Thursday, March 30, 2017

हमें समाज ने जो दिया है; कम से कम तो उतना तो वापस देना ही चाहिए- आरिफ़ा एविस

[आरिफा एविस हिन्दी व्यंग्य की सबसे युवा हस्ताक्षरों में से एक हैं। मूलत: हरदोई की रहने वाली आरिफ़ा की पढाई-लिखाई मित्रों की मदद से दिल्ली से हुई। बी.ए. के दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी पत्रकारिता की पढाई की। रोजी-रोटी के जद्दोजहद के साथ लिखना चलता रहता है। पिछले वर्ष व्यंग्य लिखना शुरु किया और उसी साल व्यंग्य संग्रह आया- ’शिकारी का अधिकार’। व्यंग्य उपन्यास ’पंचतंत्रम’ आने वाला है। उर्दू से हिन्दी अनुवाद 'मजाकिए खाने' भी प्रकाशित हुआ है। छिटपुट लेखन - 'दैनिक जनवाणी', 'देशबन्धु' , 'राजएक्सप्रेस', ', लोकजंग' व 'ऑन्लाइन पत्रिकाओं व न्यूज पोर्टल पर करती रहती हैं।
आरिफ़ा का मतलब जंग का मैदान होता है। जिन्दगी की जंग लड़ते हुये अपनी समझ को संवारती हुई आरिफ़ा से व्यंग्य लेखन और अन्य मुद्दों पर हुई बातचीत यहां पेश है।]

सवाल1: व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में कैसे आई?
जबाब: व्यंग्य लेखन से पहले लेखन की शुरूआत बताना ज्यादा जरूरी है। महिला विमर्श की एक पत्रिका निकलती है 'मुक्ति के स्वर' जो मुझे मेरे अध्यापक के जरिये मिली थी। उस पत्रिका को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया लिखकर भेजी, जो अगले अंक में छपी। यही मेरा पहला लेखन था। मैं उस समय नौवीं कक्षा में थी। इसी दौरान मैं शहीद भगत सिंह पुस्तकालय और नारी चेतना के संपर्क में आई। जहाँ मुझे समाज को देखने का नया नजरिया मिला। उन दिनों मैं सिर्फ कविताएँ लिखती थी , वो भी उर्दू में लिखकर फेविकोल से चिपका देती ताकि कोई पढ़ न सके। कारण यही था कि मुझे बड़ी मुश्किल से लड़- झगड़ कर पढ़ने का मौका मिला था। इंटर की पढ़ाई के बाद तो घर ही बैठ जाती लेकिन डीयू (दिल्ली विश्वविद्यालय) की पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा में पास होने पर दोस्तों ने फीस देकर मेरी पढ़ाई पूरी करवाई. एम.ए. की पढ़ाई नौकरी करते हुए करती रही।
ग्रेजुएशन के बाद एक वेब मैगजीन में खबरें बनाकर लिखना ही काम था। इसके बाद एक दो लेख पाठक की कलम से ही आये। कुछ दिन तक पुस्तकों के बारे में लिखना और पढ़ना चलता रहा। इन्हीं दिनों समीक्षा, लेख और कविता जनवाणी, देशबन्धु वगैरह में छपी। यहीं से नियमित लिखना शुरू कर दिया और फिर विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं में लेख भी मांगे जाने लगे।
विश्व पुस्तक मेले में अनूप श्रीवास्तव जी से मुलाकात होती है, तब उन्होंने बुक फेयर की रिपोर्टिंग व्यंग्यात्मक शैली में लिखकर मेल करने के लिए कहा था। रिपोर्ट लिखकर भेजी तो उन्होंने कहा कि अनूप शुक्ल की तरह लिखो। फिर क्या था अनूप शुक्ल को फेसबुक पर खोजा ,उनको पढ़ा लेकिन उन की तरह लिख नहीं पाई। व्यंग्यकारों को पढ़ते-पढ़ते हम भी व्यंग्य लिखने लगे। यहीं से हमारी व्यंग्य लेखन की शुरूआत हुई।
आज मैं जो कुछ भी हूँ उसमें पुस्तकालय और साथियों की वजह से हूँ और उस दृष्टिकोण की वजह से हूँ जो मुझे वहां से मिला।
सवाल 2 : पहला व्यंग्य लेख कब लिखा?
जबाब : पहला व्यंग्य लेख जनवरी 2016 में लिखा था। (कौन सा? खोजना है )
सवाल 3 : व्यंग्य आपकी समझ में क्या है? आपके नजरिये से आदर्श व्यंग्य कुछ उदाहरण अगर फ़ौरन ध्यान में आते हों तो बताइये।
जबाब : व्यंग्य विसंगतियों पर आलोचनात्मक प्रहार है जो बेहतर समाज बनाने में मदद करता है। कुछ उदाहरण जो फ़ौरन याद आ रहे हैं- 'एक मध्यवर्गीय कुत्ता', ’भोला राम का जीव’,’सुअर’, ’सदाचार का ताबीज’।
सवाल 4 : अपने लेखन के विषय कैसे तय करती हैं?
जबाब : जो विषय बहुसंख्यक आबादी को प्रभावित करते हैं और जो मुझे अन्दर तक झकझोर कर रख देते हैं। ऐसे ही विषयों को चुनती हूँ।
सवाल 5 : आपके व्यंग्य में सरोकार की धमक रहती है। हास्य से परहेज जैसा है क्या?
जबाब : रोजाना किसान, नौजवान , महिलाएं आत्महत्या करते हैं। इन्सान को इन्सान नहीं समझा जाता है। तो बताइए हास्य कैसे लिखूं। मैं भी लतीफ घोंघी की तरह लिखता चाहती हूँ। लेकिन लिखते-लिखते लेख अपने आप गंभीर हो जाते हैं। रही बात सामाजिक सरोकार की तो हर लेखक के व्यंग्य के अन्दर सामाजिक सरोकार होता है. फर्क बस इतना है कि वह सरोकार किसी व्यक्ति विशेष के लिए होता है या छोटे समूह के लिए या फिर जनसमूह के लिए. लेखक होता ही है सामाजिक तो फिर वह गैर-सरोकारी कैसे हो सकता है। हास्य व्यंग्य से मुझे कोई परहेज नहीं है।
सवाल 6 : किसी खास व्यंग्यकार के लेखन से प्रभावित हैं जिसके जैसा लिखना चाहती हैं?
जबाब : परसाई के लेखन से मैं बहुत प्रभावित होती हूँ। कोई भी व्यंग्य लेखक व्यंग्य परम्परा में अभी तक किसी को दोहरा नहीं पाया है। आप लाख कोशिश करो लेकिन आप जिनसे प्रभावित होते हैं उन जैसा नहीं लिख पाते हैं। समय, काल और बदली हुई परिस्थितियां एक दूसरे से अलग करती है समानता तो सिर्फ वैचारिक स्तर पर होती है। कोई भी लेखक अपने समय का प्रतिनिधि होता है। वह अपनी भाषा, शिल्प और विधा चुनता है। मैं व्यंग्य की विकसित परम्परा में विश्वास करती हूँ। परम्परा में अच्छा और बुरा दोनों होता है। मुझे अपनी परम्परा से जो भी अच्छा मिला है उसे ग्रहण करूंगी और सिर्फ आरिफा की तरह लिखना चाहती हूँ।
सवाल 7 : आपके व्यंग्य लिखने की प्रक्रिया क्या है? मतलब कब लिखती हैं? कितना समय लगाती हैं एक ’शिकारी का अधिकार’ जैसा व्यंग्य लिखने में?
जबाब : रोजी-रोटी के चक्कर में समय कम मिलता है। इसलिए घर पर ही काम करते हुए विषय के बारे में सोचती हूँ। फिर विषय की तथ्यात्मक जांच पड़ताल करती हूँ। उसके बाद दिमाग में एक ब्लू प्रिंट तैयार करके लिखती हूँ। दूसरी बार फिनिशिंग करती हूँ। तीसरी बार खुद पढ़कर ठीक करती हूँ। चौथी बार किसी मित्र को पढ़ाती हूँ। उनका सुझाव लेती हूँ। फिर कुछ बदलाव के साथ व्यंग्य लिख कर छोड़ देती हूँ। एक व्यंग्य में एक दिन और कभी कभी एक सप्ताह से ज्यादा समय लग जाता है।
सवाल8 : व्यंग्य के क्षेत्र में महिलायें काफ़ी कम रहीं शुरु से ही। इसका क्या कारण है आपकी समझ में?
जबाब : व्यंग्य में ही में नहीं साहित्य,समाज और यहाँ तक कि राजनीति में भी महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है। जो आज भी जारी है।
पहला कारण है - भारत की विशिष्ट सामाजिक संरचना।
दूसरा - भारत में अभी तक किसी भी बड़े सामाजिक, राजनीतिक आन्दोलन का खड़ा न होना।
इसके बावजूद व्यंग्य में महिलाओं का अकाल नहीं रहा। शुरूआत से ही महिला व्यंग्यकारों का योगदान रहा है। जिनमें -शान्ति मेहरोत्रा, सरला भटनागर, गीता विज, बानो सरताज, अलका पाठक,शिवानी, सूर्यबाला की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आज तो और भी बेहतर स्थिति है महिला व्यंग्यकारों में रोज नई नई महिलायें व्यंग्य क्षेत्र में आ रही है। वो बात अलग है कि बहुत सी महिलाओं को व्यंग्यकार ही नहीं माना जाता। वैसे कुछ पुरुष व्यंग्यकारों को भी बहुत से लोग व्यंग्यकार नहीं मानते है।
सवाल 9 : आपके व्यंग्य लेखन में आम जनता की समस्याओं पर नजर रहती है। महिलाओं की समस्याओं पर आधारित व्यंग्य नहीं दिखते आपके यहां। क्या मेरा यह सोचना ठीक है ? यदि हां तो इसका क्या कारण है?
जबाब : महिलाओं की समस्या समाज की समस्या से अलग नहीं है। समाज की समस्या हल होगी तो बहुत हद तक महिलाओं का समस्या भी हल हो जायेगी। आज महिलाओं का मुद्दा अस्मिता और अस्तित्व से जुड़ा है। ऐसी धारणा बन गयी है कि महिला मुद्दों पर सिर्फ महिलाएं ही और दलित समस्या पर दलित ही लिख सकता है। बाकी राजनीति और अर्थतन्त्र पर पुरुष ही लिखें ऐसा ही क्यों?
मेरा मानना है कि अस्तित्व और अस्मिता दोनों पर व्यंग्यकार की दृष्टि होनी चाहिए। महिला अस्तित्व और अस्मिता का संकट भारत की आर्थिक , सामाजिक, राजनैतिक गतिविधि से तय होती है। यदि समस्या की मूल जड़ पर कुछ सार्थक प्रहार किया जायेगा तो उसमें तक स्त्री हो या पुरुष सभी आयेंगे। वैसे मैंने महिलाओं पर भी लिखा है।
सवाल 10 : आज के समय में हास्य व्यंग्य लेखन की स्थिति को आप स्तर और वातावरण के लिहाज से कैसी समझती हैं?
जबाब : हर दौर में हास्य व्यंग्य का आधार अलग अलग रूप में दिखाई देता है। हास्य- व्यंग्य का सौन्दर्य विकसित भी हुआ है और विकृत भी हुआ है। जहाँ एक तरफ सामाजिक विसंगतियों पर हास्य व्यंग्य रचा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कुछ जगह फूहड़ता, वल्गर , लम्पट और महिला विरोधी भी होता है। समाज हमेशा आगे की तरफ बढ़ता है तो जाहिर है हास्य-व्यंग्य भी आगे ही बढ़ा है। रही बात स्तर की तो हर दौर में अच्छा बुरा रहा है।
सवाल 11 : अक्सर हास्य-व्यंग्य के लोगों की आपस में सोशल मीडिया पर आपस में बहस हो जाती है। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
जबाब: पहले मैं सिर्फ यही जानती थी कि फलां लेखक बड़े हैं। उनकी फलां पुस्तक आई है। या फलां अखबार में छपते हैं। सोशल मीडिया ने सबको एक जगह पर ला दिया है। अगर कोई सक्रिय नहीं है तो भी पता चल जाता है। रही बात सोशल मीडिया पर बहस की तो यहाँ भी वही बात होती है जो अक्सर मंचो पर कही जाती है। मंच पर कोई जवाब नहीं दे पाता। सोशल मीडिया पर यह स्वतंत्रता होती है कि अगर मुद्दा आया है तो हर इन्सान हास्य-व्यंग्य पर अपनी बात रखता है।
बहस किसी भी तरह की क्यों न हो अच्छी हो या बुरी, व्यक्तिगत हो या प्रवृतियों पर व्यंग्यकारों को समझने में हमारी मदद करती है। क्योंकि लेखन में शिल्प द्वारा ईमानदारी, चालाकी,छिप जाती है। लेकिन बहसों में व्यक्तित्व उजागर होता है। कोई भी बहस नवीनता की जननी है। बहस करने वाले ज्यादा खतरनाक नहीं होता, चुप्पी साधने वाले ज्यादा खतरनाक है। हर बहस के बाद इन्सान की मानसिक दशा के बारे में जानने समझने का मौका मिलता है।
सवाल 12 : अपनी किताब ’शिकारी का अधिकार’ छपवाने की विचार कैसे आया? इसको छपने के बाद कैसा महसूस हुआ/ होता है ?
जबाब: जब लेख प्रकाशित होने लगे तो कई लोगों ने पूछा कोई पुस्तक हो तो दो पढ़ना चाहते हैं। यानि जिसकी कोई किताब छपी न हो वह लेखक नहीं माना जाता। मैंने भी सोचा क्यों न एक छोटी सी किताब छपवा ली जाए। कई जगह पांडुलिपि भेजी एक प्रकाशक ने स्वीकृति दी तो छपवा दी। एक रुपया भी खर्च नहीं करना पड़ा। किताब आई तो लखनऊ अट्टहास कार्यक्रम में विमोचन भी हो गया। किताब ने पहचान दी है। किताब न होती तो आज जो व्यंग्य की दुनिया देखने को मिली है शायद बहुत देरी से देखने को मिलती।
रही बात महसूस करने की तो अच्छा ही लगता है। अब और भी अच्छा लगता है क्योंकि तीन किताबों पर और काम चल रहा है। लिखने, पढने और समझने की प्रेरणा है मेरी पहली किताब। पहली पुस्तक ने मेरी ताकत और कमियों को भी चिन्हित करने में मदद मिली है।
सवाल13 : सुना है जल्दी ही आपका एक उपन्यास भी प्रकाशित होने वाला है। इसकी विषय वस्तु के बारे में बतायें।
जबाब:यह उपन्यास दिल्ली से लखनऊ की यात्रा का संस्मरणात्मक व्यंग्य उपन्यास है बस इतना ही.
सवाल 14 : अपना सबसे पसंदीदा कोई लेख बतायें। इसको पसंद करने का क्या कारण है?
जबाब: 'शिकारी का अधिकार' मेरा पसंदीदा लेख है। इसका कारण यही है कि जंगल के बहाने पूरे सिस्टम को समझना हुआ। जंगल में सिर्फ शेर ही नहीं रहता बाकी जीवन भी होता है। उनका भी अपना एक पक्ष है।
सवाल 15 : अभी तक की पढी पुस्तकों में सबसे पसंदीदा पुस्तक और उसका कारण?
जबाब: सबसे पसंदीदा पुस्तकों में किसी एक पुस्तक का नाम बताना मुश्किल है। फिर भी चंगेज आइत्मतोव द्वारा लिखा गया रूसी उपन्यास 'पहला अध्यापक'। इस लघु उपन्यास का मुख्य पात्र सोलह साल का लड़का 'दुइशेन ' होता है। उसे वर्णमाला के कुछ ही अक्षर का ज्ञान होता है। वह जितना जानता है उतना ही स्कूल खोलकर बच्चों को सिखाता है। जब बच्चे उतना अक्षर ज्ञान सीख जाते हैं तो उन्हें दूसरे स्कूल में पढ़ने भेज देता है।
कुल मिलकर यही कि वह समाज से जितना सीखता है उतना समाज को वापस लौटा देता है। इसका मतलब यही है कि हमारे पास जो भी ज्ञान है वह सामाजिक है व्यक्तिगत कुछ भी नहीं। इस किताब से यही प्रेरणा मिलती है कि हमें समाज ने जो दिया है; कम से कम तो उतना तो वापस देना ही चाहिए।
सवाल 16 : लेखन करते हुये आपको अपने अन्दर अभी क्या कमी लगती है जिसमें अभी आपको सुधार करने गुंजाइश लगती है?
जबाब: मुझे लगता है वैचारिक पक्ष मुझे विरासत से मिला है जो दोस्तों की मंडली से प्राप्त हुआ है। रही बात कमी की तो शिल्प पर काम करना बाकी है। शिल्पगत महारथ भी करत-करत अभ्यास से हासिल होगी, ऐसा मेरे वरिष्ठ व्यंग्यकारों ने कहा है।
सवाल 17: हाल के लेखकों में सबसे पसंदीदी लेखकों के नाम और वे अपने लेखन के किस पहलू के चलते पसंद हैं आपको?
जबाब: मैं अपने समकालीन सभी लेखकों को पसंद करती हूँ। कोई भी किसी को ख़ारिज नहीं कर सकता मेरा ऐसा मानना है। सीखने के लिए सभी में कुछ न कुछ मिल जाता है। प्रतिबद्धता, शिल्प, भाषा ,शब्दों की बनावट, आक्रामकता, वैचारिकता, संरचनात्मकता, सरोकार, यहाँ तक कि पठनीयता भी सीखने को मिलती है। सभी को पढ़ती हूँ। बिना नाम लिए उन लेखकों की तरफ इशारा कर दिया है जिनको मैं पसंद करती हूँ।
सवाल 18 : आज के समय में जब हर तरफ़ बाजार हावी हो रहा है ऐसे समय में व्यंग्य लिखने में क्या चुनौती महसूस करती हैं?
जबाब:बाजार की समझ ही व्यंग्य लेखन की असली चुनौती है। आज का बाजार एक देश तक सीमित नहीं रहा है। यह वैश्विक आधार प्राप्त कर चुका है। वैश्विक पूंजी का चरित्र बदल चुका है। वित्तीय पूंजी की समझ के बिना कोई व्यंग्य लेख संभव नहीं हो सकता। इसकी धमक हर इन्सान की मानसिकता हो प्रभावित कर रही है। मुनाफाखोर बाजार हर इन्सान को लालच,मुनाफे पे आधारित संबंधों के निर्माण में सचेत रूप से लगा हुआ है। व्यंग्य लेखन में भी इसी समझ का सचेत प्रयास करना पड़ेगा।
सवाल 19 : आपकी हॉवी क्या है? उसको पूरा करने का समय कैसे निकालती हैं?
जबाब:मेरी हॉवी पढ़ना और घूमना है। मानसिक जरूरत को पूरा करने के लिए जैसा साहित्य पढ़ना चाहती हूँ पढ़ती हूँ। घूमने के लिए हर साल एक कोष बचाती हूँ जिससे पहाड़ी इलाके में घूमा जा सके।
सवाल 20 : जीवन में आगे क्या करना चाहती हैं और उसको करने की योजनायें क्या हैं?
जबाब: उर्दू और अंग्रेजी व्यंग्य का अनुवाद करना चाहती हूँ। धीरे-धीरे खोज रही हूँ। कर भी रही हूँ। उनको पूरा करने की योजना है। जब भी टाइम मिले पढ़ती हूँ और करती हूँ।
सवाल 21 : जब लिखना शुरु किया और अब कुछ साल/महीने हुये लिखते हुये। इस दौरान आपने लेखन के क्षेत्र में क्या बदलाव देखे?
जबाब: एक ही बदलाव आया है। व्यंग्य लेखन ज्यादा हो गया है। व्यंग्य ने ही मुझे पहचान दी है। व्यंग्य के प्रति ज्यादा जिम्मेदारी महसूस होने लगी है जिसको पूरा नहीं कर पाती हूँ।
सवाल 22 : लिखना शुरु करने के पहले और अब लेखन बनने के समय में आपकी सोच और समझ में क्या बदलाव आये?
जबाब: पहले लिखने का मतलब अपनी भावना को जाहिर करना लगता था। अब लगता कि लेखन भी सामाजिक बदलाव में अपनी भूमिका निभा सकता है।
सवाल 23: आज सोशल मीडिया के चलते व्यंग्य लेखन का विस्फ़ोट सा हो रखा है। आम आदमी लिखने और छपने लगा है। कुछ पुराने , सिद्ध लेखक इसको व्यंग्य लेखन के लिये ठीक नहीं मानते। उनका कहना है कि लिखास और छपास की कामना के चलते व्यंग्य लेखन का स्तर गिरा है। आपका क्या मानना है इस बारे में।
जबाब: दुनिया को परिवर्तित करने में अगर किसी टूल का सबसे ज्यादा योगदान रहा है तो वह है तकनीक जैसे-जैसे तकनीक का विकास हुआ है समाज की संरचना भी बदली है। आदिम युग से दास प्रथा, दास प्रथा से सामन्ती युग, सामन्ती युग से पूंजीवाद, पूंजीवाद से समाजवाद में परिवर्तन नई तकनीक के कारण ही संभव हो पाया है।
सोशल मीडिया से सभी को एक साथ आने का मौका मिलता है। कुछ लोग लगातार अखबार में छपते हैं लेकिन उनका नाम लेने वाला नहीं है क्योंकि वो सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं हैं. जो सक्रिय है अगर वो छपते है और अपनी वाल पर लगाते हैं तो इसमें बुराई क्या है. सबके अपने पाठक हैं। जो नहीं छपता वो भी अच्छा लिखता है। सोशल मीडिया एक प्लेटफार्म है। इसका उपयोग कैसे करना है यह आप पर निर्भर है।
सवाल 23. आज अखबारों में छपने वाला व्यंग्य 400 शब्दों तक सिमट गया है। व्यंग्य की स्थिति के लिये आप इसे कैसे देखती हैं? आप इस फ़ार्मेट में नहीं लिखती?
जबाब: हर अख़बार का अपना एक कॉलम है अपना अलग फोर्मेट है। यहाँ तक कि 2000 शब्दों में भी व्यंग्य छपता है। इसको सीमित शब्दों का नाम देना शायद ठीक नहीं। यह फोर्मेट का सवाल है। कविता, कहानी,व्यंग्य शब्दों की सीमा से नहीं बंधे होते। विचार की अवधारणाओं से बंधे होते हैं। मैं किसी भी फोर्मेट में नहीं लिखती। जितना लिखा जाता है उतना लिखती हूँ.
सवाल 25: वनलाइनर को किस तरह देखती हैं? लिखती क्यों नहीं वनलाइनर? रुचि न होना या जीवन की आपाधापी की व्यस्तता?
जबाब: व्यंग्य में वनलाइनर नया शब्द नहीं है। अपने विचारों को कम शब्दों में लिखना पहले भी था और आज भी जारी है। व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति किसी भी रूप में हो अच्छी ही होती है। चाहे वो वनलाइनर के रूप में ही क्यों न संभव हो। लिखने के बारे में सोचा नहीं। अगर लिखने का मन होगा तो जरुर लिखूंगी।
सवाल 26: सवाल-व्यंग्य लेखन में आम तौर पर व्यंग्य की स्थिति पर चिंता व्यक्त करने वाले लोग नये-नये बयान जारी करते रहते हैं। सपाटबयानी सम्प्रदाय, गालीगलौज सम्प्रदाय, कूड़ा लेखन आदि। इस स्थिति को आप किस तरह देखती हैं।
जवाब : सृजनशीलता सामाजिक सम्पत्ति है। हर इन्सान समाज से ही सीखता है। अपने व्यवहार, आसपडोस के माहौल से सीखता है। कोई भी लेखक पैदाइशी लेखक नहीं होता। न ही व्यंग्य लेखन DNA में होता है। यह कोई अनोखी घटना नहीं है। यह सब चलता रहता है। कुछ खराब ब्यान आते है तो कुछ अच्छी चिंताएं भी तो व्यंग्य में दिखाई देती है। शोधपरक लेख भी तो दिखाई देते है। आज की दुनिया एकतरफा नहीं यदि अँधेरा है तो उजाला भी है।
सवाल 27: समाज में महिलाओं की स्थिति और व्यंग्य लेखन में महिला लेखिकाओं की स्थिति पर आपका क्या सोचना है?
जबाब: समाज में महिलाएं दलितों से भी दलित हैं। उनकी दोयम दर्जे की स्थिति बदस्तूर जारी है। महिलाओं के सामने अस्तित्व और अस्मिता दोनों का सवाल है। इसके बावजूद महिलाएं आगे आ रही हैं। पढ़ लिख रही हैं , नौकरी पेशा कर रही हैं। हर क्षेत्र में अपनी भागीदारी निभा रही हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों के बावजूद महिलाएं अगर लेखन में आयीं हैं तो उन्हें देखकर अच्छा लगता है। आधुनिक व्यंग्य काल महिलाओं के लिए स्वर्णकाल है। जितनी महिलाये आज व्यंग्य लेखन में सक्रिय है , शायद पहले इतनी नहीं थी। व्यंग्य लेखन मंत डॉ. नीरज शर्मा , शशि पाण्डेय , वीणा सिंह, नेहा अग्रवाल , शैफाली पाण्डेय, डॉ. स्नेहलता पाठक, इंद्रजीत कौर,अर्चना चतुर्वेदी, सुनीता सानु, पल्लवी त्रिवेदी, शशि पुरवार ,रंजना रावत, यामिनी चतुर्वेदी,ऋचा श्रीवास्तव, सुनीता सनाढय पांडे, सोमी पांडे, सुधा शुक्ला, डा विनीता शर्मा,सपना परिहार, छमा शर्मा और दर्शन गुप्ता आदि दमदार तरीके से अपनी भूमिका निभा रही है। महिलायें और भी है जिनके व्यंग्य यदा कदा अख़बारों में पढ़ने को मिलते रहते है।
सवाल 28: अपने देश , समाज की सबसे बड़ी खूबी क्या है आपकी नजर में?
जबाब: अपना देश ही नहीं पूरी दुनिया बड़ी ही खूबसूरत है। समाज में विभिन्नता है। ढेरों बोली,कई भाषाएँ हैं। अलग अलग रहन सहन है। कई तरह के मौसम है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जिन्दा रहने की जद्दोजहद हमारे देश की सबसे बड़ी ख़ूबी है।
सवाल 29: और खामी?
जबाब: जहाँ एक तरफ शाइनिंग इण्डिया है वहीं दूसरी तरफ गरीब भारत है। इस समाज में क्षेत्रवाद,जातिवाद,धर्म ,औरत मर्द में गैर बराबरी,गरीबी ,भुखमरी,मुनाफे पर आधारित व्यवस्था जो अंदर ही अन्दर देश को खोखला कर करती जा रही है।
सवाल 30: आपको एक कुछ दिनों के लिये मनचाहा करने की स्वतंत्रता दी जाये तो आप क्या करना पसंद करेंगी?
जबाब: अगर सच में मुझे ऐसी छूट मिल जाये तो मैं पूरी दुनिया घूमना चाहूँगी। बेहतर दुनिया का सपना पहुंचाऊगी और उन पलों को विरासत के लिए लिखना चाहूँगी।
सवाल 31: जीवन का कोई यादगार अनुभव साझा करना चाहें?
जबाब: वैसे तो पूरी जिन्दगी ही मेरे लिए यादगार है. एक यादगार लम्हा मुझे हमेशा याद आता है - मैं अपने दोस्तों के साथ ट्रेकिंग पर गयी थी, जिंदगी में पहली बार पहाड़ों का नजारा देखना और उनकी खूबसूरती को निहारना और महसूस करना एक अजब एहसास है। तभी महसूस किया कि राहुल सांकृत्यायन ने अधातो घुमक्कड़ जिज्ञासा क्यों लिख डाली। उन पहाड़ों की पगडंडियों पर चलना कभी उबड़ खाबड़ रास्ता कभी एक दम साफसुथरा रास्ता. अपनी मंजिल पर पहुंचने की चाह में आगे बढ़ते रहने का जुनून मुझे हमेशा प्रेरणा देता है।
सवाल 32: और कुछ बताना चाहें अपने बारे में, लेखन के बारे में , समाज के बारे में।
जबाब:बस यही कि बहुत कुछ सीखना है, बहुत कुछ पढ़ना है और अमल करना है। रही बात लेखन की तो एक लेखक के लिए कलम ही उसका हथियार है। जहाँ तलवार काम नहीं आती वहां कलम काम आती है। समाज को बदलने में कलम ने अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और आगे भी निभाती रहेगी। मुनाफे और गैर -बराबरी पर आधारित समाज को समाप्त करके, एक बेहतर समाज की नींव रखने में यदि मेरी कलम साथ देती रहे। बस इतनी-सी चाहत है।
1. आरिफ़ा के व्यंग्य संग्रह ’शिकारी का अधिकार’ की अनूप शुक्ल द्वारा लिखी भूमिका यहां पढ सकते हैं। http://fursatiya.blogspot.in/2016/04/blog-post_24.html
2. आरिफ़ा का व्यंग्य लेख ’शिकारी का अधिकार’ यहां पढ सकते हैं http://www.hastaksher.com/rachna.php?id=361
3. आरिफ़ा के व्यंग्य संग्रह ’शिकारी का अधिकार’ के कुछ पंच वाक्य यहां पढ सकते हैंhttps://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210942630975229

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210970791519225

Post Comment

Post Comment

Saturday, March 18, 2017

पंचबैंक

1. जो याचक है,पीड़ित है, परेशान है उसे घंटा बजाना आना चाहिए। Brajesh Kanungo

2.पर-निंदा एकदम मीठे खाज की तरह होती है | इसे जितना अधिक खुजाओं, उतना अधिक मीठी कशिश देती है| राजेश सेन

3.नोटबंदी अपनी पैदाइश से ही प्रमेह और पेंचिश जैसे गरिष्ठ रोगों का शिकार है | अब उसे कैशलेस के प्रतिरोधक टीके लगाए जा रहें हैं | ई-ट्रांजेक्शन का ओआरएस घोल पिलाया जा रहा है | राजेश सेन

4. बेरोजगारी की वर्षा मे आदमी राजनीति की छतरी ढूँढता है। Abhishek Awasthi

5.शराफ़त जितनी जल्दी छोड़ी वे उतनी जल्दी जी आत्मविकास के उच्चतर सोपान पर पहुंचे। DrAtul Chaturvedi

6. औसत से ज्यादा प्रदर्शन राजनीति में व्यक्ति को अपच का शिकार कर देता है। DrAtul Chaturvedi

7. राजनीति मिशन से कमीशन होते हुये अब प्रोफ़ेशन और फ़ैशन बन गयी है। DrAtul Chaturvedi

8. आने वाले समय में रोबोट बच्चे तैयार किये जाएँगे, जिन्हें अडॉप्ट करके लोग अपनी नाक ऊँची करने में कामयाब भी होंगे और जीनियस बच्चे के माँ बाप कहलाने का गौरव मिलेगा, सो अलग .. अर्चना चतुर्वेदी

9. नेता नौकरशाहों को सरकार बनने पर देख लेने की जिस तरह धमकी देता है उसी तरह लेखक अपने विरोधियों को पत्रिका निकालने की धमकी देता है! Arvind Tiwari

10. (नेता की) खास पहचान है रंगहीन होते हुए भी ये सभी रंगों को मिलाकर काला रंग बनाते है और सफेदपोश कहलाते है Arifa Avis



11. पहले बच्चे को बोलना सिखाया जाता है और जब वो बोलना सीख जाता है तो उसे न बोलना सिखाने की जरुरत पड़ती है Yamini Chaturvedi

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210863311552293

Post Comment

Post Comment

Friday, March 17, 2017

पंचबैंक

पंचबैंक/धांसू डायलॉग
-------------------------
1. हर ऐसी मुहिम पर शक करो, फ़जीहत भरी जानो जिसके लिये नये कपड़े पहनने पड़ें।
2. मूंगफ़ली और आवारगी में खराबी ये है कि आदमी एक बार शुरू कर दें तो समझ नहीं खत्म कैसे करें?
3. जब कोई किसी पुराने दोस्त को याद करता है तो दरअस्ल अपने को याद करता है।
4. बुढापे की शादी और बैंक की चौकीदारी में जरा फ़र्क नहीं। सोते में भी एक आंख खुली रखनी पड़ती है और चुटिया पे हाथ रखकर सोना पड़ता है।
5. मर्द भी इश्क-आशिकी सिर्फ़ एक बार ही करता दूसरी मर्तबा अय्यासी और उसके बाद निरी बदमाशी।
6. जवानी दीवानी की तेजी बीबी से मारी जाती है। बीबी की तेजी औलाद से मारते हैं औलाद की तेजी साइंस से और साइंस की तेजी मजहबी शिक्षा से। अरे साहब तेजी का मारना खेल नहीं है, मरते-मरते मरती है।
7. इससे अधिक दुर्भाग्य क्या होगा कि आदमी एक गलत पेशा अपनाये और उसमें कामयाब होता चला जाये।
8. दुनिया में पीठ पीछे की बुराई से हजम होने वाली कोई चीज नहीं।
9. एक पांव लंगड़ाना दोनों पांव लंगड़ाने से बेहतर है।
10. मुगल बादशाह जिस दुश्मन को अपने हाथ से मारना नहीं चाहते थे उसे हज पर रवाना कर देते या झंडा, नक्कारा और खिलअत (शाही पोशाक) देकर दक्खिन या बंगाल जीतने के लिये भेज देते।
11. इतिहास पढने से तीन लाभ हैं। एक तो यह कि पूर्वजों के विस्तृत हालात की जानकारी होने के बाद आज की हरामजदगियों पर गुस्सा नहीं आता। दूसरे याददास्त तेज जाती है। तीसरे , लाहौल विला कूवत, तीसरा फ़ायदा दिमाग से उतर गया। कराची भी अजीब शहर है हां तीसरा भी याद गया। तीसरा फ़ायदा यह कि खाने, पीने, उठने, बैठने , भाइयों के साथ मुगलिया बरताव की सभ्यता से परिचय होता है।
मुश्ताक अहमद यूसुफ़ी
के उपन्यास धनयात्रा से 

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210851569338745

Post Comment

Post Comment

Wednesday, March 15, 2017

सोचते रहते हैं ऐसा आवारगी के बारे में

एक दिन दफ़्तर जा जाते हुये कुछ बाबा लोग दिखे। विजय नगर चौराहे के पहले। एक हाथी पर पूरा राज-पाट टाइप लादे चले जा रहे थे। घड़ी देखी। पांच मिनट लेट होने की गुंजाइश थी। आगे निकलकर गाड़ी किनारे की। दरवज्जे का पल्ला खोला। बाहर आकर बाबा लोगों का मय हाथी इंतजार करते रहे।

इन्तजार ऐसे जैसे चौराहे के सिपाही बीच-बीच में चौराहा छोड़कर दुपहिया-चौपहिया वाहन चेक करने लगते हैं। चेक करते हुये वे सरकार की कमाई में बरक्कत तो करते ही हैं। साथ में अपनी भी सब्जी भाजी और गैस के बढे हुई कीमत का दर्द हल्का कर लेते हैं।

इन्तजार का एक और अन्दाज जैसे शहर के नाके से गुजरने वाले मंत्री का उसकी पार्टी के स्वयंसेवक करते हैं। माला और मुंह मुर्झाते रहते हैं नेता जी के आते-आते।

बाबा लोगों के पास आते-आते हम उनको कैमरे में कैद कर चुके थे। पता चला कि वे पनकी मन्दिर के पास रहते हैं। मैहर दर्शन करने जा रहे थे। हमारे लिये इतना बहुत था । हम गाड़ी स्टार्ट करके चल दिये। तब तक एक बाबा ने खर्चा-पानी मांग लिया। लेकिन हम न्यूटन बाबा के जड़त्व के नियम के सम्मान करते हुये चल दिये थे तो चल ही दिये फ़िर।

लेकिन ज्यादा आगे नहीं जा पाये कि हमें यादों ने सालों पीछे धकेल दिया। जब हम साइकिल से भारत दर्शन करने जा रहे थे तो पहला पैडल धरते ही एक दम्पति कार से आये थे। उन्होंने अखबार में हमारी यायावरी की खबर बांची थी। आते ही उन्होंने शुभकामनायें दीं और कुछ पैसे भी रास्ते में खर्चे के दिये।

याद आते ही हमारी गाड़ी अपने आप धीमी हो गयी। हम फ़िर रुके। बाबा लोगों का इन्तजार किया। पास आने पर कुछ पैसे दिये। एक तरह से 34 साल पुराने कर्ज से उबरे तो नहीं लेकिन उसके सुपात्र से बने। हमको किसी ने दिया तो हम भी दे दिये।
पैसे और यादों से हल्के होकर आगे बढने से पहले मन किया कि हम भी गाड़ी यहीं किनारे ठड़िया के निकल लें संग में बाबा लोगों के। यह सोचते ही कई दुविधायें सामने आकर खड़ी हो गयीं:
1. गाड़ी सड़क पर खड़ी रहने से जाम लग जायेगा।
2. दफ़्तर में न पहुंचने पर बिना बताये अनुपस्थिति की नोटिश मिल जायेगी।
3. शाम तक घुमक्कड़ी का भूत न उतरा तो फ़िर कायदे भूत उतारा जायेगा।
हम इन्ही सब दुविधाओं के जबाब सोचने लगे। तब तक पीछे की गाड़ियां पिपियाने लगीं। मजबूरी में हमें आगे बढना पड़ा। इसके बाद का किस्सा क्या बतायें। बस समझ लीजिये कि सोचते रहते हैं ऐसा आवारगी के बारे में।
आप भी ऐसा सोचते हैं क्या कभी?


https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210835447855718

Post Comment

Post Comment

Tuesday, March 14, 2017

सब जगह तो पैसे का जोर है

आज दोपहर शास्त्री नगर तक गये। पंजाब नेशनल बैंक में भाईसाहब से मिलने। गाड़ी नीचे ही खड़ी कर दी। फ़ुटपाथ पर एक सरदार जी अपनी खराद के कारखाने पर बैठे टिफ़िन खोले रोटी खा रहे थे। बात करने की मंशा से मैंने उनसे कहा -गाड़ी खड़ी है देखे रहियेगा।
’हां, ठीक।’ - कहकर वे रोटी खाने में मशगूल हो गये।
लौटकर आने पर देखा कि वे सरदार जी खराद की मशीन पर लोहा छील रहे रहे थे। कोई जॉब बना रहे रहे। शायद रिपेयर का काम। जॉब नापने के लिये स्क्रूगेज बगल में धरा था।
बात की तो पता चला कि 1967-68 में कानपुर आये थे। पंजाब से। चालीस साल से अधिक हुये शास्त्री नगर के इस मकान में रहते हुये। दो बेटियों की शादी कर चुके। एक बेटा है वह चण्डीगढ में काम करता है। पत्नी यहां साथ में है। खराद की मशीन पर काम करके अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं।
खराद मशीन के बारे में पूछने पर बताने लगे-’सन 1984 में खरीदी थी यह मशीन। दस हजार में मिली थी। उसके पहले जो मशीन थी उसे दंगाई लूट् के गये थे। और भी सामान ले गये थे।’
33 साल पहले की दंगे की बात एक सहज खबर की तरह बता रहे थे। हमने पूछा -’इत्ती भारी मशीन कैसे लूट ले गये।’
’अरे टन टन भर वजनी सामान ले गये थे।’- उन्होंने बताया।
73 साल के कर्मवीर की जिजीविषा और काम करने की लगन की तारीफ़ की तो बोले-’काम नहीं करेंगे तो खायेंगे क्या? कौन हमको पेंशन मिलती है कोई?’
अपने से ही बताने लगे-’ सब कागज भरा के ले गये कई बार पेंशन के। लेकिन कोई नहीं मिली। न वृद्धा न समाजवादी पेंशन।’
पता चला कि जहां दुकान है वो मकान किसी दूसरे ने किराये पर खरीद लिया है।
बोले- ’हरामजादे मकान मालिक ने नोटिस दिया है। कोर्ट में केस चल रहा है। कागज मेरे सब चौरासी के दंगे में लूट ले गये।’
फ़िर आगे बोले-’ सब जगह तो पैसे का जोर है। जज भी सब क्रप्ट हैं।’
हम न्यायपालिका के सम्मान में क्या कुछ कहते। चुप रहे।
दोनों आंखों में ज्यादा पावर का चश्मा। एक में पास और दूर दोनों की नजर वाला। फ़ोटो दिखाया तो बहुत हल्के से मुस्कराये। बोले -अच्छा है।
हमने सोचा हालिया चुनाव के नतीजे के बारे में उनकी राय जानें। लेकिन नहीं पूछा। हिम्मत नहीं पड़ी। नमस्ते करके चले आये। कर्मवीर भी में जुट गये।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210828707927224

Post Comment

Post Comment

Monday, March 13, 2017

’सब मिले हुये हैं’ -लेखक संतोष त्रिवेदी के कुछ पंच

’सब मिले हुये हैं’ -लेखक संतोष त्रिवेदी के कुछ पंच
----------------------------------------------------------
1. लिखे हुये का सम्मानित होना आवश्यक है, अन्यथा लिखना ही वृथा।
2. सम्मानोपरान्त लेखन की अपनी आभा होती है। लेख के बाद कैप्शन में दिया जा सकता है- लेखक फ़लां-फ़लां पुरस्कार से सम्मानित ।
3. वे लिखने से समझौता कर सकते हैं पर सम्मान से नहीं।
4. एक दिन के लिये सेल में आने वाली चीजें ऐसा इम्प्रेशन देती हैं कि यदि उनके साथ थोड़ी भी ढिलाई बरती गयी तो वे आउट ऑफ़ स्टॉक की माला पहन लेंगी।
5. ऑनलाइन शॉपिंग की खूबी है कि कोई जान ही नहीं पाता कि अगले ने कितने का आर्डर किया है।
6. सरकार कई सालों से आम आदमी को नचा रही है पर यह उसका विशेषाधिकार है।
7. जनता की ओपिनियन चुनाव के पहले जाहिर होने से सरकार को चंदे का टोटा भी पड़ जाता है और काफ़ी बड़ा निवेश उसके हाथ से निकल जाता है।
8. हमारे देश में राजा के लिये अलग अलग नियम हैं।
9. ऐसी सरकार या मंत्री ही नाकारा है जो जासूसी के योग्य नहीं हैं।
10. जहां देश गिर रहा है, समाज गिर रहा है, बादल और पहाड़ गिर रहे हैं, रिश्ते-नाते और चरित्र गिर रहा है, इन सबके बीच यदि बेचारा रुपय्या गिर रहा है तो कौन सा पहाड़ टूट जायेगा?
11. जो कुछ नहीं करते वे कमाल करते हैं।
12. लालबत्ती धारी होने से फ़ायदा यह है कि बिना कुछ कहे उनके सारे काम हो जायेंगे।
13. नेता बनने के बाद जो भी काम होते हैं, सब जनता के ही नाम से जाने जाते हैं।
14. पढाना भी कोई नहीं है। पढाई से न तो प्रोडक्टिविटी बढती है और न देश की जीडीपी।
15. जिस चीज के पीछे बाजार हो जाता है, वैसे भी वह सभ्य और सामाजिक ट्रेडमार्क बन जाता है।
16. बाजार ही हमारा सच्चा समाज है- खेल,सिनेमा और मीडिया तो महज अदने से औजार।
17. गरीब वैसे भी हर किसी की भौजाई होता है और भौजाई से फ़ागुन में मजाक तो बनता है।
18. देश आलू-टमाटर से कहीं बड़ा है और उससे भी बड़ा मसला है हमारे गौरव का। बच्चों के लिये स्कूल या अध्यापक भले न हो पर पाठ्य-पुस्तकों में हमारे अतीत का बखान जरूर हो।
19. मंहगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे तो स्वत: निपट जायेंगे जब धर्म और संस्कृति पर खतरा दिखाया जायेगा।
20. चुनाव कई दुश्मनों को दोस्तों में और दोस्तों को दुश्मनों में बदल देता है।
21. (चुनाव में) घोर साम्प्रदायिक व्यक्ति कट्टर सेकुलर हो जाता है और सेकुलर को अचानक राष्ट्रहित के सारे विकल्प खोजने पढ जाते हैं।
22. गरीबी पर चर्चा पिछड़ेपन की निशानी है, बहस करनी है तो ’डिजिटल इण्डिया’ पर करो। शब्द बदलने चाहिये ताकि उसके अर्थ ढूंढे जा सकें।
23. असल मंजिल वही पाते हैं जो सुविधानुसार अपने रास्ते बदल लेते हैं।
24. शिखर पर वही विराजते हैं जो शरीर ही नहीं आत्मा बदलने की क्षमता रखते हैं।
25. सबके दिन बहुरते हैं। कोई ऊपर-ऊपर बटोर पाता है तो कोई तलहटी से मलाई मार लाता है।
26. भ्रष्टाचार जिस कुर्सी पर बैठता है, वह नैतिकता का पाठ पढने लगती है।
27. हमारी संसद एक पवित्र मंदिर की तरह है इसमें पुजारी बनकर प्रवेश करने वाले देवताओं की जगह विराजमान हैं।
28. मंदिर में देवताओं और पुजारियों के विशेषाधिकार होते हैं, भक्तों के नहीं। इसलिये वे वहां भरतनाट्यम करें, मल्लयुद्ध करें या माइक उखाड़ें सब उनकी नित्यलीलाओं में शुमार माना जाता है।
29. किसी की खूबसूरती पर पूछकर लिखने से वो मौलिकता और वो भाव नहीं आ सकते जो छुप-छुपकर देखने और चाहने के अनुभव से आते हैं।
30. चुनावी जीत भी चंदेबाजों और धंधेबाजों की होती है।
31. पूरे देश में अब खास नहीं आम होने में रार मची हुई है।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210820289476768

Post Comment

Post Comment

’सब मिले हुये हैं’ -एक खुरपेंचिया दोस्त की नजर में


गये साल संतोष त्रिवेदी का पहला व्यंग्य संग्रह ’सब मिले हुये हैं’ आया था। पुस्तक मेले के अवसर पर। छपते ही लेखक को मिलने वाली प्रतियों में से एक मास्टर जी ने भेजी थी। उसके बाद पुस्तक मेले में और किताबों के अलावा सुशील सिद्धार्थ जी की ’मालिश महापुराण’ भी खरीदी थी। कुछ दिनों दोनों किताबें मेज पर, यात्रा में , बैग में साथ-साथ रहीं- जैसे उन दिनों दोनों गुरु-चेला (मित्र-मित्र पढें अगर गुरु चेले पर एतराज हो)। एक बार जबलपुर से वाया दिल्ली कलकत्ता जाते हुये दोनों किताबें बाकायदे पेंसिल से निशान लगाते हुये पढीं भी गयीं। सोचा था इनके बारे में विस्तार से लिखेंगे। लेकिन लिख न पाये। मालिश महापुराण पर इसलिये कि उसके बारे में छपी समीक्षाओं का ’गिनीज बुक रिकार्ड’ टाइप बन गया होगा। हमको संकोच हुआ कि सूरज को क्या 20 वाट का बल्ब दिखायें।

संतोष त्रिवेदी के ’सब मिले हुये हैं’ के बारे में लिखने की बात भी आई-गई हो गयी। पूरी किताब एक बार पढकर भी लिखना न हो पाया। बाद में स्थगित होते-होते एकदम टल गया। दोनों किताबें भी दोनों मित्रों की तरह की बदली स्थितियों के अनुसार अलग-अलग कमरों में अलग-अलग अलमारियों में पहुंच गयीं।

’सब मिले हुये हैं’ के अधिकतर लेख अखबारों में छपे हुये हैं। छपने की जल्दी में फ़ौरन फ़ाइनल करके भेजे लेख। अखबार में छप जाने के बाद लेख ऐसे भी किताब में छपने की पात्रता हासिल कर लेता है। उसी पात्रता के तहत किताब में शामिल हुये लेखों में समसामयिक घटनाओं पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। ज्यादातर लेख सरकार के किसी काम या बयान पर जनता के नुमाइन्दे की तीखी प्रतिक्रिया के रूप में हैं। सरोकार के भरपूर। जिधर देखो उधर सरोकार ही सरोकार।

संतोष त्रिवेदी के लेखन का श्रेय केन्द्र की वर्तमान सरकार को भी जाता है। जिस समय उन्होंने अखबार में छपना शुरु किया संयोग से उसी समय वैचारिक रूप से उनके विपरीत मिजाज वाली सरकार सत्ता में आई। लेखन ने जब ’सरकार मुकाबिल हो तो अखबार में लेख निकालो’ पर अमल किया और दनादन लेख लिखे। एक बार जब लेखन और छपन का चस्का लगा और सरकार कोई मुद्दा हासिल नहीं करा पाई तो सामान्य बातों पर भी की बोर्ड खटखटा दिया।

संतोष त्रिवेदी की किताब की भूमिका लिखते हुये सुशील सिद्धार्थ जी ने लिखा है- ’समकालीन व्यंग्य-लेखन के युवा परिदृश्य में संतोष त्रिवेदी एक महत्वपूर्ण उपस्थिति हैं।’ हालिया समय की सबसे लोकप्रिय वनलाइनर लिखने वाली रंजना रावत जी ने लिखा -’संतोष जी के व्यंग्यों की विशेषता यह है कि वह हास्य और व्यंग्य का समानुपात रखते हैं।’

हमने आज इस किताब को पंच के लिहाज से दोबारा देखा, पढा। कुल जमा इकत्तीस पंच मिले 127 पेज में छपे 55 लेखों में। मतलब फ़ी लेख लगभग आधा पंच। हो सकता है कोई फ़ड़कता हुआ पंच निगाह से चूक गया हो। दुबारा देखने पर नजर आये।

हम आलोचक नहीं हैं। संतोष त्रिवेदी हमारे मित्र हैं। मित्र की किताब को मित्र नजरिये से ही देखा जाता है। गुस्सा है तो कह देंगे -कूड़ा है। मन खुश तो कह देंगे - कलम तोड़ दी यार तुमने तो।

होली के मौके पर लिखने का फ़ायदा है भी है कि आइंदा कोई बुरी लगने वाली बात भी धड़ल्ले से कही जा सकती है।
इसी बात पर याद आया कि पिछले साल जब हम यह किताब पढ रहे थे और लखीमपुर से कानपुर आते हुये कुछ देर एक कोल्हू पर रुके थे। वहां देखा कि गन्ना पेरने पर सबसे ऊपर की मैल सरीखी परत को बहाने के बाद तब बाकी का गुड़ बनाते हैं। उस समय सोचा था कि जब संतोष की किताब पर लिखेंगे तब यही लिखेंगे कि लेखन की गुड़ की भेली बनने के पहले बहाये शीरे सरीखी है यह किताब। अब यह निकल गयी अब शानदार गुड़ बनाओ। लेकिन अब सोच हैं तो यह बड़ी हल्की बात लगती है। एक मुकम्मल किताब को खारिज करने का इससे घटिया संवाद और क्या होगा?

संतोष के लेख चूंकि तात्कालिक परिस्थितियों पर लिखे गये। जब छपे उसी समय लोग उसको समझ गये होंगे लेकिन समय के साथ प्रसंग भूल जाते हैं। ’काले चश्में का गुनाह’ ’उनकी कैंटीन और हमारी कटिंग चाय’ ,’खटिया के नीचे जासूस’, ’गायब होते देश में’, ’गिरता हुआ रुपय्या’ आदि इसी तरह के लेख हैं। इन लेखों की खासियत है कि लेख विषय पर ही जमा रहता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है कि लेख घूम-घूमकर वहीं ’कदमताल’ करता रहता है। मतलब कहने का लेख इकहरा टाइप बना रहा रहता है।

संतोष और हमारे समेत तमाम साथी जो तकनीक की सुविधाओं के विस्फ़ोट एक मंच पाये अपने को अभिव्यक्त करने का उनके सामने फ़ौरन छपने की सुविधा तो है लेकिन साथ ही खतरा भी है कि हम लोग छपने से ही खुश हो जाने की आदत की गिरफ़्त में आ सकते हैं। संतोष तो खैर उमर से भले ही युवा हैं लेकिन समझ में सिद्ध लेखकों को भी हिदायतें देने की हैसियत रखते हैं। देते भी रहते हैं। लेकिन आज ’सब मिले हुये हैं’ पढते हुये अपने लेखन की तमाम कमियां समझ में आ रही हैं।

आजकल हम पंच संकलन के काम में लगे हुये हैं। इसलिये हर व्यंग्य लेख को पंच के पैमाने से देखते हैं। यहां पंच मेरी समझ में ऐसे वाक्य से है जो लेख से एकदम अलग करके स्वतंत्र रूप में अपने में एक धांसू डायलाग के रूप में प्रयोग किया जा सके। पंच की औकात गठबंधन सरकार में निर्दलीय की तरह होती है। होता भले अकेले हो लेकिन मिलता मंत्री पद है।

पंच के लिहाज से ’हम सब मिले हुये हैं’ में और बेहतरी की गुंजाइश थी। भूमिका लिखने वाले दोनों लेखक सुशील सिद्धार्थ और रंजना रावत दोनों पंच मास्टर हैं। उनसे सीखना चाहिये हम लोगों को। संतोष , सुशील के दीगर व्यवहार पर नजर रखने की बजाय यह देखते कि गुरु जी पंच कैसे लगाते हैं तो पंच दुगुने तो हो ही जाते। कई जगह कोई पंच बनते-बनते रह गया और वाक्य बनकर पैरे से जुड़ा रहा।

संतोष त्रिवेदी का जब यह व्यंग्य संकलन आया था तब से उनकी समझ बहुत परिपक्व हुई है। अध्ययन भी बढा है। अब आगे उनका अगला व्यंग्य संकलन जो आयेगा उसमें आशा है कि और शानदार रचनायें होंगी।

यह लिखना इसलिये कि संतोष त्रिवेदी की भेजी किताब एक जिम्मेदारी के रूप में थी और मन में था कि इसके बारे में लिखना है। यह इस किताब के बारे में अंतिम बयान नहीं है। आज की सोच है मेरी। कल को इसके किसी और पहलू पर भी लिखा जा सकता है। किताबों और लेखक के बारे में विचार तो बदलते रहते हैं।

संतोष त्रिवेदी को उनके पहले व्यंग्य संकलन के लिये पन्द्रह महीने बाद बधाई। होली की शुभकामनायें बधाई के साथ मुफ़्त में। :)
किताब: सब मिले हुये हैं
लेखक: संतोष त्रिवेदी
प्रकाशक: अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
पेज:127
कीमत: 250 रुपये
किताब में आये चुनिन्दा पंच यहां बांचियेhttps://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210820289476768


https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210820245315664

Post Comment

Post Comment

Sunday, March 12, 2017

बुरा न मानो होली है



होली के मौके पर टाइटल की पहली किस्त जारी की जा रही है। अपने खास मित्रों के लिये अगली किस्त शेष अगले अंक में । जिनको टाइटल पसंद न आये हों वे बताएं तो उनके टाइटल बदल देंगे। मुफ्त में। :)
1.Gyan Chaturvedi: व्यंग्य के शिखर से ’हम न टरब’।
2. प्रेम जनमेजय: ’व्यंग्य यात्रा’ के लिये व्यंग्य की जमीन जोतता व्यंग्यकार।
3. Harish Naval: बागफ़त के खरबूजे शराफ़त के मारे दिल्ली के कोल्ड स्टोरेज में।
4. Hari Joshi: अमेरिकी सड़कों की तरह सपाट/सर्राट व्यंग्यकार।
5. Anup Srivastava श्रीवास्तव: व्यंग्य की इमारत नींव की ईंट - रोज सरकने पर आमादा।
6. Arvind Tiwari: मैनपुरी चक्कू के व्यंग्य की बेहद तीखी धार,
अभी इतना ही ’शेष अगले अंक में’ यार।
7. Subhash Chander: व्यंग्य के इतिहास में नाम लिखवाने की एकमात्र दुकान।
8. Sushil Siddharth:
 गुरु तो बढिया देव सा, पर चेला मिला फ़िरन्ट,
ठांव, कुठांव देखे नहीं, है आये दिन पटकंत।
वलेसी की आफ़त है जी।
9. Alok Puranik:
हास्य-व्यंग्य संसार में लिये 'बाजार-लुकाठी' हाथ,
जिसको चलने का मन करे, वो चले हमारे साथ।
सरकार (सरोकार नहीं भाई) भी साथ चलेगी।

10. संतोष त्रिवेदी: सरोकारविहीन लेखन और सपाटबयानी ’सब मिले हुये हैं।’
11. Nirmal Gupta: हैंगर पर टंगा एंगर , सूखकर व्यंग्य बनता भयंकर।
12. Lalitya Lalit: हम इनाम लेने का कभी बुरा नहीं मानते।
13. Suresh Kant: उधौ मोहि बब (ब से बैंक) विसरत नाहीं।
14. Alankar Rastogi: ’सभी विकल्प खुले हुये हैं’ बस रॉयल्टी मिल जाये।
15. Anoop Mani Tripathi:होशियार, ख़बरदार 'शो रूम में जननायक' पधार रहा है।
16. DrAtul Chaturvedi: लोग इनाम के लिये जुगाड़ लगाते हैं, अपन का जुगाड़ ऐसा है कि बिना जुगाड़ के मिलता है इनाम।
17. Anshu Mali Rastogi:
हॉट माल हमको मिला, मिली सन्नी लियोनी आय,
सुनत सनाका खा गये, बोली हल्लो भाईजी हाय।
18. Dilip Tetarbe:
गाली की गिनती करने की इतनी बड़ी सजा न दो,
फ़िर से गिनती की है,हमने संख्या पहुंची तीन सौ दो।
19. Shefali Pande: मजे के अर्थशास्त्र के बाद क्या लिखना।
20. अर्चना चतुर्वेदी: ’शराफ़त का टोकरा’ उठाओ भाई ’मर्द शिकार पर हैं’।
21. Indrajeet Kaur: ’ईमानदारी का सीजन’ खत्म हो फ़िर जुगलबंदी में भाग लिया जाये।
22. Arifa Avis: व्यंग्य के बगीचे की ताजा बयार।
23.Udan Tashtari समीरलाल:
व्यंग्य की लाज बचाना बेटा,
आहिस्ते से मैदान में आना बेटा।
ये व्यंग्य के लोग जरा वैसे हैं
यहां फ़ौरन न छा जाना बेटा।
24. राजेश सेन: ऐसा कोई अखबार दिखा नहीं, जिसमें मेरा लेख छपा नहीं।
25.गिरीश पंकज: (व्यंग्य) माफ़िया जिन्दाबाद।
26. Sanjay Jha Mastan: व्यंग्य की जुगलबंदी का मानस पुत्र व्यंग्यकार।
2Anuj Tyagi: डॉ कहो या व्यंग्यकार, आगरे का हूं यार।
28. Govind Gautam: हमने तो राय दे दी, आप मानो न मानो होली है।
29. सुनीता शानू: व्यंग्य के अखाड़े में नवोदित सास।
30. Ramesh Tiwari: उदीयमान, उभरे हुये, स्थापित आल इन वन आलोचक।
31. Ranjana Rawat: कातिलाना वनलाइनर स्थाई अड्डा।
32. Yamini Chaturvedi: वनलाइनर से व्यंग्यकार तक मजेदार सफ़र।
33. एम.एम. चन्द्रा: जुगलबंदी के पहले मेले से बिछुड़ा अकेला व्यंग्यकार।
34. Alok Saxena Satirist: सटायरिस्ट सटा लिया अब लिखें न लिखें सटायरिस्ट तो रहना ही है।
35. Pankaj Prasun: पिछले कवि सम्मेलन से अगले कवि सम्मेलन की यात्रा में लगा व्यंग्यकार।
36 अरविन्द कुमार: जरा दिल बहक गया था वैसे बाकी तबियत ठीक है।
37. ALok Khare: वाह दद्दा, हम को भी नहीं छोड़ोगे?
38. शशिकांत सिंह: प्रजातंत्र के प्रेत के बारे में बतायेंगे।
39. Surjeet Singh: अभी तो हम लिख रहे हैं।
40. Neeraj Badhwar: हम कह चुके हैं ’हम सब फ़ेक हैं।’ पर लोग यकीन नहीं करते। बेवजह जलते हैं।
41. Brajesh Kanungo: कविता, कहानी, व्यंग्य जिस मैदान में चाहो निपट लो।
42. Om Varma: अब बस जमा रहे हैं व्यंग्य। तब तक यह दोहा सुनिये।
43. प्रमोद ताम्बट: व्यंग्यलोक का सरोकारी बासिन्दा।
44. Shashi Pandey: कविता और व्यंग्य की जुगलबंदी।
45. Surendra Mohan Sharma: व्यंग्यकारों पर सतर्क निगाह रखने वाले वकील। सुशील जी और संतोष त्रिवेदी की मोहब्बत के चश्मदीद गवाह।
46. Devendra Kumar Pandey: लोहे के घर का मजबूरन आशिक।
47. Hari Hindaun: टाइटल मिला, मिठाई बांटो।
48. Kush Vaishnav: ब्लॉगरों को झांसा देकर सेलेब्रिटी लेखक बनाता प्रकाशक।
49. सुनीता सनाढ्य पाण्डेय: आग लगाती दिखी फ़ेसबुक लाइव पर।
50.Vivek Srivastava: हमको लड़कियों से बात करने में बड़ी शरम आती है। इसीलिये हम उनसे कोच्चन करने लगते हैं। वो हमको बॉय करके चल देती हैं।
51. अनूप शुक्ल: न धेले भर का सऊर न कौड़ी भर अक्ल
देने चले टाइटल, फ़ुरसतिया अनूप शुक्ल।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210811251450823

Post Comment

Post Comment

Google Analytics Alternative