे से चलाते हुये। टाट मिल चौराहे तक तो मामला चौकस रहा। लेकिन आगे झकरकटी पुल पर ’थम’ हो गया। जाम लग गया था।

हमें लगा कि ये ससुर झकरकटी पुल भी भेडचाल फ़ैशन का शिकार हो गया। कल देखा उधर गुड़गांव को जाम के कारण मीडिया चर्चित होते देख लगता यह भी जाम के लिये हुड़कने लगा। जिसको देखो वो आजकल भेड़चाल फ़ैशन का शिकार है।

वैसे सच तो यह है कि फ़ैशन अपने में भेड़चाल है। अमेरिका , यूरोप का फ़ैशन दिल्ली, मुम्बई लपकती है। दिल्ली ,मुम्बई से बाकी शहर झपटते हैं। इसके बाद फ़िर छुटके , चिल्लर शहरों तक पहुंचता है फ़ैशन। कभी खरामा, खरामा। कभी फ़र्राटे से। बाजार की रुचि होती है तो फ़ैशन एकदम अफ़वाह की गति से फ़ैलता है।

एक बारगी तो मन तो किया पुल को हड़कायें -’जाम को क्या फ़ेसबुकिया फ़ोटो फ़ैशन समझ लिया क्या है बे कि जिसे देखो ’चैलेन्ज एक्सेप्टेड’ लिखकर तस्वीर काली कर रहा है। इत्ता तो अकल होनी चाहिये तेरे को कि फ़ोटो काली सफ़ेद करने में एक मिनट लगता है लेकिन जाम का झाम तो घंटो का होता है। पुराने पुल हो, ज्यादा जाम के लिये हुड़कोगे तो किसी दिन चू पडोगे और 'शान्त' हो जाओगे।’

लेकिन फ़िर सोचा कि पुल बेचारे का क्या दोष! वह तो बेचारा चुपचाप अपने ऊपर से गुजरते हुये लोगों को देखता है। अब लोगों को ही सलीका नहीं पुल पार करने का तो अगला क्या करे।

खैर जब फ़ंस ही गये तो ’जाम सुषमा’ निहारने लगे। मेरे बाईं तरफ़ आटो, मोटर साइकिल और कारों की लाइन लगी थी। हम भी साथ में लग लिये। कुछ लोग अपनी फ़टफ़टिया उठाकर फ़ुटपाथ पर चढ़ा लिये और फ़र्राटा मारते हुये आगे निकल लिये। उनको देखकर अपन का जी भी ललचाया कि हम भी उचका कर निकल लें। लेकिन फ़िर यह सोचकर कि अकेले उठा न पायेंगे मोटरसाइकिल आधा फ़ुट ऊंची फ़ुटपाथ पर हम जाम में ही फ़ंसे रहे।

मोटरसाइकिल उठाने में सामर्थ्य के अभाव ने सभ्य नागरिक बने रहने में सहायता की।

हम सरकते हुये आगे बढ रहे थे तब तक देखा कि पीछे से एक एम्बुलेन्स हुंहु आती हुयी आगे आयी। हमने तो उसको अपने और बायें होते हुये रास्ता दे दिया लेकिन सामने से आते एक ट्रक ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। उसकी भी गलती नहीं। वह आगे ही बढ सकता था। उसके पीछे जाम लग गया था। वह पी छे जा ही नहीं सकता था। मजबूरन एम्बुलेन्स को पीछे आना पड़ा। जाम तो उसके पीछे भी लगने लगा था लेकिन लोगों ने उसको पीछे आने दिया।

सामने से आता ट्रक बहुत धीरे-धीरे पुल पर आगे बढ रहा था। पचास पार का ड्राइवर दांत भींचे ट्रक हांक रहा था। ट्रक चींटी की रफ़्तार से तो नहीं पर बहुत धीरे-धीरे चल रहा था। लोगों अपनी-अपनी गाड़ियों के दामन ट्रक से बचाते हुये किनारे होते जा रहे थे- जैसे कभी और कुछ जगह तो आज भी लोग दलितों की छाया से भी बचते हैं उसी तरह सवारियां ट्रक के साये से दूर भाग रही थीं।

ट्रक के पीछे देखा कि एक रिकवरी वैन अपने पीछे एक ट्रक को गिरफ़्तार जैसा किये चली जा रही थी। जित्ती बड़ी रिकवरी वैन उससे दो गुना बड़ा ट्रक। दोनों के बीच में लोहे की जंजीर। ट्रक बेचारा बड़ा शरीफ़ था। अपने से आधी कद और ताकत की रिकवरी वैन के घसीटने से घिसटता हुआ पुल पर चला जा रहा था। घिसट क्या रहा था कि वह खुद अपना इंजन चालू किये वैन के पीछे शरीफ़त की चाल से चला जा रहा था।

एक मिनट के लिये लगा कि यह सोच डालें कि अपने से आ धे कद काठी की वैन के पीछे शरीफ़ों की तरह चलता ट्रक अपने से आधे कद की घरैतिन के इशारे पर सहमते हुये चलते घरवाले जैसा लग रहा था।

जब रिकवरी वैन आगे ट्रक को लेकर आगे निकल गयी तब जाम कुछ कम सा हुआ। तब तक दायीं तरफ़ एक महिला फ़ुटपाथ पर अपना सामान लुढकाते हुये आती दिखी। जाम अचानक खूबसूरत टाइप लगने लगा। बहुत गोरी सी थी महिला। खूबसूरत भी। शायद जाम के चलते अपनी सवारी छोड़कर पैदल जाने को मजबूर हो गयी होगी। बस या ट्रेन न छूट जाये इसलिये 11 नम्बर की बस पकड़ ली।

पहले तो हमने सोचा कि जब जाम में फ़ंसे ही हैं और सामने से कोई महिला आ रही है तो उनको देखने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन फ़िर याद आया कि कहीं ज्यादा देख लिया तो उसे घूरना कहा जायेगा। यह तो गंदी बात है। यह ध्यान में आते ही हमने फ़ौरन दूसरी-तीेसरी-चौथी तरफ़ देख डाला। कोई और नहीं दिखा तो मोटर साइकिल के शीशे में अपनी तरफ़ ही देख डाला। देखकर बड़ा खराब लगा कि सारी खूबसूरती मने कि स्मार्टनेस हेलमेट के नीचे कैद है। मन किया कि हेलमेट उतारकर बाल काढने के बहाने एक बार फ़िर देख लें चेहरा लेकिन फ़िर याद आया कि कंघा तो था ही नहीं जेब में। मन मारकर फ़िर इधर-उधर देखते हुये फ़िर उधर ही उधर देखने लगे जिधर देखने से बचने के लिये इधर-उधर देखना शुरु किया था।

चूंकि दायीं तरफ़ फ़ुटपाथ पर जाम नहीं लगा था इसलिये महिला आहिस्ता-आहिस्ता आगे और नजरों के पार चली गयीं। उनकी सुस्त चाल से ऐसा लगा कि शायद उनको इस तरह आगे चला जाना रास न हीं आ रहा था। बेमन से जाम के अभाव में उनको आगे निकलना पड़ रहा था। अनमने मन से जाते हुये शायद वे चाह रही थी कि थोड़ा जाम इधर फ़ुटपाथ पर भी लगता तो कित्ता अच्छा होता। हो सकता है कि वे यह भी सोच रही हों जाते हुये कि ये लोग जाम में क्यों फ़ंसे हुये हैं। इधर फ़ुटपाथ पर क्यों नहीं चलते जिधर जाम नहीं है।

खैर, कुछ देर में जाम खत्म हो गया। और हम आगे निकल लिये। पुल के नीचे देखा कुछ स्थानीय नागरिक पुलिस का सहयोग करते हुये गाड़ियों को सही से आगे -पीछे कर रहे थे। अराजक लोगों को तात्कालिक रू प से सभ्य बना रहे थे।

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Wednesday, July 27, 2016

चींटा और आदमी

रिक्शे में गेंद हैं
दो दिन पहले किसी काम के सिलसिले में हम लोग खुले में खड़े थे। काम चल रहा था। जिम्मेदारी और दिखावे के के लिहाज से कार्यस्थल पर ही खड़े थे। काम में कोई योगदान देना नहीं था सो देश दुनिया की चिंता करने लगे।

कवि यहां यह नहीं कहना चाहता कि जो देश दुनिया की चिंता करते हैं वे सब निठल्ले होते हैं। उसका मतलब शायद यह है कि जब आदमी निठल्ला होता है तो देश और दुनिया के बारे में चिंतन करने लगता है।

खुले में खड़े थे।आसमान साफ़ था। जमीन पर जगह-जगह बारिश का पानी टाइप जमा था। जहां पानी संगठित था, ज्यादा जमा था वहां तो जमा रहा। लेकिन जहां जमीन पर पानी पाउडर की पर्त सरीखा बस नाम को था उसे सफाई पसंद सूरज भाई किरणों की गर्मी के लाठी चार्ज से तितर-बितर कर दे रहे थे। वहाँ जमीन सूख रही थी। 


इसीबीच देखा कि एक लाल चीटा अपने से कई गुना बड़ा लगभग गोल आकार का एक बोझा इधर-उधर धकिया के ले जा रहा था। गोल बोझे का व्यास चीटे की कुल लम्बाई से कुछ ज्यादा ही रहा होगा। आयतन तो कई गुना रहा होगा उसके शरीर से। लेकिन लगता है वजन उतना नहीं था क्योंकि उसको वह इधर-उधर ठेले चला जा रहा था।

वजन ठेलता हुआ चीटा वजन को दो-चार इंच एक तरफ ले जाता। थक जाता तो ठहर जाता। थोड़ी देर रुकता। फिर दूसरी तरफ ठेलने लगता। मने जैसे दुनिया भर की सरकारें करती हैं। एक सरकार से एकदम उलट काम दूसरी सरकार करने लगती है।

बीच-बीच में चीटा उस वजन पर उचककर चढ़ जाता। उसकी इधर-उधर घूमती गर्दन देखकर लगता उस वजन को मंच समझकर भाषण दे रहा है। शायद भाइयों और बहनों भी कह रहा हो। क्या पता यह भी कह रहा हो कि पिछले कई दिनों से यह बोझ यहां रखा था लेकिन किसी को चिंता नहीं कि इसे आगे ले जाए। यह कहकर वह उस वजन से उतरता और फिर उसको उस दिशा की उलटी दिशा में ठेलने लगता जिधर वह थोड़ी देर पहले ठेल रहा था।


लग रहा है कोई रबर का पुल लिए जा रहा है रिक्शेवाला
दस मिनट तक देखते रहे। वजन जहां था लगभग वहीं बना रहा। लेकिन चीटा लगातार पसीने-पसीने होता रहा। यह भी हो सकता है कि चीटे ने इस काम को कोई नाम दिया हो। हर बार रुक कर इसका नाम बदल दिया हो। हर बार नाम बदलकर हल्ला मचाता कि हमने बहुत बदलाव कर दिया।

यह कुछ ऐसे ही जैसे लोकतांत्रिक देशों में सरकारें जिलों,प्रदेशों , परियोजनाओं के नाम बदलकर बिना कुछ काम किये अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटती हैं।

खैर छोड़िये चीटे को । आइये आपको आदमी के किस्से सुनाते हैं। कल देखा कि एक रिक्शेवाला अपने रिक्शे से कई गुना ज्यादा लम्बा बोझ लादे चला जा रहा था। रिक्शा मारे वजन के हिल रहा था । पता चला कि रबर वाली रिक्शे में रबर वाली गेंदें लदी हुई थीं। दादानगर के किसी कारखाने में बनी थी। नौघड़ा की किसी दुकान में जा रही थी बिकने के लिए।

आकार देखकर लगा कि कोई ' रबर फ्लोट' रिक्शे पर लदा चला जा रहा हो।

रिक्शा वजन के बोझ से हिल रहा था। उसको देखकर मुझे दो दिन पहले अपने से कई गुना बड़ा वजन ढोता चीटा याद आया। बस फर्क यही दिखा कि चीटा बहुत फुर्ती से यह काम कर था। जबकि रिक्शेवाला बड़े बेमन से किसी तरह बोझ ढो रहा था।

यह भी मजे की बात कि फ़ैक्ट्री में चीटे को जिस जगह देखा था उस जगह 'रबर फ्लोट' बनते हैं और रिक्शे पर जो आकृति बनी थी गेंद के बोझ की वह भी एक रबर फ्लोट सरीखी ही लग रही थी।

चींटे और आदमी की तुलना करना ठीक नहीं। दोनों में कोई तुलना नहीं लेकिन याद पर क्या बस। आ गई तो आ गई। क्या किया जाए। याद पर बस भी तो नहीं चलता।

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Tuesday, March 22, 2016

तुम्हें जीवन की डोर से बांध लिया है

फुटरेस्ट पर खड़े होकर बतियाते हुए बालक
सबेरे निकले साइकिल स्टार्ट करके तो पुलिया पर एक भाई अपना बदन तोड़ते दिखे। गरदन बड़ी दूर तक और देर तक घुमाई। ऐसा लगा मानो दिली तमन्ना गरदन धड़ से जुदा करके शरीर की सरकार अस्थिर करने की हो।

गरदन से फ़ुरसत हुये तो कमर पर हमला किया। इतनी घुमाई कमर मानो खोपड़ी पीछे करने का इरादा पक्का कर किया हो। पर अब शरीर के अंग कोई पार्टी के विधायक तो होते नहीं जो एक शरीर छोड़कर दूसरे में शामिल हो जायें। इसलिये बहुत कोशिश करने पर भाई साहब का शरीर एकजुट बना रहा।


सुबह की शाखा के स्वयंसेवक
एक महिला टहलते हुये बड़ी तेजी से हाथ हिलाते हुये जा रही थी। उसके हाथ कुछ छोटे से थे। ऐसा लगा कि तेज हाथ हिलाकर वह उनको कुछ लंबा करने की कोशिश कर रही थी। लेकिन हाथ उतने ही लम्बे बने रहे।
अभी सूरज भाई निकले नहीं थे लेकिन आसमान पर उजाला पसरा हुआ उनके आने की उद्घोषणा कर रहा था। सभी दिशाओं पर किरणों की सर्चलाईट मारते हुये बार-बार घोषणा सी कर रहा था -’हम सबके प्यारे जगतहृदय सम्राट सूरज भाई बस अभी पधारने ही वाले हैं।’

पक्षी चहचहाते हुये सूरज भाई का इंतजार कर रहे थे। कुछ तो गुस्से में चिंचियाते हुये भी दिख रहे थे मानो कह रहे हों--’ जल्दी आओ यार, देखकर फ़िर निकलें कुछ दाना-पानी खोजने के लिये।’


सेना का सामान लेकर जाती हुई मालगाड़ी
दीपा से मिलने गये आये। उसके पापा टमाटर काटकर सब्जी बनाने की तैयारी कर रहे थे। आसपास के कमाई करने के लिये आये लोग वापस अपने घरों को लौट गये थे। जाते समय ईंधन की बची हुई लकड़ी दीपा के पापा को दे गये थे। दीपा को जो किताबें कविता, कहानी की लाये थे उनमें से कुछ कवितायें उसने याद की हुई थीं। सुनाई भी हमको।

हमने पूछा- ’कैसे याद की?तुमको तो ठीक से पढ़ना आता नहीं।’

’मैडम ने पढकर सुनाई। हमने चीटिंग करके याद कर ली।’- दीपा ने बताया।

शोभापुर क्रासिंग बन्द थी। एक डम्पर का ड्राइवर बगल में रुके मोटरसाईकल वाले को बता रहा था कि चौराहे पर पुलिस वाले ने उससे 100 रुपये वसूल लिये। यह कहकर कि नो इंट्री लग गयी है। ड्राइवर को पता है कि नो इंट्री का समय नहीं हुआ था लेकिन अगर वह बहस करता तो डम्पर दिन भर के लिये थाने में खड़ा कर लेता पुलिस वाला इसलिये 100 रुपये थमा दिये पुलिस वाले को।


सूरज भाई का जलवा सब जगह है
नई दुनिया अखबार में खबर छपी है- ’प्रदेश में होगी सबसे स्मार्ट पुलिसिंग, ’वार रूम’ से सभी जिलों की निगरानी’। मतलब कोई वाहन इंट्री शुल्क चुकाये बिना अंदर नहीं घुसेगा शहर के।

ट्रेन आने में देर हुई तो मोटरसाईकल सवार बच्चा ड्राइवर सीट के फ़ुटरेस्ट पर खड़े होकर बतियाने लगा। उसकी टी शर्ट और पैंट में अलगाव हो गया। अंगप्रदर्शन टाइप होने लगा। होली का मौका होता तो कोई उसकी पैंट नीचे खींचकर ’बुरा न मानों होली है’ कहते हुये फ़ूट लेता।

देखते-देखते बच्चा ड्राइवर की तरफ़ का दरवज्जा खोलकर अंदर बैठकर बतियाने लगा। जब ट्रेन निकली तो नीचे उतरा। उसकी फ़ोटो उसको दिखाई तो बडी तेज हंसा। इसके बाद वह मोटरसाईकिल और अपन अपनी साईकल स्टार्ट करके आगे बढ़ गये।

व्हीकल मोड़ की तरफ़ जाते हुये शाखा पर चार लोग दिखे। साइकिल सड़क पर खड़ी करके उनसे बतियाये। तीन बच्चे और एक युवा थे शाखा में। बच्चे कह रहे- ’आज भैय़ा जी देर से आये।’ कक्षा 6, 8 और 9 में पढ़ते हैं बच्चे। हमने कहा - कक्षा 7 का कोई बच्चा नहीं। हम 7 में पढ़ने लगते हैं ताकि क्रम बन जाये। सब हंसने लगे।
बच्चों के नाम पूछे तो बच्चों ने सावधान मुद्रा में खड़े होकर बताये। हर्ष राजभर, निखिल दुबे और एक नाम बिसर गया। भाई जी निखिल परस्ते 2008 में जबलपुर इंजीनियरिंग कालेज से पढाई करके फ़िलहाल मध्य प्रदेश पावर कारपोरेशन में काम करते हैं।

सुबह 630 से 730 तक का समय है शाखा का। झंडा वंदन,सूर्य नमस्कार, योग आदि के बाद फ़ुटबाल खेलने का प्लान था। हमने पूछा- ’आप लोगों की तो ड्रेस बदल गयी। पर आप अभी तक हाफ़ पैंट में हैं। इस पर निखिल ने बताया कि अभी आधिकारिक तौर पर नहीं बदली ड्रेस। जब बदलेगी तब पहनेगे।

हमने पूछा- ’आप दो चार ही लोग दिखते हैं शाखा में। कितने लोग जुड़े हैं इस शाखा से?’

15-20 लोग जुड़े हैं। लोगों की जाब लग गयी कहीं बाहर इसलिये कम हो गये लोग लेकिन आते रहते हैं कभी-कभी। -निखिल ने जानकारी दी।

”कोई आर्थिक सहायता भी मिलती है किसी से शाखा लगाने के लिये’- मैंने पूछा।

’ सब कुछ स्वयंसेवक को ही करना होता है। कोई सहायता नहीं मिलती कहीं से।’ निखिल ने बताया।

चलते हुये फ़ोटो खींची। झंडा निखिल के ठीक पीछे था। एक बच्चे ने मजे लेते हुये कहा- ’ ये भैया जी की टोपी है।’

चाय की दुकान पर एक आदमी अकड़ा सा बैठा चाय पी रहा था। हम भी सिकुड़कर उसके बगल में बैठ गये। चुपचाप चाय पीते रहे। बगल में रेल की पटरी पर एक मालगाड़ी खड़ी थी।खमरिया फैक्ट्री से 84 एम एम बम लेकर जा रही थी। 70 साल पुरानी रेललाइन से दो डब्बे पटरी से उतर गए। रेल लाइन की मरम्मत के बाद आगे बढ़ेगी गाड़ी।

लौटते हुये देखा कि शाखा में एक और जुड़कर कुल पांच लोग हो गये थे। आपस में फ़ुटबाल खेल रहे है।

झील के पास जाकर देखा सूरज भाई अपनी किरणों को फ़ैलाये पूरे तालाब पर अपना कब्जा कर लिये थे। ऊपर और नीचे दोनों जगह चमक रहे थे। सुबह हो गयी थी।

गाना बज रहा है:
’तुम्हें जीवन की डोर से बांध लिया है
तेरे जुल्मों सितम सर आंखों पर।’

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Monday, March 21, 2016

मेरा प्यार भी तू है, ये बहार भी तू है

गेट नंबर 3 की तरफ जाते हुये रघुवर दयाल
सुबह जगे तो बाहर चिडियों के चहचहाने  की आवाज आ रही थी। पहले तो लगा भारत माता की जय बोल रहीं हैं । पर फिर लगा कि चिडियां शिकायत कर रहीं थीं कि कल कोई कविता तक नहीं लगाई ’गौरैया दिवस’ पर। हम बाहर आये तो देखा बड़ी चिडिया ’गुडमार्निंग’ कर रही थी । शायद मुस्करा भी रही हो। चोंच दूर होने के चलते देख नहीं पाये कि मुस्कराने से उसके गाल पर कोई गढ्ढा पड़ा कि नहीं।

कल गौरैया दिवस पर हमने चावल के कुछ दाने टैरेस पर फ़ैला दिया। सोचा कि दाना बिखेरते ही गौरैया चींचीं करते आयेगी और चावल चुगने लगेगी। लेकिन अभी तक किसी चोंच ने चावल चुगा नहीं है। चावल चिडियों के इंतजार में टेरेस पर पलक पांवड़े सा पसरा हुआ है।

चावल के ऊपर टेलिविजन केबल का तार सतह से कुछ ऊपर उठा लटका हुआ है। उस पर आती-जाती चींटियां किसी हाई वे पर तेज गति से आती-जाती कारों सरीखी दिख रहीं हैं। कभी कोई चींटी सामने से आती किसी दूसरी चींटी के सामने आ जाती तो दोनों पल भर के लिये ठिठक जातीं और फ़िर तेजी से आगे, अपने-अपने रास्ते मुस्कराते हुये चल देतीं।

टहलने निकले तो मिसिर जी पुलिया पर अपने साथी के साथ बैठे थे। उनसे बतियाते हुये देखा कि एक कार ड्राइवर ने कार का दरवाजा खोला। इसके बाद अपने मुंह का मसाला सड़क को सप्रेम भेंट करके स्वच्छता अभियान में अपना विनम्र योगदान देकर दरवाजा बन्द किया और तेजी से आगे चला गया। ड्राइवर के मुंह से निकले मसाले की पीक सड़क पर असहाय, लावारिश पड़ी रही।


माता के आने से आँख चली गयीं
मुंह से सड़क पर गिरने से ’मसाला-पीक’ की हड्डी-पसली बराबर हो गयी होगी। क्या पता वह मारे दर्द के कराह भी रही हो। लेकिन हमें सुनाई नहीं पड़ी जैसे दूर-दराज के इलाकों में होने वाली अनगिनत जघन्य हत्याओं, अपराधों की चीख हमको सुनाई नहीं पड़ती क्योंकि मीडिया का माइक और कैमरा वहां तक पहुंच नहीं पाता।
चाय की दुकान पर एक बुजुर्ग महिला मिली। उनका बेटा अनुकंपा के आधार पर नौकरी करता है। नौकरी मिलने के बाद बिगड़ गया। नशा-पत्ती करता है। अब बुजुर्ग महिला मात्र अपनी पेंशन के सहारे गुजर करती है। एक आदमी ने अपनी राय बताई- ’अनुकम्पा के आधार पर जिन लड़कों को नौकरी मिलती है उनमें से अधिकांश दारू-गांजा के चक्कर में पढकर बरबाद हो जाते हैं। अचानक 20-25 हजार रुपये मिलने लगते हैं तो पगला जाते हैं। औरतों को ही नौकरी करनी चाहिये आदमी के मरने पर। कम से कम परिवार तो चलता रहता है।’

बात हो रही थी कि मंदिर की तरफ़ से डगरते हुये 'दृष्टि-दिव्यांग' रघुवर दयाल डगरते हुये आये। हाथ-पैर के साथ बोलते हुये मुंह के जबड़े भी हिल रहे थे बुरी तरह। चाय वाले ने बताया कि ये माताराम (जो कल मिलीं थीं) के पति हैं। हमने पूछा कि आज माताराम किधर चली गयीं? बोले-’वे आज जीआईएफ़ चलीं गयीं। वहां मांगेगी।’
आंखें कैसी चली गयीं पूछने पर बोले-’ बड़ी माता निकली थीं। पांच साल की उमर में। आंखें नहीं रहीं।जिस बीमारी के कारण आँख चली गयी उसके लिए भी इतनी इज्जत से सम्बोधन -बड़ी माता ।’

साठ से ऊपर की उमर के आदमी की आंख चली जायें पांच साल की उमर से तो उसने उस उमर तक जो देखा होगा वही उसकी स्मृतियों में बसा होगा। पता नहीं क्या देखा होगा आखिरी समय? पेड़, पौधे, पत्ती, धूप, सड़क, तालाब, पानी, अंधेरा, उजाला, किसी का चेहरा या फ़िर कुछ और। जो भी देखा होगा आंख न रहने के पहले वही-वही फ़िर-फ़िर यादों में आता होगा।

हम जो लोग आंख वाले हैं, दुनिया देख सकते हैं, आमतौर पर यह महसूस नहीं कर पाते होंगे कि जिनके आंख नहीं हैं वे कितनी बड़ी नियामत से वंचित हैं। हमको उनके मुकाबले जो मिला है वह अनमोल है।

रघुवर दयाल नाम है बुजुर्ग का। मातारानी का नाम है बुढिया बाई। उस समय बुजुर्गों ने दोनों की शादी करा दी कि कम से कम दोनों के लिये संगसाथ तो हो जायेगा। कल बीस रुपये कमाये रघुवरदयाल ने। हमने सिक्का दिया तो टटोलकर बताया -एक रुपया है। इसके बाद लपकते हुये गेट नंबर 3 की तरफ़ चल दिये रघुवरदयाल।
दूर ट्रेन पटरी पर धडधड़ाती हुई चली जा रही थी। बगल में टेसू का पेड़ हिलते हुये रेल को टाटा कर रहा था। ट्रेन मुस्कराती हुई चली जा रही थी। सीटी बजाती हुई। हल्ला मचाती हुई। सोये हुये लोगों को जगाती हुई।

सूरज भाई किरणों की पिचकारी से उजाला चारो तरफ़ फ़ैलाते हुये लगता है होली की तैयारी में लगे हुये हैं। पत्तियों पर फ़िर-फ़िर धूप मल रहे हैं। पत्तियां हिल-डुलकर मुस्कराती हुई मना सा करती हुई धूप अपने चेहरे पर धारण करते हुये चहक रही है।

बगीचे में धूप में खिलते हुये एक कली शायद किसी भौंरे को सुनाते हुये गाना गा रही है:

’मेरा प्यार भी तू है, ये बहार भी तू है
तू ही नज़रों में जान-ए-तमन्ना, तू ही नज़ारों में
तू ही तो मेरा नील गगन है, प्यार से रोशन आँख उठाये
और घटा के रूप में तू है, काँधे पे मेरे सर को झुकाये
मुझ पे लटें बिखराये।’
लगता है सुबह हो गयी। नहीं क्या?
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Sunday, March 20, 2016

एक चाय और ले आएं साहब

'प्रभु -पहले बड़ी रौनक थी फैक्ट्री में'
प्रभु
आज चाय की दुकान पर मिल गए प्रभु। 69 साल के हैं। वीएफजे से रिटायर। बात शुरू होते ही किस्से सुनाने लगे।

'हमारे परदादा और उनके साथ के लोग 1904 में हमीरपुर से जबलपुर आये थे। पैदल । उस समय ट्रेन तो चलती नहीं थी। छह महीना लगा था। हमारा बाप यहीं मैदान में पैदा हुआ था। उसके हफ्ते भर बाद उसकी माँ मर गई। कोई महामारी फैली थी उन दिनों। यहीं मैदान में दफना दिया गया था उसको।

साथ ने बकरियां भी लाये थे परदादा। मटके में बकरी का दूध इकट्ठा करके यहीं जंगल में लकड़ियाँ जलाकर गरम करके बाप को रुई के फाहे से पिलाते बाप को। जी गया बाप। 93 साल की उमर तक पेंशन खाकर मरा।
घर के सब भाई नौकरी पर हैं। बहने भी। पत्नी कई साल पहले गुजर गयीं। कंचनपुर में रहते हैं अभी। चार बच्चे थे। दो मर गए। दो बचे हैं। प्राइवेट काम करते हैं।

'बीबी मरी तो फिर दुबारा शादी क्यों नहीं की। कर लेते अपनी जैसी स्थिति की औरत से। दोनों को साथी मिल जाता'- हमने कहा।

अरे मन था। लेकिन लौंडे छोटे थे। घर वालों ने सपोर्ट नहीं किया नहीं तो कर लेते। अब लौंडे बड़े हो गए हैं। साले, सुनते नहीं। सब अपने में मस्त हैं।

जब कोई जुगाड़ नहीं हुआ तो क्या करते? शहर में इधर-उधर चले जाते थे। काम चला लेते थे।

'तुम भी अपने बाप की नहीं सुनते होंगे जब बड़े हो गए हो गए होंगे।'- हमने कहा।

अरे नहीं। हम लोग बहुत इज्जत करते थे बाप की। आज के लौंडे सुनते नहीं। -'प्रभु उवाच।

'इसी मैदान में बाप पैदा हुआ था हमारा'
प्रभु
फैक्ट्री के किस्से सुनाये। एक पुराने अधिकारी का नाम लेकर बोले-'साहब किसी से दबते नहीं थे। जीएम से भी भिड़ जाते थे। पीकर आते थे। दफ्तर में भी चढ़ा लेते थे। लेकिन गरीब आदमी का नुकसान नहीं करते थे।  फोरमैन को टाइट किये रहते थे। आकर सुबह इंस्पेक्शन करते थे। फिर बोलते थे- 'प्रभु चाय बनाओ। ब्लैक टी लाओ। ये लाओ। वो लाओ। हम उनके बंगले गए थे जहाँ रिटायरमेंट के बाद रह रहे। बड़ा बंगला है।'

फैक्ट्री के और किस्से सुनाते हुए बोले-' पहले बहुत रौनक थी साहब यहाँ। 14-15 हजार आदमी काम करते थे। एकदम चांदनी चौक जैसा माहौल। शक्तिमान, जोंगा, निशान धकाधक बनते थे।'

इस बीच किसी से पता चला कि हम फैक्ट्री में साहब हैं तो बोले -'एक चाय और ले आएं साहब?'
हमने मना किया। बोले -'हम फैक्ट्री में साहब लोगों के लिए चाय बनाने का काम करते थे।'


फैक्ट्री से जुड़े पुराने लोगों के किस्से बिना कोतवाल सिंह की कहानी सुनाये पूरे नहीँ होते। कोतवाल साहब  का किस्सा सुनाया प्रभु ने- ' कोतवाल साहब  सिम्पल आदमी थे। इंग्लैण्ड रिटर्न थे लेकिन लगते नहीं थे जीएम। एक दिन कंजड़ बस्ती में चले गए। कच्ची पीते रहे। नशे में धुत। पुलिस वालों ने पकड़कर अंदर कर दिया। जब पता चला जीआईएफ के जीएम हैं तो जीप से उनके बंगले छुड़वाया। टेरर था उनका। चार-चार कट्टा बीड़ी दिन में फूंक जाते थे।'

फिर से अपने हमारे बारे में पूछा। आप यूपीएससी क्रास करके आये हैं। हमारे साहब एम एस सी गोल्ड मेडलिस्ट थे। ये रैले साइकिल अब भी आ रही है। अभी आपकी कितनी सर्विस बकाया है? हमने बताया -'आठ साल।' तो फिर बोले-'एक चाय और ले आयें साहब!'

अपने बारे में बताया। हम रोज पचास किलोमीटर साईकल चलाते हैं। हमुमान मन्दिर में अगरबत्ती खोंसते हैं। पाट बाबा में जलाते हैं। रास्ते में जितने भी मन्दिर मिलते हैं सबमें अगरबत्ती खोंस देते हैं। 3 घण्टा चलती है। साईकल में धरे झोले से अगरबत्ती निकाल कर दिखाई भी प्रभु ने। बड़ी सी।

चाय पीकर लौट आये। प्रभु भी चले गए। फैक्ट्री आज ओवर टाइम पर चल रही है। लोग आने लगे थे। भीख मांगने वाली बुढ़िया एक बच्ची के साथ लपकती हुई गेट नम्बर 3 की तरफ चली जा रही थी। बच्ची एक लकड़ी पकड़े हुए थी। उसका दूसरा सिरा बुढ़िया के हाथ में था। बच्ची शायद नातिन है बुढ़िया की। वह भी देख/सीख रही होगी कि भीख कैसे मांगती हैं दादी।

मिसिर जी जगदम्बिका प्रसाद के साथ जाते दिखे। हमने चाय के लिए ऑफर दिया तो बोले-'अभी दवाई खाना है जाकर। फिर कुछ और खाएंगे।'

सूरज भाई पूरे जलवे के साथ खिले हुए हैं आसमान में। सुबह हो गयी।

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Saturday, March 19, 2016

आदमी उसी को तो गरियाता है जिससे उसका कुछ रिश्ता

आजकल किसी को गरिया दो लोग बड़ी जल्दी बुरा मान जाते हैं। किसी रसूख वाले को गरियाना तो और आफ़त का काम है। पता नहीं कौन कब बुरा मान जाये और मुफ़्त का रहना, खाना, पीना होने लगे। यहां तक कि अपने अजीज को भी गरियाना मुश्किल हो गया है।

पिछले दिनों फ़िराक साहब और चोर का किस्सा काफ़ी लोगों ने पसंद किया। काफ़ी लोगों ने उसे साझा किया। इसी सिलसिले में फ़िराक साहब से जुड़ा एक किस्सा और यहां पेश है।

फ़िराक साहब मुंहफ़ट टाइप के इंसान थे। जो मन आता कह देते, जिसको मन आता गरिया देते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दुनियादार आदमी नहीं थे वे। मौके की नजाकत के हिसाब से समझदारी भी दिखाते थे।
फ़िराक साहब ने अपने मुंहफ़ट स्वभाव के चलते इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर अमरनाथ झा के बारे में भी कुछ कहा होगा। फ़िराक साहब और अमरनाथ झा जी सहपाठी रहे थे। फ़िराक साहब के विरोधियों ने अमरनाथ झा तक इसकी खबर नमक मिर्च लगाकर पहुंचाई होगी।

जब यह बात फ़िराक साहब को पता चली तो वे अमरनाथ झा से मिलने उनके बंगले गये। शाम को झा साहब के बंगले पर दरबार टाइप लगता। लोग उनसे मिलने आते थे। फ़िराक साहब भी पहुंचे। अपनी बारी का इंतजार करने लगे।

जब फ़िराक साहब का नम्बर आया तो अन्दर जाने के पहले उन्होंने बाल बिखेर लिये और कपड़े अस्त-व्यस्त कर लिये।

अन्दर पहुंचे तो फ़िराक साहब का हु्लिया देखकर झा साहब ने टोंका-’ फ़िराक, जरा सलीके से रहा करो।’

इस पर फ़िराक साहब बोले-’ अमरू तुम्हारे मां-बाप ने तुमको तमीज से रहना सिखाया। मेरे मां-बाप जाहिल , गंवार थे। उन्होंने मुझे कभी यह सब सिखाया ही नहीं तो तमीज कहां से आती मेरे पास सलीके से रहने की।’
इस पर झा साहब ने फ़िराक साहब को टोंका-’ फ़िराक अपने मां-बाप को इस तरह गाली देना ठीक नहीं। इस बात का ख्याल रखना चाहिये तुमको।’

यह सुनते ही फ़िराक साहब बोले-’ अमरू आदमी उसी को तो गरियाता है जिससे उसका कुछ रिश्ता होता है, अपनापा होता है। मैं अपने बाप को नहीं गरियाऊंगा, मां को नहीं कोसूंगा, दोस्तों को नहीं गरियाऊंगा तुमको नहीं गरियाऊंगा तो किसको गरियाऊंगा तो किसको गरियाऊंगा।’

अमरनाथ झा बोले-’ओके, ओके फ़िराक। मैं तुम्हारी बात समझ गया (आई गाट योर प्वाइंट)।

फ़िराक साहब वापस चले आये।

(यह किस्सा ममता कालिया जी ने तद्भव पत्रिका में अपने संस्मरण ’कितने शहरों में कितनी बार’ में बताया था। किताब कानपुर में घर में है। मैंने इसे याद से लिखा इसलिये शब्द इधर हो गये होंगे लेकिन भाव वही है।)
नोट: इस पोस्ट की तरकीब को वे लोग अपने बचाव के लिये इस्तेमाल कर सकते हैं जिनकी किसी पोस्ट प आहत होकर कोई उन पर केस कर दे। वे कहते सकते हैं -’ हम आपको अपना मानते हैं भाई। अब जब किसी अपने को नहीं गरियायेंगे तो किसको गरियायेंगे।

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सैंया दिल में आना जी

अहा , क्या नजारे हैं सुबह के। सूरज भाई दसो दिशाओं में धूप फ़ैला रहे हैं। मार्च के महीने में जैसे सरकारें धड़ाधड़ ग्रांट बांटती हैं सरकारी महकमों में इस हिदायत के साथ कि इसी महीने खर्च नहीं किया तो समझ लेना। लगता है सूरज भाई भी मार्च वाले मूड में आ गये हैं।

एक-एक पत्ती को खुद देख रहे हैं कि उसके पास धूप पहुंची कि नहीं! फ़ूल अभी खिला नहीं कि धर दिये करोड़ो फ़ोटान धूप के उसके ऊपर। फ़ूल बेचारा धूप के बोझ से दोहरा हुआ मुस्कराने की कोशिश में दुबला हुआ जा रहा है। मुस्कराना मजबुरी है भाई। तितली भी बैठी है न धूप के साथ। दोनों के संयुक्त बोझ को हिल-डुलकर किसी तरह निबाहने की कोशिश कर रहा है दुष्यन्त कुमार का शेर दोहराते हुये:
’ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सज़दे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।’
लेकिन देखने वाले तो वाले समझ रहे हैं कि मस्ती में झूम रहा है। अधिक से अधिक यह गाना गा लेते होंगे फ़ूल के समर्थन में:
’खिलते हैं गुल यहां हैं
खिलकर बिखरने को खिलते हैं गुल यहां’
लेकिन एफ़-एम पर गाना ये वाला बज रहा है:
’चोरी चोरी कोई आये
चुपके-चुपके , सबसे छिपके
ख्वाब कई दे जाये।’
खैर ख्वाब क्या देता कोई जब जग गये और निकल लिये साइकल पर। पुलिया पर बिन्देश्वरी प्रसाद मिश्रा जी के इंतजार में बैठे थे। मिश्रजी मंदिर तक गये थे। एक बुढिया पुलिया के आगे डगर-डगर करती चलती जा रही थी।शायद मंदिर की मंगताई पूरी हो गयी हो उसकी।
चाय की दुकान पर गाना बज रहा था:
’सैंया दिल में आना जी,
आकर फ़िर न जाना जी।’

हमको लगा ये कौन बुला रहा है भाई और किसको बुला रहा है। लेकिन बहुत देर तक कोई कहीं आता जाता नहीं दिखा तो समझ गये ये सब ऐसे ही है।कम से कम मेरे लिए तो नहीं गा रहा है कोई यह गाना।

लेकिन मन किया कि कभी फ़ुरसत में गूगल मैप में देखेंगे कि जबलपुर से दिल की दूरी कितनी है। अगर साइकिल से जाने की सोचे कोई तो कितना समय लगेगा पहुंचने में।

एक महिला साइकिल से आती दिखी। साइकिल सड़क पर खडी करके वह पास की पान की दुकान पर खड़ी होकर कुछ खरीदने लगी। हम उसकी ’एवन’ साइकिल के पास खड़े देखते रहे। आगे बास्केट और पीछे करियर पर प्लास्टिक क्रेट बंधा रखा था।

पता चला कि वह सब्जी बेचने का काम करती है। दमोह नाका जा रही है सब्जी खरीदने। कल अस्सी रुपये पसेरी (पांच किलो) के हिसाब से एक पसेरी सब्जी खरीदी थी और लगभग खरीद के बराबर मुनाफ़ा मिलाकर बेंच दी। उसका आदमी विक्टोरिया में काम करता है।

इस बीच पुलिया पर मिली महिला डगरती हुयी चाय की दुकान पर पहुंच गयी थी। चाय वाले ने उसको चाय दी। वह सड़क किनारे ही बैठकर पीने लगी।

बचपन में जब एक-दो साल की थी तब माता (चेचक) के कारण आंख चली गयी थी। गेट नंबर 6 पर मांगती है। मंदिर भी गयी थी लेकिन वहां भीड़ बहुत है और हल्ला-गुल्ला भी। कोई अगर दस रुपया दे जाये तो सबके साथ बांटना पड़ता है। लड़ाई झगड़ा भी करती हैं। गेट नंबर 6 पर भले ही कुछ कम मिले लेकिन सुकून है मांगने में।
आदमी क्या करता है पूछने पर बताया - ’वे भी गेट के ही भरोसे हैं। मतलब वे भी गेट पर ही मांगने का काम करते हैं।’

बाद में पता चला कि उसके आदमी की भी दोनों आंखें नहीं हैं। ’दृष्टि दिव्यांग’ है वो भी। कुछ दिन पहले तक इसके लिये शब्द था - ’दृष्टि बाधित’। उसके भी पहले अंधा कहने का चलन था। शब्द बदल गये पुकारने के लेकिन इस सच्चाई में कोई फ़र्क नहीं पड़ा कि जीने के लिये उनका जीवन मांगने पर ही निर्भर है। जो मिलता है मांगने से उसी से राशन, तेल, लकड़ी खरीदकर जिन्दगी चलती है।

एक लड़का और एक लड़की है। दोनों की शादी हो गयी है। लड़का ट्रैक्टर चलाता है। कमाता है लेकिन बुढई-बुढवे के लिये भीख का ही आसरा है।

लौटते में मिश्रा जी और बिन्देश्वरी प्रसाद लौटते हुये मिले।मिसिर जी बोले -’ गेट का ताला लगाकर आये थे। बच्चे अभी सो रहे होंगे। सब आराम से उठते हैं।’

लेकिन हम तो कब के उठ गये भाई। 'लाओ चाय पिलाओ कहते हुये' सूरज भाई कमरे में घुस आये। हम दोनों बतियाते हुये साथ में चाय पी रहे हैं। साथ में गाना सुनते हुए:

ये रेशमी जुल्फें, ये शरबती आँखें
इन्हें देखकर जी रहे हैं सभी।

आइये आपको भी चाय पीनी हो तो।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207575243752653 

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Friday, March 18, 2016

देखिये जरा आप भी


कल जीसीएफ और वीएफजे के साथियों के साथ साइकिल से खमरिया तक गए। Sagwal Pradeep अपने कैमरे से हमें सड़क पर साइकल चलाते पकड़ा। बेटे Anany की बात मानते हुए फेसबुक पर पोस्ट किया जा रहा है। देखिये जरा आप भी।





https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10207570649477799&set=a.3154374571759.141820.1037033614&type=3&theater

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आयुध निर्माणी दिवस

आज आयुध निर्माणी दिवस है। आज के ही दिन सन 1802 में पहली आयुध निर्माणी , गन एन्ड शेल फैक्ट्री काशीपुर की स्थापना हुई थी। मतलब 214 वां जन्मदिन है आज हमारी निर्माणियों का।

आज सुबह की शुरुआत प्रभात फेरी से हुई। फैक्ट्री के गेट नंबर 1 से शुरू करके पूरी फैक्ट्री इस्टेट घूमते हुए गेट नंबर 6 तक पहुँचे। आप भी देखिये कुछ झलकियाँ।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207565849717808?pnref=story

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