Wednesday, December 31, 2025

साल का लेखा-जोखा

 


आज साल 2025 का आख़िरी दिन है। साल की चलाचली के बेला। 2025 अगर किसी दफ्तर का बड़ा अधिकारी होता तो इसके विदाई समारोह आयोजित किए जाते। इसकी शान में कसीदे पढ़े जाते। आपके जैसा कोई नहीं जैसी बातें कहीं जातीं। साथ ही आने वाले के स्वागत की तैयारी चल रही होती

देश-दुनिया की घटनाओं का लेखा-जोखा करने बैठेंगे तो बहुत कुछ छूट जाएगा।वह देश-दुनिया के लोगों पर छोड़ते हैं। अपनी बात करते हैं।
व्यक्तिगत स्तर पर 2025 का साल अच्छा ही बीता। शुरुआती तीन महीने कानपुर में बीते। इसके बाद के साथ महीने नोयडा में रहे। दिल्ली में कई जगहें देखीं। कुछ अकेले, कुछ Alok Puranik जी और Manu Kaushal जी की मंडली के साथ कई कार्यक्रम देखे। कुछ लोगों से पहली बार मिलना हुआ। इनमें Jagadishwar जी, Sudha Singh जी और Ibbar Rabi जी प्रमुख रहे।
नोयडा जाने के पहले इस साल श्रीलंका यात्रा हुई फरवरी महीने। इसके बाद अक्टूबर माह में लक्षद्वीप की घुमाई हुई। दोनों जगह के बहुत प्यारे अनुभव हुए। लक्षद्वीप में स्कूबा डाइब का अनुभव अद्भुत रहा।
श्रीलंका और लक्षद्वीप दोनों जगह के यात्रावृत्तांत पूरे लिखे। इनको जमाकर किताब बनाने का विचार है। कोई प्रकाशक मिला तो ठीक नहीं तो जल्द ही ई बुक फार्म में तो प्रकाशित कर देंगे। बस किताबों के नाम तय करने बाक़ी हैं। सेल्फ पब्लिशिंग का तरीका सीख जाने के बाद किताब प्रकाशित करना बायें हाथ का भले न लगे लेकिन हफ़्ते -दो हफ़्ते भर में किताब तो निकाल ही सकते हैं।
पिछले साल दो किताबें प्रकाशित हुईं थीं। 'बेवक़ूफ़ी का सफ़र' और 'पुलिया पर जिंदगी' ( प्रकाशन की सूचना का लिंक : https://www.facebook.com/share/p/14L3skA6GJd/) ।
इस साल अपनी अभी तक की लिखी सारी कवितानुमा लिखाई को जमा करके कविता संकलन -अंधेरे का बड़प्पन ई बुक के रूप में प्रकाशित किया। इसमें मेरी सारी साधारण, ख़राब और कुछ अच्छी कविताएँ शामिल हैं। इसका कवर पेज मेरी भतीजी स्वाति ने बनाया है। इस कविता संकलन का प्रिंट संस्करण बनाना अभी बाक़ी है। वह काम अगले साल पूरा होगा।
'अंधेरे का बड़प्पन' के पहले Alok Puranik जी पर केंद्रित किताब 'आलोक पुराणिक -व्यंग्य का एटीएम' को भी अपडेट करके प्रकाशित किया। ई बुक और प्रिंट दोनों फार्म में। किताब की अभी तक केवल एक ई बुक प्रति का आर्डर आया। आने वाले दिनों में कभी आलोक पुराणिक जी को कोई और बड़ा पुरस्कार मिले या फिर वो क़ायदे से विवादास्पद हो जाएँ तो तब शायद इस किताब की बिक्री बढ़े।
आने वाले वर्षों में अभी तक प्रकाशित सभी किताबों को फिर से प्रकाशित करने का विचार है। याद के लिए नाम लिख रहे हैं :
1.पुलिया पर दुनिया
2.बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य
3. सूरज की मिस्ड कॉल
4. घुमक्कड़ी की दिहाड़ी
5. झाड़े रहो कलट्टरगंज
6. बेवक़ूफ़ी का सफ़र
7. पुलिया पर जिंदगी
अगले साल आने वाली संभावित किताबों में शामिल हैं :
1. कनपुरिया कोलंबस (अमेरिका के यात्रा संस्मरण)
2. कश्मीर के यात्रा संस्मरण
3. श्रीलंका के यात्रा संस्मरण
4. लक्षद्वीप के यात्रा संस्मरण
5. गोवा, लद्दाख और नेपाल के यात्रा संस्मरण
'कनपुरिया कोलम्बस' प्रकाशक को दी हुई हुई है। शायद अप्रैल में प्रकाशित हो। देखते हैं। इसके बाद ही बाक़ी किताबों के बारे में मामला तय होगा। अपने बाकी संस्मरण भी इकट्ठा करेंगे।
इस साल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि लखनऊ में अपने घर में शिफ्ट होना रही। यह घर हम लोगों ने 2004 में मजाक-मजाक में बुक कराया था। 2008 में इसकी रजिस्ट्री हुई थी। रिटायरमेंट के बाद इसकी दुबारा मरम्मत का काम शुरू करके नवंबर में यहाँ प्रविष्ट हुए। अभी कुछ शुरुआती समस्याएं ठीक होनी हैं लेकिन अपने घर में रहना अच्छा लग रहा है।
इस घर में किताबों के लिए भी एक कमरा है। घर का सबसे छोटा लेकिन मेरे लिए घर का सबसे प्यारा कोना। किताबें अभी ऐसे ही रख दी है अलमारियों में।इनकी लिस्ट बनानी है। सिलसिलेवार जमाना है।
किताबों के कमरे में मैंने सोचा था कि एक गद्दा डालेंगे ज़मीन पर। उस पर बैठकर, लेटकर किताबें पढ़ेंगे। मेरे विचार को संशोधित करके लकड़ी का एक सरकउआ केबिन बना दिया गया। इसको दराज की तरह अंदर-बाहर किया जा सकता है। ऊपर गद्दी लगी है। यह बिस्तर दराज रेलगाड़ी के डब्बे की बर्थ की तरह बनी है। देखते हैं इसका कितना उपयोग होता है। नहीं होगा तो फिर गद्दा ज़मीन पर डालकर पढ़ा जाएगा।
इस साल की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि रही वजन कम करना। अप्रैल से जुलाई के बीच करीब 12 किलो वजन कम किया गया। खुराक में नियंत्रण और टहलाई करके वजन करीब 95 किलो से 83 किलो तक हुआ। डायटीएशियन Rupali Karajgir की सलाह से ऐसा संभव हुआ। पिछले कुछ समय से लापरवाही के बावजूद वजन अभी भी 83 किलो के करीब बना हुआ है। मेरा प्लान तो इस साल 80 किलो तक पहुँचना था। लेकिन घर वालों और शुभ चिंतकों के 'बहुत दुबले लगने लगे', 'इतने कमजोर हो गए' जैसे प्रेम प्रदर्शन और अपनी आलस्य के प्रति सहज लगाव के कारण इस लक्ष्य की प्राप्ति में अभी सफल नहीं हो पाये। लेकिन आने वाले साल में ऐसा करेंगे।
बीते साल में उर्दू और स्पेनिश सीखना शुरू किया था। उर्दू का तो पूरा कायदा सीख गए थे। स्पेनिश का भी काफ़ी अभ्यास किया। लेकिन उर्दू अभ्यास की कमी की कारण थोड़ा पिछड़ गई। स्पेनिश डाँवा डोल हो रही है पिछले कई दिनों। आने वाले समय में दोनों भाषाओं को एकदम स्कूली बच्चों की तरह सीखने का इरादा है।
नए साल में और कोई संकल्प लेना मतलब अपने ऊपर बोझ डालना ही होगा। कोशिश करेंगे कि पढ़ना, लिखना, घूमना, फिरना, मिलना -जुलना हो सके।फ़िल्में भी देखेंगे। घूमने-फिरने में देश-विदेश होंगे। साइकिल बाजी भी करेंगे। हमारे कारण किसी भले इंसान को कष्ट न हो। कुछ सामाजिक काम कर सकें।
आने वाला साल आपके लिए शुभ हो। मंगलमय हो।

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Tuesday, December 30, 2025

अपने ग्राहक को जानिए



 कल बैंक जाना हुआ। बैंक मतलब बैंक ऑफ़ बड़ौदा। बैंक से रोज KYC अपडेट करने की नोटिस आ रही है। KYC मने know your customer. अपने ग्राहक को जानिए। ग्राहक को जानने का मतलब ग्राहक अपने बारे में बैंक को बताये।

जिस बैंक में वर्षों से खाते हैं। वहाँ बार-बार ग्राहक अपने बारे में बताये। ग़ज़ब बेइज्जती है।
पता चला कि आशियाना में बैंक ऑफ़ बड़ौदा की शाखा है। बैंक की तरफ़ जाते हुए देखा एक ऊबड़-खाबड़ मैदान में बच्चे क्रिकेट खेलने के लिए ईंटों का विकेट बना रहे थे। टीम बांटकर टॉस के लिए तैयार हो रहे थे। पास में बैठी एक महिला धूप में बैठी चुनही तंबाकू रगड़ रही थी, सड़क पर आते जाते लोगों को देखते।
कुछ देर हमने मैदान में खेल की तैयारी करते बच्चों को देखा। पास खड़े आदमी से पूछा-'बैंक कितनी दूर है?' आदमी ने बताया कि आशियाना वाली बैंक के मुक़ाबले ट्रांसपोर्ट नगर वाली ब्रांच पास है। गूगल में देखा तो ट्रांसपोर्ट नगर का रास्ता सीधा है। अपन मुड़कर ट्रांसपोर्ट नगर वाली ब्रांच की तरफ चल दिए।
रास्ते में बैंक ऑफ़ बड़ौदा (BOB) से इंग्लैंड के तेज गेंदबाज बॉब विलिस की याद आई। अपने समय में दुनिया के बेहतरीन फ़ास्ट बॉलर थे बॉब विलिस। छह साल पहले सत्तर साल की उम्र में दुनिया से विदा हुए।
बैंक का रास्ता सीधा था। ट्रांसपोर्ट नगर होने के कारण जगह-जगह चाय,नाश्ते की दुकानें थीं। ड्राइवर, क्लीनर,हेल्पर जैसे लोग दुकानों के बाहर बेंचों पर बैठे खाने-पीने में जुटे थे। रास्ते में एक दुकान का नाम दिखा -'ग़ुलाम टॉयर सर्विस।' पुराने टॉयरों का धंधा करने वाली दुकान। ग़ुलाम शब्द से 'आदि विद्रोही' का नायक स्पार्टकस याद आया।
'आदि विद्रोही' में गुलामों के ठेकेदार का एक संवाद याद आ गया। ठेकेदार अपने गुलामों को खूब खिलाता-पिलाता है। उनकी देखभाल करता है। गुलामों की देखभाल का कारण बताते हुए कहता है -'ग़ुलाम की गलती पर आप उसको जान से मार सकते हैं लेकिन अगर उसका मूड ख़राब हो गया तो उसको आप अपना काम बिगाड़ने से नहीं रोक सकते। इसलिए मैं गुलामों को कायदे से रखता हूँ। '
बैंक में एक बुजुर्ग महिला हाथ में ख़ाली फार्म लिए। अपना KYC कराने के लिए काउंटर पर खड़ी थीं। उनको फार्म भरना नहीं आता था। काउंटर पर बैठे आदमी ने पास खड़े बैंक कर्मचारी से कहा -'माता जी का फार्म भर दो।' उसने ना-नुकुर करते हुए कहा -'किसी से भरवा लें।' हमने सोचा हम ही भर देंगे। लेकिन जब तक हम अपना सेवा ऑफ़र करें तब तक काउंटर पर बैठे आदमी ने ज़ोर देकर बुजुर्ग महिला का फ़ार्म भरने के लिए बैंक कर्मचारी को थमा दिया।
बैंक कर्मचारी ने कम्प्यूटर पर देखकर बताया -'आपका KYC अभी तक हुआ नहीं। कानपुर से ही होगा।' KYC फ़ार्म भरकर हम तीन दिन पहले भेज मेल कर चुके हैं। अभी तक हुआ नहीं। मैंने भी ऐसा ही सोचा था कि अभी तक हुआ नहीं होगा। बैंक ने मेरे विश्वास की रक्षा की।
काउंटर पर बैठे आदमी ने सुझाव दिया कि अपना खाता यहाँ ट्रांसफर करवा लें। अपन 'हाँ' कहकर वापस लौट लिए।
लौटते में सोचा किसी दुकान पर बैठकर चाय पियें। एक चाय दुकान के पास एक आदमी अपनी मोटर साइकिल को बार-बार 'किकिया' रहा था। मोटरसाइकिल स्टार्ट नहीं हो रही थी। शायद पेट्रोल खत्म हो गया था। दुकान पर बैठे एक आदमी ने चाय की चुस्की लेते हुए सलाह दी -'नाले में घुसा दो। अपने आप टंकी फुल हो जायेगी।' मोटर साइकिल वाले ने मुस्कराते हुए भले आदमी की तरफ़ देखा। मुझे याद आया कि साहब ने नाले से गैस निकलने की बात कही थी। यहाँ ये भाई जी नाले से पेट्रोल भरवा दे रहे हैं। फिर याद कि पेट्रोल को भी तो गैस ही कहते हैं (गैसोलीन)।
नुक्कड़ की दूसरी चाय की दुकान के बाहर तख़्त पर बैठे तमाम ग्राहक चाय, समोसा, नाश्ता में जुटे थे। दुकान की मालकिन एक महिला है। ठसक के साथ काउंटर पर बैठी है। मालिक होने की ठसक लिंग निरेपक्ष (Gender Neutral) होती है। मालकिन की जगह CEO लिखें तो कैसा रहेगा? सड़क के दूसरी तरफ़ थी दुकान इसलिए हम वहाँ रुकने के बजाय आगे बढ़ गए।
एक दुकान पर गरमा-गर्म समोसे निकल रहे थे। सोचा घर के लिए ले लें। लेकिन फिर दोपहर का खाने का समय याद करके नहीं लिए। दोपहर का खाने का समय लिखते हुए कहानीकार अमरकांत जी की प्रसिद्ध कहानी 'दोपहर का भोजन' याद आई। रात को ही इंडिया टुडे वार्षिकी में अमरकांत जी के बारे में उनकी बहू कुमुद शर्मा जी का संस्मरण पढ़ा था।
अमरकांत जी पर लिखे संस्मरण से पता चला कि अमरकांत जी 'वर्मा जी' थे। कुमुद शर्मा जी का अमरकांत जी के बेटे अरुण जी से विवाह 'अंतर्जातीय' था। ब्राह्मण परिवार की कुमुद जी के लिए अपने पिता के भय के कारण अंतर्जातीय विवाह की परिकल्पना ही डरा देने वाली थी। बहरहाल, बाद में यह संभव हुआ।
अपने समाज में प्रेम विवाह, अंतर्जातीय विवाह , अन्तर धार्मिक विवाह अपने में एक क्रांतिकारी काम माना जाता है। कई लोग इस क्रांति को ही अपने जीवन की बड़ी उपलब्धि मानकर खुश और संतुष्ट हो जाते हैं।
आगे सड़क बनाने का काम चल रहा था। सड़क की शुरुआत में 'सावधान कार्य प्रगति पर है' लिखा था। सावधान से लग रहा था 'चेतावनी' जैसी हो। सड़क बन रही है। सावधान हो जाओ। फिर न कहना बताया नहीं। सरकारों को भी इस तरह के बोर्ड लगाने चाहिए -"सावधान, विकास हो रहा है।" फिर न कहना बताया नहीं।
सड़क बनाने वाले फुटपाथ पर बने नल के पानी से नहा रहे थे। जाँधिया पहने नहाते लोगों मजदूरों की देखकर मुझे कलकत्ता की सड़कों के मोड़ों पर नलों में नहाते , रिक्शे धोते, नहाते मज़दूर याद आ गए। आगे एक जगह मजदूर लोग बैठे खाना खा रहे थे। उनको खाते देखकर हमारी भूख भी तेज हो गई। अपन लपकते हुए घर आ गए। घर में गरमा-गरम खिचड़ी हमारा इंतजार कर रही थी।
खिचड़ी खाते हुए हम लोगों ने कहावत याद की -खिचड़ी के चार यार -दही, पापड़, घी, अचार।'
यार से अपने तमाम यार -दोस्त या आए। उनसे बात करेंगे आज। आपको भी याद आ रहे होंगे अपने दोस्त। उनसे बात करिए। अच्छा लगेगा।

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Saturday, December 27, 2025

कुछ विशेष शब्द बताते हैं आपका भविष्य


 

आज के अख़बार में पढ़ा -'कुछ विशेष शब्द बताते हैं आपका भविष्य।' इसमें बताया गया है कि बातचीत में मैं, मेरा जैसे शब्द प्रयोग करने वाले आत्मकेंद्रित होते हैं। हम, हमारा प्रयोग करने वाले लोग ज्यादा सामाजिक होते हैं।

मुझे याद आया कि बाद के दिनों में किसी सूचना के बारे में पूछने अक्सर जबाब मिलता -'देखना पड़ेगा, कैसे होगा, हो नहीं पायेगा।' 'देखना पड़ेगा' सुनते ही अक्सर हमारे उपदेश का नल खुल जाता। हम विस्तार से बताते कि कैसे बोले गए शब्द लोगों के व्यक्तित्व का एक्सरे होते हैं।
'देखना पड़ेगा' से यह व्यवहार में नकारात्मक ध्वनित होता है। ऐसा लगता है सामने वाला कहना चाह रहा है कि सूचना के बारे में बताना एक अतिरिक्त काम है। इसकी जगह कहना चाहिए -"देखकर बताते हैं।" 'देखना पड़ेगा' से लगता है बताने वाला नकारात्मक, आलसी, ऐंठू, टालू इंसान है। उसके अंदर काम को लेकर उत्साह नहीं है। नई चुनौतियों इसके बनिस्बत 'देखकर बताते हैं' कहने वाला धनात्मक, मेहनती, विनम्र और काम के प्रति समर्पित इंसान है।
इस तरह का उपदेश देकर हम अपने को ज्ञानी साबित कर लेते। उपदेश समझाने वाले अंदाज में होता। ज़्यादा लंबा नहीं होता। लोग झेल लेते। भले ही बाद में मन में झुंझलाते हों और सोचते हों कि साहब हैं तो जो कहेंगे उसे झेलना ही होगा।
मुझे यह भी याद आया कि नौकरी के शुरुआती दिनों में किसी की पूरी बात सुने बिना उसके शुरुआती वाक्य सुनकर अक्सर मैं 'नहीं, नहीं' कहते हुए अपनी बात कहना शुरू कर देता। बाद में सामने वाले की पूरी बात सुनने पर हमारे जबाब अक्सर अलग होता। यह आदत कई लोगों में देखी है मैंने। शुरुआती शब्द सुनते ही प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगते हैं। इस चक्कर में अक्सर बात गड़बड़ा जाती है।
जबलपुर में रहने के दौरान मैंने पाया कि वहाँ लोग 'अपन' शब्द का इस्तेमाल करते हैं। 'अपन देख लेंगे', 'अपन कर लेंगे', 'अपन ऐसा करेंगे ', 'अपन साथ चलेंगे'। 'अपन' शब्द हम से भी ज्यादा आत्मीय और सामाहिक लगता है। 'हम' शब्द में सामाजिकता है लेकिन थोड़ी ऐंठ भी है। सामाजिकता के साथ-साथ अधिकार भाव है। इसके मुकाबले 'अपन' ज़्यादा आत्मीय, विनम्र और मुलायम शब्द है। साथ रहने, साथ चलने का निरहंकारी भाव है 'अपन में।'
मैं, मेरा, मेरे को, कहने वाले अक्सर कितने असामाजिक या ऐंठ वाले होते हैं इसका कोई पैमाना नहीं है। 'शब्द' इलाके के अनुसार चलन में आते हैं। 'मैं, मेरा' प्रयोग करने वाले लोग इसे अपने पर विश्वास का प्रतीक भी बता सकते हैं। यह कह सकते हैं कि यह उनके अहम का नहीं बल्कि आत्मविश्वास का परिचायक है।
'ये फलाने की गारंटी है, 'फलाना है मुमकिन है' कहने वाले लोग 'मैं, मेरा ' कहने वाले लोगों से भी ज़्यादा आत्मकेंद्रित, ऐठूँ, अड़ियल होते हैं या ज्यादा आत्मविश्वासी यह कहना मुश्किल। लेकिन व्यवहार से समझ में तो आता है।
'अपन' शब्द ऋग्वेद के श्लोक "संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्" ("हम सब एक साथ चलें, एक साथ बोलें, और हमारे मन एक (समान/एकीकृत) हों") का कोड वर्ड है। 'मैं' और 'मेरा' और 'मेरी गारंटी' कहने वाले लोग ऋग्वेद के इस सूत्र मंत्र से अलग घराने के लोग होते हैं। यह लिखते हुए विनोद कुमार शुक्ल जी की कविता याद आ गई :
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।
विनोद कुमार शुक्ल जी जिस इलाके में रहे उस तरफ़ 'अपन' का चलन है। उनकी यह कविता 'अपन घराने' की कविता है। पता नहीं यह कहना कितना सही है लेकिन अपन तो ऐसा ही मानते हैं।
आपका क्या कहना है? Suresh Pant जी और Ajit Wadnerkar जी बतायें।

Friday, December 26, 2025

सब्जी खरीदने की कला




 कल रात को सब्जी खरीदने गए। धनिया, मिर्च, अदरख, प्याज, लहसुन, गोभी, शकरकंद, सिंघाड़ा। हफ़्ते में दो दिन लगता है सब्जी बाजार। इतवार, वृहस्पतिवार।वृहस्पतिवार लिखते हुए याद आया अम्मा इसे 'बेफ़ै' कहा करती थीं। वृहस्पतिवार लिखने-पढ़ने वालों का शब्द है। लिखने -पढ़ने वाले भी बोलचाल में इसे वृहस्पति ही कहते हैं। लोक भाषा में वृहस्पति भी गोलियाकर 'बेफ़ै' हो जाता है।

लोकभाषा में संभ्रांत भाषाओं के शब्दों के किनारे घिसकर उनको गोल बना दिया जाता है। वृहस्पतिवार 'बेफ़ै' हो जाता है, शुक्रवार 'शूक' हो जाता है। गोलाकार होने पर शब्द आसानी से लुढ़कते हैं। दूर तक जाते हैं। ज्यादा लोगों तक पहुंचते हैं।
सड़क किनारे लगे सब्जी मंडी में सड़क के दोनों तरफ़ सब्ज़ी वाले बैठे रहते हैं। रात देर होते-होते सब्जी वाले किसी तरह सब सब्जी बेचकर घर वापस लौट लेना चाहते हैं। सब्जी के दाम कम हो जाते हैं। बीस रुपये की पाव भर धनिया, सौ रुपए के ढाई किलो प्याज। साठ रुपये किलो टमाटर। कहीं और भी सस्ती बिक रही होगी सब्जी। कहीं इससे कई गुने दाम पर।
सब्जी वाले ज्यादातर स्कैनर लिए बैठे हैं। जिन लोगों के पास स्कैनर नहीं है वे पास के किसी सब्ज़ी वाले के स्कैनर में भुगतान के लिए बोल देते हैं। एक सब्जी वाला तीन-चार लोगों के भुगतान ले रहा है। अपना ख़ुद की सब्जी का भुगतान भी ले लेता है।
मुझे लगा कल को कहीं सब्जी वाले पर आयकर वाले छापा न डाल दें। कहें पाँच सौ रुपए कमाई इनकम टैक्स वालों को बताते हो जबकि तुम्हारे स्कैनर से हज़ार रुपये बरामद हुए। वह कितना भी कहे कि इसमें शकरकंद वाले और अदरख वाले की बिक्री भी शामिल है लेकिन वे मानेगे ही नहीं। ज्यादा हल्ला मचाएगा सब्जी वाला तो उसके पीछे ED लग जायेगी। सब्जी वाले के पास 'सत्ता धारी पार्टी' को ज्वाइन करने या उसके खाते में चंदा देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहेगा।
अपने यहाँ लोकतंत्र में सत्ताधारी पार्टी का मतलब रंगदारी मांगने वाले लोगों का गिरोह होता गया है।
शकरकंद वाले बुजुर्ग मोटी सफेद जैकेट पहने थे। सफेद, उजले, बिना दाग वाले दांत। शुद्ध मुस्कान। उनकी जैकेट लाल होती और लाल टोपा पहने होते-सफेद फुंदने वाला तो पूछ ही लेते -‘ अरे सांता जी , आप अभी तक यहीं हो।बच्चों को गिफ्ट देने कब जाओगे ?’
लेकिन मैंने उनसे पूछा नहीं। स्कैनर के पैसे के बारे में अलबत्ता पूछ लिया -'उनसे हिसाब कैसे करोगे? कित्ते पैसे आए तुम्हारे कैसे हिसाब करोगे?'
बोले -' सब हिसाब है। तीस रुपये तुम्हारे हुए। इसके पहले के साठ। और पहले के पैसा मिलाकर एक सौ तीस रुपये हो गए अब तक। उई दई देहैं (वो दे देंगे)।' हमने निष्कर्ष निकाला -'आम लोगों में सहज विश्वास अभी क़ायम है।'
हमने पूछा -' तुम शकरकंद साठ रुपये किलो बेच रहे हो? बगलवाला तो चालीस में दे रहा है।'
'वो सफेद शकरकंद है। मीठी नहीं है।'- बुजुर्गवार ने विश्वास से बताया।
लाल सिंघाड़ा और हरे सिंघाड़ा तो एक ही दुकान में साठ रुपये और चालीस रुपये के दाम पर बिकते मिले। अभी उबले सिंघाड़े खाते हुए लगा हरे सिंघाड़े का पता लेकिन लाल (जो लाए थे) वाले वाक़ई स्वादिष्ट हैं।
सब्जी बाजार में घूमते -फिरते सब्जी ख़रीदते देखते -देखते झोला भर गया। उठाकर चलना मेहनत का काम लगने लगा तो लौट लिए।
रास्ते में एक आदमी पेड़ की आड़ में खड़े होकर फ़ोन पर किसी से कह रहा था -'यश से कहना, लड़ाई न करे। आराम से बात करे।'
आदमी की कदकाठी और बात करने का अंदाज़ देखकर मुझे ट्रम्प के भारत-पाक के बीच लड़ाई रुकवाने के दावे याद आए। अगर दावा सही है तो क्या पता ट्रम्प ने भी अमेरिका में किसी सब्जी मंडी के पास किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर दोनों देशों के हाकिमों को फ़ोन किया होगा -' लड़ाई न करो भाई। आराम से बात करो।'
सब्जी मंडी में या रास्ते में या कॉलोनी में कोई शहर में हुए प्रधानमंत्री के दौरे के बारे में बात करते नहीं सुनाई दिया। कल प्रधानमंत्री जी ने लखनऊ में अटल जी और अन्य महापुरुषों प्रतिमाओं का उद्घाटन किया। 235 करोड़ की लागत लगी। संयोग से कल ही अटल बिहारी जी का बाबरी मस्जिद गिराने पर हुई लोकसभा में अटल जी का भाषण सरसरी तौर पर पढ़ा। उन्होंने कहा था -"मस्जिद गिरने पर आडवाणी जी का चेहरा आँसुओं से तर था।"
बाबरी मस्जिद गिराने का श्रेय आडवाणी जी, उमा भारती जी आदि को दिया जाता है। लेकिन अदालत में सभी ने अपने दोषी न होने के हलफ़नामे दिए। सभी बच भी गए। जिस बात का श्रेय सामाजिक जीवन में लेते हुए लोग सत्ता में आए उसी को अदालत में नकारना आज के समय की राजनीति है।
लौटकर ताजा इंडिया टु डे में सुरेंद्र मोहन पाठक जी की पसंदीदा किताबों की लिस्ट देखी। एक चादर मैली सी (राजेन्द्र सिंह बेदी) , गॉडफ़ादर (मारियो पूजो) , गिरती दीवारें (उपेंद्र नाथ अश्क) और बगैर उनवान के (बिना शीर्षक -सआदत हसन मंटो का उपन्यास) में से पहली दो किताबें पढ़ चुके हैं। गॉडफ़ादर फ़िल्म देखने के बाद इसे फिर से पढ़ना सोचा था। अब पढ़ेंगे। गिरती दीवारें कई बार ख़रीदने की सोची, मिली नहीं। 'बगैर उनवान' भी मंगायेंगे।
बात सब्जी खरीदने से शुरू हुई थी। उसका हिसाब बताना तो भूल ही गए। घर लौट के आए तो सब्जी देखकर हमको बताया गया कि हम सब्जी गड़बड़ लाए हैं। सोया मेथी बड़ी-बड़ी है, छाँट के लेनी चाहिए थी। सब्जी और फल ख़रीदने पर अक्सर हमको उलाहने मिलते रहते हैं। हम सोच रहे हैं 'सब्जी खरीदने की कला' सिखाने वाला कोई आनलाइन कोर्स हो तो उसे ज्वाइन कर लें। आपको पता हो तो बताइयेगा।

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Wednesday, December 24, 2025

विनोद कुमार शुक्ल जी नहीं रहे



 कल विनोद कुमार शुक्ल जी नहीं रहे। वे लंबे समय से बीमार थे। उनके इलाज में लापरवाही के समाचार और उसके खंडन के समाचार आते रहे। इसके पहले उनकी रॉयल्टी से संबंधित खबरें चर्चा में रहीं।

विनोद कुमार जी के बारे में लोगों ने लेख लिखे। अपने-अपने हिसाब से उनके बारे में लेख लिखे। उनसे एक मुलाक़ात से लेकर उनके साथ ज़िन्दगी के कई साल गुजारने वाले लोगों के मुग्ध, आत्मीय संस्मरण। अखबारों में भी उनके न रहने की ख़बरें, भले ही कोने में, दूसरे -तीसरे कॉलम में छपीं।
विनोद जी मैं भी एक बार मिला हूँ। कुछ घंटे उनके साथ रहे थे हम लोग वर्धा में। धीमी आवाज में बातचीत करते हुए कई संस्मरण साझा किए। किसी लेखक के बारे में कोई याद साझा करके उनको लगा कि यह बात सार्वजनिक रूप से कहना शायद ठीक नहीं होगा। उन्होंने हमसे कहा -"इसे कहीं लिखियेगा नहीं।" संकोची स्वभाव के व्यक्ति को लगता होगा कि उसकी कोई बात किसी को बुरी न लग जाये।
एक मुलाक़ात के आधार पर किसी के पूरे व्यक्तिव के बारे में कुछ कहना ऐसे ही होगा जैसे कैलकुलस में छोटे x (small x ) को शून्य से लेकर पूरे फ़लक तक इंटीग्रेट करके देख लिया जाये। गणितीय समाकलन में पूरा फ़लक एक समान माना जाता है। इंसान के व्यक्तित्व में अनगिनत पहलू होते हैं। उसको को किसी गणितीय संख्या की तरह इंटीग्रेट करना संभव नहीं होता। विनोद जी के बारे में भी उनसे एक मुलाक़ात के आधार पर उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ कहना ठीक नहीं होगा। उनके व्यक्तिव के बारे में सहज, सरल, मानवीय, विनम्र, आत्मीय विशेषण उनसे जुड़े लोगों के अनुभवों के आधार के कहे जाते हैं। और भी बहुत कुछ रहा होगा उनमें जो उनके साथ लगातार रहने वाले बेहतर अनुभव कर सकते होंगे।
विनोद कुमार शुक्ल जी के न रहने लोग उनको उनकी कविताओं और लेखन के माध्यम से जानेंगे:
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।
विनोद कुमार शुक्ल जी को विनम्र श्रद्धांजलि।
विनोद कुमार शुक्ल जी को ज्ञानपीठ सम्मान मिलने के समय उनके बारे में लिखा संस्मरण :


Tuesday, December 23, 2025

आपका पसंदीदा ध्येय वाक्य क्या है?





 आज सबेरे जगने के पहले मजेदार सपना देखा। शुरुआत एक संदेश से हुई। उस संदेश में सूचना थी कि हमारे वरिष्ठ अधिकारी हमसे मिलना चाहते हैं। मीटिंग में बुलाया है। हम तैयार होकर जाने के लिए निकलते हैं तो शर्ट नहीं मिलती। आख़िर में बनियाइन में ही पहुँच जाते हैं मीटिंग में। पता चला हमारे वरिष्ठ अधिकारी मीटिंग में नए साल की पिकनिक के बारे में चर्चा कर रहे हैं। एक दोस्त हमको दूसरे नाम से बुलाता है। ध्यान दिलाये जाने पर कहता -' इतने दिन बाद मिले हैं। अनूप की जगह आशुतोष बोल गए।'

सपने में दफ़्तर, मीटिंग और वरिष्ठ अधिकारी देखकर लगा कि रिटायरमेंट के डेढ़ साल बाद भी दफ़्तर पीछा नहीं छोड़ रहा है।
मीटिंग से लौटते में घर का रास्ता भूल जाते हैं। जिस गली यह सोचकर घुसते हैं कि यही सही रास्ता है वहाँ नयी बस्ती मिलती है। जागने तक घर नहीं पहुँच पाते।
नींद खुलने पर सपने का अंत याद करते हैं तो श्रीलाल शुक्ल जी की कहानी याद आती है -'यह घर मेरा नहीं है।' इस कहानी में एक दुनियावी रूप से सफल पिता अपने बेटे को उसकी छोटी-छोटी गलतियों पर टोंकता रहता है। एक दिन पिता को घर आने पर बेटा नहीं दिखता। वे उसे खोजते हैं तो बेटे का संदेश दिखता है जिसका आशय है -" इतने अनुशासन वाले घर में रहना मेरे लिए मुश्किल है। मुझे लगता है कि यह घर मेरा नहीं है। मैं यह घर छोड़कर जा रहा हूँ।"
बेटे का संदेश पढ़कर पिता की हवा ख़राब हो जाती है। वे परेशान होकर हर संभावित जगह पर बेटे को खोजते हैं। बेटा नहीं मिलता। बाद में निराश होकर वे घर लौटते हैं तो देखते हैं कि उनका बेटा घर में ही एक कोने में सो रहा है। वे प्यार से उसे घर के अंदर ले जाते हैं। मानवीय संवेदना की बहुत प्यारी कहानी है 'यह घर मेरा नहीं है।' (कहानी का लिंक टिप्पणी में)
कहानी के साथ ही याद आता है बेटे Anany Shukla जार्जिया की फ्लाइट सुबह चार बजे की थी। समय चार बजकर बीस मिनट हुए थे। फ़ोन मिलाया बेटे को तो बच्चा बोर्डिंग कर रहा था। उसको शुभकामनाएँ देकर फिर सो गए।
बाद में सुबह उठकर चाय बनाकर पीते हुए देखा तो फ़्लाइट पाँच बजे दिल्ली से चली है। आठ घंटे में अजरबैजान के बाकू हवाई अड्डे पहुंचेगी। बाकू में छह घंटे का ले ओवर है। इसके बाद की फ्लाइट से जार्जिया जायेगा।
चाय के साथ अखबार पढ़ते हुए देखा तो एक रिटायर्ड आई जी ने आठ करोड़ की धोखाधड़ी से परेशान होकर ख़ुद को गोली मारकर आत्महत्या की कोशिश की। उनकी क्या परिस्थितियाँ रहीं होंगी मुझे पता नहीं लेकिन आई जी को पेंशन मिलती ही होगी। सवा लाख रुपए कम से कम महीना। साधारण से भी बेहतर जीवन जीवन जीने के लिए इतने पैसे बहुत होते हैं। आत्महत्या की कोशिश करना मतलब जीवन जीने की इच्छा का खतम हो जाना।
आई जी की खुद को गोली मारकर आत्महत्या की कोशिश की खबर पढ़कर 2008 में लिखी एक पोस्ट (लिंक टिप्पणी में) का एक अंश याद आया :
" आदि विद्रोही मेरी सबसे पसंदीदा किताबों में है। हावर्ट् फ़्रास्ट की इस किताब का बेहद सुन्दर अनुवाद अमृतराय ने किया है। इसमें रोम के पहले गुलाम विद्रोह की कहानी है। स्पार्टाकस गुलामों का नायक है। उसकी प्रेमिका वारीनिया जब उससे कहती है कि तुम्हारे मरने के बाद मैं भी मर जाउंगी। तब वह कहता है-
'जीवन अपने आप में अमूल्य है। मुझे वचन दो कि मेरे न रहने के बाद तुम आत्महत्या नहीं करोगी।'
वारीनिया जीवित रहने का वचन देती है। स्पार्टाकस मारा जाता है। वारीनिया जीवित रहती है। अपना घर बसाती है। कई बच्चों को जन्म देती है। उनके नाम भी स्पार्टाकस रखती है। मानवता की मुक्ति की कहानी चलती रहती है।
हम सबमें स्पार्टाकस के कुछ न कुछ अंश होते हैं लेकिन हम अलग-अलग समय में बेहद अकेले होते जाते हैं। ऐसे ही किसी अकेलेपन के क्षण में लोग अवसाद को सहन न कर पाने के कारण अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं। जीवन अपने आप में अमूल्य है बिसरा देते हैं। असफ़लता और अवसाद के उन क्षणों में यह बात एकदम नहीं याद आती -सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है।"
आदि विदोही किताब पढ़ने के बाद से 'सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है ' मेरा ध्येय वाक्य बन गया है। जो उदास, परेशान, निराश, हताश, लुटा-पिटा दिखता है उसको यह नारा टिका देते हैं। एक किताब का इतना योगदान बहुत है।
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