Tuesday, November 08, 2011

मेरे व्यंग्य-लेखन का एक ऐतिहासिक क्षण- श्रीलाल शुक्ल

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मेरे व्यंग्य-लेखन का एक ऐतिहासिक क्षण- श्रीलाल शुक्ल

[कल जागरण समूह की संस्था लक्ष्मी देवी ललित कला अकादमी में स्व. श्रीलाल शुक्ल की स्मृति का आयोजन किया गया। लोगों ने उनके बारे में अपनी राय रखी। मैंने भी अपने संस्मरण सुनाये। वहीं पर प्रसिद्ध आलोचक स्व. देवी शंकर अवस्थी की पत्नी आदरणीया कमलेश अवस्थी जी भी आईं थीं। श्रीलाल शुक्ल जी बेटी रेखा अवस्थी उनकी देवरानी हैं। कमलेश जी ने श्रीलाल शुक्ल जी से संबंधित कई आत्मीय संस्मरण सुनाये। इन संस्मरणों में रागदरबारी के पात्रों की रचना प्रक्रिया, समाज के बारे में श्रीलाल जी सोच-समझ और उनके द्वारा सुनाये गये अपने समय के कई साहित्यकारों (फ़िराक साहब, भगवतीचरण वर्मा , नागर जी आदि) के किस्से हैं। पुरस्कार मिलने पर श्रीलाल शुक्ल जी प्रतिक्रिया और तमाम विकट परिस्थितियों में भी वे कैसे सहज बने रहते थे इसके जिक्र के साथ अन्य कई वाकयों का जिक्र है। इसी सिलसिले में श्रीलाल शुक्ल जी द्वारा लिखा यह लेख भी यहां पोस्ट किया जा रहा है जिसे श्रीलाल जी ने अपना लिखा एतिहासिक व्यंग्य लेख बताया है। कमलेश जी के वक्तव्य की वीडियो रिकार्डिंग नीचे दी गयी है। ]

मेरे व्यंग्य-लेखन का एक ऐतिहासिक क्षण- श्रीलाल शुक्ल


श्रीलाल शुक्ल
1945 की बात है। तब तक विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी को देखते ही उसे लफ़ंगा मानने का चलन नहीं हुआ था। ऐसे प्रोफ़ेसर काफ़ी संख्या में थे जो लड़कों को ’जेंटिलमैन’ कहकर संबोधित करते थे, यही नहीं, उन्हें ऐसा समझते भी थे।
मैं प्रयाग विश्वविद्यालय में था। वातावरण सब प्रकार से विद्यार्थी को जेंटिलमैन बना डालने वाला था। हमारे छात्रावासों में मीटिंग हाल में योग्य और विशिष्टता पाने वाले विद्यार्थियों की सूचियां टंगी हुईं थीं। ये आई.सी.एस. में , पी.सी.एस. में, इसमें, उसमें -किसी भी तुक की सरकारी नौकरी की परीक्षा में सफ़ल होने वालों की सूचियां थीं। हम किसी-न-किसी दिन इन्हीं सूचियों में टंगने की उम्मीद बांधे चुपचाप किताबें पढ़ते रहते, उससे भी ज्यादा चुप होकर खेलते और छात्रावास के पुरातनकालीन शौचालयों, गंध भरे, लगभग गंदे भोजनालयों और बिन पानी के गुसलखानों में आते-जाते हुये अपने को जैंटिलमैन बनाये रखने की कला सीखते।
मेस और रेलवे बोर्ड की भाषा में- संडास तो जैसे-तैसे चल जाते, क्योंकि वे जैसे-जैसे अपने उद्धेश्य की पूर्ति कर देते थे, पर बिना पानी का गुसलखाना कहॉं तक सहा जाता? शायद पानी का दबाब कम था। जो भी हो, नल से बूंद-बूंद पानी टपकता था। बूंद-बूंद से घंटेभर में बाल्टी भरती थी और चौथाई मिनट में रीती हो जाती थी। गुसलखाने के आगे ’क्यू’ लगता था, पर ’क्यू’ का कोई नियम जरूरी नहीं था। नहाने वालों की भीड़ में दंगे की स्थिति पैदा हो जाती थी। इसी स्थिति ने कुछ नेता पैदा किये। नेताओं ने नहाने की व्यवस्था में सुधार करना चाहा। तब तक हम सीख गये थे कि किसी भी सुधार के लिये धुंआधार आंदोलन करना ही एकमात्र तरीका है। हम आंदोलन पर उतर आये।
सिर्फ़ बाथरूमी चप्पल और पैजामे पहने हुये, हाथ में तौलिया और साबुन लिये नंगे बदन जवांमर्दों का एक जत्था हमारे छात्रावास से बाहर निकला। जुलूस की शक्ल में हम वाइसचांसलर डॉ. अमरनाथ झा के बंगले की ओर बढ़े। आसपास के छात्रावासों के लड़के भी हमारे दुख से दुखित होकर जिस्म से कपड़े उतार-उतारकर तौलिया झटकारते हुये, जुलूस में शामिल हो गये। ’इन्कलाब जिन्दाबाद’ का वातावरण बन गया। ’लोटे-लोटे की झनकार, सारे बाथरूम बेकार’ के नारों से खुद हमारे ही दिमाग गूंज उठे।
ऐसे मौके पर प्रयाण-गीत के लिये मैंने एक कविता लिखी थी, जिसे यहॉं दोहराना ही इस टिप्पणी का असली उद्धेश्य है।
यह कविता उस जमाने के प्रसिद्ध प्रयाण गीत -
खिदमते हिंद में जो मर जायेंगे
नाम दुनिया में अपना कर जायेंगे।

की तर्ज पर लिखी गयी थी और इस प्रकार थी-
” हम बिना बाथरूम के मर जायेंगे।
नाम दुनिया में अपना कर जायेंगे।

यह न पूछो कि मरकर किधर जायेंगे,
होगा पानी जिधर, बस उधर जायेंगे।
जून में हम नहाकर थे घर से चले,
अब नहायेंगे फ़िर जब कि घर जायेंगे।
यह हमारा वतन भी अरब हो गया,
आज हम भी खलीफ़ा के घर जायेंगे।
-आदि-आदि।”

यह मेरी पहली व्यंग्य रचना थी। पता नहीं, उस ’करुण-करुण मसृण-मसृण’ वाले जमाने में जबकि जबकि ज्यादातर मैं खुद उसी वृत्ति का शिकार था -मैं यह प्रयाण- गीत कैसे लिख ले गया। जो भी हो, इसका यह नतीजा जरूर निकला कि लगभग दस साल बाद मैंने जब व्यंग्य लिखना शुरु किया तो मुझमें यह आत्मविश्वास था कि मैं दस साल की सीनियारिटी वाला व्यंग्य-लेखक हूं और दूसरों की तरह किसी भी पोच बात को सीनियारिटी के सहारे चला सकता हूं।
खैर, अपने व्यंग्य-लेखन के बारे में इतना तो मैंने लगे हाथ यूं ही बता दिया। जहां तक बाथरूमों की बात है, खलीफ़ा- डॉ. झा ने हमारे आंदोलन को सफ़ल बनाने में बड़ी मदद की। आज की तरह विद्यार्थियों के जुलूस को देखते ही उन्होंने पुलिस नहीं बुलाई, गोली नहीं चलवाई, प्रेस के लिये तकरीर नहीं दी, इसे अपनी इज्जत का सवाल नहीं बनाया। सिर्फ़ एक-दो छोटे-छोटे वाक्यों में जुलूस के सनकीपन का हवाला देते हुये उन्होंने आश्वासन दिया कि ठीक ढंग के नये बाथरूमों की व्यवस्था हो जायेगी। यही नहीं-आज आपको ऐसी बात सुनकर अचंभा भले ही हो- उन्होंने अपना आश्वासन जल्दी ही पूरा भी कर दिया।
श्रीलाल शुक्ल
धर्मयुग, 1963
(श्रीलाल शुक्ल- जीवन ही जीवन से साभार)

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21 responses to “मेरे व्यंग्य-लेखन का एक ऐतिहासिक क्षण- श्रीलाल शुक्ल”

  1. sanjay jha
    ’लोटे-लोटे की झनकार, सारे बाथरूम बेकार’……..गज्जबे इन्क्लाबियत निकल रहा है…………
    प्रणाम.
  2. डॉ0 मानवी मौर्य
    कॉलेज लाइफ का भी अलग ही मजा है। आपका लेख पढकर फिर से यादें ताजा हो गईं। श्रीलाल शुक्‍ल जी मेरे पसंदीदा साहित्‍यकारों में से एक हैं।
    डॉ0 मानवी मौर्य की हालिया प्रविष्टी..हिन्‍दी के प्रथम स्‍थापित गजलकार: शमशेर बहादुर सिंह
  3. Deepak dudeja
    ’करुण-करुण मसृण-मसृण’ वाले जमाने
    अब के जमाने का भी कोई विशेषण देते जाइए.
  4. Shikha Varshney
    आह …सुबह बना दी आपने.
    कितना निश्छल सा लेखन .
    तब तक विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी को देखते ही उसे लफ़ंगा मानने का चलन नहीं हुआ था। :):).
    नमन है श्रीलाल शुक्ल को .और आभार आपका.
    Shikha Varshney की हालिया प्रविष्टी..इतिहास की धरोहर "रोम".(.पार्ट २ )
  5. वन्दना अवस्थी दुबे
    आभार.
  6. rachna
    हेअडिंग में
    श्रीलाल शुक्ल
    से पहले inverted comma लगाना चाहिये .
    हेअडिंग देख कर भ्रम होता हैं जैसे आप के व्यंग लेखन की बात हुई हैं .
  7. arvind mishra
    इस प्रसंग से हमें खुद के ऐसे होस्टल अभियानों की याद हो आयी :)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..मेरे पसंदीदा शेर -सेशन 4
  8. प्रवीण पाण्डेय
    पढ़कर आनन्द उचक आया।
  9. santosh trivedi
    फिर से श्रीलाल शुक्ल जी याद आ गए ! उनका जाना हिंदी साहित्य की एक विशेष शैली से पाठकों को महरूम हो जाना है !
  10. वन्दना अवस्थी दुबे
    रचना जी, शुक्ल जी की पोस्ट पर उनसे पूछे बिना जवाब देना, धृष्टता लग रही है, लेकिन मैं इसे कर रही हूं. आपने हैडिंग में सुधार का सुझाव दिया है, तो मैं ये जानकारी दे दूं, कि जब हम किसी व्यक्ति के बारे में लिखते हैं तो उसका नाम इन्वर्टेड कॉमा में दिया जाता है, लेकिन यदि हम किसी लेखक की ही रचना दे रहे हैं, तो हैडिंग के बाद डैश और लेखक का नाम दिया जाता है, जिसका मतलब होता है, कि ये वाक्य लेखक के द्वारा ही कहा गया है. यही व्याकरण-सम्मत है.
    बाकी शुक्ल जी जो कहना चाहें. :)
    वन्दना अवस्थी दुबे की हालिया प्रविष्टी..क्या होगा अंजाम मेरे देश का….
    1. rachna
      “मेरे व्यंग्य-लेखन का एक ऐतिहासिक क्षण” – श्रीलाल शुक्ल
      वंदना
      सही तरीका ये हैं . मेरे व्यंग्य-लेखन का एक ऐतिहासिक क्षण – श्रीलाल शुक्ल पढ़ कर लगता हैं जैसे अनूप शुक्ल ने श्रीलाल शुक्ल पर व्यंग लिखा था
      rachna की हालिया प्रविष्टी..चाइल्ड लेबर
  11. सलिल वर्मा
    शुक्ल जी की रचनाओं को पढ़ते हुए होठों पर मुस्कान होती है.. उनकी सबसे बड़ी विशेषता (और शायद किसी भी व्यंग्यकार की) यह है की वे कभी loud नहीं हुए… और उनके लेखन का क्षितिज इतना विस्तृत की “आदमी का ज़हर” पढ़ते हुए लगता ही नहीं “राग दरबारी” के रचयिता की रचना है!!
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति!!
    सलिल वर्मा की हालिया प्रविष्टी..माँ सुन्दर होती हैं
  12. चंदन कुमार मिश्र
    बढ़िया रहा गजल या व्यंग्य से गुजरना…
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..स्वेटर (कविता)
  13. मनोज कुमार
    अब तो न वो लोटा है, न वो बाथरूम!
    श्री शुक्ल ने पाठकों को जिस यथार्थ से परिचय कराया वह आज अनुपलब्ध-सा ही है। यथार्थ के प्रति श्री शुक्ल जैसी सतर्क, गहरी और पैनी निगाह बहुत ही कम देखने को मिलती है।
    मनोज कुमार की हालिया प्रविष्टी..घायलों की मरहम-पट्टी
  14. ज्ञान दत्त पाण्डेय
    खलीफा घर लौट गया! :-(
    ज्ञान दत्त पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..जर्जर खण्डहर
  15. Anonymous
    बहुतै मजा आया पढकर ….
  16. अजित वडनेरकर
    बढ़िया…पूरा पढ़ गए। गु़सलखाने की पानी से रिश्तेदारी तो अंग्रेज बहुत
    पहले खत्म कर गए थे।
    आज के दौर के अख़बार भी वही काम कर रहे हैं:)
  17. संतोष त्रिवेदी
    ….काश मैं भी जूता खाने लायक होता !
  18. rajendra rao
    विलम्ब से ही सही आज इस प्रसंग पर अनूप शुक्ला जी की टिप्पणी पढ़ने को मिली।मैं उस आयोजन में था।श्रीलाल जी को स्म्ररण करते हुए कमलेश अवस्थी जी के वक्तव्य को यहां देख कर खुशी हुई।अब से आपका ब्लाग देखा करूंगा।
  19. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] मेरे व्यंग्य-लेखन का एक ऐतिहासिक क्षण-… [...]
  20. AKASH
    जेंटलमेन , :)
    ये प्रजाति आजकल लुप्त होने की कगार पर है | :)
    सादर
    AKASH की हालिया प्रविष्टी..तुम कुछ-कुछ मेरे जैसे हो

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