Thursday, April 15, 2010

छोटी ई, बड़ी ई और वर्णमाला

http://web.archive.org/web/20140419213914/http://hindini.com/fursatiya/archives/1333

छोटी ई, बड़ी ई और वर्णमाला

वर्णमाला
पिछ्ले कई दिनों से मैं यह बतकही/कहा-सुनी देख रहा हूं!
’छोटी ई’ और ’ बड़ी ई’ आपस में लगातार एक-दूसरे से बतिया/बहसिया रही हैं। तर्क-वितर्क कर रही हैं। लगी पड़ी हैं एक-दूसरे को औकात दिखाने पर।
छोटी ई का कहना है कि वर्णमाला में पहले आती है इसलिये वो बड़ी है। बड़ी ई कहती है अगर वो छोटी होती तो उसको बड़ी ई क्यों कहते!
दोनों में से किसी के पास हाईस्कूल का सर्टिफ़िकेट तो है नहीं कि बड़े-छोटे का मामला तय हो सके। आपस में जुड़वां मानने को दोनों तैयार नहीं! हर चाहती है उसको ही बड़ा माना जाये।
इस बीच तमाम अक्षर आते जा रहे हैं! छोटी ई और बड़ी ई मिलकर या अकेले जैसी मांग हो उसके अनुसार उनकी सेवा करती जा रही हैं। सेवाकार्य पूरा करते ही फ़िर लड़ने लगती- जैसे कि क्रिकेट खिलाड़ी गेंद फ़ील्ड करके च्युंगम चबाने लगाते हैं।
इस बीच तमाम अक्षर आते जा रहे हैं! छोटी ई और बड़ी ई मिलकर या अकेले जैसी मांग हो उसके अनुसार उनकी सेवा करती जा रही हैं। सेवाकार्य पूरा करते ही फ़िर लड़ने लगती- जैसे कि क्रिकेट खिलाड़ी गेंद फ़ील्ड करके च्युंगम चबाने लगाते हैं।
सेवाकार्य का नमूना भी देखना चाहते हैं आप! लीजिये- देख लीजिये।
देखिये इधर से एक आया, एक आया और आधा भी दिखा। छोटी ई और बड़ी ई ने उनको देखा और आंखों ही आंखों में इशारा किया। छोटी ई ह के बायें लग गयी , बड़ी ई द की दायीं ओर। ह को हि और द को दी बना दिया। आधे न को दोनों के बीच धर दिया जैसे मोटर साइकिल में मियां-बीबी के बीच बच्चा एडजस्ट हो जाता है। सबके सहयोग से हिन्दी शब्द बन गया और चल दिया।
फ़िर दोनों ने देखा कि एक , के साथ टहल रहा है। पास आकर दोनों बद हो गये थे। पहले तो छोटी ई और बड़ी ई ने उनको देखकर मुंह बनाया लेकिन फ़िर न जाने क्या सोचकर दोनों को पास बुलाया। छोटी ई ने के ऊपर और बड़ी ई ने के ऊपर अपनी छतरियां तान दी और बगल से एक बिंदी उठाकर के ऊपर लगा दी। आवारा, निठल्ला से फ़िरते बद का कायाकल्प हो गया! बुराई के गैंग में टहलने वाला बद, बिंदी बनकर पारिवारिक हो गया और एक सुहागन के माथे पर दमकने लगा। बद से बिंदी होने में उसका लिंग परिवर्तन हो गया लेकिन इससे शब्द समुदाय में कोई हलचल नहीं हुई। सबने उसे नये रूप में सहर्ष स्वीकार लिया।
इससे लगा कि शब्द समुदाय में लिंग भेद के आधार पर व्यवहार भेद नहीं होता।
इस बीच तमाम अक्षर आते जा रहे हैं! छोटी ई और बड़ी ई बड़ी ई ने छोटी ई को इशारा किया! छोटी ई ने धीरे से के ऊपर अपना छाता तान दिया। दल , दिल बनकर धड़कने लगा। दिल की धड़कन देखकर बड़ी ई इत्ती बाबली हो गयी कि एक और दूसरा दल दिखा तो उसके द के साथ सट ली।
उधर से के साथ दिखा। दोनों को लगा कि अगर ये ऐसे ही घूमते रहे तो या तो दल वाली सारी खुराफ़ातें अंजाम देंगे। हुल्लड़ मचायेंगे। भभ्भड़ करेंगे! बड़ी ई ने छोटी ई को इशारा किया! छोटी ई ने धीरे से के ऊपर अपना छाता तान दिया। दल , दिल बनकर धड़कने लगा। दिल की धड़कन देखकर बड़ी ई इत्ती बाबली हो गयी कि एक और दूसरा दल दिखा तो उसके द के साथ सट ली। दल को दील बना दिया। किसी ने टोंका -अरे मुई क्या करती है! कोई निठल्ला वैयाकरण देखेगा तो टोंकेगा। कहेगा दील सही नहीं हैं , इसे दिल बनाओ।
बड़ी ई इससे बेखबर के साथ लगी रही। कहने लगी जब कोई टोंकेगा तब देखा जायेगा। अभी तो मेरा दिल है कि मानता नहीं।
एक और दल इतना क्यूट सा दिखा कि बड़ी ई और छोटी ई दोनों का एक साथ उसके साथ जुड़ने का मन हो आया। दोनों ने मिलकर दल को दिली बना दिया। दिली के संग के लिये पहले तो इच्छा को बुलाया! फ़िर उनको लगा कि कोई हिन्दी ने नाम पर नाक और उर्दू के नाम पर भौं न सिकोड़े इसलिये तमन्ना को साथ लेकर मस्ती करने लगीं। दल जैसा हुड़दंगिया सा लगने वाला शब्द छोटी ई और बड़ी ई के संसर्ग में आकर पहले तो दिली बना और उसई के चलते इच्छा और तमन्ना के साथ जोड़ी बनाकर महीन भावनाओं की अभिव्यक्ति का काम पाकर ऐश करने लगा!
कई जगह छोटी ई का काम बड़ी ई ने किया। कई जगह बड़ी ई काम छोटी ई ने किया। दिल की जगह दील वाली बात तो आपको बता ही चुके। बहुत जगह ऐसा हुआ कि फ़िर की जगह फ़ीर हो गया, हीर की जगह हिर हो गया (रांझा गया काम से! खोजता फ़िर रहा है हीर को! ) , दिन की जगह दीन पता नही कित्ती जगह ऐसा हुआ। अनगिनत किस्से! कभी छोटी ई किसी के साथ टहलने गयी तो बड़ी ई ने उसका काम संभाल लिया , जब बड़ी कहीं गई तो छोटी ने उसका भी संभाल लिया।
कोई शब्द बन-ठन के आया था छोटी ई और बड़ी ई की सेवायें पाने के लिये। बना-ठना तो था ही। जित्ता बना-ठना था उससे ज्यादा अकड़ रहा था। ऐसे जैसे कहीं से फ़्री का कलफ़ लगवा के आया हो!
एक दिन तो मजा आ गया। कोई शब्द बन-ठन के आया था छोटी ई और बड़ी ई की सेवायें पाने के लिये। बना-ठना तो था ही। जित्ता बना-ठना था उससे ज्यादा अकड़ रहा था। ऐसे जैसे कहीं से फ़्री का कलफ़ लगवा के आया हो! उसको देखते ही दोनों को शरारत सूझी। बिना उसको कुछ बताये छोटी की जगह बड़ी लग गयी, बड़ी की जगह छोटी लग ली। मात्रा-सेवा करने के बाद उससे कहा – जाइये आपकी यात्रा शुभ हो। चलने से पहले शब्द ने शीशे में अपनी धज देखी तो हत्थे से उखड़ गया। बोला मेरा सारा हुलिया बिगाड़ दिया। दिल्ली की जगह मुझे दील्लि बना दिया। मुझे ऐरा-गैरा समझ लिया है। दोनों को पकड़ कर लोक सभा में पूरे दिन की कार्यवाही न सुनवाई तो मेरा नाम भी दिल्ली नहीं।
लेकिन दोनों ई तो मिलकर उससे दिल्लगी करती रहीं। कहा कि इत्ते बार जाने कित्ते लोगों ने तुम्हारे नाम वाले शहर को उजाड़ा तब तुम्हारा नाम वाला शहर तो कुछ कर नहीं पाया। तू आया बड़ा नखरे दिखाने वाला। तेरे जैसे भतेरे देखे हैं। दुकान से ज्यादा नखरे साइनबोर्ड के।
लेकिन शब्द चूंकि राजधानी से जुड़ा था इसलिये उसकी अकड़ खतम ही न हो पा रही थी। बार-बार देख लेने की धमकी दिये जा रहा था। बोला तुम लोगों को जरा सा भी सऊर नहीं! पता भी नहीं किधर लगना है ,कैसे लगना है! बिना देखे लग लीं! कौन है तुम्हारा मालिक बुलाओ मैं अभी शिकायत करूंगा। ऐसी खराब सेवा देखकर मूड ऑफ़ हो गया मेरा तो। शताब्दी का समय हो रहा है! जल्दी बुलाओ अपने शब्द मैनेजर को।
जब खुद अल्ला-ताला भगवान सबसे जो कि सबसे बड़े कारसाज हैं इत्ते खराब ऐढ़ें-बैढे आईटम बना के भेज देते हैं धरती पर तो आम लोगों के उत्पादन पर हल्ला मचाने से क्या होगा।
इसके बाद पता नहीं क्या हुआ। किससे क्या बात हुई कुछ पता नहीं लेकिन जो जबाब पता चला वो शायद कुछ इस तरह से था कि जब खुद अल्ला-ताला भगवान सबसे जो कि सबसे बड़े कारसाज हैं इत्ते खराब ऐढ़ें-बैढे आईटम बना के भेज देते हैं धरती पर तो आम लोगों के उत्पादन पर हल्ला मचाने से क्या होगा। जब भगवान के कारखाने के क्वालिटी कन्ट्रोल इत्ता चौपट है कि खंचियन लंग्ड़े/लूले, अंधे/काने तो खैर छोड़ ही देव ,दिमागी रूप से एक से एक पैदल , तुर्रम खां . लम्पट/लफ़ंदर टाइप आइटम टेस्टेड/ ओके होकर धरती पर सप्लाई हो जाते हैं कि लगता है कि वहां भी मेड इन चाइना वाले आइटम धड़ल्ले से चलते हैं । जब सर्वशक्तिमान और सर्वगुणसम्पन्न के यहां उत्पादन की गुणवत्ता के हाल हैं तो धरती पर बनने वाले शब्द की क्या कही जाये!
शब्द निर्माण के काम से फ़ुरसत पाते ही छोटी ई और बड़ी ई फ़िर से छोटे-बड़े की बात तय करने के लिये चहकते हुये लड़ने लगीं। अचानक बड़ी ई ने देखा कि बाकी सारे अक्षर उनको लड़ते-झगड़ते देख रहे हैं। सब मुस्करा रहे हैं। घूर रहे हैं। छोटी ई ने जब बड़ी ई को दूसरे अक्षरों को ताकते देखा तो पहले तो उसे लगा कि शायद उसका किसी से कांटा भिड़ गया या फ़िर उसका फ़िर किसी पर दिल आ गया। लेकिन जब उसने बड़ी ई को कोई हरकत न करते देखा तो वह पास जाकर उसको हिलाकर बोली- ये बड़ी ई किधर खो गयी? क्या सोचने लगी? अच्छा परेशान मत हो मैंने मान लिया कि तू ही बड़ी ई है। चल अब खुश हो जा! हंस दे। चल जल्दी से हंस!
लेकिन बड़ी ई चुपचाप लगातार बाकियों को घूरती रही। कुछ बोली नहीं। छोटी ई उसे घसीट कर अलग ले गयी और उससे पूछा -तू ऐसे चुप क्यों है? मैंने आज तक कभी उसे इस तरह चुप नहीं देखा। मेरी बात इत्ती बुरी लग गयी क्या?
बड़ी ई बोली नहीं मेरी सहेली! तेरी बात का क्या बुरा मानता। लेकिन आज मैंने यह ध्यान दिया कि सारी वर्णमाला में एक मेरे , तेरे और ञ के अलावा और कोई स्त्रीलिंग शब्द ही है नहीं। न कोई स्त्रीलिंग स्वर न व्यंजन! एक तरफ़ से देख लो अ,आ,उ,ऊ,ए,ऐ,ओ,औ अं,अ: सबके सब मर्दलिंग! इसके बाद कवर्ग, चवर्ग, तवर्ग,पवर्ग, टवर्ग, यवर्ग जिधर देखती हूं उधर पुल्लिंग ही पुल्लिंग दिखते हैं। हम तुम और ञ छोड़कर और कोई स्त्रीलिंग स्वर/व्यंजन दिखता ही नहीं। हम अपने काम से काम में लगे रहे। हालांकि किसी ने आजतक हम लोगों से कोई बदसलूकी नहीं की। किसी ने कोई ताना नहीं मारा। न रात बिरात किसी ने कोई छेड़खानी की लेकिन आज जब यह बात सोच रही हूं तो बड़ा अजीब सा लग रहा है।
क्या पता खूब सारे स्त्रीलिंग शब्द रहे हों लेकिन उनको उसी तरह मिटा दिया गया हो जिस तरह आज लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है। क्या पता शायद वर्णमाला का निर्धारण किसी मर्दानी सोच वाले ने लिया और स्त्रीलिंग ध्वनियों को अनारकली की तरह इतिहास में दफ़न हो कर दिया हो।
छोटी ई ने भी कभी इस तरह नहीं सोचा था लेकिन उसके लिये भी यह नयी बात थी। बोली- अरे हां सच में! मैंने भी कभी ध्यान नहीं दिया इस तरफ़। कैसे ऐसा हुआ होगा! लेकिन क्या ऐसा हुआ होगा कि शुरु से ही हम लोग ऐसे ही रहें या फ़िर क्या पता खूब सारे स्त्रीलिंग शब्द रहे हों लेकिन उनको उसी तरह मिटा दिया गया हो जिस तरह आज लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है। क्या पता शायद वर्णमाला का निर्धारण किसी मर्दानी सोच वाले ने लिया और स्त्रीलिंग ध्वनियों को अनारकली की तरह इतिहास में दफ़न हो कर दिया हो।
छोटी ई और बड़ी ई न जाने कित्ती देर इसी तरह की बातें करती रहीं। तमाम अक्षर उनके आगे अपने संस्कार के लिये खड़े थे। लेकिन वे अनमनी सी अपनी सोच में डूबी रहीं। काफ़ी देर बाद जब किसी ने उनको टोका तो वे फ़िर अनमनेपन से उबर कर काम में जुट गयीं। देखते-देखते उन्होंने ढेर सारे शब्दों का संस्कार कर डाला। दीदी, दिदिया, बीबी, मुन्नी, लल्ली, मुनिया, बिटिया, भतीजी, रानी ,नानी जैसे न जाने कित्ते स्त्रीलिंग शब्दों का निर्माण कर डाला। सारे के सारे स्त्रीलिंग शब्दों का निर्माण करके शायद वे वर्णमाला में अपने अल्पमत होने की कमी पूरी कर रहीं थीं।
अब छोटी ई और बड़ी ई आपस में लड़-झगड़ नहीं रहीं थीं। एक-दूसरे के कन्धे पर सर रखे मुस्करा रहीं थीं। खिलखिला रहीं थीं।

44 responses to “छोटी ई, बड़ी ई और वर्णमाला”

  1. ghughutibasuti
    वाह, गजब का लिखा है। इस तरह से कभी सोचा ही नहीं। ॡ व ऋ शायद स्त्रीलिंग होने के कारण बाहर कर दी गईं?
    घुघूती बासूती
  2. dhiru singh
    यह शब्दो का सफ़र इ और ई द्वारा बेहद मनमोहक रहा
  3. vineet kumar
    अद्भुत। मुझे ऐसा लगा कि मैं वर्णमाला की किसी ऐसे क्लास में बैठा हूं जहां शब्द-ज्ञान सिर्फ इसलिए नहीं कराया जा रहा कि इसे सीखने के बाद लाटसाहब बन जाए बल्कि इसलिए कि इसे सीखने के बाद बारीक से बारीक गतिविधियों को आपसे में साझा कर सकें। मानवीय अनुभावों को समझ सकें और फिर उसमें संवेदनशील तरीके से व्यक्त कर सके। मेरा बस चले तो इसकी प्रति उन तमाम लोगों तक पहुंचाउ जो कि हिन्दी को कठिन भाषा करार देने का कुचक्र रचते हैं।..
  4. वन्दना अवस्थी दुबे
    इतने बड़े वर्ण-समुदाय में अकेले तीन स्त्रीलिंग वर्ण! यहां भी लड़कियों की कमी हो गई! उसमें भी इ और ई ही विशिष्ट हैं, बेचारी ञ तो हमेशा से ” ञ माने कुछ नहीं” का गान सुनती आ रही है. बहुत सुन्दर वर्ण-चित्र. आनन्द दायक पोस्ट.
  5. jandunia
    बहुत खूब
  6. amrendra nath tripathi
    @………..कई जगह छोटी ई का काम बड़ी ई ने किया।
    और जगह का क्या सच है ? क्या कहा जाय .. पर ब्लॉग की दुनिया में
    इन दोनों ने लोगों की उंगली पर खूब कहर ढाए हैं ! उदा० — ” आप की
    पोस्ट दील को छू गयी ” ( यह ई-कमाल लखनऊ के आसपास खूब देखा जाता है ) ..
    .
    ‘दिल्ली’ भी खूब है ! सजा ई की भुगता रहा है देश भर को ! :)
    .
    अंत का विवेचन तो वाकई ‘मानीखेज’ है .. सिर्फ लालित्य ही नहीं दृष्टि भी ! बड़ा अच्छा लगा !
    पढने लगा तो छोड़ नहीं पाया ! अंत में दोनों ई-यों को मुस्काते देखकर अच्छा लगा ! आभार !!!
  7. Manoj Kumar
    हमें ऐसा समाज बनाना है जिसमें इ, ई, सूचक शब्‍द, संकेत, प्रतीक भाव, आंतरिक संस्‍कार आदि का सर्वथा जमाव हो । जिसमें व्‍यक्ति की पहचान व्‍इ, ई, गत हो अ, आ में नहीं ।
  8. Ranjana.
    ??????????? बस सोच रही हूँ कि क्या कहूँ आपके इस अद्भुद आलेख पर……..
    कसम से… कुच्छो नहीं बुझा रहा है….
    निशब्द मंत्रमुग्ध हूँ……..
    सोच रही हूँ आपने कितना कुछ पढ़ा और मनन किया है….कैसी गहरी अनूठी आपकी देखने परखने की शक्ति है….आपके ज्ञान ,चिंतन , और अभिव्यक्ति क्षमता के समृद्धि का प्रमाण है यह आलेख…
  9. pankaj upadhyay
    आपकी कल्पनाशीलता को सलाम..
    तो आप शब्दज्ञानी भी है.. और साथ मे वाह क्या फ़िक्शन जोडा है…
    जबरदस्त!!
  10. विवेक सिंह
    इसीलिए तो आपका नाम अनूप है कि आप जैसा कोई नहीं । गज़ब के जासूस हैं आप ।
    वैसे मामला हम सुलझाए देते हैं : छोटी ‘इ’ उम्र में बड़ी है । बड़ी ‘ई’ उम्र में छोटी है लेकिन लम्बी ज्यादा हो गई है ।
  11. anitakumar
    रंजना जी की टिप्पणी हमारी भी मानी जाए। एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी पोस्ट्…॥पल भर को ये दिमाग हमें दे दे उधार ही सही…।:)
  12. Dr.Manoj Mishra
    बहुत सुंदर पोस्ट जो कि पूरी पाठशाला बन गयी है.
  13. anil kant
    वाह !
    क्या खूब पढने को मिला है आज .
  14. सागर नाहर
    एकदम “दील” से लीखि गई पोस्ट! :)
    कमाल है आज तक इस बात पर ध्यान ही नहीं गया कि वर्णमाला में मात्र तीन ही शब्द हैं जो स्त्रीलिंगी हैं। लेकिन “माईनोरिटी” में होने के बाद भी इनके महत्वपूर्ण योगदान को नकारा नहीं जा सकता। चाहे प प्रीत हो या मीत; हर ऐसी जगह जहाँ प्रेम हो इनकी मौजूदगी एकदम जरूरी होती है।
  15. Abhishek Ojha
    फिओतु देख के तो हमें लगा कहीं गोविंदा के फिल्म के गाने की बात तो नहीं चलने वाली.. :)
  16. Abhishek Ojha
    *फिओतु=फोटू
  17. Shiv Kumar Mishra
    अद्भुत पोस्ट है!!
  18. आशीष
    बहुत खूब. ऐसा सोचना भी कठिन था आपके लिखने के पहले.
  19. Saagar
    इसको तबियत से निपटाना कहते हैं और हमलोग सुलटाना … वाह !
  20. Manoj Kumar
    बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 17.04.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/
  21. Indranil
    बहुत ही सुन्दर लेखन है ! शब्दों के खेल से शुरुआत हुई, व्यंग्य से होते हुए एक गंभीर भाव में अंत । बहुत मज़ा भी आया और अच्छा भी लगा पढ़कर । बधाई !
    आप मेरे ब्लॉग पधारे, टिपण्णी किये, उसके लिए ढेर सारे धन्यवाद ! आते रहिएगा, आपका हमेशा स्वागत है । और हाँ जहाँ तक ठसक की बात है, तो यही एक चीज़ तो बची है लेखकों के पास, झूठी ही सही, पर और कहीं नहीं तो अपने लेख में ही हो । खैर ये तो कहने की बातें हैं । कालचक्र के सामने किसकी क्या बिसात ।
  22. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    ई का लिख मारे जी…?
    अच्छा, ‘ई’ का लिख मारे?
    ई तो गजबै हो गया।
    ईसे मुझे ऊ वाली चौपाई याद आ गई
    जिमि दसनन्ह महि जीभि बिचारी।
    व‍इसहि इ- ई वर्ण में नारी
  23. रचना त्रिपाठी
    नारी समुदाय की ओर से’ ई‘ बहनों को सलाम ।
  24. kanchan
    ये है असल क्रिएटिविटी, जो आपकी पोस्ट को लेख बनाती है और जमाने तक जिंदा रखने का बूता रखती है। ऐसी सोच आना ही बताता है कि आपका दिमाग उर्वरक है।
    इनमें ऐसी ही उर्वरक सोच आने देते रहिये। घास पतवार को सिर उठाने से पहले ही समूलनाश कर दीजिये।
    इस लेख की बधाई…!
  25. Anonymous
    अनूप जी की जै हो।
    कल आपकी पोस्ट पढ़नी शुरू की और फिर नेट गायब हो गया।
    अब तक नदारद है। दफ्तर में सुकून से नहीं पढ़ पाते हैं।
    हालांकि जितना पढ़ पाए हैं वह हमेशा की तरह आपकी फुरसतिया मौज से प्रेरित
    विलक्षण कलात्मक शब्दविलास का नमूना है।
    यह पोस्ट मुझे यह आग्रह करती हुई भी नजर आई कि एक पोस्ट मैं भी लिखूं…जो इसकी
    ही पूरक होगी।
  26. hempandey
    अक्षरों को लेकर एक चमत्कारी लेख पढवाने के लिए साधुवाद. छोटी इ और बड़ी ई के झगड़े ने अनेक दूसरे झगड़ों की ओर इशारा कर दिया.
    समीर लाल जी ने भी हाल ही में शब्द के चमत्कार पर लिखा है.
  27. Alpana
    लेकिन आज मैंने यह ध्यान दिया कि सारी वर्णमाला में एक मेरे , तेरे और ञ के अलावा और कोई स्त्रीलिंग शब्द ही है नहीं। ‘न कोई स्त्रीलिंग स्वर न व्यंजन! एक तरफ़ से देख लो अ,आ,उ,ऊ,ए,ऐ,ओ,औ अं,अ: सबके सब मर्दलिंग! ‘
    –इतनी दूर तक तो अपनी सोच नहीं गयी..यह तो शोध का विषय हो गया!
    [और महिला मुक्ति मोर्चा वालों के लिए एक नया मुद्दा !]वर्णमाला तक में यह भेद भाव!
    बहुत अच्छा लिखा है.
  28. aradhana "mukti"
    गजब…फुरसत से लिखी गई पोस्ट… थोड़ा पढ़ा था, फिर सोचा कि फुरसत से ही पढ़ूँगी. हमेशा की तरह कुछ लाइनें गजब हैं. इ का इस तरह का प्रयोग गुजरात में खूब देखने को मिलता है. कुछ लाइनें बहुत पसन्द आईं–
    -आधे न को दोनों के बीच धर दिया जैसे मोटर साइकिल में मियां-बीबी के बीच बच्चा एडजस्ट हो जाता है। सबके सहयोग से हिन्दी शब्द बन गया और चल दिया।
    -इससे लगा कि शब्द समुदाय में लिंग भेद के आधार पर व्यवहार भेद नहीं होता।
    -जब भगवान के कारखाने के क्वालिटी कन्ट्रोल इत्ता चौपट है कि खंचियन लंग्ड़े/लूले, अंधे/काने तो खैर छोड़ ही देव ,दिमागी रूप से एक से एक पैदल , तुर्रम खां . लम्पट/लफ़ंदर टाइप आइटम टेस्टेड/ ओके होकर धरती पर सप्लाई हो जाते हैं कि लगता है कि वहां भी मेड इन चाइना वाले आइटम धड़ल्ले से चलते हैं ।
    लेकिन ये बात सोलह आने सच नहीं है…”-लेकिन आज मैंने यह ध्यान दिया कि सारी वर्णमाला में एक मेरे , तेरे और ञ के अलावा और कोई स्त्रीलिंग शब्द ही है नहीं।”
    —–आ वर्ण भी बहुत जगह स्त्रीलिंग के रूप में प्रयुक्त होता है, जैसे सरला, सौन्दर्या वगैरह. संस्कृत में स्त्री-प्रत्यय पर अलग से दृष्टि डाली गई है. इसमें टाप्‌ प्रत्यय मुख्य है, जिसे लगाने पर पुल्लिंग शब्द स्त्रीलिंग हो जाते हैं. शेष मुख्य प्रत्यय हैं- ङीप्‌, ङीष्‌, ङीन्‌ आदि. मतलब ईकारान्त शब्द बनाने वाले प्रत्यय अधिक हैं.
    इसलिये ये तो सच है कि ईकारान्त स्रीलिंग की संख्या अधिक है हिन्दी में भी और संस्कृत में भी पर आकारान्त का प्रयोग भी होता है.
  29. प्रवीण पाण्डेय
    ई बड़ा इन्टेरेस्टिंग रहा ।
  30. shefali
    ise padhne ke baad ek hee shabd bacha hai….adbhut
  31. मृगांक
    भैया तुम गज़ब का लेख लिखने लगे हो ,पता नहीं ये विरह में हुआ है या स्वाभाविक है ,खैर यह देख / पढ़ के गर्व होता है की हम अनूप के सहपाठी है .
  32. Swapna Manjusha 'ada'
    अरे धुत्त…
    एतना दील से और एतना बढ़ीया कोइ लीखता है का….
    आप भि न महा कुराफाति हैं…सच में ..
    और हाँ बहुते रीस्क ले रहे हैं बोल के, पूरा पलिता लगाने का मसाला है, मेहरारू लोग-बाग़ कम है, वर्णमाला में…
    कोइ धमाका जे होइ तो मस्कील होय सकत है…
    हाँ नहि तो….
  33. हिमांशु
    ऐसा कौन लिखे.. सोचे भी ऐसा कौन !
    ब्लॉगजगत में अकेले अनूप हैं आप !
    वर्णमाला के बहाने कहाँ-कहाँ नज़र है आपकी !
    अदभुत लालित्य है इस आलेख में, कल्पनाशीलता भी गज़ब की !
    आलेख की कमनीयता निहार रहा हूँ ! हर पंक्ति एक दूसरे से होड़ लेती हुई !
    “इस हुनर में भी इतने माहिर हो इसका था तनिक भी न अन्दाजा
    मुँह की कालिख को पोंछ उँगली से गाल का तिल बना दिया तुमने ! …”
  34. शरद कोकास
    हमने एक दिन साक्षरता अभियान मे देखा कि एक गाँव मे छोटी इ बड़ी ई को साड़ी के उल्टे पल्ले और सीधे पल्ले के रूपक से सिखाया जा रहा था…. यह कि .. और यह की…. आप खुद ही देख लीजिये ।
  35. मीनाक्षी
    . “अब छोटी ई और बड़ी ई आपस में लड़-झगड़ नहीं रहीं थीं। एक-दूसरे के कन्धे पर सर रखे मुस्करा रहीं थीं। खिलखिला रहीं थीं”
    पहले भी कुछ नहीं बोल पाए थे…अब भी हैरान परेशान हैं…. आपके वर्णों , शब्दों , वाक्यों और भावों की हाज़िरजवाबी का जवाब नहीं…..इतने चुस्त , तेज़ तर्रार कि एक पल के लिए कहाँ से आए…क्या कह गए ….बस देखते ही रह जाते हैं…
  36. चंदन कुमार मिश्र
    पहिले यह कि बासूती जी का विचार जानकर मजा-हँसी सब आया-गया। अजित साहब को बेकार साबित करना है का?
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..हिन्दी.blogspot.com या हिन्दी.tk लिखिए जनाब न कि hindi.blogspot.com या hindi.tk
  37. pratibha saksena
    बहुत मज़ेदार वर्णन है छोटी-बड़ी दोनों ‘इयों’ का .आपने तो पूरी तरह उनका मानवीकरण कर दिया और वह भी यथार्थ के धरातल पर !
    बधाई स्वीकारें अनूप जी !
  38. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] छोटी ई, बड़ी ई और वर्णमाला [...]
  39. संतोष त्रिवेदी
    ग़जब….बद वाला किस्सा सुपरहिट !
    .
    .आधुनिक काल के सर्वश्रेष्ठ हास्य- व्यंग्यकार
  40. धीरेन्द्र पाण्डेय
    वाह भई वाह मज़ा आ गया लगा जैसे अ नार ,आ म , इ मली ,ई ख सब आपस में बाते कर रहें हो
    तनिक इसपर भी नज़र डालिए
    राख में दबी चिंगारी
    http://nithallchintan.blogspot.in/
    धीरेन्द्र पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..राख में दबी चिंगारी
  41. धीरेन्द्र पाण्डेय
    भई मज़ा आ गया अ-नार आ-म ई-मली ई-ख का मानवीय करण अद्भुत है
    ये भी देखा जाय
    राख में दबी चिंगारी
    http://nithallchintan.blogspot.in/
    धीरेन्द्र पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..राख में दबी चिंगारी
  42. सतीश चन्द्र सत्यार्थी
    वाह!! अद्भुत!
  43. sharmila ghosh
    अगर लेखकों की जमात न होती, तो हम पाठक कैसे कहला पाते! कितने नुक्सान में होत्ते हम सब…पता नहीं कैसे इतने अच्छे-अच्छे आइडियाज़ आते हैं आप लेखकों के मन मे!
  44. Anonymous
    थिस इस वैरी निसली रिटेन .ई ऍम वैरी फोंड ऑफ़ IT

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1 comment:

  1. क्या बात है कमाल की क्लास लगाईं है आपने मजा आ गया पढ़ कर ... वर्णमाला पर ऐसा दृष्टिबोध ... सब लोग इतना कुछ कह चुके है तारीफ़ की नदी में इतना पानी बह चुका है ... पर फिर भी इतनी लाजवाब पोस्ट पर जय हो
    बोलना तो बनता ही है ... जय हो ...

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