Friday, December 29, 2017

झाड़े रहो कलट्टरगंज


और अंतत: किताब तैयार ही हो गयी -झाड़े रहो कलट्टरगंज। इस साल की तीसरी किताब। कल छापाखाना में गई किताब। इसके पहले ’सूरज की मिस्ड कॉल’ और ’आलोक पुराणिक- व्यंग्य का एटीएम’ तैयार हो ही गयी थी। सूरज की मिस्ड कॉल तो छप भी गयी है। छापेखाने से निकल चुकी है। जिन लोगों ने आर्डर की होगी उन तक पहुंचेगी आहिस्ते-आहिस्ते - जाड़े में गुनगुनी धूप की तरह। गुनगुनी धूप से याद आई यह बात:
"तुम्हारी याद
गुनगुनी धूप सी पसरी है
मेरे चारो तरफ़।
कोहरा तुम्हारी अनुपस्थिति की तरह
उदासी सा फ़ैला है।
धीरे-धीरे
धूप फ़ैलती जा रही है
कोहरा छंटता जा रहा है।"
किताब पहुंचने तक धूप एकदम बालिग होकर खूबसूरत हो जायेगी।
अब इस किताब का नाम ’ झाड़े रहो कलट्टरगंज’ रखने के पीछे का कारण भी जान लीजिये:
"किताब का नाम ’झाड़े रहो कलट्टरगंज’ रखा गया। यह नारा कनपुरिया मस्ती का पर्याय है। कभी ’भारत का मैनचेस्टर’ कहलाने वाला शहर कुली-कबाडियों के शहर में बदलते हुये अब देश के सबसे प्रदूषित आधुनिक शहरों में शामिल होने को बेताब है। लेकिन इस सबसे बेपरवाह मस्ती की अंतर्धारा शहर की हवाओं में लगातार बहती रहती है। अपने शहर के इस बेलौस फ़क्कड़ मिजाज से जुड़ने की ललक और लालच के चलते ही इस किताब का नाम - ’झाड़े रहो कलट्टरगंज’ रखा गया। जिस भी पूर्वज ने यह मस्ती भरा नारा इजाद किया हो उसकी याद को नमन करते हुये उसके प्रति आभार व्यक्त करता हूं।"
किताब का कवर पेज Kush ने बनाया है। बहुत कोशिश के बावजूद कवर पेज में कुश साइकिल न घुसा सके। वह फ़िर कभी। बहुत जल्दी ही किसी किताब में आयेगी।
किताब की भूमिका लिखने का काम किया Alok Puranik ने। उन्होंने मौके का फ़ायदा उठाते हुये मौज ले ली अनूप शुक्ल से:
"अनूप शुक्ल बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। वृतांत लेखन गजब करते हैं, कैमरे के साथ प्रयोग खूब किये हैं। अफसर भी हैं और उसके बावजूद इंसान भी बने हुए हैं। उत्साही और उत्सुक विकट हैं, मंगल ग्रह पर साइकिल से चलेंगे-ऐसा प्रस्ताव कोई उन्हे मजाक में भी दे दे, तो शाम को साइकिल लेकर घर आ जायें कि चलो बता हुई थी ना चलो मंगल की तरफ। ऐसा इंसान व्यंग्य लेखन खूब कर सकता है औऱ जम के कर सकता है। वहां असल में क्या हो रहा है, यह देखने की उत्सुकता-यह व्यंग्यकार को बहुत कच्चा माल दिलाती है। अनूप शुक्ल साइकिल रोककर नदी के किनारे के उस कोने में चले जाते हैं, जहां बालक जुआ खेल रहे होते हैं और एक बालिका बालकों को डपट रही होती है-क्यों बे बड़ा दांव क्यों नहीं लगाते। अनूप शुक्ल किसी रेहड़ी पर फल बेचनेवाले की जिंदगी में पूरा झांकने की सामर्थ्य रखते हैं। मानवीय चरित्र को कई कोणों से परखने में उनकी गहरी रुचि है।"
अपन ने भी फ़ौरन बदला चुकाते हुये किताब का समर्पित कर दी उनको यह लिखते हुये:
"व्यंग्य के अखाड़े के सबसे तगड़े पहलवान
व्यवस्थित आवारा , बहुधंधी फ़ोकसकर्ता
आलोक पुराणिक के लिये
जो हमेशा नित नये प्रयोग करते हुये
यह बताते और जताते रहते हैं कि
सिर्फ काम ही समय की छलनी की पार ले जाता है।"
बाकी जो है किताब में है। किताब मंगाने के लिये इस कड़ी पर पहुंचिये।
1. http://rujhaanpublications.com/pr…/jhaade-raho-kalattarganj/
सूरज की मिस्ड कॉल मंगाने के लिये इधर क्लिकियाइये
आलोक पुराणिक - व्यंग्य का एटीएम पाने के लिये इधर आइये
व्यंग्य का एटीएम और सूरज की मिस्ड कॉल का काम्बो पैक इधर पाइये।
4. http://rujhaanpublications.com/…/combo-offer-suraj-ki-miss…/
सभी किताबें पुस्तक मेले में रुझान प्रकाशन के स्टॉल पर उपलब्ध रहेंगी।

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Thursday, December 28, 2017

ये दुनिया बड़ी तेज चलती है


अंतरिक्ष बहुतों की तरह हमारे लिये भी जिज्ञासा का विषय रहा है। बचपन से अब तक इत्ती बातें पढ़ीं हैं कि बहुत कुछ तो गड्ड-मड्ड हो गयी हैं। कोई बताता है सारी आकाश गंगायें एक-दूसरे से दूर भागी जा रही हैं। भागी जा रहीं हैं। ऐसी-वैसी स्पीड से नहीं प्रकाश की स्पीड से। मतलब तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड! मतलब अपनी राजधानी एक्सप्रेस भी तेज! 
मैं सोचता हूं कब तक भागेंगी ये आकाश गंगायें। काहे को भागी चली जा रही हैं। कहां तक जायेंगी? कभी हांफ़ते हुये सुस्ताने की बात भी करेंगी क्या?
हम तो इस पर कवितागिरी भी कर दिये थे :):
ये दुनिया बड़ी तेज चलती है ,
बस जीने के खातिर मरती है। पता नहीं कहां पहुंचेगी ,
वहां पहुंचकर क्या कर लेगी ।
हमारी औकात देखिये। ससुर छह फ़िटा आदमी ताजिदगी ऐंठा रहता है। हिटलर की तरह गरदन अकड़ाये! साठ-सत्तर साल में गो-वेन्ट-गान हो लेता है। बड़े उछल के कहते हैं इत्ती स्पीड से गाड़ियां चलती हैं। ये है वो है! ये तीर मार लिया वो जलवे दिखा दिये। ये झगड़े निपटा दिये वो बलवे करा दिये!
मतलब हमका अईसा वईसा न समझो हम बड़े काम की चीज!
तुलना करिये जरा! सबसे पास जो तारा है सूरजजी के बाद वाला उस तक पहुंचने में प्रकाश को चार साल से ज्यादा लगते हैं। तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड के हिसाब से लगातार चार साल से ज्यादा चलो तब पहुंचो उसके द्वारे।
सूरज अपना माल ऊर्जा जो फ़्री में सप्लाई करते हैं उसको हम तक पहुंचने में आठ मिनट लग जाते हैं। लोग कहते हैं अगर हम अपने पास उपलब्ध सबसे तेज साधन से भी चलें तो भी पहुंचने में पचास-साठ पीढ़ियां निपट लेंगी। अब अगर वहां जाने की बात करी जाये जहां से हम तक प्रकाश पहुंचने में हज्जारों साल लेता है तो कित्ते साल में पहुंचेंगे। सोचते हैं और बस सोचते ही रह जाते हैं। सोचने में कुछ पल्ले से जाता नहीं है न! 
उधर दूसरे बयान भी हैं! हनुमान जी सूरज को मधुर फ़ल जान कर लील जाते हैं! लक्ष्मण कहते हैं अगर राम जी आज्ञा दें तो इस ससुरे ब्रम्हाण्ड को गेंद की तरह उठाकर कच्चे घड़े की तरह फ़ोड़ दूं:
जौ राउर अनुशासन पाऊं। कंदुक इव ब्रम्हाण्ड उठाऊं॥
कांचे घट जिमि डारौं फ़ोरी। सकऊं मेरू मूलक जिमि तोरी॥
इसी बहाने हमें आज फ़िर लगा कि जब आदमी गुस्सा होता है तो तर्क उसके पास से विदा हो लेता है। अब बताओ दुनिया को उठाओगे गेंद की तरह और फोड़ोगे घड़े की तरह! दूसरी बात कि जब आप खुद ब्रम्हाण्ड में मौजूद हैं तो उसे उठायेंगे कैसे! हो सकता कि प्रभु भक्तों के पास कोई भक्तिपूर्ण तर्क हो इस बात का। लेकिन सहज बुद्धि की बात है अपनी सो कह गये। भक्तगण क्षमा करेंगे। 
लोग कहते हैं कि अगर आदमी की गति प्रकाश की गति से तेज हो तो वह अतीत में जा सकता है। अतीत की घटनाओं को नियंत्रित कर सकता है। गणितीय सूत्रों से भी यह बात तय पायी गई। लेकिन वैज्ञानिको ने शायद इसे सहज बुद्धि के तराजू पर तौल कर खारिज कर दिया। उनका कहना है कि अगर ऐसा होगा तो कोई अतीत में जाकर अपने मां-बाप का टेटुआ दबा देगा। फ़िर उसकी पैदाइश डाउटफ़ुल हो जायेगी।
क्या बतायें बहुत उलझ से गये दुनिया के बारे में सोचते-सोचते। कहते हैं लोग कि ब्रम्हाण्ड में हर क्षण हजारों तारे जन्म ले रहे हैं, हजारों मर रहे हैं। एक दूसरे से दूर भाग रहे हैं! नजदीक भी आ रहे हैं। कृष्णजी तो सब कुछ अपने मुंह में दिखा दिये थे अर्जुन को। बेचारे इत्ता डर गये कि मरने-मारने पर उतारू हो गये।
न जाने कित्ती बड़ी है दुनिया। अभी तो हमारे और हमारी फ़ैक्ट्री तक सीमित है! जा रहे हैं अपनी दुनिया में! 

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Sunday, December 24, 2017

नानी की दुकान


भोपाल की सुबह बड़े तालाब के किनारे टहलते हुए बीती। लौटते हुए नानी की दुकान पर चाय पी गयी। पोहा खाया गया।
दो महीने हुए नानी को अपनी दुकान लगाए। इसके पहले एक हॉस्टल में बच्चों के लिए खाने-पीने का इंतजाम देखती थी। इंजीनियर बच्चे पहले साल सीधे होते हैं, दूसरे साल में शरारतें सीख जाते हैं। इसीलिए तीसरे साल के बच्चों को हॉस्टल में नहीं रखती थीं।
नानी की दुकान नाम नातिन , रोशनी के, कहने पर रखा गया।
हौसला गजब का। हाईस्कूल तक पढ़ीं हैं नानी लेकिन भाषा पर चकाचक अधिकार। पति 28 साल पहले नहीं रहे।
पोहा और चाय चकाचक। दोनों के दाम पांच रुपये। हमने कहा- 'हमारी तरफ से आप भी चाय पियो, पोहा खाइए।' उन्होंने चाय तो पी लेकिन पोहा बोलीं -अभी खाएंगे।
सुबह पोहा, फिर समोसा, फिर पूड़ी-सब्जी और दीगर नाश्ते की व्यवस्था। घर परिवार की तमाम बातें साझा हुईं। बताया की उनका नाम कांता शुक्ला है।
सामने ही नानी की नातिन रोशनी धूप में अखबार बांच रही थी। हमने पूछा - "नानी को कुछ सहयोग करती हो? " वह बोली -"गल्ला काटते हैं।" गल्ला काटना मतलब काउंटर पर बैठना।
नानी के देवर बड़े लेखक हैं। कोई व्यास जी। नानी कोई और काम भी करना चाहती हैं। आगे बढ़ना चाहती हैं।
नानी की चाय पीकर और उनके हौसले की तारीफ करते हुए हम वापस लौटे।

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भोपाल में प्रवासी मजदूर




सवेरे जब आगे चले से तो देखा एक भाई जी तालाब की मुंडेर पर बैठे दातुन कर रहे थे। पता किया तो मालूम हुआ कि भाई जी बैतूल के एक गांव के रहने वाले हैं । भोपाल काम के सिलसिले में आए थे । यहीं पर रोज मेहनत मजदूरी करके गुजारा करते हैं। पास में केवल एक झोले में कुछ कपड़े थे।
हमने पूछा कैसे गुजारा होता है? रात कहां सोते हैं ? तो सामने के पार्क की तरफ इशारा करके बोले वहीं सो जाते हैं। मजदूरी कभी मिलती है , कभी नहीं मिलती। बैतूल के गांव में पूरा परिवार है। यहां भोपाल में कमाई के लिए आए हैं ।
उनसे बात करके हम आगे ही पड़े थे कि देखा एक भाई जी शीशे में चेहरा देखते हुए बाल काढ़ रहे थे। तल्लीनता से। हमको देखकर थोड़ा ठिठके। लेकिन फिर बाल संवारने में जुट गए। उनको देखकर भी यही लगा वे भी आसपास के किसी इलाके से यहां रोजी-रोटी के चक्कर में आये हैं।
इन दोनों लोगों को देखकर एहसास हुआ कि जिंदगी के कितने रूप हैं। किसी के लिए सुगम, सुखद, सुहानी और किसी के लिए कठिन, जटिल और चुनौती भरी।

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Saturday, December 23, 2017

अपन सही तो सब सही



भोपाल स्टेशन गाड़ी पहुंची डेढ़ बजे। मल्लब केवल 4 घण्टे लेट। स्टेशन पर ही चाय पी। घर के बाद की पहली ठीक चाय। इसके पहले कानपुर , झांसी में पी लेकिन वह स्टेशन की चाय की तरह ही थी। फ़ीकी, बेस्वाद, ठण्डी।



हमने जुमला भी सोच लिया था -'अपने देश की स्टेशन की चाय और जनसेवक कभी सुधर नहीं सकते। ' लेकिन फिर लिखा नहीं। सच क्या लिखें बार-बार बेफालतू में।
स्टेशन पर चाय की दुकान पर एक आदमी चाय वाले से बतिया रहा था। किसी बात पर बोला -'किसी भोपाली की बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए। '
हमने उसकी इस बात पर भरोसा करते हुए पूछा - 'फिर जो पता और रास्ता बताया उस पर भरोसा करें कि नहीं?' वह हंसने लगा।
बाहर रसीद मियां मिले। ऑटो वाले। बोले 180 रुपये लेंगे। हमने ओला चेक किया । किराया बताइस 185 रुपया । हम बैठ गए ऑटो में। बतियाते हुए आये। आने के पहले। स्टेशन पर ही सचिन भाई से 500 के फुटकर ले लिए रसीद भाई ने।
27 साल से ऑटो चला रहे हैं रसीद। रात को निकालते हैं ऑटो। 150 रूपया किराया। तीन -चार सवारी मिल गई तो काम हो गया। दिन में सोते हैं। हमारे रूप में पहली सवारी मिली रात 2 बजे।
'अपन सही तो सब सही' मानने वाले रसीद के खुद के ऑटो थे। 3-4रखे। फिर बेंच दिये। कौन कागद के झंझट में पड़े। किराए वाले में 150 रुपये दिए। चलाया। खड़ा कर दिया।
दोनों बेटे काम करते हैं रसीद के। एक कपड़ा मिल में, दूसरा दर्जी है। बेटी 12 वीं में पढ़ती है। कोई नशा नहीं। दाल-रोटी मजे में चल जाती है।
जरा देर में ही आ गए गेस्ट हाउस। रात में चाय बनवाई । मजे से पीते हुए फेसबुकिया स्टेटस बांचते रहे। देखा कि आलोक बाबू ट्रेन से पिछली पोस्ट को लाइक करते पाये गए। वो भी आ रहे हैं भोपाल। पहला ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान समारोह है कल। कैलाश मन्डलेकर जी को मिलना है।
इस सम्मान की मूल भावना से असहमत रहे अपन। इस बारे में विस्तार से लिख भी चुके। लेकिन जब हो रहा है तो आ ही गए भोपाल। अब ज्यादा कुछ लिखेंगे तो सुशील जी अनफ्रेंड और ब्लाक कर देंगे। वे थानवी जी के बाद दूसरे नम्बर के 'ब्लाक प्रमुख' हैं।खैर पहुंच गए मौका-ए-वारदात पर। इसी बहाने तमाम दोस्त लोगों से मिलना होगा।
इस सम्मान के बहाने कैलाश मन्डलेकर जी से परिचय हुआ। बढिया लिखते हैं।
इनाम शुरू हुआ भोपाल के ज्ञानजी के नाम पर। घोषणा की दिल्ली के सुशील सिद्धार्थ जी ने। इंतजाम का जिम्मा ठेल दिया भोपाल के लोगों पर।संयोजक सुशील जी ट्रेन में मजे से सो रहे होंगे। बेचारे भोपाल वाले आने वालों की ट्रेन की आवाजाही देख रहे हैं। हमको भी शांतिलाल जी के कई संदेशे दे चुके। अपन आ गए। मजे में हैं ।
अब फिलहाल इतना ही। बाकी की खबर सुबह।

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Thursday, December 21, 2017

झाड़े रहो कलट्टरगंज - नया हास्य-व्यंग्य संग्रह

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 5 लोग
पिछले इतवार को लैपटॉप लेकर बैठे तो पिछले चार-पांच साल में लिखे गये हास्य-व्यंग्य लेख उछल-उछलकर हल्ला मचाने लगे कि हमको किताब में कब जगह मिलेगी, हम कब विमोचित होंगे? हम कब पुस्तक मेले जायेंगे?
हमने पहले तो डपट दिया - क्या जनसेवकों की तरह हरकतें करते हो जिनको जनसेवा के लिये सांसद/विधायक/मंत्रीपद ही चाहिये।
लेकिन फ़िर लगा कि लेखों की मांग इत्ती नाजायज भी नहीं। लेखों का मन लेखकों जैसा ही तो होगा। लेखक का मन होता है उसके लिखे की किताब आये तो लेखों का भी सहज मन होता है कि वे किताब में आयें।
खैर फ़िर बईठ के छांटे लेख और किताब की पांडुलिपि बनाकर भेज दी, अपनी बात और समर्पण सहित अपने मेहनती प्रकाशक Kush Vaishnav के पास। भूमिका के लिये अपने व्यंग्य बाबा Alok Puranik को पकड़ा और याद दिलाया कि मंडी हाउस में इस बार चाय के पैसे हमने दिये थे। भाई साहब ने फ़ौरन भूमिका लिख भेजी। मजे लेते हुये अनूप शुक्ल के। देखिये क्या लिखते हैं वे :
"अनूप शुक्ल बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। वृतांत लेखन गजब करते हैं, कैमरे के साथ प्रयोग खूब किये हैं। अफसर भी हैं और उसके बावजूद इंसान भी बने हुए हैं। उत्साही और उत्सुक विकट हैं, मंगल ग्रह पर साइकिल से चलेंगे-ऐसा प्रस्ताव कोई उन्हे मजाक में भी दे दे, तो शाम को साइकिल लेकर घर आ जायें कि चलो बता हुई थी ना चलो मंगल की तरफ। ऐसा इंसान व्यंग्य लेखन खूब कर सकता है औऱ जम के कर सकता है। वहां असल में क्या हो रहा है, यह देखने की उत्सुकता-यह व्यंग्यकार को बहुत कच्चा माल दिलाती है। अनूप शुक्ल साइकिल रोककर नदी के किनारे के उस कोने में चले जाते हैं, जहां बालक जुआ खेल रहे होते हैं और एक बालिका बालकों को डपट रही होती है-क्यों बे बड़ा दांव क्यों नहीं लगाते। अनूप शुक्ल किसी रेहड़ी पर फल बेचनेवाले की जिंदगी में पूरा झांकने की सामर्थ्य रखते हैं। मानवीय चरित्र को कई कोणों से परखने में उनकी गहरी रुचि है।"
जब इत्ता सब हो गया तो फ़िर किताब आ ही जानी चाहिये न ! इतवार की शाम को शुरु हुई किताब का कवर पेज भी कुश ने वुधवार को बना दिया। फ़िर क्या बन गई किताब - झाड़े रहो कलट्टरगंज !
’झाड़े रहो कलट्टरगंज’ लिखा तो बोला हम किताब का शीर्षक बनेंगे। हम बोले बन जाओ। कौन रोकता है भईया तुमको। तो भाई किताब का शीर्षक भी तय भी हो गया - झाड़े रहो कलट्टरगंज !
तो इसी बहाने लेखक की पांचवी किताब और इस साल इस महीने की भी छपने वाली तीसरी किताब फ़ाइनल हो गयी - झाड़े रहो कलट्टरगंज।
बधाई -सधाई दीजिये वो तो ठीक है लेकिन यह भी बताइये कि कवर पेज कैसा है?

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Tuesday, December 19, 2017

चुनाव के बाद वोटिंग मशीन


1. गुंडा जब अपने दीन-धरम छोड़ देता है तो नेता हो जाता है।
2. जिन महिलाओं से छेड़छाड़ होती है उसके जिम्मे सफ़ाई देने का ही काम बचता है।
3. गुंडों के बीच फ़ंसना तो नेताओंं के बीच फ़ंसने से सौ गुना बेहतर है!
4. नेताओं से ज्यादा उनके पिछलग्गुओं से डर लगता है।
चुनाव के बाद वोटिंग मशीने सुस्ता रहीं थी। आपस में अपने-अपने किस्से सुना रही थीं। लोगों ने कैसे उनका उपयोग किया। कैसे वोट डाला। कैसे दबाया। कैसे सहलाया। आइये सुनाते हैं कुछ उनकी गप्पागाथा:
ईवीएम 1: एक वोटर ने तो इत्ती जोर से बटन दबाया कि अभी तक दर्द कर रहा है। लगता है अगले चुनाव में चल न पायेंगे हम।
ईवीएम 2: याद आ रही है क्या उस वोटर की?
ईवीएम 3: अरे उसकी याद की कड़ाही में तू काहे अपनी जलेबी छान रही है? तुमको किसी की याद नहीं आती तो क्या किसी को नहीं आयेगी? क्यों री दर्द कैसा हो रहा है मीठा कि खट्टा?
ईवीएम 1: भक्क उस तरह वाला दर्द थोड़ी हो रहा। तुम तो सबको अपनी तरह समझ लेती हो। सबके भाग्य में वो मीठा-खट्टा दर्द कहां?
इस गप्पाष्टक को एक बुढिया ईवीएम मशीन दूर से सुन रही थी। अंजर-पंजर ढीले होने के चलते उसको चुनाव में ले नहीं जाया गया था। ऊंचा सुनती थी । इसीलिये दूर की बातों पर कान लगे रहते थे।
बुजुर्गा ईवीएम आवाज में बोली- ’सुना है तुम लोगों से कुछ छेड़छाड़ हुई वहां चुनाव में। तुम लोग भी छेड़छाड़ में इत्ती बेसुध हुई कि वोट दिये किसी और को गये पर तुमने गिनाये किसी और के नाम।’
छेड़छाड़ के नाम से ईवीएम मशीने एकदम प्याज-टमाटर की तरह लाल हो गयीं। (बुजुर्ग और सांवली मशीने प्याज की तरह, युवा और गोरी टमाटर की तरह) लेकिन उनको लगा कि लाल होने से काम नहीं चलेगा तो सफ़ाई देने लगीं। वैसे भी जिन महिलाओं से छेड़छाड़ होती है उसके जिम्मे सफ़ाई देने का ही काम बचता है।
वे बोलीं-- ’हम लोग कोई ऐसी-वैसी मशीन थोड़ी हैं। हमको कौन छेड़ेगा। हम कोई खूबसूरत टाइप मशीन भी नहीं जो हमको कोई छेड़े। खूबसूरत होती तो कोई हीरो-हीरोइन हमारा विज्ञापन करता। भले घर की लड़कियों की तरह हम चुनाव आयोग के गोदाम से सीधे पोलिंग बूथ जाते हैं वहां से सीधे वापस आ जाते हैं। कहीं इधर-उधर ताकते तक नहीं। झांकने की तो बात ही छोड़ दो। ’
सफ़ाई से बुजुर्ग ईवीएम मशीन और उत्साहित हो गयी। बोली-’ लेकिन जब हवा उड़ी है तो कुछ तो बात हुई ही होगी कि छेड़छाड़ का हल्ला है। हमने भी चुनाव करवाये हैं। हमको भी लोगों ने दबाया है। इधर-उधर थपथपाया है। किसी-किसी ने तो पटका भी है। खटखटाकर भी वोट डाला है लेकिन मजाल है जो आजतक किसी ने छेड़छाड़ की हो। तुम लोगों ने जरूर कुछ ऐसा किया होगा जो छेड़छाड़ की खबर फ़ैली। लाख समझाओ लेकिन तुम लोग मनमानी से बाज कहां आते हो। ये नयी हवा का असर है।’ बुढिया ईवीएम बड़बड़ाते हुये खांसने लगी।
फ़िर तो सब ईवीएम मशीने छेड़छाड़ का आरोप लगाने पर फ़िरंट हो गयीं। पता लगा कि मशीनों से छेड़छाड़ का आरोप लगाने वाले वही लोग थे जो हार भी गये थे। उनको इस बात से तसल्ली हुई कि जीते हुये लोगों ने उन पर छेड़छाड़ का आरोप नहीं लगाया।
फ़िर तो ईवीएम मशीनों के सुर बदल गये। वे ठिठोली करते हुये बतियाने लगीं।
बकने दो हरंटो को। सरकार तो हमारे समर्थन में होगी।
तब क्या एक ने नारा लगाया:
"जिसके साथ खड़ी हो सरकार
उसको कौन बात का डर यार।"
जिसने हम पर छेड़खानी की बात कही उसको अगले चुनाव में टिकट न मिले।
अरे नहीं री। टिकट तो मिले लेकिन टिकट के दाम दोगुने हो जायें।
और टिकट जिस इलाके से मिलें उस इलाके में उसको कोई जानता न हो।
फ़िर तो वो जीत जायेगा बे। लोग उसकी करतूतें जानेंगे नहीं तो भला समझ कर जिता देंगे।
दिन भर इसी गपड़चौथ में जुटी एवीएम मशीनों ने शाम को महसूस किया कि वे तो अपनी छेड़छाड़ के ही किस्से में जुटी रहीं।
एक बोली- ’इस चुनाव में हम ईवीएम के हाल तो रजिया की तरह हो गये तो जो नेताओं के चक्कर में फ़ंस गयी हो।’
अबे रजिया तो गुंडों के बीच फ़ंसी थी। -दूसरी ने सुधारने की कोशिश की।
हां यार। रजिया की किस्मत अच्छी थी जो गुंडों के बीच फ़ंसी थी। हमारे ही करम फ़ूटे हैं जो नेताओं के बीच फ़ंस गये।- तीसरी न कहा।
ये क्या आंय-बांय-सांय बक रही है तू। क्या चुनाव सभा में भाषण दे रही है। गुंडों के बीच फ़ंसना अच्छी किस्मत है? - चौथी ने हड़काया।
गुंडों के बीच फ़ंसना तो नेताओंं के बीच फ़ंसने से सौ गुना बेहतर है यार- दूसरी ने समझाया।
कैसे ? -कईयों ने एक साथ पूंछा।
गुंडों का कुछ तो दीन-धरम होता है। गुंडा जब अपने दीन-धरम छोड़ देता है तो नेता हो जाता है।’- दूसरी ने अनुभवामृत बांटा।
सही कह रही है तू। लेकिन इस बात को बाहर किसी से कहना नहीं वर्ना लोग जीना दूभर कर देंगे। अभी छेड़छाड़ की बात कही फ़िर न जाने क्या गत करायें हमारी। नेताओं का कोई भरोसा नहीं आजकल।
हमको तो नेताओं से ज्यादा उनके पिछलग्गुओं से डर लगता है।
न जाने कौन जनम के पाप थे तो हम ईवीएम मशीन बने। एक ईवीम मशीन ने अपना मत्था ठोंकते हुये कहा।
एक भक्तिन टाइप ईवीएम मशीन रामचरित मानस की चौपाइयां बांचने लगी:
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा
जो जस करै तो तस फ़ल चाखा।
दूसरी पैरोडीबाजी करने लगी:
कोऊ नृप होय हमें का हानी
ईवीएम छोड़ न होइहैं रानी।
हम ईवीएम मशीनों को उनके हाल पर छोड़कर चले आये। कर भी क्या सकते थे?

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Friday, December 08, 2017

सड़क पर जाम, एक नया झाम


समय के साथ तमाम परिभाषायें बदल जाती हैं।
पहले दूरी का मात्रक मील/किलोमीटर हुआ करता था। फ़िर घंटे/दिन हुआ। किदवई नगर से स्टेशन आधा घंटा की दूरी पर है। चमनगंज से फ़जलगंज एक घंटा। भन्नाना पुरवा से माल रोड पौन घंटा।
इधर जाम ने दूरी के सारे मात्रकों का हुलिया बिगाड़ के धर दिया है। हर मात्रक में जाम का हिस्सा शामिल हो गया है। अगर जाम नहीं मिला तो आधा घंटा। अगर जाम मिल गया तो खुदा मालिक। जाम ने दुनिया की सारी दूरियां बराबर कर दी हैं। आप हो सकता है कि लखनऊ से लंदन जित्ते समय में पहुंच जायें उत्ते समय में( जाम कृपा से) लखनऊ से कानपुर न पहुंच सकें। शहरों में रहने वाले लोग जाम से उसी तरह डरते हैं जिस तरह शोले फ़िल्म में गांव वाले गब्बर सिंह से डरते थे। शहरातियों की जिंदगी में ट्रैफ़िक-जाम उसी तरह् घुलमिल गया है जिस तरह नौकरशाही में भ्रष्टाचार।
जाम की खूबसूरती यह है कि यह हर गाड़ी को समान भाव से अटकाता है। मारुति 800 और हीरो हांडा में यह कोई भेदभाव नहीं करता। खड़खड़े और टेम्पो को बराबर महत्व देता है। टाटा का ट्रक और बजाज की मोटरसाइकिल इसको समान रूप से प्रिय हैं। यह सबको समान भाव से अपने प्रेमपास में लपेटता है। जाम के ऊपर कोई यह आरोप नहीं लगा कि उसने कोई गाड़ी घूस लेकर निकाल दी।
जाम का दर्शन दिव्य है। जाम में फ़ंसा हुआ आदमी कोलम्बस हो जाता है। वह दायें-बांये,आगे-पीछे, अगल-बगल से होकर जाम से निकल भागना चाहता है। जाम में फ़ंसा हुआ हर व्यक्ति मुक्ति का अमेरिका पाना चाहता है। लेकिन जाम उसे और फ़ंसा देता है। वापस भारत में पटक देता है। हर गलत साइड से निकलता आदमी दूसरे को रांग साइड चलने के टोंकता है। हर चालक आपसे जरा सा साइड देने की बात करता है।
कुछ गीत अगर आज के समय में दुबारा लिखे जाते तो उनमें जाम जरूर शामिल होता:
हम तुम्हे चाहते हैं ऐसे, मरने वाला कोई जिंदगी चाहता हो जैसे
अगर आज लिखा तो शायद लिखा जाता तो शायद इस तरह बनता-
हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे, जाम में फ़ंसा कोई उससे निकलना चाहता हो जैसे मरने का अनुभव हरेक को नहीं होता। लेकिन जाम के अनुभव की बात से यह गाना ज्यादा अपीलिंग होता। ज्यादा लोगों तक पहुंचता।
सडकों में जाम लगने के कारण मांग और आपूर्ति वाले घराने के हैं। गाड़ियां ज्यादा सड़कें कम। ज्यादा समय नहीं लगेगा जब शहरों में गाड़ियों का कुल क्षेत्रफ़ल शायद शहरों की सड़कों के क्षेत्रफ़ल से आगे निकल जाये। सड़कें का कुल क्षेत्रफ़ल कम गाड़ियों का ज्यादा। आज भी गाड़ी बेचने वाली कंपनिया तमाम तरह के आफ़र दे रही हैं। कल को शायद वे गाड़ी बेंचने के लिये गाड़ी के साथ एकाध किलोमीटर सड़क भी उपहार में दें। गाड़ी के साथ शहर से साठ किलोमीटर दूर एक किलोमीटर की सड़क आपकी गाड़ी के लिये मुफ़्त में। आप कभी भी वहां ले जाकर अपनी गाड़ी चला सकते हैं। पहली बार गाड़ी ले जाने की व्यवस्था कंपनी की तरफ़ से की जायेगी। इसके बाद आपको खुद ले जानी होगी।
इस समस्या से निपटने के लिये तमाम व्यवहारिक/तकनीकी उपाय भी सोचें जायेंगे। जाम का आने वाले समय में क्या प्रभाव हो सकता है देखिये तो सही:
1. सड़कों पर गाड़ी रखने की जगह कम होने के चलते गड़ियां इस तरह की बनने लगेंगी कि उनको चारपाई की तरह खड़ा करके धर दिया जायेगा।
2. घर आकर जैसे कपड़े खूंटियों पर टांग दिये जाते हैं वैसे ही गाड़ियों को भी दीवारों पर टांगने की व्यवस्था होने लगे।
3. गाड़ियों के फ़ौरन खोलने की व्यवस्था होने लगे। जो हिस्सा अटका जाम में उसको लपेट के अंदर कर लिया और निकल गये।
4. गाडियों को तहाकर होल्डाल की तरह लपेट सकने का जुगाड़ होने लगे गाड़ियों में।
5. गाड़ियां इत्ती हल्की बनने लगें कि चारपाई की तरह उसको सर पर उठाकर जाम के झाम से निकल जाने का जुगाड़ हो।
6.हर गाड़ी अपने साथ एकाध किलोमीटर फ़ोल्डिंग सड़क लेकर चले शायद। जहां फ़ंसे अपनी गाड़ी से सड़क निकाली, बिछायी और फ़ुर्र से निकल लिये।
घर से निकलने से पहले ज्योतिषियों की सेवायें लेने लगें लोग! ज्योतिषी लोग आपके गंतव्य और गाड़ी की कुंडली मिलाकर देखें और बतायें कि कित्ते गुण मिलते हैं। जिस मामले में गुण कम मिलें उस तरफ़ आप न जायें। जिधर मिल जायें उधर निकल लें। क्या पता कल को जाम के कारण हमेशा ठिकाने से दूर रह जाने वाली गाड़ियों के लिये कालसर्प योग पूजा की व्यवस्था भी हो जाये।
लोग जाम के चलते रात-विरात यात्रा करने लगें। फ़िर सूनसान अंधेरे में होने वाले अपराध कम हो जायेंगे। लोग शायद सलाह देने लगें- दिन के उजाले में चलने की क्या जरूरत। रात को निकलना चाहिये जब सड़कों पर खूब गाड़ियां चलती हैं।
शहरों में सड़क के लिये जगह कम होने के कारण गाड़ियों के चलने के लिये गांवों में सड़क बनाई जायें। इससे गांवों का मजबूरी में विकास होने लगे।
शहरों की सड़कों पर जाम के चलते देहात से शहर आने वालों का पलायन रुक जायेगा। लोग कहेंगे कि जब शहर में जाकर जाम में ही फ़ंसना है तो अपना गांव क्या बुरा है। यहां भी तो अब जाम की व्यवस्था करा दी है सरकार ने।
हो सकता है आने वाले समय में शहर में लगने वाला जाम शहर की समृद्धि का पैमाना बन जाये। औसत पांच घंटे वाले जाम को औसत तीन घंटे जाम वाले शहर से ज्यादा समृद्ध माना जाये ।
इन उपायों को देखकर आपको अंदाजा लग गया होगा कि हम जाम की समस्या से कित्ता हलकान हैं।
लेकिन यह पोस्ट करने समय हम यह भी सोच रहे हैं कि कोई मंहगाई/भूख से पटकनी खाया इंसान अगर इसे देखेगा तो शायद कहे, ” ससुर के नाती -जाम की समस्या तो बढ़ती गाड़ियों के चलते हुयी जो कि दो सदी पहले से बनना शुरू हुई। लेकिन आदमी तो न जाने कब से बनना शुरु हुआ था इस दुनिया में। उसके पेट में भूख का जाम तो सदियों से लगा हुआ है। भूख से मरता आदमी कब तुम्हारी चिंता के दायरे में आयेगा?”
हमें कौनौ जबाब नहीं सूझता सिवाय इसे पोस्ट करके फ़ूट लेने के! 

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Sunday, December 03, 2017

एक गुनगुनी सुबह


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बाहर
गंगा स्नान करके लौटती महिला

सुबह टहलने निकले। सुलभ शौचालय दिखा। कुछ लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। एक आदमी अखबार पढ़ रहा था। शायद दबाब बना रहा हो। पता नहीं किस खबर को पढ़ते ही प्रेसर बन जाये। अलग-अलग रुझान वाले लोगों को अलग-अलग ख़बरों से प्रेशर बनते होंगे।

आजकल स्वच्छता अभियान पर जोर है। खुले में शौच की खिल्ली उड़ाते हुए उसके खिलाफ हवा बनाई जा रही है। गांवों में शौचालय बन रहे हैं। भले ही उनमें सामान रखा जा रहा हो। लेकिन बन रहे हैं तो उनका उपयोग भी होने लगेगा कभी।
सुलभ शौचालय के बाहर अखबार पढ़ते देख आइडिया आया कि खुले में शौच रोकने के लिए खूब सारे शौचालय बनाये जाएं। उनकी सुविधाएं बढ़ाई जाएं। अखबार के साथ इंटरनेट भी मुहैया करवाये जाएं। और भी हेन-तेन। इतना कि लोग घर के ट्वायलेट छोड़कर 'शौचालय मॉल' में आने लगे निपटान के लिए।
सरकार को यह सब करने में बहुत समय लगेगा। प्राइवेट सेक्टर को सौंप दिया जाए यह काम। तमाम निजी इंजीनियरिंग कॉलेज बेकार हो रहे। लड़के आ नहीं रहे भर्ती होने। वे सब बदल दिए जाएं बड़े शौचालयों में। पैसा वसूल हो जाएगा। शिक्षा अभियान को स्वच्छता अभियान में बदल दिया जाए।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: भोजन और बाहर
मंदिर के बाहर भक्त, फूल की दुकान और भिखारियों का कम्बो पैकेज
यह फालतू की सोच लिए-लिए हम आगे बढ़े। देखा एक महिला तेज-तेज चलती हुई जा रही थी। हाथ में लुटिया में पानी। बहुत मन लगाकर चल रही थी। आगे निकलकर हम साईकल स्टैंड पर खड़ी करके फोटो लिए। पूछकर। फ़ोटो खिंचाने से पहले उसने पल्लू सर पर धरा। चेहरे की व्यस्तता हटाकर सुकून वाली मुस्कान धारण की। लोटे को दोनों हाथ से पकड़कर संतुलित किया। फ़ोटो खिंचाई। देखने के बाद -थैंक्यू अंकल जी कहा।

पता चला कि रोज घण्टाघर से चलकर गंगा नहाने जाती हैं। करीब पांच किलोमीटर होगा। गंगा के प्रति आस्था। हम बताओ बगल में रहते हुए आज तक न नहाए। अनास्था है यह? एक दिन सूरज की किरणों के साथ चमकते हुए नहाएंगे। जल्ली ही।
आगे घंटाघर के पास एक मंदिर गुलजार हो रहा था। घण्टा बज रहा था। बाहर फूल वाला अपनी दुकान सजा चुके थे। मंदिर के सीन का कोरम पूरा करने के लिए भिखारी भी बैठ गए थे। एक को आने में कुछ देरी हुई तो लपककर आता दिखा। संग में बैठ गया। भक्त लोग खरामा-खरामा अंदर जाते हुए घण्टा बजाते चले गए। भगवान बेचारे अंदर बैठे होंगे। जो आता होगा उनको आशीर्वाद या प्रसाद या मनोकामना पूरी होने का आशीष दे देते होंगे। 

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 3 लोग, मुस्कुराते लोग, लोग बैठ रहे हैं, लोग खा रहे हैं, मेज़ और भोजन
इटवार की सुबह पराठे सेंकता बालक
कभी-कभी सोंचते भी होंगे कि यार, यहाँ जाड़े ने ठिठुर रहे हैं। बाहर होते तो गुनगुनी धूप सेंकते। क्या पता कोई दूसरे देवता उनको समझाते -
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता,
कभी जमीं तो कभी आसमां नहीं मिलता।
घण्टाघर के आगे एक ठेलिये पर सब्जी -पराठा का ठेला लगा था। एक लड़का ठेलिये पर बईठे हुए उचक-उचककर पराठा सेंक रहा था। बतियाते हुए मुस्कराता गया। जितना शरीफ लोग दिन भर में नहीं मुस्कराते उतना पांच मिनट में मुस्करा दिया बच्चा। पढ़ने जाता है लेकिन इतवार होने के चलते पिता का साथ दे रहा था।


20 रुपये के दो पराठे सब्जी सहित भाव थे। जीएसटी का हिसाब गोल। कभी शायद पुलिस वाले हर ठेले वाले से जीएसटी की पूछताछ करने लगें। जब करेंगे तब देखा जाएगा अभी तो सुबह की गुनगुनी धूप का मजा लिया जाए।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10213127530516352

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