Friday, February 03, 2006

अति सूधो सनेह को मारग है

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अति सूधो सनेह को मारग है

अब ये लो नया लफड़ा। प्रेम के बारे में लिखो। हमारे पास जितना प्रेम का स्टाक था वह हम पहले ही अपने लेख प्रेम गली अति सांकरी तथा ये पीला वासंतिया चांद में उड़ेल चुके हैं। अब प्रत्यक्षाजी तथा आशीष कहते हैं थोड़ा और बयान किया जाय।में अपनी कल्पना के घोड़ों को दौडा़ने के लिये पुचकारता हूं लेकिन वे अड़े खड़े हैं जहां के तहां-ठेलुहा,देबाशीष,अतुल के ब्लाग की तरह। बहरहाल देखा जाये हमारे पहले के शूरमाओं ने क्या किया।
देखा गया कि तो सब सूरमाओं ने अपने-अपने काम के अंदाज में प्रेमियों के गुण बताये। प्रत्यक्षाजी खरीददारी का काम देखती हैं। आदर्श प्रेमी की उनकी जरूरतें भी टेंडर के अनुसार हैं। आठ गुण बतायें गयें हैं। जो लोग इन गुणों को धारण करते हैं वे आदर्श प्रेमी का टेंडर पाने के पात्र हैं। स्वामीजी कम्प्यूटर कर्मी हैं। उन्होंने प्रेमी प्रोग्राम बनाया जो कि तभी चलेगा जब सिस्टम में आठ सुविधायें होंगी। मानोशीजी पिछले समाचार मिलने तक कुछ करती नहीं थीं लिहाजा ये पति को भी कुछ करते नहीं देख सकतीं। न रिमोट चलाते,न समाचार पत्र पढ़ते न ही हूँ-हाँ करते देखना चाहती हैं ये अपने पति को । ये नहीं चाहती कि किसी काम लायक रहे इनका चाहने वाला -पति।
तरुन ने भी अपना रोना रोते हुये लिखा:-
जब से हुई है शादी, आंसू बहा रहा हूँ,
आफत गले पड़ी है उसको निभा रहा हूँ।
चुन्‍नू करे परेशाँ, मुन्‍नी को ढूँढता हूँ,
राशन नहीं है घर पे बाजार जा रहा हूँ।।

मैडम है घर से गायब, सखियों से जा मिली है,
जलता नही है चूल्‍हा, कब से जला रहा हूँ।
आयेगा मेरा भी एक दिन, मैं भी राजा बनूँगा,
फिर कहूँगा आजा, नहीं तो दूजी ला रहा हूँ।।

आशीषके बारे में क्या कहें? अविगत गति कछु कहत न आवै! इनकी कहानियां सुनकर इनके कुंवारेपन का घिसा-पिटा राज समझ में आता है:-
एक लड़का बहुत दिन से अपने लिये लड़की तलाश रहा था। काफी दिन बाद मिलने पर उसके दोस्त ने शाश्वत सवाल दोहराया-कोई लड़की पसन्द आई?
लड़के ने कहा हां मिल गई लड़की जिसे मैं बहुत पसन्द करता हूं।
दोस्त बोला -फिर क्या शादी कर लो जल्दी से।
लड़के ने अपने आपको दुख पूर्वक उचकाते हुये कहा- यार शादी तो मैं कर लूं लेकिन एक ट्रेजेडी है।
दोस्त बोला -कैसी ट्रेजेडी?क्या समस्या है?
लड़का बोला-यार प्राब्लम यह है कि वह अपने पसन्द के लड़के से शादी करना चाहती है।
प्रेम के बारे में अपने विचार हम पिछले साल ही प्रकट कर चुके हैं:-
जब आदमी के पास कुछ करने को नहीं होता तो प्यार करने लगता है.इसका उल्टा भी सही है-जब आदमी प्यार करने लगता है तो कुछ और करने लायक नहीं रहता .प्यार एक आग है.इस आग का त्रिभुज तीन भुजाओं से मुकम्मल होता है. जलने के लिये पदार्थ (प्रेमीजीव), जलने के लिये न्यूनतम तापमान(उमर,अहमकपना) तथा आक्सीजन(वातावरण,मौका,साथ) किसी भी एक तत्व के हट जाने पर यह आग बुझ जाती है.धुआं सुलगता रहता है.कुछ लोग इस पवित्र ‘प्रेमयज्ञ धूम’ को ताजिंदगी सहेज के रखते हैं .बहुतों को धुआं उठते ही खांसी आने लगती है जिससे बचने के लिये वे दूसरी आग जलाने के प्रयास करते हैं.इनके लिये कहा है नंदनजी ने:-
अभी मुझसे फिर उससे फिर किसी और से
मियां यह मोहब्बत है या कोई कारखाना.
पुराने समय से प्रेम को हमेशा अहमकपन माना गया है। कोई समझदार आदमी प्रेम करते हुये नहीं पकड़ा गया। समझदार आदमी प्यार करिच नहीं सकता। प्रेम करने के लिये सबसे जरूरी तत्व है- दुनियावी बेवकूफी। जिसमें जितनी ज्यादा होगा -वह उतना सफल प्रेमी कहलायेगा।
कुछ लोग कहते हैं-प्यार एक सुखद अहसास है.पर यह ठीक नहीं है.प्यार के ‘ब्रांड एम्बेसडर’ लैला मजनू ,शीरी -फरहाद मर गये रोते-रोते.यह सुखद अहसास कैसे हो सकता है?
लोगों ने तमाम गुण बतायें हैं आदर्श प्रेमी के । गोया प्रेमी नहीं अपनी कंपनी के लिये कर्मचारी चुनना हो। जबकि दुनिया में प्रेम हमेशा वह दुर्घटना मानी गई है जो पहली नज़र में होती है।”लव एट फस्ट साइट।“साथी को देखा नहीं उधर प्रेम का नगाड़ा बजने लगा। मन कसमसाने लगा:-
नैन लड़ जइहैं तो मनवा मां कसक हुइबै करी
प्रेम का बजिहै जब पटाखा तो मनवा मा कसक हुइबै करी।

सच तो यह है कि प्रेम का कोई गणित नहीं होता। कुछ पता नहीं होता कि आप किन गुणों को धारण करने वाले पर अपने दिल की लुटिया डुबा देंगे। सर्वथा अनिश्चित। वास्तव में ज्यादातर मामलों में प्रेम के तत्व ‘रिवर्स इंजीनियरिंग’ से तय होते हैं। जो आपको अच्छा लगता है आप मान लेते हैं कि वही गुण आदर्श प्रेमी के गुण होते हैं।पता नहीं किसके लिये आप कहने लगें-आप मुझे अच्छे लगने लगे।
यह भी संभव हो कि किसी शख्स में वो सारे गुण मौजूद हों जो कि आप अपने प्रेमी में देखना चाहते हैं लेकिन असेम्बली‘ हो उन गुणों की वो निहायत बेतरतीब हो। जब आप सहिष्णुता की अपेक्षा करें साथी से तब वह स्पष्टवादी (मुंहफट) हो जाये तथा जब आप आशा करते हों कि वह आपके बारे में सच बताये तब वह सहिष्णुता धारण कर ले।
कुछ लोग कहते हैं कि हम अपने प्रेम में खुद को खोजते हैं। जो हम होना चाहते हैं वह खोजते हैं। वहीं दूसरे लोग कहते हैं प्रेमी में हम उन तत्वों की तलाश करते हैं जिनकी हमारे में कमी होती है। यह दूसरी बात मुझे सच के करीब लगती है जब मैं देखता हूं कि स्वामीजी अपनी होने वाली प्रेमिका में सहिष्णुता,समझदारी आदि-इत्यादि गुणतलाशते हैं।
प्रेम का हमारे देश में कोई उल्लेखनीय इतिहास नहीं रहा है। जो छोटी प्रेम नदियां बहीं भी वे शादी के सागर तुरंत विलीन हो गईं। राजा लोग शादी करते,बच्चे होते फिर रानियों के मर जाने पर प्रेम करके रानियों के मकबरे बनवा डालते। इस तरह इतिहास में उनका प्रेम अमर हो जाता। जिसका जितना उंचा मकबरा उसका उतना गहरा प्रेम।ताजमहल के बारे में पता चलता है कि मुमताज महल जब तेहरवें बच्चे को पैदा करते समय मरी तो उसकी उम्र केवल ३९ साल थी। चूंकि मकबरा बड़ा बना है लिहाजा शाहजहां -मुमताजमहल का प्रेम भी बड़ा है।प्रेम की गहराई मकबरे की ऊंचाई से तय होती है।
आमजीवन में भी लोग तमाम पाबंदियों के बावजूद प्रेम का झण्डा फहराने का कोई मौका नहीं चूकते। हर साल मेरठ, मुजफ्फरनगर, हरियाणा के गांवों में आये दिन पंचायतें घर वालों की मर्जी के खिलाफ शादी करने वाले प्रेमियों-प्रेमिकाओं को सरेआम फूंकती रहती हैं लेकिन प्रेमीजन हैं कि लगे हुये हैं। ये आग ही ऐसी है कि लगाये न लगे बुझाये न बुझे।
पता नहीं प्रेमिकाओं के कौन से गुण देखकर लोग मरने के लिये तैयार हो जाते हैं। काश! उनमें भी तमाम मध्यमवर्गीय लड़कों की तरह की समझदारियां होती जो प्रेम तो अपने साथ की लड़की से करते हैं लेकिन शादी अपने पिताजी के द्वारा तय दहेज की सीढ़ी पर चढ़कर करते हैं।
पुराने जमाने में जब लोग प्रेम के पथ पर डगर बढ़ाते थे तो चुनने में टाइम बरबाद नहीं करते थे। जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिये टाइप प्यार करते थे। राही मासूम रज़ा के पात्र हैं वे तड़ से इश्क करने लगते हैं। रजिया ने मुन्नन को देखा और वो तड़ से उसपे फिदा हो गई। फिदा होने के बाद वो पूछती हाय वो कैसा लगता है?
आशिक लड़के भी संतोषी प्रकृति के होते थे। जो मिल गया उसी में उचक कर गाने लगे-

चांद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैने सोचा था,
हां तुम बिल्कुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था।

उन दिनों तो एक ने इजहारे मुहब्बत किया नहीं कि दूसरे ने भी गरदन हिला दी और दोनों चलो भाग चलें पूरब की ओर कहते हुये भागते चले जाते अमराइयों में,पनघटों पर,घाटियों में,पार्कों में,सिनेमाहाल में,सहेली के यहां दोस्त के यहां।
धीरे-धीरे प्रेम के दफ्तर में भी लालफीताशाही आने लगी। प्रेमी कुछ इंतजार के बाद यंग्री यंग मैन होने लगा-
सुन साहिबा सुन,सुन साहिबा सुन
हमने तुम्हें चुन लिया तू भी मुझे चुन।

इसपर भी न मानी कन्या तो लड़का पूरा रंगरूट हो जाता है:-
सीधे-सीधे हां करती है या चलती है थाने?
कलाकार रंगरूट आगे अपने प्रेम संबंधों का वर्णन करता है रेल के डिब्बों में,शौचालयों की दीवारों में,कूडा़ घरों में-कोणार्क ,खजुहारो शैली के चित्रों में।जब सब मेहनत के बाद भी मंजिले मकसूद नहीं मिलती तो वह अपनी प्रेमिका के चेहरे पर अपना सारा प्रेम तेजाब का उडे़ल देता है।अगर तू मेरी नहीं हो सकती तो तुझे किसी दूसरे की भी मैं नहीं होने दूंगा।
विकल्पहीन कन्यायें तो प्रेमी के आवाहन (तू भी मुझे चुन) पर उसे चुनकर, चूना लगाने लगतीं लेकिन कुछ होती जिनके पास विकल्प होते वे अंखियों से गोली सी मारते हुये कहतीं-ज्यादा मत परेशान करो वर्ना भाईसाहब कह दूंगी सरे बाजार । बांध दूंगी राखी तो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहोगे। खिलाना पड़ेगा हमारे बच्चों को मामा कहते हुये।
कुछ शरमदार नायिकायें शायद इस तरह विरोध जाहिर करतीं होंगी-
देखिये आपसे मैंने कितनी बार कहा आप मेरे सपनों में मत आया करें प्लीज़। समझा करें मेरी शादी होने वाली है। माना कि हमने साथ-साथ गर्मी की दोपहर में छत पर बैठकर बातें की हैं,हाथ में हाथ पकड़कर पसीने-पसीने हुये हैं इस चक्कर में हम दोनों की डिवीजन खराब हो गयी लेकिन अब तो तंग मत करिये न। आपका क्या आपको तो कहीं नौकरी मिल जायेगी बाहर चले जायेंगे। लेकिन मेरा क्या होगा? मैं तो भले घर की लड़की हूं । बदनामी तो मेरी होगी न! इसलिये अगर आप मुझे जरा सा भी चाहते हों तो प्लीज़ मेरे सपनों में आना बंद कर दें। मेरी अगले महीने शादी है मैं अब ‘इनके’ सपने भी देखना चाहती हूं। अभ्यास जरूरी है न!९ को शादी है ,आइयेगा जरूर। तंबू -कनात लगवाने में पापा की हेल्पकर देना प्लीज़।
आधुनिक बालक-बालिकाओं के सम्पर्क में तो मैं नहीं हूं लेकिन जैसा सुनता हूं कि पुराने जमाने में जिस अंदाज में लोग जहां सस्ते में मिली खरीद के डाल लेते थे कि पड़ी रहेगी बखत-जरूरत काम देगी। जिसकी कितनी जमीन उसका उतना रुआब। या फिर जिस तरह राजा लोग शिकार पर जाते तो एकाध रानी भी ले लाते रनिवास की शोभा तथा संख्या बढ़ाने के लिये ।उसी अंदाज में आजकल प्रेम होने लगा है। जिसके जितने ज्यादा प्रेम उसका उतना रुतबा। मेरे प्रेमी से तेरे प्रेमी ज्यादा कैसे?
ये बालक-बालिकायें प्रेम संबंध के स्थाइत्व के लिये नहीं संबंधों की संख्या बढ़ाने के लिये ज्यादा परेशान रहते हैं। साथी के रकीबों की संख्या बढ़ती रहे। इनकी धमकियां भी कुछ ऐसी होती होंगी-ये रामसजीवन मैं देख रही हूं कि तुम कुछ ज्यादा ही पजेसिव हो गये । अगर यही हाल रहा तो वी कांट गो अ लांग वे। या फिर कुछ धमकाती होंगीं- ज्यादा स्मार्ट मत बनो वर्ना शादी कर लूंगी तुमसे तो रोते नहीं बनेगा।
विज्ञापन भी प्रेम को मैगी नूडल बनाये हुये हैं। जो कन्या आपकी तरफ देखने के लिये भी तैयार नहीं वही कन्या एक खास रेजर से दाड़ी बनाने पर जोंक की तरह आपसे चिपक जायेगी।लड़की नहीं पट रही रही है कोई बात नहीं कुछ हजार में खास फटफटिया लो लड़कियां पटापट पटेंगी। लड़का नहीं पट रहा -अरे ये वाली क्रीम लगाइये न! आप शमा लड़के परवाना न बन जायें तो पूरे पांच रुपये वापस। फलानी साड़ी पहिनिये लड़का लटपटाता चला आयेगा आपकी तरफ!
बाजार यही बताता है कि किसी गुण की जरूरत नहीं आपको किसी के सपनों का राजा या किसी के सपनों की रानी बनने के लिये। बस ये क्रीम लीजिये,वो पाउडर मलिये। ये अंडरवियर पहिनिये वो बनियाइन। ये सूटिंग-वो शर्टिंग। ये टानिक,वो जड़ी बूटीयुक्त तेल। खाना पकाना सीखने की कोई जरूरत नहीं इस कुकर में वो मसाला डालिये बस हो चाट लीजिये अपनी अंगुलियां। अब तो इजहारे मुहब्बत के लिये शेरो शायरी भी रटने के लिये जरूरत नहीं -बस प्रस्टिज कुकर ले आइये:-
जो बीबी से करे प्यार वो कैसे करे प्रेस्टीज से इंकार।
यहां आते-आते मैं विषय के औचित्य पर लौटता हूं। यह विषय मांग करता है कि आप आठ गुण बताओ जो आप अपने प्रेमी-प्रेमिका में चाहते हो। अब आप करने लगे टुकड़े-टुकडे़ अपने प्रेमी के। जो सिर्फ प्रेमिका की चितवन पर मर मिटे ,सिर्फ तिरछी नज़र के तीर से घायल हो गये कहते हुये-
तिरछी नज़र का तीर है,मुश्किल से निकलेगा,
गर दिल से निकलेगा तो दिल के साथ निकलेगा।

वो अपनी माशूका में सात फर्जी गुण खोज रहे हैं। जिनके साथी में सैकड़ों गुण हैं वे उनके केवल आठ गुण चुन के बाकी गुणों को आप सौरभ गांगुली बना दो। ये कैसा प्रेमी-प्रेमिका खोज है जो उसको टुकड़े-टुकड़े कर दे।
सच पूछा जाये तो प्रेम एक अहसास है जिसकी कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं दी जा सकती। इसी तरह प्रेमी के गुण भी । वैसे प्रेम वही है जो हमें उदात्त बनाये,हमारा विस्तार करे। जीवन के प्रति सकारात्मक बनाये। प्रेम व्यक्ति को निर्मल बनाता है,निश्छल बनाता है। घाघ व्यक्ति जिंदगी में सब कुछ हासिल कर सकता है प्रेम नहीं कर सकता-
अति सूधो सनेह को मारग है जहं नैकु सयानप,बांक नहीं।
लोग कहेंगे कि अब कुछ अपने बारे में भी बताया जाय। तो हम साल भर पहले अपनी कहानी लिख चुके हैं :-

मैंने भी कोशिश की.टुकड़ों-टुकड़ों मे तमाम महिलाओं में तमाम गुण चीजें देखीं जो मुझे लगातार आकर्षित करते रहे.पर टुकड़े,टुकड़े ही रहे. उन टुकड़ों को जोड़कर कोई मुकम्मल कोलाज ऐसा नहीं बन पाया आज तक जो मेरी बीबी की जगह ले सके.विकल्पहीनता की स्थिति में खींच रहे हैं गाडी- इश्क का हुक्का गुड़गुड़ाते हुये
.
कुछ नहीं बदला सिवाय समय के ।
बकिया इश्क के बारे में तो गुणी लोग कह गये हैं:-
कबिरा यह घर प्रेम का खाला का घर नाहिं,
शीश उतारै भुईं धरै तब पैठै घर मांहि।

ये तो खाली ट्रेलर है। न जाने कितने पेंच हैं इस प्रेम पाठशाला के। इसका भी रिवाज उल्टा ही है जो प्रेमपाठ पढ़ गया वो गया काम से:-

मकतबे इश्क का ये खेल निराला देखा,
उसको छुट्टी न मिली जिसको सबक याद हुआ।

आगे जिन लोगों के लेख पढ़ना चाहता हूं इस मसले पर वे हैं:-
१)रमन कौल-चेन मेल मत लिखें लेख तो लिखें।
२)इंद्र अवस्थी- कन्या छात्रावास की ताकाझांकी कब लिखोगे?
३)अतुल अरोरा- सही में अभी भी व्यस्त हो?
४)रवि रतलामी- जिनके लिये लड़े-झगडे़ उनके बारे में कुछ तो लिखा जाये।
५)पंकज नरुला- जहाज का पंछी कुछ इस पर भी उड़े। लिखा जाये कुछ शहजादियों पर।
६) देबाशीष-अब तो हो गये इंडीब्लागर्स चुनाव। तबियत भी ठीक हो गयी होगी। कुछ हो जाये नुक्ताचीनी।
७)राजेश-तुम भी काहे चूको ठाकुर?लिखा मारो सारा किस्सा जो तुम बताये नहीं लेकिन हम जानते हैं।
८)विजय ठाकुर-अपने होने का सबूत दो। पुटुष के फूल फिर खिले होंगे!
९)प्रेम पीयूष- कहां गये बंधुवर? पेंसिल की तरह गुम?
१०)जीतेंद्र-कब तक छिपाओगे छत की बातें जो पूरी बताई नहीं?

मेरी पसंद

मैं सदा बरसने वाला मेघ बनूँ
तुम कभी न बुझने वाली प्यास बनो।

संभव है बिना बुलाए तुम तक आऊँ
हो सकता है कुछ कहे बिना फिर जाऊँ
यों तो मैं सबको बहला ही लेता हूँ
लेकिन अपना परिचय कम ही देता हूँ।
मैं बनूँ तुम्हारे मन की सुन्दरता
तुम कभी न थकने वाली साँस बनो।
तुम मुझे उठाओ अगर कहीं गिर जाऊँ
कुछ कहो न जब मैं गीतों से घिर जाऊँ
तुम मुझे जगह दो नयनों में या मन में
पर जैसे भी हो पास रहो जीवन में ।
मैं अमृत बाँटने वाला मेघ बनूँ
तुम मुझे उठाने को आकाश बनो ।
हो जहाँ स्वरों का अंत वहाँ मैं गाऊँ
हो जहाँ प्यार ही प्यार वहाँ बस जाऊँ
मैं खिलूँ वहाँ पर जहाँ मरण मुरझाये
मैं चलूँ वहाँ पर जहाँ जगत रुक जाये।
मैं जग में जीने का सामान बनूँ
तुम जीने वालों का इतिहास बनो।
-स्व.रमानाथ अवस्थी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

7 responses to “अति सूधो सनेह को मारग है”

  1. eswami
    कुछ लोग कहते हैं कि हम अपने प्रेम में खुद को खोजते हैं। जो हम होना चाहते हैं वह खोजते हैं। वहीं दूसरे लोग कहते हैं प्रेमी में हम उन तत्वों की तलाश करते हैं जिनकी हमारे में कमी होती है। यह दूसरी बात मुझे सच के करीब लगती है जब मैं देखता हूं कि स्वामीजी अपनी होने वाली प्रेमिका में सहिष्णुता,समझदारी आदि-इत्यादि गुण तलाशते हैं।
    हां जी बिल्कुल, उसे हमारे समान साण्ड-बुद्धि नही होना चाहिए.
    लेकिन गुरुदेव, मैं बच्चों की खुशी के लिए उन के साथ बच्चा तो बना – प्रेम की बात चली और रूमी,खलील जिब्रान और बुल्ले शाह को कोट किए बिना लिखा – कितना मुश्किल था आपको अंदाजा भी नही है! इधर तो पब्लिक को मीर और मज़ाज भी भारी पड जाते हैं. चलो हल्का-फ़ुल्का ही सही संवाद अच्छा है. छोरों-छारियों वाली बातें है – प्रेम का आध्यात्म और उस से जुडा सबकुछ आज कॉर्नी और मेलोड्रामेटिक करार दिया जाता है. लेकिन आल टाईम बेस्ट हाल ओफ़ फ़ेम नंबर १ पीले वसंती चांद की कसम – अपना टाईम सचमुच कुछ और था प्रभु!
  2. Atul
    आशीष,तरूण और अब शुकुल देव जी, यह टैग का खेल कर करके टीपबाजी कर रहे हैं। अब तीन टीप पढ़ने के बाद भी न लिखा तो गाँधी का चेला बन जाऊँगा। खैर लेख जल्द हाजिर होगा गुरुदेव। बकिया आपने हेशा कि तरह झकास लिखा।
  3. Dharni

  4. प्रत्यक्षा
    आपको इसलिये टैग थोडे किया था कि हमारी ही खिंचाई कर दें .
    रिसर्च पेपर बहुत अच्छा था, टैग शिकार बार बार इसी लिये ही तो बनाया गया आपको.
    मज़ा आ गया.
    प्रत्यक्षा
  5. अतुल
    बुरा फँसाया गुरूदेव आपने। यह रही विशलिस्ट की व्यथाकथा।
  6. जीतू
    तुम तो गुरु अवलोकनी लेख लिख दिये, दूसरो को आदेश देकर अपने राज छिपाये रखना चाहते हो? ऐसा नही चलेगा।
    बदनामी तो मेरी होगी न! इसलिये अगर आप मुझे जरा सा भी चाहते हों तो प्लीज़ मेरे सपनों में आना बंद कर दें। मेरी अगले महीने शादी है मैं अब ‘इनके’ सपने भी देखना चाहती हूं। अभ्यास जरूरी है न!९ को शादी है ,आइयेगा जरूर। तंबू -कनात लगवाने में पापा की हेल्पकर देना प्लीज़।
    गुरु ये तो व्यथा कथा दिख रही है, इतना डीप और डिटेल्ड, कोई अनुभवी ही लिख सकता है जिसने इस व्यथा को झेला हो।
    बकिया लेख अच्छा लिखे हो। लगे रहो।
  7. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.अति सूधो सनेह को मारग है 2.हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती 3.आपका संकल्प क्या है? 4.वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत है 5.मेरे अब्बा मुझे चैन से पढ़ने नहीं देते 6.जेहि पर जाकर सत्य सनेहू [...]

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