Tuesday, February 24, 2026

राजधानी टी स्टॉल


 कल टहलते हुए चाय की गुमटी दिखी। नाम था -'राजधानी टी स्टॉल।' गुमटी पर दो झंडे फहरा रहे थे। हवा में फहराते झंडों को देखकर लगा कि इनकी जगह गुब्बारे होते तो गुमटी हवा में होती। ऐसा होता क्या पता दुकान का नाम बदल कर हो जाता -' हवा-हवाई टी स्टॉल।' हर चुनाव सभा में उड़कर पहुँच जाती दुकान। खूब बिक्री होती।

दुकान पर रेट लिस्ट लगी थी। चाय के दाम दस रुपये। कुल्हड़ की चाय के पंद्रह रुपए। मतलब कुल्हड़ के पाँच रुपए। कभी लालू यादव जी के रेल मंत्री रहते ट्रेन में कुल्हड़ की चाय का चलन शुरू हुआ था।
दुकान वाले ने बताया कि यह दुकान तो नई है। पुरानी दुकान आठ-दस साल पहले खुली थी। आगे है। एक ही नाम से दो चाय की ठेलिया। प्रदेश की राजधानी में दो-दो राजधानी टी स्टॉल। किसी भी प्रदेश में जाकर खड़ी कर दें ठेलिया। बेचने लगे चाय।
पुरानी वाली राजधानी टी स्टॉल के पीछे एक इमारत पर बड़ा सा सीमेंट का गोला सा रखा दिखा। पता चला कि मौसम विभाग का ऑफ़िस है। उस ऑफ़िस तक जाने वाली सड़क ऊबड़-खाबड़ है। शायद इसी लिए मौसम की ख़बरें बहक जाती हों। बारिश की अनुमान वाले दिन धूप निकल आती हो। धूप वाले दिन रिमझिम बरसात।
दोनों दुकानों के मालिकान के नाम अलग-अलग हैं। पुरानी वाली दुकान पर प्रोप्राइटर के नाम दीपक जोशी और राकिम ख़ान हैं। शायद दोस्त हों जोशी जी और ख़ान साहब। नई वाली राजधानी टी स्टॉल पर इरफ़ान ख़ान का लिखा है। शायद गठबंधन से भरोसा उठ गया हो।
पिछले दिनों जगह-जगह अलग-अलग नाम वाले टी स्टॉल दिखे। क्या पता कल कोई 'ट्रम्प टी स्टॉल', 'प्रधान सेवक टी स्टॉल' देखने को मिले। यह लिखते हुए अमेरिका में ट्रम्प टावर में Abhishek Ojha के साथ पी हुई कॉफ़ी का स्वाद अनायास याद आ गया।
आगे ही शुक्ला टी स्टॉल भी है। पिछली बार बंद दिखी थी। सोचा चलकर चाय पी जाये। लेकिन चौराहे पर मुड़ गए। घर तक का ऑटो खरीदा। कप्तान गौरव तिवारी आए हमको लेने। रैपिडो में ड्राइवर को कैप्टन करके ही बताते हैं। गौरव ने बताया कि लंच के बाद की पहली सवारी उठा रहे हैं। हमने सोचा हम ख़ुद बैठे हैं ऑटो पर और ये कह रहे हैं हमको उठा रहे हैं। कितना अंतर होता है एक ही बात को दो लोगों द्वारा व्यक्त किए जाने पर।
घर आकर ऑटो रुकने पर गौरव ने अंगड़ाई ली। हमने पैसे भुगतान किए और घर में घुस गए। घर वापसी हुई हमारी। कोई इसे कहेगा -'लौट के बुद्दु घर को आए।' कोई 'बुद्धू' की जगह 'बुद्ध' भी पढ़ सकता है। ज़्यादा अंतर है भी नहीं आजकल दोनों में। वैसे अगर सही में बुद्ध घर वापस आए होते, बुद्ध की घर वापसी हुई होती तो इतिहास कैसा रहता? क्या पता इस बात की कल्पना करते हुए कोई उपन्यास लिखे -'बुद्ध की घर वापसी।'
बुद्ध जी का तो पता नहीं लेकिन आज कोई बुद्धू घर वापस लौटता है तो उससे कहा जाता है -'लौट आए, चलो बढ़िया सी चाय बनाओ।'
ट्रम्प टॉवर का किस्सा फोटो के साथ लगा है।

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Monday, February 23, 2026

इंदिरा रॉय से मुलाक़ात


 काजीरंगा में हाथी सफारी के बाद हम होटल वापस लौटे। नहा-धोकर नाश्ता किया। नाश्ता मतलब जमकर नाश्ता।

होटल में आमतौर पर सुबह का नाश्ता होटल के किराए में जुड़ा रहता है। माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम का पालन करते हुए अधिकतर यात्री दो-तीन दिन के बराबर नाश्ता कर लेते हैं ताकि लंच की जरूरत न पड़े।
जमकर नाश्ता करने के बाद कमरे में आए। वापस लौटने की तैयारी करने लगे। सामान जमाया।
सामान जमाने के बीच ही कमरे की घंटी बजी। बाहर होटल की महिला स्टॉफ़ थी। वो होटल की साफ़-सफ़ाई का इंतज़ाम देखती थीं। बातचीत होने लगी।
उसने पूछा -'आपको कैसा लगा काजीरंगा? होटल का स्टे?'
हमने कहा -'अच्छा। बहुत अच्छा।'
सुनकर उसके चेहरे पर ख़ुशी आ गई। उसके बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह होटल 2014 में ज्वाइन किया। अपने पति की जगह। पति होटल में ही काम करते थे। 2014 में नहीं रहे। एक दुर्घटना में नहीं रहे। पति की जगह होटल में काम मिल गया।
हमने पूछा कि पति के न रहने पर दूसरी शादी नहीं की?
उसने बताया -'दो छोटे-छोटे बच्चे थे। शादी करते तो उनकी जिंदगी पर असर पड़ता। इसलिए शादी नहीं की।'
बच्चों के बारे बताया कि दो बच्चे हैं। बेटी छब्बीस साल की है। चार साल पहले उसकी शादी की। बेटा फोटोग्राफर है। 23 साल का है। उसकी भी शादी होने वाली है।
हमने कहा -' बेटी की उमर छब्बीस साल। तुम्हारी इतनी उमर तो नहीं लगती।'
किसी महिला से बातचीत करते हुए 'आपकी उमर इतनी तो नहीं लगती' बातचीत आगे बढ़ाने का सबसे सहज तरीका होता है। इंदिरा रॉय के बारे में तो सच में ऐसा लगा मुझे।
उसने बताया -'मेरी उमर 45 साल की हो गई।'
बेटी की हाल ही में 26 साल की उम्र में शादी की। इसका मतलब इंदिरा रॉय की शादी के समय 17-18 साल रही होगी।
होटल के पास ही के गांव रहती हैं इंदिरा रॉय । बेटा पास के क़स्बे में काम करता है। वहीं रहता है। माँ के पास आता-जाता रहता है। वे अकेली ही रहती हैं।
मुझे होटल की यह बात अच्छी लगी पति के न रहने पर उनकी जगह उनकी पत्नी को काम दे दिया।
आम तौर पर जीवन साथी के न रहने पर पति-पत्नी के नजरिये अलग-अलग रहते हैं। अधिकतर आदमी इस लिए दूसरा विवाह कर लेते हैं कि बच्चे पालने हैं। वहीं आमतौर पर महिलाएं इसलिए दूसरी शादी नहीं करती क्योंकि बच्चे पालने हैं। पता नहीं दूसरा जीवन साथी कैसा मिले। कारण और भी होंगे जो कि तात्कालिक समय , आसपास के परिवेश और समाज पर निर्भर रहते हैं।
फिर कभी आने पर पर मिलने की बात कहकर हम सामान लेकर चल दिए। हमारी आगे की मंजिल शिलांग थी।
पहले की पोस्ट : https://www.facebook.com/share/v/1L8H1mJDKt/
इंदिरा रॉय 👇



Sunday, February 22, 2026

गांव में ऐसा ही होता है

 आज सबेरे ब्लिंकिट से कुछ सामान मंगाया। डिलीवरी करने आए भाई जी साइकिल से आए थे। आमतौर पर डिलीवरी करने वाले लोग बाइक से आते हैं। साइकिल से सामान देने पहली बार कोई आया था।

सामान लेने के बाद हमने कहा -'पिछले पहिए में हवा में कम है।'
वो बोले -' सबेरे कोई दुकान खुली ही नहीं हवा भरने वाली। थोड़ी देर में खुलेगी तो भरवायेंगे।'
हमने कहा -'पंप दें, भर लो हवा?'
वो बोले -'है क्या पंप? दे दीजिए।'
संयोग से पंप तुरंत मिल गया। वो हवा भरने लगे। पंप को छुच्छी में लगाते हुए बोले -'पाँच रुपये बच गए।'
हवा भरने से साइकिल चलाने में होनी वाली सहूलियत पर पाँच रुपये बचने की बात को तरजीह से पैसे के महत्व का एहसास हुआ।
साइकिल में चेन कवर नहीं है। पूछने पर बताया -'लगवाना है।'
हवा भरते हुए बात करते रहे। बताया कि रायबरेली घर है। परिवार गांव में रहता है। दो बच्चे हैं। जुड़वाँ। चौदह साल उमर है। आठवीं में पढ़ते हैं।
हमने कहा -' चौदह साल की उमर के बच्चे! इतनी उमर तो नहीं लगती तुम्हारी। जल्दी शादी हुई होगी।'
बबलू यादव ने बताया -'हाँ, जब हम आठवीं में पढ़ते थे तब माँ नहीं रही। बड़े भाई बाहर रहते थे। घर में कोई खाना बनाने वाला नहीं था। पिताजी ने हमारी जल्दी शादी कर दी। हाई स्कूल में थे जब हमारी शादी हुई। गांव में ऐसा ही होता है।'
हमने पूछा -'तुम्हारा नाम बबलू यादव है। बबलू तो घर के नाम होते हैं। स्कूल में भी यही लिखवाया गया?'
बबलू बोले -'हाँ, स्कूल में भी यही लिखवा दिया। मास्टर साहब ने लिख दिया। वही बना रहा। गांव में ऐसा ही होता है।'
जूते फ़ौज टाइप के थे। पूछने पर बताया बबलू ने कि वे एक जगह सिक्योरिटी दरबान का काम करते हैं। आज छुट्टी थी तो ब्लिंकिट की डिलीवरी करने लगे। आज दिन भर करेंगे। दिन भर करने पर पाँच सौ रुपये तक कमाई हो जायेगी। तीन चार घंटा काम करने पर सौ-दो सौ मिल जाते हैं। शाम को भी ड्यूटी से छुट्टी मिलने पर अक्सर डिलीवरी कर लेते हैं। कुछ कमाई हो जाती है। खाना ख़ुद बनाते हैं।
जल्दी शादी के कारण पढ़ाई छूट जाने और पिछड़ जाने का भी हल्का अफ़सोस जाहिर किया बबलू ने। लेकिन मेहनत की कमाई पर भरोसा बना है।
सबेरे की पहली डिलीवरी थी बबलू की।
हमने पूछा -'नाश्ता किया कुछ सुबह? '
बबलू ने कहाँ -'हाँ चाय पी थी। कुछ नमकीन साथ में खाई थी।'
बबलू चलने को हुए तो हमने कहा -'पानी पी लो।'
बोले -'ठीक है।'
लेकिन हमने ज़बरियन जैसा रोक लिया। रुको कहने के बाद फ्रिज से एक अलसी का लड्डू निकला और ग्लास में पानी भरकर बबलू को दिया। लड्डू Nirupma दीदी बनाकर दे गईं थीं। आजकल ह्यूस्टन में अमेरिका गिरी कर रही हैं।
लड्डू खाकर बबलू ने ग्लास से पानी सीधे न पीकर हथेली का चुल्लू बनाया। हमने कहा ऐसे ही पी लो सीधे। लेकिन बबलू ने पानी चुल्लू से ही पिया। ग्लास जूठा न हो इसलिए चुल्लू से पानी पीते हुए किसी को वर्षों बाद देखा। गांव में ( शहर में भी) एक लोटे से, बिना ग्लास के, कई लोग इसी तरह से पानी पीते थे।
हमने पूछा -'रायबरेली घर है। जाते रहते होगे।'
'हाँ, काम-काज होता है तो जाते हैं। ऐसे भी कभी-कभी चले जाते हैं जरूरत पड़ने पर।'-बबलू ने कहा।
हमने कहा -' गांव में परिवार है। पत्नी है। बच्चे हैं। हर हफ़्ते जाना चाहिए।'
बबलू बोले -' हाँ, लेकिन अब यहाँ काम कर लेते हैं। उमर भी हो गई।'
बबलू चले गए। हम सोच रहे थे कि चालीस साल की उमर का आदमी कह रहा है -'अब उमर हो गई।'
बबलू की यह बात भी याद आई -' गांव में ऐसा ही होता है। '

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Saturday, February 21, 2026

जैसे चॉकलेट के लिए पानी


 पिछले साल अगस्त महीने में दिल्ली में Ibbar Rabi जी से मुलाक़ात के दौरान Ashok Pande का जिक्र करते इब्बार रब्बी जी ने बताया -"हल्द्वानी वाला अशोक पाण्डे बहुत अच्छा लिखता है। उसका 'लपूझन्ना' न पढ़ा हो तो पढ़ना।"

हमने बताया कि हम अशोक पाण्डे के बहुत बड़े फैन हैं। इतने कि अगर फेसबुक में केवल एक लिखने वाले को पढ़ने की शर्त हो तो हम अशोक पांडे को पढ़ना चाहेंगे।
उन्होंने अशोक पाण्डे द्वारा अनुवादित एक किताब का जिक्र किया -"चॉकलेट एंड मार्गरिटा ।" बताया कि अद्भुत किताब है। अशोक पाण्डे ने इसका अनुवाद बहुत सुंदर अनुवाद किया है। अशोक पाण्डे द्वारा अनूदित इस किताब के बारे मुझे जानकारी नहीं थी।
बाद में अशोक पाण्डे ने बताया -"बीस-पचीस साल पहले यह किताब एक लोकल प्रकाशक ने छापी थी। अब सब कॉपियां खत्म हो गयीं। उन्होंने एक किताब कहीं से खोजकर, जुगाड़कर भेजने का वायदा किया है।"
लोकल प्रकाशक वाली किताब शायद मिल गई थी लेकिन इधर-उधर के लफड़ों के चलते पहुंची नहीं हम तक। इस बीच उस किताब का संभावना प्रकाशन से नया संस्करण आ गया। किताब के छपने और आनलाइन आने में भी कुछ समय लगा। किताब के बारे में इतनी बातें हुईं इस बीच कि पढ़ने की बेताबी हुई। फिर याद आया कि कबाड़खाना ब्लॉग में इसके कुछ अंश लगाए गए थे। हमने उनको पढ़ना शुरू किया। रोचक लगे अंश। इस बीच किताब छपकर आनलाइन उपलब्ध हो गई। हमने फटाक से किताब ख़रीदी और कबाड़खाना वाली पोस्ट को पढ़ना रोक दिया कि अब किताब ही पढ़ेंगे।
इस बीच किताब का नाम भी बदल गया था। पता चला कि जिस किताब को अपन "चॉकलेट एंड मार्गरिटा" के नाम से खोज रहे थे उसका असली नाम था -"जैसे चॉकलेट के लिए पानी।"
यह किताब 'लाइक वॉटर फॉर चॉकलेट' मैक्सिकन उपन्यासकार और पटकथा लेखक लॉरा एस्क्विवेल के द्वारा लिखा गया एक उपन्यास है। मूल पुस्तक 1989 में ''कोमो अगुआ पैरा चॉकलेट'' शीर्षक से स्पेनिश में लिखी गई थी और 1990 में मेक्सिको का सबसे अधिक बिकने वाला उपन्यास बन गया था। इस 256 पेज के उपन्यास को 1994 में ''अमेरिकन बुकसेलर्स बुक ऑफ द ईयर फॉर एडल्ट ट्रेड'' के रूप में भी सम्मानित किया गया था। यह एस्क्विवेल का सबसे मान्यता प्राप्त थाऔर बीसवीं सदी के स्पेनिश में सर्वश्रेष्ठ उपन्यास। तीस भाषाओं में अनुवादित हुई इस किताब की करोड़ से अधिक प्रतियां बिकी थीं।
किताब आने के बाद फौरन उसे पढ़ना शुरू किया। अनोखे ढंग से लिखी गई किताब। सभी अध्यायों की शुरुआत रसोई से। कोई व्यंजन बनाने का किस्सा आगे बढ़ते हुए उपन्यास के पात्रों के बारे में बताता है। इस किताब के बारे में लिखते हुए Sudipti ने लिखा भी है :
"प्रेम, आवेग, स्वार्थ, वासना, फैंटेसी, विद्रोह और वेदना के तत्वों से बुनी गई इस कहानी में सबको एक सूत्र में बांधने वाला तत्व है भोजन।"
किताब के पात्रों सभी प्रमुख पात्र मानों अभिशप्त प्रेमी रहे हैं। मामा एलेना उपन्यास में कड़क, अनुशासनप्रिय और क्रूर तक दिखाई गई हैं। लेकिन उनके निधन के बाद पता चलता है कि उनका जीवन भी 'प्रेम वंचित' रहा। जिससे वे प्यार करती थीं उससे शादी न हो सकी। शायद इसीलिए वे क्रूर हो गयीं। तीता का तो जीवन ही रोते हुए बीता। उसके प्रेमी की शादी उसकी छोटी बहन से हो जाती है। यह उसकी माँ की ज़िद के कारण होता है जिसे उसका प्रेमी इस लालच में स्वीकार कर लेता है ताकि वह अपनी प्रेमिका के पास रह सके। बाद में मामा एलेना और बहन रोसाउरा के निधन के बाद तीता का विवाह अपने प्रेमी पेद्रो से होता है और एक-दूसरे को अनंत प्रेम करते हुए उन्होंने उस भावना को जिया जिसे वे बरसों से दबाए हुए थे।
यही शायद उनके जीवन का चरम था। इसी मिलन के बाद पेद्रो का निधन हो जाता है। बाद में तीता भी एक तरह से ख़ुद के लिए मरण चुनती है।
अपने समय के बेस्ट सेलर रहे इस अनूठे उपन्यास का हासिल है प्रेम की परिभाषा। इसके बारे में अशोक पाण्डे कई बार बता चुके हैं :
"हम सब अपने भीतर एक माचिस का डिब्बा लेकर पैदा होते हैं लेकिन एक भी तीली ख़ुद नहीं जला सकते। बिना ऑक्सीजन और मोमबत्ती के वह संभव नहीं होता. ऑक्सीजन उस इन्सान की सांस से आएगी जिसे हम प्यार करते हैं जबकि मोमबत्ती का काम अच्छा भोजन, बढ़िया संगीत, मोहब्बत या प्यार भरे शब्द ही कर सकते हैं।इन्हीं के आपस में मिलने पर वह चमकदार विस्फोट घट सकेगा।वही चिंगारी हमारे भीतर गर्मी पैदा करती है और हमें ज़िंदा रखती है. समय के साथ-साथ यह गर्मी कम होती जाती है। फिर बस एक वैसा ही एक और विस्फोट उसे दोबारा ज़िन्दा करता है।
इन विस्फोटों में हमारी आत्मा के लिए जीवन छिपा होता है। इन्सान को जीवन में यह ढूंढना होता है कि ऐसे विस्फोट उसके भीतर कैसे होंगे।समय रहते नहीं ढूंढ पाता तो उसका माचिस का डिब्बा सील जाता है और फिर एक भी माचिस नहीं जलाई जा सकती। तीलियाँ कभी न जलाई जाएं या सारी की सारी एक साथ जल उठें तो इन्सान की आत्मा या तो बुझ जाती है या पूरी तरह भस्म हो जाती है।
कोमलता, प्रेम और इच्छा मनुष्य-जीवन की अनिवार्य चिंगारियाँ हैं। ज़रूरी है आप ऐसे लोगों से दूर रहें जिनकी सांस ठंडी होती है, जो आपके भीतर की हर आग को बुझा देते हैं।"
यह बात बताने के पहले हर बार अशोक पाण्डे लिखते हैं -"पहले भी लिखा है, आज फिर लिखता हूँ. मोहब्बत के साथ जीना है तो अपने भीतर की माचिस की डिबिया को बचा-सम्हाल कर रखिये।"
इस अनूठे स्पेनिश का अनुवाद अशोक पाण्डे ने किया है। बहुत अच्छा अनुवाद है। पढ़ने लायक किताब है। शानदार काम है। अशोक पाण्डे जी इस पुण्य काम के लिए बधाई के पात्र हैं।
अशोक पाण्डे के लेखन/अनुवाद को हम लोगों तक पहुँचाने के लिए संभावना प्रकाशन के Abhishek Agarwal भी बधाई के पात्र हैं। आशा है आने वाले समय में अशोक -अभिषेक की शानदार जोड़ी और पठनीय सामग्री हम तक पहुँचायेगी।
किताब का नाम : जैसे चॉकलेट के लिए पानी
लेखिका : लॉरा एस्कीवेल
अनुवाद :अशोक पाण्डे
प्रकाशक : संभावना प्रकाशन
पृष्ठ : 163
कीमत : 285/-
किताब अमेजन में उपलब्ध है।ई बुक भी उपलब्ध है। लिंक टिप्पणी में है।

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Thursday, February 19, 2026

AI में AI मतलब आर्टिफिशियल इटेलिजेंस में आर्टिफ़िशियल इंसल्ट


 करीब पच्चीस साल पहले की बात है। हमारे महाप्रबंधक ने फैक्ट्री से संबंधित कुछ आँकड़े मुख्यालय को बताये थे। मुख्यालय के लोग हमारे महाप्रबंधक की हाँकू प्रवृति से परिचित रहे होंगे। उन्होंने हमसे उसी बावत पूछा। हमने सच बता दिया। मुख्यालय से कुछ कहा गया होगा महाप्रबंधक को। उन्होंने मुझसे फ़ोन करके कहा :

"अरे यार तुमको इतना सच बोलने की क्या जरूरत थी?"
हमने उनसे कहा -"आपने यह भी तो नहीं बताया मुझसे कि झूठ कितना बोलना है।"
हाल ही में हुई AI समिति के समय गलगोटिया विश्वविद्यालय का झूठ पकड़े जाने से देश की भद्द पिटने की खबर से यह क़िस्सा मुझे याद आया।
गलगोटिया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर रही महिला ने शानदार अंग्रेजी में अपनी यूनिवर्सिटी को रिप्रेजेंट किया। झूठ पकड़े जाने पर विश्वविद्यालय ने शायद उनको नौकरी से निकाल दिया। एक अच्छी ख़ासी, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली, प्रतिभाशाली महिला की छवि एक विलेन जैसी बना दी। सारी कमियों का ठीकरा उनके ऊपर फोड़ दिया गया।
इसी घटना पर रिपोर्टिंग करते हुए सुबह से आज तक न्यूज़ चैनल की एंकर गलगोटिया यूनिवर्सिटी के किए धरे पर लीपा पोती करने की कोशिश कर रही हैं। गलगोटिया विश्वविद्यालय की गलती के चलते देश को कमतर न आंकने की बात कर रही हैं। साथ ही चीन की परमाणु क्षमताओं का जिक्र कर रही हैं। चीन भारत के लिए कितना बड़ा ख़तरा हो सकता है यह भी बता रही हैं।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी की चूक और झूठ को एंकर ने गलगोटिया यूनिवर्सिटी की गलती बताते हुए कहा -'गलती पकड़ी जाने पर उनको सॉरी बोलना चाहिए। माफ़ी मांगने की बजाय वे और बड़ा झूठ बोल रही हैं।'
ऐसा कहते हुए आज तक की एंकर अपने चैनल के माध्यम से बोले अनेक झूठ पचा गई जो उन्होंने एकरिंग करते हुए बोले थे। आपरेशन सिंदूर के समय दूसरे चैनलों के साथ भारत की फौज द्वारा पाक़िस्तान के लाहौर पर कब्जा करने, वहाँ चाय पीने जैसी रिपोर्टिंग की थी। उन खबरों पर कभी माफ़ी मांगने जैसा पवित्र काम नहीं किया।
इस बेइज्जती से प्रभावित ABP न्यूज चैनल की वाइस प्रेसिडेंट ने गलगोटिया विश्विद्यालय की मान्यता रद्द करने की माँग करते ट्वीट किया था :
,"जिस भारत की यूनिवर्सिटी ने चाइना का सामान अपना बताकर AI समिट में देश का मजाक बनाया है. तत्काल प्रभाव से उसकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिये. इन लोगों के घटिया आचरण से देश की छवि धूमिल होती है.
जब इतना बड़ा झूठ इतने बड़े प्लेटफार्म पर बोल रहे हैं तो ये बच्चों को कैंपस में क्या पढ़ाते…"
(खबर का स्रोत Khushdeep Sehgal की पोस्ट
बाद में पता लगा वह ट्वीट भी डिलीट कर दिया गया। जो काम किया नहीं जा सकता उसका आह्वान करके लोगों को वैसी ही माँग के लिए उकसाना ठीक नहीं।
संयोग की इस नकल कांड में बदनाम होने वाली तीनों लोग महिलायें हैं। खबरें ऐसी चल रही हैं मानों इन महिलाओं ने ही सब बवाल किए। जबकि असलियत यह है कि ये महिलायें तो चेहरा हैं। ये तो इस मीडिया का चेहरा है। मुझे सबसे ज़्यादा सहानुभूति तो गलगोटिया विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर रही महिला से है।
इस बात अपना मत रखते हुए Sudhir Tewari जी ने लिखा है :
"गलगोटिया विश्वविद्यालय द्वारा जो कुछ भी किया गया है, वह उभरते हुए 'विकसित भारत' की प्रतिष्ठा बढ़ाने के उद्देश्य से सर्वोच्च राष्ट्रीय हित में है! इसलिए, यदि उसकी ओर से कोई चूक हुई है, चाहे वह जानबूझकर या सोच-समझकर ही क्यों न हुई हो, तो उसे संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए और क्षमा कर दिया जाना चाहिए।"
आगे उन्होंने शंका जाहिर की :
"यह पूरी तरह संभव है कि जहां गैलगोटिया विश्वविद्यालय ने एआई इम्पैक्ट समिट की प्रत्याशा में एआई एप्लिकेशन (जो अब विचाराधीन है) विकसित किया हो, वहीं चीन ने अपनी कुख्यात एआई निगरानी प्रणाली का उपयोग करके इसकी नकल की हो!"
सुधीर तिवारी जी की देश भक्ति लहालोट पूरी पोस्ट से आप यहाँ (https://www.facebook.com/share/p/1B2XSzxpAX/) पढ़ सकते हैं ।
हमारा कहना है AI का मतलब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मतलब कृत्तिम मेधा होता है। तो कृत्तिम मेधा की प्रदर्शनी में हुई नकल में पकड़े जाने पर परेशान होने की क्या जरूरत। इसमें हुई बदनामी को कृत्तिम बदनामी समझकर आगे नए कांड की तैयारी की जाये।
नाम न बताने की शर्त पर कुछ लोगों ने मुझे बताया कि बतर्ज रागदरबारी गलगोटिया कांड से उन लोगों के बांछे वे शरीर में जहाँ कहीं भी होती हों , खिल गईं होंगी।बड़ी बात नहीं यह सारा रायता उन्होंने ही फैलवाया हो जिसे आजतक की एंकर बड़े मेहनत से समेटती दिख रही हैं।
हमने उनको बहुत तेज ऊँची आवाज में सहमते हुए हड़काया -'इस तरह की देश विरोधी बात सोचते हुए तुमको शर्म नहीं आती।'
भाई साहब ने फौरन अपनी बात को X के ट्वीट की तरह मन से ही डिलीट कर दिया। गला फाड़ आवाज में भारत माता की जय बोला। वंदे मातरम का नारा लगाया और तेज आवाज में गाने लगे -'सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा।'

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