Saturday, June 30, 2018

फ़ुटबाल


मानसून आने की खबर हो चुकी है। लेकिन बरस नहीं रहा है। लगता है कहीं रुककर फ़ुटबाल मैच देखने लगा है। पूरी दुनिया में आजकल फ़ुटबाल मचा है न!
बादल-बदलियों के साथ अपनी पसंदीदा टीमों को चीयरअप करने में जुटे होंगे। इसीलिये बरसने में देर कर रहे हैं शायद। जैसे दफ़्तरों में लोग चाय की चुस्कियां लेते हुये क्रिकेट मैच देखते हुये काम-तमाम करते हैं वैसे बादल-बदलियां धूप की चुस्कियां लेते हुये नैन-मटक्का कर रहे होंगे।
हो तो यह भी सकता है कि बादल-बदलियों को कहीं मुफ़्त का नेटवर्क मिल गया हो। अच्छे सिग्नल मिलते ही वे अपने दोस्त-सहेलियों से हाऊ-डू-यू-डुआने लगे हो। हम्म, यप्प, के, लोल मचाने लगे हों।
फ़ुटबाल का हल्ला मचा है। रोमांच के क्षणों में उचकते लोगों को देखकर लगता है कि कम ऊंचाई के बच्चों को बचपन से फ़ुटबाल देखने की आदत डाल दी जाये तो उनके कद निकल आयें। मैच के दौरान दर्शकों की तेज धड़कने देखकर अंदेशा होता है कि हो न हो फ़ुटबाल की शुरुआत किसी दिल के डॉक्टर ने की होगी। खेल के दौरान धकधक के चलते गड़बड़ाते दिल के इलाज के मरीज मिलते होंगे।
श्रीलाल शुक्ल जी ने लिखा है-’ हमारे देश की शिक्षा नीति रास्ते में पड़ी कुतिया है जिसे जो मन आता है लात लगा देता है।’ फ़ुटबाल देखकर मुझे यह अपने देश के विकास योजनाओं सा लगता है। कभी कोई आगे लात मारता है, कभी पीछे। कभी आसमान तक पहुंचती है, कभी लद्द से जमीन पर मुंह के बल गिरती है। गेंद दिन भर में मीलों भटकने के बाद भी रहती मैदान में ही है जैसे गंगा सफ़ाई में अरबों-खरबों खर्चने के बाद भी गंगा वैसे ही बहती हैं।
फ़ुटबाल में क्रिकेट की तरह चीयरबालायें नहीं होती। इसका कारण शायद उनके ठुमकने के लिये मौका तय करने में असफ़लता रही होगी। अगर हर गोल के बाद ठुमकने का नियम बनता तो किसी मैच में कोई गोल न होने पर चीयरबालाओं का ’ठुमका-उपवास’ हो जाता। अगर हर लम्बी किस पर मटकने का नियम होता तो क्या पता चीयरलीडर कमर उनके शरीर से एक ही मैच में समर्थन वापस ले लेती। उनके शरीर की सरकार गिर जाती। उस पर आई.सी.यू. लागू हो जाता। चीयरलीडरानियों की कमी की भरपाई खिलाड़ी लोग नाच-गाकर, एक दूसरे पर कूद कर लेते हैं।
हमारी फ़ुटबाल के बारे में जानकारी उतनी ही अच्छी है जितनी स्नूकर के बारे में हैं। दोनों के बारे में एक-बराबर जानकारी होने के नाते अपन पूरे दावे से कह सकते हैं कि दोनों ही क्रिकेट से अलग हैं। कम खर्चीला और ज्यादा वर्जिश वाला खेल होने के बावजूद अपने देश में क्रिकेट फ़ुटबाल के मुकाबले ज्यादा चलन में है तो उसका कारण सिर्फ़ यही समझ में आता है कि फ़ुटबाल में क्रिकेट जितनी समय की बर्बादी और निठल्लेपन की गुंजाइश नहीं बनती।
गेंद के पीछे भागते खिलाड़ी देखकर विदर्भ और अन्य इलाकों में पानी के टैंकर के पीछे भागती जनता की याद आती है। मैदान में भागते-भागते गिर जाने वाले खिलाड़ी गिरकर नाटक करते हुये तड़फ़ने लगने वाले खिलाड़ी देखकर लगता है कि दुनिया के सारे फ़ुटबालर अपने देश की नाट्य संस्थाओं के टॉपर होते हैं।
फ़ुटबालर फ़्री किक, पेनाल्टी किक हथियाने के लिये विरोधी खेमे में जितनी गिरा-गिरौव्वल करते हैं उसे देखकर कुर्सी हथियाने के लिये पतित होते जनप्रतिनिधियों की याद आती है। दूसरी टीम के खिलाड़ी को धकियाने वाले खिलाड़ी गिरे हुये को ही दोषी साबित करने की कोशिश करते हैं जैसे राजनीति में विरोधी को पीटकर उसी के खिलाफ़ पुलिस रिपोर्ट कराने का चलन है।
फ़ुटबाल में खेल कुल जमा 90 मिनट चलता है। सारी गिरा-गिरौव्वल डेढ घंट ही चलती लेकिन कुर्सी के लिये गिरौनी हरकतें साल-दर-साल जारी रहती हैं। सबसे बड़ी बात फ़ुटबाल के नाटक में भाषण नहीं होते। इसीलिये फ़ुटबाल मैदान के नाटक राजनीति की तरह बेहूदे, फ़ूहड़ और गलीज भरे नहीं लगते।
फ़ुटबाल के बारे में हमारी सिफ़र जैसी जानकारी और उड़ती-उजड़ती जैसी रुचि के बावजूद हमें यह खेल पसंद है तो सिर्फ़ इसलिये कि आजकल फ़ुटबाल मैचों के चलते फ़ूहड़ बयानों के घमासान में मंदी है। दुनिया की औसत खूबसूरत बढ गई लगती है। इसी समय लगता है कि काश दुनिया भर में खेले जाने वाली सारी फ़ुटबाली किकों को एक जगह इकट्ठा किया जा सकता और जहां कोई बेहूदे बयान देता, रिमोट किक अपने आप उसके मुंह में पड़ जाती। लेकिन चाहने मात्र से अगर कुछ होता तो अब तक दुनिया कहां से कहां पहुंच चुकी होती।
फ़िलहाल तो दुनिया कहीं नहीं पहुंची है। अपनी ही धुरी पर कदमताल कर रही है। उसकी ही गोद में फ़ुटबाल के अगले मैच की सीटी बज चुकी है। मैच की बात करते-करते मैच सही में शुरु हो गया। इससे यह लगता है बदलाव की बात करते रहना चाहिये। पता नहीं कब सही में कुछ बदल जाये। है कि नहीं?

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Friday, June 29, 2018

व्यंगैत, लिखैत की इंद्रधनुषी छटाएँ


व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार कराता है,जीवन की आलोचना करता है,विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखण्डों का परदाफाश करता है। - परसाई
आज देश भर के अखबारों और पत्रिकाओं में धड़ाधड़ व्यंग्य लिखा जा रहा है। व्यंग्य जिसको परसाई जी स्पिरिट मानते थे अब विधा टाइप कुछ होने की तरफ़ अग्रसर है। पता नहीं विधा हुआ कि नहीं क्योंकि कोई गजट नोटिफ़िकेशन नहीं हुआ इस सिलसिले में। जो भी है इत्ता बहुत है कि व्यंग्य धड़ल्ले से लिखा जा रहा है।
व्यंग्य लिखा जा रहा है तो लेखक भी होंगे, लेखिकायें भी। कई पीढियां सक्रिय हैं लेखकों की। पीढियों से मतलब उमर और अनुभव दोनों से मतलब है। कई उम्रदराज लोगों ने हाल में ही लिखना शुरु किया है। कई युवा ऐसे हैं जिनकी लिखते-लिखते इत्ती धाक हो गयी है कि काम भर के वरिष्ठ हो गये हैं।
लिखैत खूब हैं तो लिखैतों की अपनी-अपनी रुचि के हिसाब से बैठकी भी है। व्यंग्य लेखकों के अलग-अलग घराने भी हैं। जहां चार व्यंग्यकार मिल गये वो अपने बीच में से किसी को छांटकर सबसे संभावनाशी्ल व्यंग्यकार घोषित कर देता है। कभी मूड़ में आया तो किसी ने सालों से लिख रहे किसी दूसरे व्यंग्यकार को व्यंग्यकार ही मानने से इंकार कर दिया। इन्द्रधनुषी स्थिति है व्यंग्य की इस मामले में। कब कौन रंग उचककर दूसरे पर चढ बैठे किसी को पता नहीं।
सभी व्यंग्यकार अलग-अलग बहुत प्यारे लोग हैं लेकिन जहां चार व्यंगैत इकट्ठा हुये वहीं लोगों को व्यंग्य सेनाओं में बदलते देर नहीं लगती।अनेक व्यंग्य के चक्रवर्ती सम्राट हैं व्यंग्य की दुनिया में जिनका साम्राज्य उनके गांव की सीमा तक सिमटा हुआ है।
बहरहाल यह सब तो सहज मानवीय प्रवृत्तियां हैं। हर जगह हैं। व्यंग्य में भी हैं। इन सबके बावजूद अक्सर बहुत बेहतरीन लेखन देखने को मिलता है। सोशल मीडिया के आने के बाद आम लोग भारी संख्या में लिखने लगे हैं । उनमें से कुछ बहुत अच्छा लिखते हैं। उनकी गजब की फ़ैन फ़ालोविंग है। उनके पढ़ने का इंतजार करते हैं लोग। सोशल मीडिया के लोगों के बारे में स्थापित व्यंग्यकारों की शुरुआती धारणा जो भी रही हो लेकिन उनको अनदेखा करना किसी के लिये संभव नहीं है।
कहने का मतलब टॉप टेन और बॉटम टेन की माया में उलझने के बेफ़ालतू चक्कर में पड़कर टाइम खोटी मती करिये। मस्त रहिये। देखिये, पढिये, सुनिये, गुनिये और धांस के लिखिये। जो होगा देखा जायेगा।
आप बुरा मत मानिये भाई यह हम आपसे नहीं कह रहे। यह खुद से कह रहे हैं। 

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Tuesday, June 26, 2018

मुस्ताक अहमद युसुफ़ी के पंच


1. इस्लाम के लिये सबसे ज्यादा कुर्बानी बकरों ने दी है।
2. मर्द की आंख और औरत की जबान का दम सब से आखिर में निकलता है।
3. इस्लामिक दुनिया में आज तक कोई बकरा स्वाभाविक मौत नहीं मरा।
4. दुश्मनी के लिहाज से दुश्मनों के तीन दर्जे होते हैं- दुश्मन, जानी दुश्मन और रिश्तेदार।
5. आदमी एक बार प्रोफ़ेसर हो जाये तो जिन्दगी भर प्रोफ़ेसर ही रहता है , चाहे बाद में वह समझदारी की बातें ही क्यों न करने लगे।
6. उस शहर की गलियां इतनी तंग थीं कि अगर मुख्तलिफ़ जिंस (विपरीत लिंगी) आमने-सामने से आ जायें तो निकाह के अलावा कोई गुंजाइश नहीं रहती।
7. वो जहर देकर मारती तो दुनिया की नजर में आ जाती, अन्दाज-ए-कातिल तो देखो -हमसे शादी कर ली।
8. दुनिया में गालिब वह अकेला शायर है कि जो समझ में आ जाये तो दंगा मचा देता है।
9. कुछ लोग इतने मजहबी होते हैं कि जूता पसन्द करने के लिये भी मस्जिद का रुख करते हैं।
10. मेरा ताल्लुक इस भोली-भाली नसल से है जो यह समझती है कि बच्चे बुजुर्गों की दुआओं से पैदा होते हैं।
11. हमारे जमाने में तरबूज इस तरह खरीदा जाता था जैसे आजकल शादी होती है- सिर्फ़ सूरत देखकर।
12. सिर्फ़ 99 प्रतिशत पुलिस वालों की वजह से बाकी एक प्रतिशत भी बदनाम हैं।
13. हुकूमतों के अलावा कोई भी अपनी मौजूदा तरक्की से खुश नहीं होता।
14. फ़ूल जो कुछ जमीन से लेते हैं उससे कहीं ज्यादा लौटा देते हैं।
15. हमारे मुल्क की अफ़वाहों की सबसे बड़ी खराबी यह है कि वे सच
निकलती हैं।
16. ये वो दौर था जब शौहदों को औरत का एक्स-रे भी नज़र आ जाए तो दिल में अरमान मचल उठते थे।
- मुश्ताक अहमद युसुफ़ी
मुस्ताक साहब के बारे में जानने के लिये आप यहां पहुंचे:

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Monday, June 25, 2018

गंगा किनारे स्कूल

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग बैठ रहे हैं, जूते और बाहर
गंगा के तट पर इतवारी स्कूल
इतवार को टहलने निकले। साईकल किसी नवजात सरकार सी उचकती-फुचकती चल रही थी। नई सरकारें कसम खाते ही हर तरफ फ़ीता काटने लगती हैं। उसी तर्ज पर साईकल गड्ढे, सड़क सब जगह पहिया घुसाती चल रही थी। सरपट।
सुरेश अपने अड्डे पर रिक्शा सम्भाल रहे थे। रिक्शेवाले नदारद थे। जब मन आता है घर चले जाते हैं। वापस आ जाते हैं। राधा फूलबाग की तरफ अपनी रोजी कमाने गईं थीं। रोजी कमाने मतलब भीख मांगने। मांगने वालों का भी ड्यूटी टाइम होता है। देर करने पर दिहाड़ी कम हो जाती है।
शुक्लागंज के मुहाने पर सड़क डिवाइडर पर एक आदमी 'कम्बल कब्जा' करके टहलने गया था। जिस जगह सोया होगा, वहीं कम्बल छोड़ गया होगा।
डिवाइडर के दूसरे सिरे पर एक महिला घुटने सिकोड़े सो रही थी। कमीज पहने थी। कमर के नीचे बिना कपड़े। बाल उलझे। शरीर पर मैल। पता नहीं कहाँ से आई। कब से यहां है। सो रही थी इसलिए हिम्मत भी नहीं हुई कुछ पूछने की। जागती भी तो क्या कर पाते। मध्यम वर्ग का आदमी खाली दर्शक बना रहता है। कुछ भी होता रहे अगल बगल। देख लेगा। दुखी हो लगा। फोटो खैंच लेगा। वीडियो बना लेगा। कुछ लिख लिखा लेगा। बहुत हुआ तो दुखी होकर अपना अपना काम पूरा कर लेगा।
हमने भी मध्य वर्ग के सच्चे प्रतिनिधि की तरह चुपचाप महिला को कुछ देर देखा। फिर बाकी लोगों के देखने के लिए छोड़कर आगे बढ़ गए। आसपास के लोग अपने हिस्से का काम पहले ही कर चुके थे। महिला तसल्ली से सोती रही।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, जूते, भीड़ और बाहर
हर बच्चे का अपना आसन
घाट किनारे पेड़ के नीचे सुबह वाला स्कूल चल रहा था। 30-35 बच्चे अलग-अलग पढ़ रहे थे। क्लास के हिसाब से बच्चे बंटे थे। छोटे बच्चों को गणित पढ़ाते हुए बड़ी संख्या, बराबर, छोटी संख्या ( ग्रेटर , इक्वल टू, स्मालर दैन) सिखा रहे थे। बड़ी संख्या, छोटी संख्या के लिए चोंच इधर, चोंच उधर। मुंह इधर खुला, उधर खुला मतलब समझ सकने वाली भाषा में सिखा रहे थे बच्चे।
चबूतरे पर कुछ बच्चे पीरियॉडिक टेबल मतलब आवर्त सारणी सीख रहे थे। कक्षा छह में पढ़ते हैं बच्चे। हमें याद आता है कि हमारा परिचय आवर्त सारणी से तब हुआ था जब हम कक्षा ग्यारह में घुसे थे। कक्षा छह में तो अपन एबीसीडी से हेलो, हाउ डु यू डू सीखे थे। जमाना तेजी से आगे बढ़ रहा था।
अंग्रेजी सीखते बच्चे बीच बीच में पानी पीने की छुट्टी मांग रहे थे। कई बच्चों के एक साथ छुट्टी मांगने पर टीचर नाराज़ सी भी हुई। बच्चे चुप हुये। कुछ देर बाद फिर हाथ उठाकर पानी की अर्जी लगा दी।
इस बीच मोटर साइकिल के सहारे टिका ब्लैक बोर्ड हवा के झोंके से हिलकर नीचे गिर गया। ऐसे जैसे कोई गठबंधन सरकार साथी दल के समर्थन वापस लेने पर गिर जाए। बोर्ड फिर टिकाया गया। क्लास फिर शुरू हुई।
कुछ देर बाद योग क्लास शुरू हुई। बच्चों ने विभिन्नता में एकता की तरह एक ही आसन अलग- अलग तरह से करते हुए योग किय्या। योग के बाद बच्चों को जूडो-कराटे सिखाया गया। बच्चे आत्मरक्षा के उपाय सीख रहे थे।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, मुस्कुराते लोग, लोग बैठ रहे हैं
संस्था की सदस्य कोषाध्यक्ष रचना
इस बीच जय हो फ्रेंडशिप ग्रुप के लीडर जयसिंह और कोषाध्यक्ष का काम भी देखने वाली रचना आईं। उनसे पता चला कि रजिस्ट्रेशन हो गया है ग्रुप का। लेकिन अभी खाता नहीं खुला। ग्रुप के करीब 50-55 सदस्य हैं। ग्रुप को सहयोग मिलने की बात करने पर पता चला कि अधिकतर सहयोग करने वालों की मंशा ग्रुप पर कब्जे की रहती है। जो भी सहयोग करता है, वह ग्रुप की उपलब्धियों को अपने खाते में जोड़कर खुद को चमकाना चाहता है।
अभी तो कोई ग्रांट नही मिलती तब यह हाल। कल को पैसा आएगा तब तो मारकाट ही मच जाएगी। समाजिक काम काज में भी बड़ी मारकाट है। बड़ी असामाजिकता है।
नई उम्र के बच्चों का उत्साह देखकर अच्छा लगता है। लगता है हम भी पढ़ाएं बच्चों को। एकाध दिन कर भी लेंगे। लेकिन नियमित कठिन लगता है। किसी भी काम को नियमित करना मुश्किल होता है। इसी चक्कर में भले लोग भी अच्छे कामों से दूर रहते हैं। हो नहीं पाते अच्छे काम ज्यादा। बुरे काम धड़ल्ले से होते रहते हैं।
लौटते हुए धूप काफी हो गयी थी। डिवाइडर पर सोती महिला पुल की छांह में सो रही थी। सड़क पर आते-जाते लोग उससे निर्लिप्त बगल से गुज़रते जा रहे थे। हम भी चुपचाप साइकिलियाते हुए घर आ गए।

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Sunday, June 24, 2018

मुश्ताक अहमद युसुफ़ी नहीं रहे

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति
मुस्ताक अहमद युसुफ़ी
आज फ़ेसबुक पर एक पोस्ट से पता चला कि मुश्ताक अहमद युसुफ़ी साहब नहीं रहे। 20 जून को उनका इंतकाल हुआ। हिन्दी व्यंग्य की दुनिया में इसकी खबर पता नहीं चली।
94 साल की उमर में मुश्ताक साहब का इंतकाल हुआ। मैंने पाकिस्तान के अखबार देखे। मुश्ताक साहब को पाकिस्तान में गालिब के पाये का गद्य लेखक माना गया है।
मुश्ताक साहब के कई वीडियो देखे सुबह से। एक इंटरव्यू में उनसे पूछा गया -’अहमद युसुफ़ी के युग में जीते हुये कैसा लगता है?’
उन्होंने जबाब दिया। अच्छा लगता है। लेकिन हर एक को अपने खुद के युग में जीना चाहिये।
एक सवाल के जबाब में उन्होंने जबाब दिया -’अपने से कमजोर पर तंज नहीं कसना चाहिये। मजा तो अपने से मजबूत पर तंज कसने का है।’
मुश्ताक साहब के बारे में खबरों का और उनके इंटरव्यू के लिंक नीचे दिये हैं। इन वीडियो में उनको उनकेे कुछ कलाम पढते हुये भी सुन -देख सकते हैं।
मुश्ताक साहब ने अपने एक बयान में कहा था- ’पश्चिमी समाज में लोग किसी इमारत को तब तक तवज्जो नहीं देते जब तक वह उजाड़ न होने लगे। इसी तर्ज पर अपने यहां लेखक को उसके मरने के चालीस दिन बाद से तवज्जो मिलती है।’
हास्य व्यंग्य के बेहतरीन लेखक मुश्ताक अहमद के निधन पर श्रद्धांजलि ।
मुश्ताक साहब के लेखन के कुछ अंश यहां पेश हैं:
1. हर ऐसी मुहिम पर शक करो, फ़जीहत भरी जानो जिसके लिये नये कपड़े पहनने पड़ें।
2. मूंगफ़ली और आवारगी में खराबी ये है कि आदमी एक बार शुरू कर दें तो समझ नहीं खत्म कैसे करें?
3. जब कोई किसी पुराने दोस्त को याद करता है तो दरअस्ल अपने को याद करता है।
4. बुढापे की शादी और बैंक की चौकीदारी में जरा फ़र्क नहीं। सोते में भी एक आंख खुली रखनी पड़ती है और चुटिया पे हाथ रखकर सोना पड़ता है।
5. मर्द भी इश्क-आशिकी सिर्फ़ एक बार ही करता दूसरी मर्तबा अय्यासी और उसके बाद निरी बदमाशी।
6. जवानी दीवानी की तेजी बीबी से मारी जाती है। बीबी की तेजी औलाद से मारते हैं औलाद की तेजी साइंस से और साइंस की तेजी मजहबी शिक्षा से। अरे साहब तेजी का मारना खेल नहीं है, मरते-मरते मरती है।
7. इससे अधिक दुर्भाग्य क्या होगा कि आदमी एक गलत पेशा अपनाये और उसमें कामयाब होता चला जाये।
8. दुनिया में पीठ पीछे की बुराई से हजम होने वाली कोई चीज नहीं।
9. एक पांव लंगड़ाना दोनों पांव लंगड़ाने से बेहतर है।
10. मुगल बादशाह जिस दुश्मन को अपने हाथ से मारना नहीं चाहते थे उसे हज पर रवाना कर देते या झंडा, नक्कारा और खिलअत (शाही पोशाक) देकर दक्खिन या बंगाल जीतने के लिये भेज देते।
11. इतिहास पढने से तीन लाभ हैं। एक तो यह कि पूर्वजों के विस्तृत हालात की जानकारी होने के बाद आज की हरामजदगियों पर गुस्सा नहीं आता। दूसरे याददास्त तेज जाती है। तीसरे , लाहौल विला कूवत, तीसरा फ़ायदा दिमाग से उतर गया। कराची भी अजीब शहर है हां तीसरा भी याद गया। तीसरा फ़ायदा यह कि खाने, पीने, उठने, बैठने , भाइयों के साथ मुगलिया बरताव की सभ्यता से परिचय होता है।
12. ऐसा लगता है मनुष्य में अपने आप पर हंसने का साहस नहीं रहा। दूसरों पर हंसने में उसे डर लगता है।
13. व्यंग्यकार को जो कुछ कहना होता है वो हंसी-हंसी में इस तरह कह जाता है कि सुनने वाले को भी बहुत बाद में खबर होती है।मैंने कभी किसी ठुके हुए मौलवी और व्यंग्यकार को लिखने-बोलने के कारण जेल में जाते नहीं देखा।
14. बिच्छू का काटा रोता और सांप का काटा सोता है। इंशाजी (इब्ने इंशा)का काटा सोते में मुस्कराता भी है। जिस व्यंग्यकार का लिखा इस कसौटी पर न उतरे उसे यूनिवर्सिटी के कोर्स में सम्मिलित कर देना चाहिए।
15. समाज जब अल्लाह की धरती पर इतरा-इतरा कर चलने लगते हैं तो धरती मुस्कराहट से फट जाती है और सभ्यताएं इसमें समा जाती हैं।
16. मुस्कान से परे वो विपरीतता और व्यंग्य जो सोच-सच्चाई और बुद्धिमत्ता से खाली है, मुंह फाड़ने , फक्कड़पन और ठिठोल से अधिक की सत्ता नहीं रखता।
17. धन, स्त्री और भाषा का संसार एक रस और एक दृष्टि का संसार है, मगर तितली की सैकड़ों आँखे होती हैं और वो उन सबकी सामूहिक मदद से देखती हैं। व्यंग्यकार भी अपने पूरे अस्तित्व से सब कुछ देखता, सुनता, सहता और सराहता चला जाता है। फिर वातावरण में अपने सारे रंग बिखेरकर किसी नए क्षितिज, किसी और रंगीन दिशा की खोज में खो जाता है।
18. जैसे-जैसे साम्राज्य पर अहंकार और हवस बढ़ती जाती है डिक्टेटर अपने निजी विरोधियों को ईश्वर का विरोधी और अपने चाकर-टोले को बुरा बताने वालों को देशद्रोही बताता है। जो उसके कदमों में नहीं लोटते, उन पर ईश्वर की धरती का अन्न, उसकी छांव और चांदनी हराम कर देता है। लेखकों, कवियों को शाही बिरयानी खिलाकर ये बताता है कि लिखने वाले के क्या कर्तव्य हैं और नमकहरामी किसे कहते हैं।
19. कभी-कभी कोई समाज भी अपने ऊपर अतीत ओढ़ लेता है।गौर से देखा जाए तो एशियाई ड्रामे का असल विलेन अतीत है। जो समाज जितना दबा, कुचला और कायर हो उसे अपना अतीत उतना ही उज्ज्वल और दुहराये जाने लायक लगता है।हर परीक्षा और कठिनाई की घड़ी में वो अपने अतीत की और उन्मुख होता है और अतीत भी वो नहीं, जो वस्तुत: था, बल्कि वो जो उसने अपनी इच्छा और पसंद के अनुसार तुरन्त गढ़ कर बनाया है।
20. लीडर भ्रष्ट, विद्वान लोग स्वार्थी, जनता भयभीत-आतंकित और हर आदेश का पालन करने वाली। जब संस्थान खोखले और लोग चापलूस हो जायें तो जनतंत्र धीरे-धीरे डिक्टेटरशिप को रास्ता देता जाता है। फिर कोई डिक्टेटर देश को कुपित आंखों से देखने लगता है। तीसरी दुनिया के किसी भी देश के हालात पर दृष्टिपात कीजिए। डिक्टेटर स्वयं नहीं आता, लाया और बुलाया जाता है और जब आ जाता है तो प्रलय उसके साथ-साथ आती है।
21. कभी-कभी कोई समाज भी अपने ऊपर अतीत को ओढ़ लेता है। गौर से देखा जाये तो एशियाई ड्रामे का अस्ल-विलेन अतीत है। जो समाज जितना दबा, कुचला और कायर हो उसे अपना अतीत उतना ही अधिक उज्ज्वल और दुहराये जाने लायक दिखाई पड़ता है। हर परीक्षा और कठिनाई की घड़ी में वो अपने अतीत की ओर उन्मुख होता है और अतीत भी वो नहीं, जो वस्तुतः था, बल्कि वो जो उसने अपनी इच्छा और पसंद के अनुसार तुरंत गढ़ कर बनाया है।
संबंधित कड़ियां
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1. https://epaper.dawn.com/DetailNews.php… मुश्ताक साहब के बारे में समाचार
3. https://www.youtube.com/watch?v=g7eFB0oJUeE
https://www.youtube.com/watch?v=d_Hdc6k_DX8 मुश्ताक साहब का व्यंग्य पाठ -1
4. https://www.youtube.com/watch?v=TxNe5tVA5eU मुश्ताक साहब का व्यंग्य पाठ -2
5. https://www.youtube.com/watch?v=RcT6SPaPOUY मुश्ताक साहब का व्यंग्य पाठ -3
6.https://www.youtube.com/watch?v=YoJqFbK2dYo मुश्ताक साहब का व्यंग्य पाठ -4
7. https://www.youtube.com/watch?v=5BCRS86SoPY मुश्ताक साहब का व्यंग्य पाठ -5
8. https://www.youtube.com/watch?v=B_2PtMjsUZM मुश्ताक साहब का व्यंग्य पाठ -6
9. http://www.hindisamay.com/…/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%… मुश्ताक साहब का उपन्यास - खोया पानी

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Friday, June 22, 2018

टर्र का मेला और हामिद की याद

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 6 लोग, लोग बैठ रहे हैं
चाय की दुकान पर बुजुरगों का टाइम पास

ईद वाले दिन आर्यसमाज से निकल कर साईकल कर्नल गंज की तरफ घुमा ली। यतीमखाने की बगल वाली सड़क से तलाक महल होते हुए चमनगंज जाने वाली सड़क पर आ गए।
आगे बढ़ने से पहले एक चाय की दुकान दिखी। रुक गए। काफी देर से चाय पी नहीं थी। वैसे रुकने का कारण चाय पीने से ज्यादा वहां बेंच पर बैठे लोग थे। चाय के इंतजार में या फिर ऐसे ही टाइम पास करते हुए।
चाय दो रेट में थी। प्लास्टिक के कप में पांच रुपये की, कुल्हड़ में छह की। कुल्हड़ में चाय डालते ही पेंदे से बाहर आने लगी। छेद था नीचे। चाय वाले ने कुल्हड़ को कोसा और दूसरे में चाय डाली। कुल्हड़ 85 पैसे का एक आता है। 15 पैसे हर कुल्हड़ के जो ज्यादा चार्ज करता है वह इसी तरह के खराब कुल्हड़ के लिए होगा।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग
टर्र के मेले में एक दुकान
तलाक महल या तलाक मोहाल के नाम के बारे में बताया दुकानदार ने कि बेगम को तलाक देते समय मेहर के रूप में महल दिया गया था। इसीलिए तलाकमहल नाम पड़ा। महल के आगे होने की जानकारी भी दी अगले ने। हमने उसे कभी फिर देखने के लिए प्लान वाली लिस्ट में शामिल कर लिया।
दुकान वाले ने बातचीत करते हुए बताया -'चाय गरीब कामगार आदमी पीता है। आजकल काम धन्धा सब चौपट है। लोग घर वापस चले गए हैं। इसलिए चाय कम बिकती है आजकल।'
हमने कहा -'यहां तमाम दुकानों में लोग आते होंगे। तुम्हारी सड़क पर दुकान है। ग्राहक मिलते होंगे।'
उसने बताया -'ये सब खाने की दुकानें हैं। मीट की। जो आदमी यहां आएगा खाने वो मीट के साथ कोल्ड ड्रिंक पियेगा कि चाय। मामला चौपट है। लेकिन खुदा सबका ख्याल रखता है। हमारा भी रखेगा।'
आगे सड़क पर भीड़ थी। मुझे लगा जाम है। लेकिन पता चला मेला लगा था। झूले, मिट्टी के बर्तन, प्लास्टिक के खिलौने और तमाम दुकानें। हमें ईदगाह कहानी का हामिद याद आया। उसने भी इसी तरह की किसी दुकान से अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदा होगा। हिंदी साहित्य के सबसे प्रभावित करने वाले किरदारों की मैं कोई फेहरिस्त बनाऊ तो हामिद का नाम उसमें अवश्य शामिल होगा। जब हैरी पॉटर की चरचा जोरों पर थी तो मैंने एक लेख लिखा था उसमें हामिद यथार्थ चरित्र और हैरी के काल्पनिक की तुलना की थी। ’ईदगाह’ कहानी और लेख के लिंक टिप्पणी में।
प्रेमचंद ने जिस समय यह कहानी लिखी थी उस समय हिंदुस्तानी समाज घुला-मिला था। हिन्दू-मुसलमान एक ही बस्ती में घुलमिल कर रहते थे। इसीलिए प्रेमचंद इस कहानी को वास्तविकता से लिख पाये। गए अस्सी-नब्बे सालों में हालात ऐसे बदहाल हुए हैं कि एक-दूसरे समाज के बारे में जिक्र करने , लिखने का सिर्फ घृणा फैलाने वाली फौजों ने संभाल रखा है। कहानियों से अलग समुदाय के लोग देश मे सरकारी नौकरियों की तरह कम होते गए हैं।
बहरहाल आगे भीड़ देख हम एक गली में घुस गए। अंधेरा था। लोग घरों के बाहर बैठे मिलना-जुलना कर रहे थे। आगे सड़क पर जलते बड़े चूल्हे में बड़ी देग पर कुछ पक रहा था। हम उसको खड़े होकर देखने लगे। चूल्हे की आग मुझको सबसे खूबसूरत आग लगती है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, मुस्कुराते लोग, दाड़ी
अपना कलाम सुनाते हुए शायर
इसी बीच वहीं तरन्नुम से गाते फ़क़ीर की आवाज सुनाई दी। लोग उनको सुन रहे थे। हम भी लपके। सुना । कुछ रिकार्ड भी किया। एक पोस्ट भी कर चुके हैं।
अगले दिन अखबार से पता चला कि जो मेला कल हम बिना देखे छोड़ आये वह टर्र का मेला कहलाता है। ईद बकरीद के बाद चमनगंज और आसपास लगता है। लखनऊ में चिड़ियाघर के आसपास। करीब सौ सवा सौ सालों से लग रहा है मेला। हमको हवा ही नहीं। होता है ऐसा। आसपास बहुत कुछ होता रहता है, अपने को हवा ही नहीं लगती। नंदन जी का शेर है :
वो जो दिख रही है किश्ती
इसी झील से गयी है
पानी मे आग क्या है
उसे कुछ पता नहीं है।
इसी तरह बहुत कुछ हमको बिन पता हुए ही घट जाता है। आठ भी हमको बिना बताए बज गया। अब दफ्तर जाना होगा। आप मजे करिये।

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Wednesday, June 20, 2018

कानपुर के इतिहास के बीच

चित्र में ये शामिल हो सकता है: वृक्ष, पौधा, आकाश, बाहर और प्रकृति
तिलक हाल देश के स्वतंत्रता की अनगिनत घटनाओं की गवाह इमारत

उस दिन शाम को घूमने निकले। साइकिल माल रोड से शिवाला वाली गली में घुसा दी। ईद का दिन था। ज्यादातर दुकाने बन्द थीं। केवल चाय-पानी, मिठाई की दुकानें गुलजार थीं। लोग-बाग नये कपड़ों में इधर-उधर टहल रहे थे। कहीं-कहीं गले भी मिलते दिखे लोग। वैसे ज्यादातर गला -मिलन सुबह हो चुका होगा। हम उसे देखने से वंचित रहे। आलस्य के साथ गठबंधन किये पढे रहे। जब आलस्य की सरकार गिरी तब तक शाम हो चुकी थी।
बुजुर्ग लोग घरों के बाहर गली के चबूतरों, दुकान के बाहर बेंचों पर बैठे थे। लोग आते, सलाम करते, दुआयें लेते, ईद मुबारक कहकर निकल लेते। बुजुर्ग लोगों को वैसे भी आशीर्वाद देने का लाइसेंस मिलता है।
साहित्य में भी बुजुर्ग लोग आशीर्वाद देते रहते हैं। लेकिन तमाम लोगों को शिकायत है कि यहां आशीर्वाद में ’लालफ़ीताशाही’ है, ’इंस्पेक्टर राज’ है। बिना जुगाड़ आशीर्वाद इशू नहीं करते बुजुर्ग। लेकिन हमको यह बात सिरे से गलत लगती है। बुजुर्गों को बदनाम करने की साजिश की तरह। वैसे यह भी सच है कि अपने यहां साहित्यिक बुजुर्ग अल्पसंख्यक ही हैं। उमर और अनुभव से जो बड़े हैं वे अपने लड़कपन से बुजुर्गियत को स्वीकार करने से मना करते हैं। खुद अपने से कम उम्र के लोगों से आशीर्वाद , शुभकामनाएं, समर्थन झटकते रहते हैं।

चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर और पाठ
श्रद्धानन्द पार्क अनगिनत सभाओं का इतिहास
बहरहाल, शिवाले के आगे निकले तो एक गली में श्रद्धानन्द पार्क का बोर्ड दिखा। श्रद्धानन्द पार्क का जिक्र स्वतंत्रता के इतिहास में कई जगह हुआ है। पार्क बहुत छोटा सा लगा। हमारे घर के बगीचे से थोड़ा ही बड़ा होगा। खड़े होकर देखते रहे। सोचते रहे। कद में इतना छोटा पार्क इतिहास में इतना जबर दखल किये है। लेकिन फ़िर यह भी सोचा कि इतिहास में जगह कद, काठी, रोब उआब से नहीं तय होती। मायने यह रखता है कि आपने किया क्या है, आपसे हुआ क्या है?
श्रद्धानंद पार्क के पीछे ही तिलक हाल दिखा। इस हाल की भी कानपुर और भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में उल्लेखनीय स्थान है। तमाम राष्ट्रीय घटनाओं का गवाह रहा है यह हाल। जिधर से देखा वह कभी सामने का हिस्सा रहा होगा। अब वह पिछवाड़ा हो गया है। गेट के सामने कूड़ा पडा था। वहीं पत्थर पर लिखा था:
" जमीन खरीदी सन 1925
पंडित जवाहर लाल ने नींव रखी 24-09-31
महात्मा गांधी ने उद्घाटन किया 24-07-34
निरीक्षक श्री तुलसी दास कोचर
निर्माण कर्ता - मेसर्स धनीराम प्रेम सुख ठेकेदार
प्रबन्धक- श्री नारायण प्रसाद अरोड़ा"
कुछ देर खड़े होकर इस ऐतिहासिक इमारत को देखते रहे। बाग में एक आदमी बचे पौधों को पानी दे रहा था। इमारत राष्ट्रीय धरोहर की तरह ही लग रही थी।निस्तेज, उदास, मार्गदर्शक मंडल की सदस्य सरीखी। बरामदे में टूटी कुर्सियां गंजी पड़ी थीं।
सामने से इमारत को देखने आये। गेट बंद था। खुला होता तो अंदर के नजारे देखते। सामने दूध, मिठाई की दुकाने आबाद थीं। एक दुकान का नाम मजेदार दिखा- ’डबल हाथरस वाले’। हमने पूछा -’क्या कोई सिंगल हाथरस वाले भी हैं यहां?’ बताया -’ हां चौक में पहली दुकान है हमारी उसका नाम हाथरस मिठाई भण्डार है।’
बाजार में इस तरह के टोटके बहुत चलते हैं। बाजार शुरुआत करता है। फ़िर लोग अपनाते हैं। बाजार सबका गुरु है। गुरु क्या गुरु घंटाल है पक्का। इसी से सीख कर लोग ’निंदा’ के बाद ’कड़ी निंदा’ और फ़िर ’सबसे कड़ी निंदा’ टाइप मुलायमियत वाले बयान जारी करते हैं। बड़ी बात नहीं कि कल को ईमानादार सरकार के बाद कोई ’डबल ईमानदार सरकार’ ,’ट्रिपल राष्ट्रवादी सरकार’ , ’मल्टीपल देशभक्त’ सरकार’ बनाकर देश के लोगों की जबरियन सेवा करने लगे।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर
इस गली में तिलक हाल है
गली से लौटकर सड़क पर आये तो आर्यसमाज का होम्योपैथिक अस्पताल दिखा। घुस गये अंदर। कम रोशनी वाला बल्ब जल रहा था। आर्यसमाज से जुड़े तमाम लोगों के चित्र दीवार में। वहीं तख्त पर एक बुजुर्ग बैठे थे। उनसे बतियाने लगे।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: Udbhrant Sharma, खड़े रहना और चश्मे
आर्यसमाज के सहज प्रचारक रवीन्द्र पांडेय जी
पता चला बुजुर्गवार सुल्तानपुर के रहने वाले हैं। अब इलाहाबाद में घर है। आर्यसमाज के प्रचार-प्रसार का काम करते हैं। निशुल्क। देश घूमे हुए हैं। कुछ दिन वकालत भी की लखनऊ में। जमी नहीं तो छोड़ दी। नाम बताया रवीन्द्र पाण्डेय। बातचीत के दौरान उन्होंने अपने मोबाइल का जिक्र किया। बोले -’इसका उपयोग सीखना है। खासकर फ़ोटो खींचना।'
पुराना माडल वाला नोकिया का नया मोबाइल था। सस्ता और टिकाऊ घराने का। हमने उनको फ़ोटो खैंचना सिखाया। ब्लू टूथ का उपयोग सिखाया। कुछ देर बाद बात करते हुये वे अंग्रेजी के वाक्य बोलने लगे। शायद यह सोचते हुये कि हमको अंग्रेजी जमती हो। लेकिन अंग्रेजी में अपन का हाथ और पैर क्या पूरा शरीर हमेशा तंग रहता है। अंतिम विकल्प के रूप में ही अंग्रेजी की छतरी खोलते हैं। छुट्टी के दिन और दफ़्तर के बाहर अंग्रेजी बोलना फ़िजूल खर्ची भी लगा हमें। इसलिये हम हिन्दी से ही चिपके रहे। पाण्डेय जी अलबत्ता बीच-बीच में और किनारे-किनारे भी अंग्रेजी उवाचते रहे। बाद में जब हमने बताया कि हम इलाहाबाद से पढाई किये हैं तो इलाहाबाद और तेलियर गंज में रहने के दिनों की यादें भी साझा हूईं।

बातचीत के बीच में आर्य समाज के बारे में तमाम बाते हुयीं। इसी बीच वहां पुजारी जी आ गये। पंडित कृपा शंकर शुक्ल। वे हमको उस बिल्डिंग के बारे में कुछ बातें बताने लगे। हमने फ़ौरन अपने कनपुरिया इन्साइक्लोलीडिया हमनाम अनूप शुक्ल Anoop Shukla को फ़ोन मिलाकर स्पीकर आन कर दिया। अनूप शुक्ल ने उस बिल्डिंग की ऐसी रनिंग कमेंट्री करी कि तीनों श्रोता विस्मित च चकित हो गये। हमको जो याद रहा वह मात्र इतना कि यह भवन 'खुर्द महल' कहलाता था। वह किसी नबाब की दूसरी पत्नी का महल था। हमने फ़ौरन यह जिम्मेदारी अनूप शुक्ल के ऊपर डाल दी कि इस बारे में विस्तार से लिखें।
लिखने की जिम्मेदारी की बात चलने पर अनूप शुक्ल ने बताया मुंशी ज्वाला प्रसाद जी ने मेस्टन रोड का के पचास वर्ष का इतिहास लिखा है। वहां लगे बोर्ड के अनुसार मुंशी जी इस संस्था के 1903 से 1930 तक मंत्री रहे। पुरोहित जी ने इस किताब के बारे में बताया कि इसकी दो-तीन प्रतियां बची हैं शहर में। वे कोशिश करेंगे कि इसके बारे में पता करें। तय हुआ कि वे एकाध दिन में किताब खोजेंगे। उसकी फ़ोटोकॉपी हम करायेंगे फ़िर हमारे इन्साइक्लोपीडिया अनूप शुक्ल लिखने का काम संभालेंगे।
आर्य समाज से बाहर निकलकर हम चमनगंज की तरफ़ बढ गये। ईद के मौके पर आगे के मोर्चे हमको आवाज दे रहे थे।

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Monday, June 18, 2018

जिसे जो भी चाहे दे दे, तेरे पास क्या नहीं है



इतवार को ईद के दिन शहर घूमने निकले। साइकिल पर। मालरोड, शिवाला, मेस्टन रॉड, परेड, कर्नलगंज, तलाक मोहाल, चमनगंज , नई सड़क होते हुए वापस घर लौटे। सबके किस्से विस्तार से अलग से।
हलीम मुस्लिम कालेज के पीछे की एक पतली सड़क पर एक बुजुर्गवार खड़े हुए तरन्नुम में शेर पढ़ रहे थे। लोग सुन रहे थे। अपन भी साइकिल को ब्रेक मारकर खड़े हो गये। सुनते रहे। कुछ रिकार्ड भी किये। कुछ आप भी सुनिए।
बातचीत से पता चला कि गाने वाले मकनपुर के किसी सूफी, औलिया से जुड़े हैं। लोगों के कलाम इकट्ठा करके घूमते हुए सुनाते हैं। 'रट्टू शायर ' हैं।
शायर का एक मुरीद , सफ़ेद गंजी पहने, प्लास्टिक की पन्नी में चाय लिए बहुत देर तक खड़ा रहा। बोले-'जब भी आते हैं ये हम इनको जरूर सुनते हैं। कभी-कभी घण्टों।'
आते-जाते लोग पास खड़े होकर कुछ देर सुनते, चले जाते। कोई-कोई कुछ पैसे-रुपये देते जाते जिसे बिना देखे शायर अपनी जेब के हवाले करते जाते।
शायर साहब उससे बेपरवाह शेर पढ़ते रहे। अधिकतर शेर ईद के मौके पर पढ़े जाने वाले टाईप। बाद में काफी इशरार करने पर वहीं नुक्कड़ के चबूतरे पर बैठकर चाय पी। फिर कुछ और कलाम सुनाए। जो हमने रिकार्ड किया उनमें से एक यहां पेश है। बाकी भी कभी पोस्ट किए जाएंगे कभी मौके-बेमौके।
सुनिए और आनंदित होइए। 
बता रहा है हमको, तेरे मिस्ले औलिया में कोई दूसरा नहीं है।
ये तेरा इत्तियारो मनसब , कोई जानता नहीं है।
तू नवाजिशों का वारिश, तू अताओं का समन्दर
जिसे जो भी चाहे दे दे, तेरे पास क्या नहीं है।
जितना खुदा ही हासिल हो, तेरी मदार-ए- आलम
वो सफ़ीना बहर-ए-गम में कभी डूबता नही हैं।

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Saturday, June 16, 2018

डांस इंडिया डांस



'डांस इंडिया डांस’, ये भी कोई बात हुई। मने 'इंडिया' देश न होकर कोई बच्चा हो गया । नर्सरी, केजी वाला। उससे किसी को ’पोयम’ सुनाने को कहा जाये। घरों में पड़ोस के अंकल-आंटी के आते ही बच्चे से 'पोयम' सुनाने को कहा जाता है। अब जब ’पोयम’ कहा है तो अंग्रेजी की ही होगी। आजकल घरों में ’पोयम’ ही चल रही हैं। कवितायें गायब हो गयीं। बच्चा 'ट्विंकल-ट्विंकल' से शुरू करता है। एक बार मुंह खुल जाये तो 'जानी-जानी यस पापा’ तक सुना जाता है। कभी-कभी तो ’हम्प्टी-डम्प्टी’ को दीवार से गिरा तक आता है।
लेकिन बच्चे की बात अलग। इंडिया की बात एकदम अलग। ’इंडिया कोई बच्चा थोड़ी है जो 'डांस इंडिया डांस' सुनते ही ठुमकने लगे। इंडिया कोई लंदन है क्या जो किसी के कहने से पूरा ठुमकने लगे?
वैसे सोचें तो डांस में होता क्या है। हिलना-डुलना ही तो। धीमे हिले-डुले तो थिरकना हुआ। थिरकना मतलब- ’बच्चा डांस।’ थोड़ा तेज मटके तो ’कायदे का डांस’ हो गया। ’कायदे’ लिखने से मामला ’कायदे आजम’ के साथ नत्थी हो सकता है इसलिये तेज मटकने को ’बालिग डांस’ पढा जाये। भाषा में शुद्धता के लिये हुड़कने वाले ’बालिग’ की जगह ’वयस्क’ बांचे।
अब आप कहेंगे -”बच्चे लोग ’बालिग डांस’ कैसे करेंगे?’ तो हम यही कहेंगे कि जब गरीब बच्चे अपना बचपना स्थगित करके घर चलाने के लिये कमाई में खप रहे हैं तो डांस कौन बड़ी बात। बच्चे बालिगों वाले दीगर काम मसलन हत्या, बलात्कार जैसे काम अंजाम दे रहे हैं तो डांस करने में क्या एतराज।
डांस में शरीर के जितने ज्यादा अंग शरीक होते हैं, यह उतना ही जमाऊ होता है । आप डांस को गठबंधन सरकार मानिये। इसके मंत्रिमंडल में शरीर की पार्टियों के जितने ज्यादा अंग शामिल होंगे, उतना ही जमाऊ होगा डांस। उतना ही टिकाऊ होगा नृत्य।
डांस करते समय शरीर किसी गठबंधन सरकार सरीखा हो जाता है। इसमें हर धड़े का विरोधी धड़ा होता है। हर अंग दूसरे से दूर भागता दिखता है। शरीर की सरकार से समर्थन वापसी की धमकी जैसा देता हुआ। लेकिन शरीर रूपी कुर्सी का आकर्षण इतना तगड़ा होता है कि अलग नहीं हो पाता। हर अंग अपने पड़ोस के अंग से अलग तनता है। अलग हिलता है। अलग डुलता है। अंगों का हिलना डुलना जितना अलग-थलग होता है, डांस उतना बेहतर कहलाता है।
डांस करते हुए कोई हाथ बहुत तेज हिलाता है, कोई पैर। किसी की कमर बहुत तेज मटकती है, किसी का कूल्हा। जो अंग बहुत तेज हिलता है, बाकी अंग उसके समर्थन में हिलने लगते हैं। जो अंग सबसे तेज हिलता है वह अंगों का लीडर हो जाता है। शरीर अगर संसद होता तो सबसे तेज फडकता हुआ अंग ईश्वर की शपथ लेकर प्रधानमंत्री बन जाता। भाइयों, बहनों कहते हुये हवा-हवाई हांकने लगता।
डांस एक तरह का ऊर्जा स्थानान्तरण है। सर से इनर्जी कन्धे पर आती है, कूल्हे, पेट, हाथ,पांव हिलाती है। कश्मीर से कन्याकुमारी हो जाती है। लोकतंत्र में कोई-कोई राज्य ’विशेष राज्य’ का दर्जा पा जाते हैं। ज्यादा ग्रांट हथियाते हैं। डांस में इसी तरह कुछ अंग खुद को दूसरे से ज्यादा फ़ड़काते हैं। बाकी अंगों से ज्यादा ऊर्जा पाते हैं। खपाते हैं। डांस जमने के बाद ऊर्जा का गणित समझ नहीं आता। पता नहीं चलता है कि ऊर्जा आ कहां से रही है, हिल्ले कैसे लग रही है। थिरकने के आगे सब बिसरा जाता है।
डांस भी एक तरह का लोकतंत्र ही हो जाता है। लोकतंत्र में तरह-तरह का धन किधर-किधर से आता है, किधर चला जाता है पता नहीं चलता। काला धन सफ़ेद में गड्ड-मड्ड होकर और सफ़ेद हो जाता है। सफ़ेद धन नदियों की तरह सूखता जाता है। काला धन महासागर की तरह लहराता है। वह काले धन के ही खिलाफ़ हल्ला मचवाता है। हल्ले की आड में सफ़ेद को और काला करवाता है। ’इंडिया’ को मनमर्जी से नचाता है।
देश की सोचें तो देश का हर हिस्सा बड़ी तेजी से डांस करता है। हर हिस्से को अलग-अलग और एक साथ भी झटके। कभी मंहगाई नचाती है, कभी गुंडागर्दी। कहीं देशभक्ति फड़कने लगती है, कहीं अलगाववाद। कभी कोई घोटाला उछल जाता है, कभी किसी को सजा हो जाती है। बयानबाजी भी नचाये रहते हैं देश को। देशी मुद्दे कमजोर पड़े तो मीडिया विदेशी धुन बजा देता है। किम जोंग, ट्रंप को मिलवा देता है। फ़ुटबाल का विश्वकप करवा देता है। बगदादी को मरवा देता है। हनीप्रीत, रामरहीम की गुफ़ा में घुसा देता है। किसी पत्रकार को मरवा देता है।
ये सब मुद्दे एक-दूसरे से अलग-अलग दिखते हैं। लेकिन देश ’विविधता में एकता’ की तर्ज पर हर एक की धुन पर नाचता रहता है। किसी धुन को निराश नहीं करता। नेपथ्य में बाजार गाता रहता है - 'नाच मेरी बुलबुल तुझे पैसा मिलेगा।' जनता को पता है कि मिलना कुछ नहीं है। उल्टा पास से जाना ही है फिर भी नाचती रहती है।
इसी नाच गाने में कभी कोई डांस अलग टाइप का हो जाता है। वायरल हो जाता है। यह अलग टाईप का होना कुछ उसी तरह से होना है जैसे रोज होते घपलों-घोटालों से अलग तरह का घपला नजर आना। कचहरी, कोर्ट, तहसील, लायसेंस से भली तरह वाकिफ जनता को अलग तरह का घोटाला नजर आने पर उसका मनोरंजन हो जाता है। कुछ में तो हफ्ता, महीना कट जाता है।
प्रोफ़ेसर साहब का डांस वीडियो जो वायरल हुआ वह देश की स्थिति का परिचायक है। कभी साहित्य समाज का दर्पण होता है। अब साहित्य ने अपना काम डांस को सौंप दिया है। डांस समाज की स्थिति बताता है। डांस करने वाले सज्जन मास्टर हैं। मास्टरी में जितनी शोहरत जिन्दगी भर में न मिली उससे कई गुना ज्यादा डांस करने से मिल गयी। सेलेब्रिटी हो गये। इससे यह मतलब निकलता है कि आपको शोहरत चाहिये तो अपनी फ़ील्ड से अलग इलाके में पसीना बहाइये।
डांस वाले उस्ताद का वीडियो तो अभी वायरल हुआ। पर समाज इस सीख पर बहुत पहले से लगा हुआ है। लोग अपनी फ़ील्ड से अलग क्षेत्र में शोहरत कमा रहे हैं। जनसेवक गुंडागर्दी में नाम कमा रहे हैं, गुंडे जनसेवा में पसीना बहा रहे हैं। अफ़सर अनशन पर जा रहे हैं, अनशन करने वाले सरकार चला रहे हैं। बाबा लोग मनी माफ़िया बने जा रहे हैं, बलात्कारी लोग बाबा बनते जा रहे हैं। भगवान कहलाने वाले लोग जेल जा रहे हैं, जेल में जमा लोग गवाह, जज मरवा रहे हैं। मने लोग अपने इलाके से अलग डांस करते हुये धमाल मचा रहे हैं।


इतना लिखने के बाद हमको भी धमाल मचाने का मन होने लगा। धमाल में क्या होगा, कुछ नहीं पता। पहले से पता हो तो धमाल कैसा? अब तो बस शुरु हो जाते हैं। तो आइये लेते हैं गहरी वाली सांस, शुरु करते हैं कहते हुये - ’डांस इंडिया डांस।’

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Monday, June 11, 2018

सबसे स्मार्ट कौन ?

कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.
दुनिया का सबसे पहला आलू कहां पाया गया, बताइये फौरन स्मार्ट बन जाइये।

कल पैदल टहले। ढेर सारा। टहलना शुरू करते ही रिकार्ड भी करते गए। चलन है भाई। कुछ भी करो, रिकार्ड रखो। क्या पता कल कोई अध्यादेश जारी हो जाये जो टहला है, वही सड़क पर चलने का अधिकारी है। बखत जरूरत काम आएगा।
फूलबाग चौराहे पर सिपाही तैनात था। बत्तियां जल रहीं थीं लेकिन ट्रैफिक हाथ से चल रहा था। हरी बत्ती पर हाथ से गाड़ी रोक देता। लाल पर कहता -'निकल लो।' कई बार गफलत में हरी बत्ती पर भी गाड़ियों को पास दे देता।
बगल में खड़े होकर हम उसको देखते रहे। कानपुर में दो दिन पहले मुख्यमंत्री जी ने ऑटोमैटिक ट्राफिक सिग्नल व्यवस्था का उद्घाटन किया। जहां उल्लंघन किया, चालान 'एटोमेटिकली' हो गया। फूलबाग में, नरोना चौराहे पर क्या व्यवस्था है, पता नहीं क्योंकि यहां सिपाही का हाथ ही सिग्नल है। चौराहे पर अंधेरे का भी इंतजाम पुख्ता है। सिपाही का हाथ केवल आगे वाली गाड़ी को दिखता है। बाकी उसके पीछे।
सिपाही ने हाथ के सिग्नल से गाड़ियों को निकलने की व्यवस्था देने के बाद खैनी ठोंकी। ठोंकता रहा। खैनी ठोंक-फटकार कर मुंह में स्थापित की। आनन्दित होकर दूसरी तरफ की गाड़ियों को जाने की अनुमति दी। हमने उससे पूछा -'ये ट्रैफिक सिग्नल तो बेकार ही लगे हैं फिर।'
बोला-'इसी लिए तो हम खड़े हैं यहां चौराहे पर।'
अंधेरे में भी धूप का चश्मा लगाए सिपाही ऐसी जगह खड़ा था जहां उसे दूर से देखकर संकेत ग्रहण करने की सम्भावनाएं एकदम खत्म थी।
आगे एक जगह कानपुर नगर निगम के सौजन्य से पानी बिक रहा था। पांच रुपये का बीस लीटर। कार्ड स्वैप करके लोग पानी भर रहे थे। बगल में एक नगर निगम की ही पौशाला थी। फूस की झोपड़ी। अंदर न आदमी, न घड़ा और जाहिर है न ही पानी। 'कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता दुनिया में' का खुला इश्तहार।
बड़ी बात नहीं कल को सड़क पर हवा, पानी, धूप सब प्रीपेड कार्ड पर दिखें, मिले। सड़क पर चलना भी कार्ड पर पेमेंट के बाद हो। पर किलोमीटर के रेट हों। आपने बड़े चौराहे तक की सड़क पर चलने के पैसे भरे हों। आपका मन किय्या कि जरा चौक तक घूम आएं, बिना पेमेंट आगे जा न पाएं। क्या पता आगे जाने के लिए पेमेंट के लिए कार्ड स्वाइप करें और आपका कार्ड हैक हो जाये। पड़े रहेंगे आप बड़ा चौराहे पर कानपुर के किसी अधबने फ्लाई ओवर सरीखे। कोई आएगा तब आपको वापस ले जाएगा।
जेड स्क्वायर माल में घुसते ही 'स्टार प्लस' का 'सबसे स्मार्ट कौन' तमाशा चल रहा था। अपना नाम भरिये। किसी सवाल का जबाब दीजिये। सही जबाब देने पर स्मार्ट बन जाइये। सवाल का भी मुलाहिजा हो जाये लगे हाथ:
1. एक लड़का महीने में 30 दिन जागता है। फिर भी तरोताजा दिखता है। कैसे?
2. दुनिया में आलू सबसे पहले कहां पाया गया था?
सभी सवालों के विकल्प भी दिए थे। आपको बस उनमें से एक चुनना था।
पहले का जबाब था -'क्योंकि वह रात को सोता है।' दूसरे का सही जबाब था -'जमीन में।' लोग मजाक-मजाक में स्मार्ट बन रहे थे। इतनी आसानी से स्मार्ट बनाकर 'स्टार प्लस'लोगों को बेवकूफ बना रहा था। अपना प्रचार कर रहा था।
क्या पता कल को लोग अपना, बच्चों का नाम, जन्मतिथि बताकर भी स्मार्ट बनने लगे। सबको स्मार्ट बनाते हुए, सबको बेवक़ूफ़ बनाना है।
माल में घुसते ही लोग सबसे पहले फ़ोटो, सेल्फी ले रहे थे। हमें लगता है कि माल में सेल्फी, फ़ोटो की सुविधा खत्म हो जाये तो बिक्री आधी हो जाये।
लौटते ने बैटरी ऑटो से आये। चौराहे पर सिपाही देखकर ऑटो वाले ने रास्ता बदल लिया। कागज सब ठीक हैं पर कहता है-'पता नहीं किस बात पर सनक जाएं साले। रोक दें, ठोंक दें कुछ ठिकाना नहीं। इसलिए इधर से आ गए।'
अंदर गली में एक दिन रात का मैच हो रहा था। पचास गुना पचास मीटर से भी कम बड़े मैदान में बत्ती की रोशनी में मैच। एक मंदिर पर बैनर लगा था। प्रीमियर टूर्नामेंट। रबर की गेंद से मैच हो रहा था। छज्जे से कमेंट्री हो रही थी। आसपास के लोग जमा थे मैच देखने को। हम भी जमे कुछ देर। कमेंटेटर ने कहा -' इस टीम के लिए यह ओवर पंजाब की खेती सरीखा साबित हुआ। खूब रन कूट डाले इन लोगों ने।'
कमेंट्रेटर को सुनकर लगा कि आगे जसदेव सिंह की तर्ज पर कहीं कमेंटेटर, एंकर बनने की संभावना है बालक में।
चौराहे पर एक आदमी फुटपाथ पर लेटा था। आंते दिखती हुई। गांधी जी का दरिद्रनारायण। वह सो रहा था। अनगिनत लोग ऐसे भूखे सोते रहते हैं। कुछ भूख से मर भी जाते हैं। हल्ला मचने पर जिले के डीएम सस्पेंड हो जाते हैं। बहाल हो जाते हैं।
सबसे अलग मॉल में 'सबसे स्मार्ट' लोग खोजे जाते हैं। खेल चलता रहता है। क्योंकि मॉल में भूखे लोग नहीं जाते हैं।
अरे आज सोमवार हो गया। आप मजे कीजिये। हम अब दफ्तर जाते हैं।

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Sunday, June 10, 2018

मेरे दिल का गया करार रे

सूरज भाई से सुबह की नमस्ते
सुबह की शुरुआत चाय बाजी से हुई। बच्चा बाहर जा रहा है। ओला वाले अनुराग आधे घण्टे पहले आ गए। चाय की तारीफ सुनने के लिए हमने पूछा -'चाय कैसी लगी?' बोले -'डेढ़ साल में पहली बार किसी ने चाय पिलाई।'
हम चाय की तारीफ का इन्तजार ही करते रहे। असल में हमारी चाय की लोग इतनी तारीफ करते हैं कि मन करता है कि चाय की दुकान खोल लें। हालांकि रोज चाय बनवाने का उपाय मात्र है यह। लेकिन आज तारीफ न मिलने से चाय की दुकान खोलने का इरादा कुछ कम हो गया।
बच्चे के साथ हम भी लग लिए शुक्लागंज तक। पुल पार बालक को विदा किया। आगे बढ़े। स्टेशन की तरफ। सूरज भाई ने ड्यूटी ज्वाइन कर ली थी। चमक रहे थे। मुसाफिर कंधे, हाथों में बैग लिए लपके जा रहे थे। सड़क के किनारे दुकानें आबाद थीं। दुकानों में बकौल श्रीलाल शुक्ल -' प्राय: सभी में जनता का एक मनपसन्द पेय मिलता था जिसे वहां गर्द, चीकट, चाय, की कई बार इस्तेमाल की हुई पत्ती और खौलते पानी आदि के सहारे बनाया जाता था।'
चित्र में ये शामिल हो सकता है: पौधा और बाहर
रेलवे के स्लीपर मतलब गरीब का बिस्तर भी और बाथरूम भी
सड़क किनारे कंक्रीट के रेलवे स्लीपर पड़े थे। उनमें एक आदमी सोया था। उसके पैताने दूसरा आदमी स्लीपर को पनघट बनाये अपने कपड़े धो रहा था।
स्टेशन पर अंग्रेजों के जमाने का टिकट काउंटर था। उसमें मुंडी घुसाए लोग टिकट खरीद रहे थे। काउंटर के ठीक सामने डिजिटल टिकट मशीन खराब पड़ी, हिंदुस्तान की डिजिटल प्रगति की मुनादी कर रही थी।
स्टेशन पर गाड़ी के इंतजार में बैठे लोग गप्पाष्टक हांक रहे थे। एक यात्री ने एल सी की वीरता का करते हुए बताया-'काल्हि इत्ती जोर आई एल सी कि पैसेंजर का पीट दिहिस।' हमको Devendra Kumar के लोहे के घर के किस्से याद आये।
पटरी किनारे चलते हुए वापस आये। पटरियों के जिन हिस्सों पर पहिये चलते हैं वो चमक रहे थे। बाकी काले। लगा कि चमकता वही है जो रगड़ खाता है।

रेलवे का फाटक स्थाई रूप से बंद है। मोटरसाइकिल वालों ने बीच के हिस्से को उठाकर ऊंचा कर लिया है। मुंडी झुकाकर बैठे-बैठे निकल जाते हैं। हर बाधा को पार करने का शार्ट कट है अपने यहां। कविता भी है न:
देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं।
गंगा दुबली हो गयी है। बालू की हड्डियां दिख रही हैं। नदी कई धाराओं में बंटी है। कौन असली पता नहीं चलता। बीच पुल से खड़े होकर धार देखते हुए सोचे कि यहां सीढ़ी होती तो उतर कर नहा लेते। कई लोग डुबकी लगा रहे हैं। बीच बालू तमाम लोग सो रहे हैं। गंगा किनारे अनगिनत लोगों के शयनकक्ष हैं।
सूरज भाई अपने पूरे कुनबे के साथ गंगा नहा रहे हैं। पानी सुनहरा हो रहा है। सूरज की संगत का असर है। सुनहरा पानी हिलडुल कर और खूबसूरत लग रहा है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, पौधा, वृक्ष, बाहर और प्रकृति
जैनब की झोपड़ी, गंगा का किनारा
जैनब अपनी झोपड़ी के बाहर अपनी बिटिया के साथ नदी निहार रही है। तन्वंगी गंगा देखकर लगता है उसने भी 'चैलेंज एक्सेप्ट' किया और ढांचा हड्डी कर लिया। बताया संदीप कल रात खाना खाकर निकला। अभी तक नहीं आया। आएगा।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बैठे हैं
राधा मजे से अपने तख्त पर
राधा अपने ठीहे पर विराजी है। रिक्शे वाले घर चले गए हैं। चूल्हा उजाड़ गए हैं। जैसे कोई राजनयिक बंगला खाली करते हुए उजाड़ जाए। राधा बताती है -'ये सब गांजा , शराब पीते हैं। हल्ला करते हैं।'
हमने कहा -'तुम भी तो पीती हो गांजा, शराब।'
बोली-'शराब कभी-कभी। गांजा पी लेते हैं। बीड़ी कितनी पी सुबह से उसका हिसाब नहीं। '
आज सुबह ही उठ गई थी राधा। मुर्गा बोलने से पहले। आसपास कोई मुर्गा अलबत्ता मुझे दिखा नहीं। पास खड़े हुए थे तो बैठा लिया। गाना सुनाने लगी। 'मन डोले रे तन डोले रे, मेरे जी का गया करार' रे। बेसुरे सुर में गाना पूरी तन्मयता से गाती राधा एक के बाद दूसरे गाने पर इतनी तेजी से शिफ्ट हो रहीं थी जितनी तेजी से नेता लोग अपने बयान भी नहीं बदल पाते।
सीतापुर मिश्रिख के रिक्शे वालों के चूल्हे जले हुए थे। एक आदमी रोटियां थाप रहा था। दूसरा सेंक रहा था। भारी हैवीवेट रोटियां। बगल में दाल पक रही थी। रोटियों पर बात चली तो एक ने कहा -'ये खा कर ही क्विंटल भर का रिक्शा खींचने की ताकत आती है।' दूसरे ने हमको चैलेंज भी दिया कि रोटी खा लो। कहा यो खा लो था लेकिन मतलब खाकर दिखाने से था। हमने चैलेंज स्वीकार नहीं किया।
चूल्हे की रोटी से बात गैस की चली। लोगों ने बताया उनके यहां खाना गैस पर बनता है। एक ने कहा -'गैस मोदी दिहिन।' दूसरे ने बताया -'अखिलेश दिहिन।' अच्छी बात यह हुई कि दोनों ने इस पर कोई बहस नहीं की। कामगारों और प्राइम टाइम वाले पार्टी प्रवक्ताओं में यही अंतर होता है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बाहर
कैंची साइकिल सीखती बच्ची
आते समय एक लड़की कैंची साइकिल चलाना सीखती दिखी। बार-बार कोशिश करती। थोड़ी दूर चलाती। उतर जाती। फिर चलाती। सीखने की प्रबल इच्छा चेहरे पर साफ दिख रही थी। 'कोई काम नहीं है मुश्किल जब किया इरादा पक्का' का इश्तहार लग रहा था बच्ची का चेहरा।
महीनों से बने ओवरब्रिज पर मिट्टी बराबर की जा रही थी। लग रहा है अब पुल बन ही जायेगा।
हेयर कटिंग सैलून की दुकान खुल गयी है। एक बंदर दुकान से लोरियल डाई का डब्बा उठा लाया है। उसे खोलने की कोशिश करते हुए डब्बे पर बनी हीरोइन को बार-बार चूम टाइप रहा है। हमने फोटो खींचने की कोशिश की तो खौखिया पड़ा मुझ पर। ऐसे लगा जैसे किसी अराजक स्वयंसेवक की फोटो लेने पर वह कैमरा तोड़ने को झपटे। हम सहम गए। सहमते हुए ही हमने उस पर आभासी गुम्मा चलाने का एक्शन किया। वह भी पीछे हट गया। दो बांके वाले अंदाज में दोनों अपने-अपने रस्ते चल दिये।
इतवार की सुबह हो गयी। हम दफ्तर को चल दिये। आप मजे करो।

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Saturday, June 09, 2018

तेल और तेल के दाम


तेल फिर चर्चा में हैं । हमेशा रहता है। तेल के दाम चंद्रमा की कलाओं की तरह बढ़ते हैं। चन्द्रमा तो छोटा बड़ा होता है। लेकिन तेल के दाम को छोटा होना पसंद नहीं। कभी मजबूरी में घटना भी पड़ता है तो दोगुना बढ़कर हिसाब बराबर कर लेता है।
तेल का महत्व जगजाहिर है। तेल खुद को जलाकर दूसरों के लिए ऊर्जा पैदा करता है। वोट बैंक की तरह समझिये तेल को। किसी लोकतंत्र में दबे-कुचले , वंचित लोग चुनाव में महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वैसे ही जमीन में मीलों नीचे दबा- कुचला, काला-कलूटा , बदसूरत तेल जमीन पर आते ही महत्वपूर्ण हो जाता है। लोग इस पर कब्जे के लिए मारपीट करने लगते हैं।
वोट बैंक पर कब्जे के लिए अपने देश में भाषणबाजी, आरोप-प्रत्यारोप या फिर दंगा-फसाद आदि का चलन है। तेल पर कब्जे के लिए शांति का हल्ला मचाना पड़ता है। ताकतंवर , गुंडे टाइप के देश किसी तेल वाले देश में लोकतंत्र को खतरे में बता देते हैं। उस देश में घुसकर उसकी सरकार गिरा देते हैं। शांति की स्थापना के लिए अशांति मचा देते हैं।
तेल ऊर्जा पैदा करने के साथ ही घर्षण कम करता है। घर्षण कम होने से भी ऊर्जा बचती है। जहां तेल लग जाता है वहां घर्षण कम हो जाता है। कम मेहनत में ज्यादा काम हो जाता है। लोग इस वैज्ञानिक सत्य को इतना ज्यादा जानते हैं सारी ऊर्जा तेल लगाने में ही लगा देते हैं। मेहनत करने वाले टापते रह जाते हैं। तेल लगाने वाले बहुत आगे निकल जाते हैं।
हमारे एक मित्र को 'तेल लगाऊ' विधा में महारत हासिल है। वे अपने बॉस की कई दिन मिजाज पुर्सी करते रहे। असर न हुआ। तेल का असर न हुआ। मेहनत लगने लगी। हलकान हो गए। तेल लगाकर काम निकालने वाले का पसीना निकल आया। अंततः सीधे पूछ ही लिया एक दिन बॉस से -'साहब हम इतना तेल लगाते हैं, आप पर कुछ असर नहीं होता। '
पूछने का अंदाज भी तेल लगाऊ ही था। लेकिन बॉस उसमें मिली निरीहता और छद्म आकुलता से पसीज गए। बताया -'आप तेल लगाते कहाँ हैं, आप तो तेल बहाते हैं। बहुत तेल बर्बाद करते हैं। तेल दिन पर दिन मंहगा हो रहा है। आप इतना तेल लाते कहां से हैं। इतनी बर्बादी देखकर मेरा दिल दहल जाता है।'
तेल मध्यवर्गीय समाज की चौपाल है। मंहगाई की नपनी है तेल के दाम। पहले लोग गेंहू , चावल के दाम से मंहगाई नापते थे। आज तेल मंहगाई मीटर हो गया है। कभी तेल के दाम किसी की उम्र से जुड़ जाते हैं , कभी किसी और नाम से। सब नापें फेल हो जाती हैं। तेल के दाम कंचनमृग की तरह इधर-उधर होते रहते हैं।
लोग आज के समय में तेल के बढ़ते दामों से परेशान दिखते हैं। आज जब भी कोई परेशानी दिखती है तो उसे अपने अतीत के आईने में देखने का चलन है। सबको पता है कि रामायण , महाभारत काल में अपना समाज बहुत उन्नत था। इंटरनेट, सर्जरी सब था। फिर भी उस समय लड़ाई घोड़ों, हाथियों से हुई । ऐसा थोड़ी था कि उस उन्नत समाज में टैंक वगैरह न हों। लेकिन उस समय तेल के दाम इतने ज्यादा थे कि लोगों ने घोड़े-हाथियों से लड़ाई लड़ना उचित समझा।
देवता लोग इसीलिये पावरफुल हैं क्योंकि उनके सारे वाहन बिना तेल के चलते हैं। अपने परम भक्त गज को ग्राह से बचाने के लिए भगवान नंगे पांव पैदल भगे चले आये। समझ लीजिए कितना मंहगा रहा होगा उन दिनों।
कवि यहां कहना यह चाहता है कि तेल के अगर दाम बढ़ रहे है तो हमको दुखी नहीं होना चाहिए। हमको यह मनाना चाहिए कि यह और बढ़े। इतना बढ़े कि हमारी पहुंच से बाहर हो जाये। हमारा तेल से तलाक हो जाये। हम बिना तेल के रहना सीख लें। देवता हो जाएं।
लेकिन मनचाहा हमेशा होता कहां हैं। अभी - अभी खबर आई कि तेल के दाम तीस पैसे कम हो गए। हसम्भावित देवत्व से फिर दूर हो गए। मनुष्य योनि में ही रहने को अभिशप्त। तेल के दाम पर स्यापा करने को मजबूर। तेल लगाने , तेल बहाने वाले समाज में सांस लेना ही होगा।
लेकिन हमें पूरा भरोसा है कि तेल के दाम फिर बढ़ेंगे। हचककर बढ़ेंगे। हम तेल से दूर होते जाएंगे। हम कीड़ो -मकोड़े की जिंदगी जीते हुए भी देवत्व के नजदीक पहुंचेंगे। देखते-देखते उल्लू, गरुड़, घोड़े, गधों पर चलने लगेंगे।
आपको यह बेवकूफी की बात लगती होगी। हमको भी लगती है। लेकिन जहां इतनी बेवकूफाना बातों के साथ जी रहे हैं, वहाँ एक और सही। बेवकूफियों को स्वीकारे बिना जीना असंभव है। तेल के दाम गए , तेल लेने। अभी तो अगली सांस ले ली जाए। इसके बाद जो होगा , देखा जाएगा।

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