Friday, December 23, 2016

बीच सड़क पर बीड़ी पीता आदमी




टाटमिल चौराहा
कल शाम दफ़्तर से लौटते हुये याद आया कि गाड़ी के ’प्रदूषण प्रमाणपत्र’ की आखिरी तारीख थी। मतलब अगर न बनवाया तो अगले दिन से ’जुर्माना ज़ोन’ में खड़े हो जायेंगे। मजे की बात कि याद आई ऐन उस जगह पर जहां ’प्रदूषण प्रमाणपत्र’ बनवाने की गुमटी थी।

हमने अपनी याददाश्त की पीठ ठोंकी। पिछले दिनों कई बार जरूरी चीजें भूलने के कारण डांट खा चुकी है ’याददाश्त’ । कल तारीफ़ पाने की खुशी ’याददाश्त’ के चेहरे पर साफ़ चमक रही थी। याददाश्त बेचारी लजाकर मुंडी में सिमट गयी। लाज-लाल ’याददाश्त’ की फ़ोटो अगर लगाते फ़ेसबुक पर तो खचिया भर टिप्पणियां, लाइक आते क्यूट, स्वीट, ऑसम घराने के।

प्रदूषण प्रमाणपत्र बनवाने के लिये बालक को पुराना वाला कागज दिया। बालक ने कागज देखकर कागज बना दिया। प्रदूषण का कागज कागज देखकर ही बनता है। गाड़ी थोड़ी देखी जाती है। गाड़ी इस बीच रानी बिटिया की तरह चुपचाप खड़ी रही- मुंह दिखाई के समय नई बहुरिया की तरह संकोच चेहरे पर धरे हुये। सत्तर रुपये में गाड़ी छह महाने के लिये प्रदूषण मुक्त हो गयी।

लौटने के लिये गाड़ी को सड़क पर लाने के लिये मोड़े। गाड़ी सड़क के लम्बवत ही हो पायी थी कि एक साइकिल सवार अचानक गाड़ी के आगे रुक गये। जब वे रुके तो हम भी रुक गये। साइकिल सवार बीच सड़क पर जेब टटोलकर कुछ निकालने लगे। हमें लगा कि कुछ जरूरी सामान याद आ गया होगा उसको खोजकर आश्वश्त होना चाहते हैं। यह भी लगा कि शायद मिल जाने पर वे भी अपनी याददाश्त की पीठ ठोंके। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वे जेब देर तक टटोलते ही रहे।



बम्पर विहीन वाहन 

जब अगले ने जेब टटोलना जारी रखा तो हमने हार्न बजाया। साइकिल थोड़ा आगे खिसकी लेकिन फ़िर भी वह सड़क के बीच में ही थी। फ़िर हार्न बजाया तो उन्होंने हैंडल पकड़े-पकड़े एक हाथ जेब में डाले हुये साइकिल थोड़ा और सरका ली। हमने फ़िर हार्न बजाया तो उन्होंने थोड़ा और सरका ली। मतलब आप समझ लेव कि जित्ती बार हमने हार्न बजाया उत्ती बार साइकिल सरका ली अगले ने। भाईसाहब हर हार्न पर अपनी ’पोजिशन-ए-साइकिल’ ऐसे बदल रहे थे जैसे रिजर्व बैंक नोटबंदी पर नित-नये नियम बदलती रहती है।


जब हमने गाड़ी घुमाकर सड़क पर सीधी कर ली तो देखा भाईसाहब फ़ाइनली सड़क के किनारे पहुंचकर जेब से लाइटर निकालकर बीड़ी सुलगा चुके थे। मतलब जो उनका अचानक रुकना था वह अचानक बीड़ी पीने की तलब उठने पर बीड़ी सुलगाने की इच्छा के चलते था। मैं उनके बीड़ी-प्रेम से बहुत प्रभावित हुआ।


सड़क पर अचानक रुककर बीड़ी पीने की इच्छा होने पर बीच सड़क पर खड़े होकर तसल्ली से बीड़ी सुलगाने की यह सामान्य सी लगने वाली यह घटना देखने में भले साधारण सी लगे लेकिन इसको हल्के में लेना ठीक नहीं होगा। इससे साफ़ पता लगता कि देश का आम आदमी तसल्ली से जी रहा है। अपनी मनमर्जी से बीच सड़क पर खड़ा होकर बीड़ी सुलगा रहा है। इसका मतलब देश के आम आदमी के परेशान होने का जो हल्ला किया जा रहा है वो सब झूठ है। देश का आम आदमी बीच सड़क पर अपनी साइकिल रोककर , सडक पर आती-जाती गाड़ियों से बेपरवाह, तसल्ली से बीड़ी पी रहा है। मजे में है आम आदमी।


यह लिखते हुये हमारे दिमाग के व्यंग्यकार वाले हिस्से ने सुझाया कि चलते-चलते अचानक बीच सड़क पर रुककर बीड़ी पीने की इस घटना को अचानक हुई ’नोटबंदी’ से जोड़ दो तो घटना का फ़लक बड़ा हो जायेगा। हमने सुझाव देने वाले व्यंग्यकार को बड़ी जोर से हड़काया - "तेरी तो ऐसी की तैसी। बड़ा आया फ़लक बड़ा करने वाला। लगता है टीवी देखते हुये तुम्हारे दिमाग में भी प्रतिक्रिया का स्तर जनप्रतिनिधियों जैसा दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है।"


हमारी हड़काई से दिमाग का व्यंग्यकार बेचारा घुटनों में मुंड़ी घुसाकर गुड़ी-मुड़ी होकर बैठ गया। बुदबुदाते हुये बोला-’हमारे कहने का मतलब गलत तरीके से समझा गया।’ हमें व्यंग्यकार की बेवकूफ़ी पर लाड़ सा आया। लेकिन हमने प्यार जाहिर नहीं किया। जाहिर करते तो वह फ़िर कोई और बेवकूफ़ी की बात करने लगता- मंच से भाषण करते नेता की तरह।


टाटमिल चौराहे पर रुकने का सिग्नल था। सिग्नल मतलब कोई ऐसा नहीं कि लाल बत्ती दिख रही हो। गाड़ियां रुकी थीं तो हम भी रुक गये। लेकिन हम चौराहे से कुछ कदम पीछे ही रुके रहे। पीछे रुकने की कारण यह था कि चौराहे पर गाड़ी खड़ी करते ही कोई आदमी आकर गाड़ी पोंछने लगता है। हमारे न न करते हुये भी वह गाड़ी का शीशा और खिड़की तो पोंछ ही डालता है। लगता है कि गाड़ी पर एकदम सर्जिकल कर रहा है। कभी-कभी आधी गाड़ी ही पोंछता है कि बत्ती हरी हो जाने के चलते हम गाड़ी स्टार्ट कर देते हैं। गाड़ी पोंछने के बावजूद अक्सर ही हम उसको कुछ पैसे नहीं देते (एकाध बार को छोड़कर)। यह न देना कई कारणों का गठबंधन है । इसमें उसका जबरियन सेवा देना, पैसे फ़ुटकर न होना, इसको ठीक न समझना जैसे बहाने शामिल हैं। लेकिन जब भी बिना पैसे देते हुये फ़ूटते हैं तो सेकेंड के बहुत छोटे हिस्से तक यह तो लगता है कि कित्ते चिरकुट हैं। किसी की मेहनत, भले ही वह जबरियन कर रहा हो, के पैसे मारकर फ़ूट लिये हैं।


लगता तो यह भी है कि देश के चौराहे में गाड़ी पोंछने के लिये लपकते हुये इन लोगों के लिये कोई काम नहीं उपलब्ध करा पाये हम लोग।


चौराहे की बात से ही याद आया कि एक दिन फ़जलगंज चौराहे के पास खरामा-खरामा जा रहे थे फ़ैक्ट्री। इतने में एक गाड़ी वाला बगल से आया। बायीं तरफ़ से उसने हमारी गाड़ी को ओवरटेक किया। इतनी तेजी में था वह कि हमारा अगला बंपर गाड़ी से उड़ा दिया। कैशलेश एकोनामी के दौर में हमारी गाड़ी ’बंपर लेस’ होकर बीच सड़क पर खड़ी हो गयी। हमने शांतभाव से आगे भागती गाड़ी की तेजी देखी। बंपरविहीन गाड़ी जीवनसाथी विहीन घर की तरह बेरौनक लग रही थी। बंपर हालांकि खुद राणा सांगा हो चुका था। लेकिन उसके चलते गाड़ी की इज्जत बची हुई थी। बंपर विदा होते ही रेडियेटर नंगा दिखने लगा। बेचारा शर्मा रहा था लेकिन अब क्या किया जाये। लग रहा था बीच सड़क रेडियेटर की चड्ढी उतार दी हो किसी ने। हमने उतरकर बंपर उठाया और वहीं चौराहे पर किनारे धर दिया।


शाम को लौटते देखा बंपर जहां रखा था उससे थोड़ा और दूर सुरक्षित रखा था। इस बीच हमने यह भी कल्पना कर ली थी कि कोई मेरा बंपर उठाकर ले गया होगा। उसमें लगी नंबर प्लेट को किसी गाड़ी में लगाकर कोई वारदात करेगा और नंबर से प्लेट के आधार पर पुलिस हमारी तलाश में घूमने लगेगी। यह ख्याल आने पर हमने अपनी अकल को इतना तेज डांटा था (प्लेट और बंपर साथ न लाने के लिये) कि बेचारी रुंआसी हो गयी थी। बंपर वहां देखकर अकल बेचारी ने संतोष की सांस ली। हमने उसको वात्सल्य की नजरों से देखना चाहा तो वह दिखी नहीं। कुछ देर बाद देखा कि अपना स्टेट्स ’फ़ीलिंग सैड’ से बदलकर ’फ़ीलिंग रिलैक्स्ड’ करने चली गयी थी।
बंपर को चौराहे पर पुलिस वाले भाई साहब ने ठीक से रख दिया था। कहा भी -’हमने किनारे रख दिया था कि जिसका होगा ले जायेगा।’ हमने उनको धन्यवाद दिया। बंपर को गाड़ी में धरा और घर आ गये। भागते भूत को लंगोटी कैसी लगती है मुझे पता नहीं लेकिन हमें टूटते बंपर के लिये गाड़ी की नंबर प्लेट ही भली लगी।


आज सुबह जब उठे तो कोहरा छाया हुआ था। कोहरे के चंगुल में सारी दिशायें ओस के आंसू रो रहीं थीं। अब सूरज भाई कोहरे के खिलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक कर रहे हैं। उजाला कोहरे पर ’रोशनी चार्ज’ करते हुये उसको तितर-बितर कर रहा है। सुबह हो रही है। सुहानी भी है। आपको मुबारक हो।
#रोजनामचा

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Wednesday, December 21, 2016

लम्हों ने खता की है सदियों ने सजा पाई

गंगा बैराज पर गंगा
बहुत दिन बाद सूरज भाई दिखे। चमक रहे थे आसमान पर। सड़क की दाईं तरफ थे। मन किया दक्षिणपंथी कहकर मजे लें। लेकिन अगले मोड़ के बाद वे हमारी बाई तरफ हो गए। हमें लगा हमारे मन की बात जानकर बदला पाला। मुस्करा रहे थे भाई। मानों कह रहे हों - 'चीजें एक जैसी होतीं हैं। दिखती कैसी हैं यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम उनको देख कैसे रहे हैं।'

सड़क पर दो कुत्ते विपक्षी पार्टियों की तरह एक-दूसरे पर भौंकते, उलझते, सुलझते मस्ती टाइप कर रहे थे। किसी आदमी को आते देख दोनों आपस में लड़ना छोड़कर उसपर मिलकर भौंकने लगते। आदमी पर भौंकते समय दोनों कुत्ते हो जाते । एक हो जाते जैसे धुर विरोधी विचार वाली पार्टियां चंदे के मामले में एक हो जाती हैं।
क्रासिंग पर दो टेंपो वाले किसी बात पर उलझ गए। तीसरा आकर एक का साथ देने लगा। अब एक टेम्पो वाले को दो से निपटना था। दोनों में से एक ने मारने के लिए हाथ उठाया। टेम्पो वाले ने उससे बचने के लिए हाथ बढ़ाया तब तक दूसरे ने उसको पीछे से थपड़िया दिया। पिटा हुआ टेम्पो वाला मुझे देश की जनता की तरह लगा जिसको सरकार ने काला धन पर रोकथाम के नाम पर नोटबंदी की चोट मार दी। लोग थोड़ी देर तक देखते रहे कि शायद कुछ और हो आगे लेकिन हम निकल लिए आगे।

बहुत दिन बाद गंगा नदी दिखी आज। सूरज की किरणें पानी में उतरकर बिंदास नहा रहीं थी। किरणें पानी में नहाते हुए खिलखिला रहीं थीं। ऊपर से सूरज भाई वात्सल्य से अपनी बच्चियों को मजे करते देख रहे थे। बाकी की किरणें कायनात को चमकाने में लगी हुई थी।


सूरज भाई हँसते हुए बोले - 'ठीक करते हो।बवाल से हमेशा 'हजार स्टेटस' की दूरी पर रहा करो। बहुत मन हुड़के कुछ लिखने का तो कोई ऐसे शेर ठेल दिया करो जिसको दोनों तरफ के लोगों को लगे कि तुम उनका समर्थन कर रहे हो। उनकी भी जय-जय। इनकी भी जय-जय। इसके बाद भारतमाता की जय। वन्देमातरम। इंकलाब जिंदाबाद कहकर फूट लिया करो।'
चाय की दुकान पर टैंया
सूरज भाई बतियाते हुए कहने लगे -'तुमने नहीँ लिखा कुछ करीना पुत्तर के नाम पर। पूरा सोशल मिडिया तो पटा पड़ा है तैमूर के नाम पर।' हम बोले -'हमको डर लगता है भाई जी। वर्ना लिखना तो हम यह चाहते थे कि तैमूर लंग के सदियों पहले का किस्सा तो हमने इतिहास में पढ़ा। उसका कत्लेआम सुना। उसके आधे नाम से जितना एतराज है उतना उस समय लाख लोग जो मारे गए वे करते तो इतिहास दूसरा होता। और नाम का ही देखा जाए तो नाथूराम ने गांधी जी को मारा। तो क्या किसी नाम में राम लगाने से आदमी खराब हो जाएगा। बच्चा जो अब्बी आया है दुनिया में उसको काहे सदियों पहले किसी के अपराध की सजा दी जाए।'

हम पूछे यहां कौन सा शेर फिट होगा भाई जी?

बोले बहुत हैं यार। गूगल किया करो। यही लिख मारो:

लम्हों ने खता की है
सदियों ने सजा पाई।

हमने कहा - 'न भाई अब इस मसले पर शेर-चीता बाजी न करेंगे।बवाल है ई सब। '

सड़क पर एक आदमी झाड़ू लगा रहा है। कूड़ा बीच सड़क से किनारे इकट्ठा कर रहा है। लगा कि कोई बैंकर बन्दनोट पर झाड़ू मार रहा है। एक बच्चा सड़क पर पानी की धार मार रहा है। मीलों दूर पसरी सड़क में कुछ मीटर पानी की घार ऐसे लग रही है मानो शहर के हजारों एटीएम में से किसी एक में नोट आ जाने से वो गुलजार दिखे।

ढाबे पर काम करता बच्चा चाय में बिस्कुट जल्दी-जल्दी डुबाकर खा रहा है। स्वेटर नहीँ पहने है। जाड़ा बचाने के लिए कमर हिलौवा डांस करता जा रहा है। साथ के लड़के से चुहल करते हुए मुस्कराता भी जा रहा है। शायद गाना भी गा रहा हो मन ही मन - 'बेबी को बेस पसंदा।'

ठिठुरता, डांस करता, मुस्कराता , चाय पीता और बतियाता बच्चा मल्टी टास्किंग का ब्रांड एम्बेसडर लग रहा था।

दस बारह साल के बच्चे को सुबह-सुबह ढाबे पर काम करते देख याद आया कि बालश्रम तो अपराध है। सरकार इसके खिलाफ है। अच्छा हुआ मैंने उससे कुछ लिया नहीं। अनजाने अपराध से बचे।

सड़क पर धूप पसरी हुई है। खिड़की से आती धूप बता रही है कि धूप गुनगुनी है। यह गुनगुनी धूप दुनिया में बहुतों को नसीब नहीं है। हमको मुफ़्त में मिल रही। इफरात में। हम इसके मजे लेते हुए सूरज भाई को धन्यवाद देने के लिए मुंडी उनकी तरफ करते हैं तो उनको मुस्कराते देखकर चुप रह जाते हैं। एक किरण भागते हुए आती है और हमारे चेहरे पर कबड्डी जैसी खेलते हुई मस्तियाने लगती है। उसके साथ उसकी अनगिनत सहेलियां भी हैं।

सब मजे से खेल रहीं हैं। धक्कम-मुक्का करते हुए पूरी कायनात को एलानिया बता रही हैं - उठो सोने वालों, सुबह हो गयी है- सुहानी वाली सुबह।


  

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Sunday, December 18, 2016

कैशलेश इकोनामी





अपना देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र की गाड़ी में जनता सवारी होती है। ड्राइवर का काम सरकार करती है। सरकार चलाने के लिये नारों के ईंधन की जरूरत होती है। नारे लगते रहते हैं, सरकार सरपट चलती रहती है। नारे चुके, सरकार गयी।  


पुराने समय में नारे टिकाऊ होते थे। देर तक चलते थे। आराम-हराम है, जय-जवान, जय किसान , गरीबी-हटाओ जैसे नारे पांच-पांच साल खैंच लेते थे सरकार की गाड़ी। एक बार लगा दिया नारा फ़िर पांच साल कोई चिन्ता नहीं। लेकिन समय के साथ जनता के जीभ का स्वाद बदल गया है। जनता एक नारा लम्बे समय तक पसंद नहीं करती। सरकार को मजबूरी में नित-नये नारे गढने पड़ते हैं। न गढे तो आफ़त। उतार देगी जनता। दूसरा ड्राइवर रख लेगी।


पहले ’संयुक्त परिवार’ का जमाना था। एक कमाने वाला होता था दस खाने वाले। फ़िर भी काम चल जाता था आराम से। कमाने वाले की इज्जत होती थी। संयुक्त परिवार के टूटने के हरेक को कमाना जरूरी हो गया।  नारों के भी वही हाल थे। पहले एक नारा पांच साल आराम से खैंच लेता था। नारे इज्जत से लगाये जाते थे। आज के समय में नारों के बुरे हाल हैं। भौत बेइज्जती होती है। लगते ही खिल्ली उड़ाने लगते हैं लोग नारों की। नारों के हाल चुटकुलों सरीखे हो गये हैं। अक्सर तो याद तक नहीं रहते। नारे  एक दफ़िया पासवर्ड’ (OTP)  की तरह हो गये हैं। जैसे हर ट्रान्जैक्शन के लिये नया पासवर्ड चाहिये होता है वैसे ही अब हर दिन एक नया नारा चाहिये।

कैशलेश इकोनामीदेश का एकदम नया नारा है। अभी ट्रायल पर है। कोई कहता है इसके बाद देश धक्काड़े से आगे बढेगा प्रगति पथ पर। दीगर लोग कहते हैं देश के लिये  नया बवाल। लेकिन भैया ऐसे सोचो  तो जिन्दगी ही एक बवाल है। तो क्या जीना छोड़ दोगे। इसलिये शुभ-शुभ बोलो। 

आज के समय में देश में जो जिसमें होना चाहिये वह उसी से हीन हो रहा है। अखबार न्यूजलेशबुद्धिजीवी बुद्धिलेश , नायिकायें टॉपलेश, संसद बहसलेश , नौकरशाही कर्तव्यलेश और जननायक शर्मलेश हो गये हैं वैसे ही भैया आप भी कैशलेश हो जाओ। उसी में बरक्कत है।  जब सरकार ने नारा दिया है तो  लगाना तो पड़ेगा ही। इसलिये कैशलेश हो जाने में भी भलाई है। निभा लेव नारा। कुछ दिन बाद नया नारा आयेगा तब उसको चिल्लाना। 

कोई भी नारा सफ़ल होने के लिये उसके फ़ायदे गिनाना जरूरी होता है। तो आइये आपको गिनाते हैं कैशलेश इकोनामी के फ़ायदे।

 सबसे बड़ा फ़ायदा तो यह कि देश की बाकी सब समस्यायें  कैशलेश होते ही खत्म हो जायेंगे। कोई गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार की बात करे उससे कहा जा सकता है- भैया फ़ौरन कैशलेश हो जाओ, सब बवालों से मुक्ति पाओ।

 अभी 40 करोड़ (कोई कहता है 50 करोड़ कोई 60 करोड़। आप अपने करोड़ अपने हिसाब से तय कर लें) लोगों के बैंकों में खाते ही नहीं खुले। जिनके खाते ही नहीं खुले उनके खाते खुलवाकर उनको कैशलेश बनाने के काम में पूरा देश जुट जाये। जबरियन नसबंदीतर्ज पर जबरियन कैशलेशबनाया। जिसके पास पैसे बरामद हों उसके पैसे जब्तकरके उसको एटीएम थमा दिया जाये। प्रौढ शिक्षा केन्द्रकी तरह गांव-गांव कैशलेश शिक्षा केन्द्रखोले जायें। कैशलेश मित्रबनाये जायें। जो एक बार एटीएम से पैसा निकाल ले उसको कैशेलश साक्षरकी डिग्री दे दी जाये। नौकरी मेंकैशलेश साक्षरको वरीयता दी जाये।

कैशलेश साक्षरहो जाने के बाद अनपढ भी अपना बिना अक्षर पहचाने पासवर्ड प्रयोग करने लगेंगे। इस तरह भारत दुनिया का पहला हो जायेगा जहां अनपढ बिना अक्षर पहचाने उसका प्रयोग करना सीखें चुके होंगे। मास्टर लोग ककहरा सिखाने से पहले बच्चों को पासवर्ड बनाना सिखायेंगे।

एकबार कैशलेश की पटरी पर देश दौड़ने लगा फ़िर तमाम समस्यायें सर पर पैरधरकर फ़ूट लेंगी। छीना, झपटी के मामले कम हो जायेंगे। लोगों के पास जब पैसा  ही नहीं होगा तो लुटेगा क्या खाक? भीख मांगने वाले लोग  अपने बच्चों को मजबूरन स्कूल भेजेंगे। कहेंगे- जा बेटा कम से कम कुछ हैकिंग-सैकिंग सीख ले। कम से कम जिन्दा रहने का जुगाड़ रहेगा। हमारा जमाना गया जब कहीं भी खड़े हो जाते थे कटोरा लेकर तो कुछ मिल जाता था। लोग सिक्का फ़ेंककर निकल थे। आज किसके पास समय है जो हमारी मशीन में आकर कार्ड स्वाइप करके भीख दे। दो चार जो आते भी हैं तो इंटरनेट कनेक्शन ही नहीं मिलता। भीख मांगना अब वोट मांगने से भी गया बीता काम हो गया है। बहुत मेहनत पड़ती है। बिना हैकिंग सीखे अब  गुजारा नहीं।’

आने वाले समय में जगह-जगह हैकिंग सिखाने के स्कूल खुल जायेंगे। उनके विज्ञापन कुछ इस तरह होंगे- ’महीने भर में 1000 रुपये तक कैशलेश कमाई करना सीखें।’

गांवों में नये तरह के साहूकार पैदा होंगे। पहले जमाने के साहूकार लोगों के गहने गिरवी रखकर वुआज पर पैसे देते थे। नये जमाने में उनके कब्जे में लोगों के एटीएम होंगे। जिस साहूकार के कब्जे में जितने ज्यादा एटीएम होंगे वो उतना ही ताकतवर होगा। वे नये बाहुबली होंगे। जनप्रतिनिधि उनके पास ही वोट के लिये जायेंगे।  

गुंडे-बदमाशों की जगह देश में हैकरों की तूती बोलेगी। जिसके पास जितने कुशल हैकर होंगे उसकी मनपसंद सरकार होगी। सरकारें आज समर्थन के अभाव में गिरती हैं। कैशलेश इकोनामीहैक होना शुरु हो जायेंगी। 

कैशलेश होने का एक फ़ायदा यह भी होगा कि लोगों को करोड़ों, अरबों, खरबों के पैसे रखने के लिये जगह की जरूरत नहीं होगी। इससे जो जगह बचेगी उसमें लोगों के रहने की जगह निकल आयेगा। मुफ़्त आवास सुविधा के तहत लोग अपनी इमारतें  गरीबों को दे सकेंगे। 

कैशलेश व्यवस्था का मतलब धन का मूर्त से अमूर्त हो जाना। अभी धन हजार, पांच सौ, दस, पचास के नोट की शक्ल में दिखता है। कैशलेश हो जाने बाद दिखना बन्द हो जायेगा धन का। यह आस्तिकता से नास्तिकता की यात्रा होगी। बिना मार-पीट, खून-खराबे के एक नये तरह का ’आस्थान्तरण’  होगा।

 कैशलेश इकोनामी के आह्वान के बाद देश की सारी असमानतायें खतम हो जायेंगी। देश में केवल दो तरह के होंगे। एक वे जो कैशलेश हो चुके हैं। दूसरे वे जिनको कैशलेश होना है। किसी भी समस्या का हल उनके कैशलेश होने या न होने में ही पाया जायेगा। कोई व्यक्ति अपनी कोई भी समस्या लेकर आयेगा तो उससे कहा जा सकता है-’भैया तुम्हारी सब समस्याओं का हल कैशलेश हो जाने में है। कैशलेश हो जाओ, सब समस्याओं से निजात पाओ।’ अगर कोई कैशलेश हुआ व्यक्ति अपनी कोई परेशानी बताते पाया गया तो उससे कहा जायेगा- ’तुम तो कैशलेश हो गये। अब किस बात की परेशानी तुमको? झूठ बोलते हो तुम। कैशविहीन  हुआ आदमी अपने-आप  परेशानीविहीन माना जायेगा। जाओ भागो यहां से हमको बाकी लोगों को कैशलेश व्यवस्था से जोड़ना है।’ 

खैर यह सब छोड़ो। आप अपनी बताओ कि आप अभी तक ’कैशलेश इकोनामी’ से जुड़े कि नहीं? जल्दी से जुडिये वर्ना आप टापते रह जायेंगे और कोई नया नारा चलन में आ जायेगा।




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Sunday, December 11, 2016

सर्दी का मौसम



दिसम्बर का महीना शुरु होते ही कायनात ने मौसम बदलने की घोषणा कर दी। सर्दी का मौसम आ गया। कोहरे की चादर ओढे  पेड़-पौधे सूरज की तरफ़ मुंह करके खड़े हो गये। एटीएम के बाहर नोट-निकासी के लिये खड़ी जनता की तरह वे सूरज से गर्मी की सप्लाई का इंतजार करने लगे।  किरणों के काम के घंटे कम हो गये। उनके दर्शन दुर्लभ हो गये।  ठण्डक की सप्लाई बढ़ा दी गयी।  सर्दी के  कपड़े निकलने लगे। लोग पहन-ओढकर निकलने लगे। जगह-जगह कूड़े के ढेर के अलाव जलने लगे। लावारिश मौतें ठंड के खाते में जुड़ने लगी।


क्या पता सूरज भाई के यहां भी कोई ’रोशनी घोटाला’ हुआ हो। सूरज के केन्द्र से चली करोंडों-अरबों डिग्री की गर्मी सतह तक आते-आते 6000 डिग्री ही बचती है। किसी ने सोचा यह उजाले का भ्रष्टाचार रुकना चाहिये। अरबों-खरबों के फ़ोटान जहां दबे हैं वे सब निकलने चाहिये। वहां भी नोटबंदी की तर्ज पर ’किरणबंदी’ हो गयी हो। ज्यादा फ़ोटान वाली किरणों की सप्लाई बन्द हो गयी हो। डिकिरणाईजेशन लागू हो गया हो सूरज भाई के यहां भी। इसीलिये सुबह-शाम रोशनी की किरणों की सप्लाई में कमी हो गयी हो। 

ट्रेनों ने  देरी से चलना शुरु कर दिया है। जहाजों की उड़ाने निरस्त होने लगी हैं। मंहगी गाड़ियां रफ़्तार में साइकिलों से मुकाबला करने में जुटी हुई हैं। लोग मुंह की भाप से खुद को गरम करके काम चलाने लगे हैं। मूंगफ़ली टूंगते हुये देश की समस्याओं के हल खोजने के काम में तेजी आ गयी है। चाय की खपत में पूरे देश में इजाफ़ा हो गया है। चाय वालों की पूछ और नखरे बढ़ गये हैं। 

गलियों में कोहरा पसरा हुआ है। लेकिन सड़क के  कोहरे को गाड़ियों ने कुचलकर चिंदी-चिंदी कर दिया है। जो कोहरा कुचले जाने से बचा है उसको गाड़ियों के धुंये ने सुलगाकर खतम कर दिया है। बचा हुआ कोहरा जानबचाकर पेड़ों की टहनियों, पत्तों में जाकर छिप गया है। जान जाने के डर से थर-थर कांप रहा है बेचारा। पेड़ उसके थरथराने से हिलडुल रहे हैं। ऊपर से आती किरणों की सवारी देखकर कोहरे बेचारी की सिट्टी और पिट्टी दोनों गुम हो गयी है।

भीख मांगने वाली का बच्चा कनटोपा पहने अपनी मां से चिपका है। महिला चुपचाप हथेली फ़ैलाये बैठी है। लोग आते-जाते उसको देखते निकल रहे हैं। जेब से हाथ निकालना कठिन होता जा रहा है। पैसा निकालना  तो और भी कठिन। नोटबंदी के समय में कैसलेस भीखकी व्यवस्था का इंतजाम किया ही नहीं है महिला ने। कैसे मिलती भीख? भीख मांगने के लिये भिखारियों को भी वोट मांगने वाले लोगों की तरह आधुनिक होना पड़ेगा।

यह बात हम बचपन से जानते हैं कि सर्दी में चीजें सिकुड़ जाती हैं। लोग अपनी ऊर्जा को बचाकर रखने के लिये कपड़े लादने लगते हैं। दिन में चार बार नहाने वाले , चार दिन में एक बार पानी गिराने लगते हैं। लोग घर से निकलना कम कर देते हैं। 

लेकिन इस बार की सर्दी में नजारे अलग तरह के हैं। लोग एटीएम की लाइनों में पैसे निकालने के लिये खड़े हैं।  सर्दी से मुकाबले के लिये जगह-जगह अलाव की जगह इस बार भाषणों से आग उगलने की व्यवस्था की गयी है। लोग भाषण सुनकर गरम हो रहे हैं। उबल रहे हैं। ठंड से मुकाबले की यह नयी तकनीक विकसित हुई है। आगे चलकर इसका उपयोग पेट की आग बुझाने के लिये भी किया जायेगा। शुरुआती दौर में कुछ समस्यायें आ रही हैं लेकिन लोग लगे हुये हैं इस तकनीक में महारत हासिल करने में। कुछ दिन बाद देश की हर समस्या का इलाज भाषणों से ही होना संभव हो जायेगा। तब शायद हम दुनिया में पहले देश होंगे जहां भाषणों के माध्यम से समस्याओं के हल निकाले गये। अपना देश एक बार फ़िर दुनिया का सिरमौर बन जायेगा। 

लेकिन यह जब होगा तब होगा। फ़िलहाल तो सर्दी का मौसम है। खुद को बचाकर रहिये। पहन-ओढकर घर से निकलिये। मफ़लर कसकर रखिये। कपड़े न हों तो कोई बात नहीं, सिकुड़कर रहिये। जितना सिकुड़ेंगे, आपके जिन्दा रहने की संभावनायें बढती जायेंगी। 

क्या सोच रहे हैं भाई ! सिकुड़िये जल्दी से । आपके सिकुड़ने से जो जगह निकलनी है उस पर कब्जा करने के लिये अकड़े हुये लोग इंतजार कर रहे हैं। देरी करेंगे तो जनहित/देशहित में वे आपको  रगड़ देंगे।

जिन्दा रहने के लिये सिकुड़कर रहना सीखना आना चाहिये।


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