उमानंद मदिर से लौटकर पास ही स्थित प्रसिद्ध शिव मंदिर देखने गए। कई बार लोगों के बताये जाने के बाद भी मुझे मंदिर का नाम याद नहीं हुआ। सोचते जाना है मंदिर देखने । शिवमंदिर है।
जिस जगह से उमानंद मंदिर जाने के लिए नाव मिलती है उस जगह से कुछ मिनट की दूरी पर ही मंदिर है। मुख्य सड़क किनारे ही बना हुआ है मंदिर। मंदिर के पास ही फुटपाथ पर पैदल पार पथ बना हुआ है। पैदल पार पथ के पास ही एक भाई जी पान-मसाला की दुकान लगाए बैठे थे। हमने उनसे शिव मंदिर के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि हाँ यही है मंदिर।
मंदिर का नाम उन्होंने बताया शुक्रेश्वर मंदिर। लेकिन उनके बताने के लहजे से लगा कि वे मंदिर का नाम 'शुक्लेश्वर' बता रहे हैं। हमने सोचा वाह, यह मजेदार है। शुक्ला जी के नाम मंदिर है आसाम में। जलवा है शुक्ला लोगों का।
दुकान वाले ने अपनी तरफ़ से बताया कि दर्शन करने जा रहे हैं तो जूते यहाँ रख सकते हैं। पाँच रुपए लगेंगे जूता रखाई। 'जूता रखाई' से मुझे 'जूता चुराई' याद आ गया। लेकिन 'जूता चुराई' तो जीवन में एक बार होती है, जूता रखाई तो जगह-जगह, रोज़ होती है।
जूता मंदिर के बाहर स्थित फुटपाथ पर रखकर हम मंदिर परिसर में पहुंचे। बड़ा, साफ़ -सुथरा, खुला -खुला मंदिर परिसर। अंदर जाकर दायीं तरफ़ बनी सीढ़ियों से ऊपर मंदिर जाने का रास्ता था। सीढ़ियों के ऊपर बोर्ड में मंदिर का नाम लिखा था - "श्री श्री महाप्रभु शुक्रेश्वर देवालय।"
दो मिनट पहले बाहर उच्चारण की समझ के नाम से जो मंदिर अपने नाम का लग रहा था अंदर पहुंचते ही उसका नाम बदल गया। ऐसा लगा कि दो मिनट में मंदिर की मिल्कियत छिन गई। शुक्लेश्वर से शुक्रेश्वर हो गया मंदिर का नाम। सोचा गाना गाया जाए - 'चलो सुहाना भरम तो टूटा' लेकिन गाया नहीं क्योंकि हमको पहले से ही पता था कि नाम कुछ और मंदिर का। हम समझ ग़लत रहे हैं। भरम सही में भरम था ही नहीं।
शुक्रेश्वर मंदिर के बारे में जानकारी लेने पर पता चला कि यह मंदिर 1744 में अहोम राजा प्रमत्त सिंह द्वारा बनवाया गया यह मंदिर सुक्रेश्वर या इटाखुली पहाड़ी पर स्थित है और भारत के सबसे विशाल शिवलिंगों में से एक के लिए जाना जाता है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर के बारे में माना जाता है कि यहाँ ऋषि शुक्र ने भगवान शिव की पूजा की थी।
ऋषि शुक्र मतलब शुक्राचार्य असुरों (दैत्य, दानव और राक्षसों) के गुरु और पुरोहित थे। मृत संजीवनी विद्या जानते थे। इस विद्या से वे मरे हुए असुरों को ज़िंदा कर देते थे। उनसे संजीवनी विद्या सीखने आए देवगुरु बृहस्पति के पुत्र कच का उनकी पुत्री से देवयानी से प्रेम हो गया। असुरों को लगा कि अगर कच मृत संजीवनी विद्या सीख जायेंगे तो वे भी देवताओं को ज़िंदा कर दिया करेंगे। असुरों से कच को मार दिया। इस पर अपनी पुत्री देवयानी के कहने पर शुक्राचार्य जी ने उसे ज़िंदा कर दिया
असुरों ने कच को निपटाने का उपाय सोचा। ऋषि शुकाचार्य भयंकर मदिरा प्रेमी थे। असुरों ने कच को मारकर जला दिया। उसकी राख को शराब में मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दिया। देवयानी को पता चला तो उसने पिता से कच को ज़िंदा करने के लिए कहा। अब ज़िंदा कैसे करते? वह तो उनके पेट में था। लेकिन पुत्री के प्रेम को नकारना शुक्राचार्य के लिए संभव नहीं था। उन्होंने कच को अपने पेट में संजीवनी विद्या सिखाई। कच को ज़िंदा किया।
शुक्राचार्य के पेट में जाकर संजीवनी विद्या के कारण जीवित होने के कारण कच ने देवयानी से विवाह करने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि शुक्राचार्य के पेट से उत्पन्न होने के कारण उनके और देवयानी के बीच भाई-बहन का रिश्ता हुआ। इस पर देवयानी ने शाप दिया कि कच की संजीवनी विद्या किसी काम नहीं आएगी, और बदले में कच ने शाप दिया कि किसी भी ब्राह्मण को देवयानी से विवाह नहीं करना चाहिए।
शुक्राचार्य-कच-देवयानी से जुड़ी यह कथा विष्णु सखाराम खांडेकर द्वारा लिखी किताब ययाति में पढ़ी थी। यह किताब मुझे 37 वर्ष पूर्व मेरे विवाह के अवसर पर निरुपमा दीदी Nirupma Ashok ने भेंट की थी। साथ में अखिलन की चित्रप्रिया भी थी। ययाति तो उसी समय पढ़ ली थी। लेकिन चित्रप्रिया अभी भी पढ़नी है। आशा है इस साल इसे पढ़ लेंगे।
ययाति से याद आया ययाति राजा नहुष के वंशज थे। राजा नहुष को अगस्त्य ऋषि ने श्राप दिया था कि तुम्हारे वंशजों की ’यौन कामना’ हमेशा अतृप्त रहेगी। ययाति ने अपने जीवन काल में तमाम लोगों से संसर्ग किए।महिलाओं, युवतियों और बच्चियों से यौन संबंध स्थापित किए। बुढ़ापे में अशक्त हो जाने पर अपने पुत्र से जवानी उधार ली।
हाल ही में एपस्टीन फाइलों में दुनिया भर के नामचीन, प्रभावशाली, शरीर से अशक्त होने के बावजूद अतृप्त यौन कामना की पूर्ति के प्रयास करने वालों के नाम आए। इससे एहसास हुआ कि ययाति के वंशज पूरी दुनिया में पसरे हुए हैं।
ययाति की कहानी तो प्रसंगवश आ गई। हम तो शुक्रेश्वर देवालय की बात कर रहे थे। ऊपर जाने पर मंदिर में एक विशाल आकार का शिवलिंग दिखा। कई लोग उस शिव लिंग की पूजा कर रहे थे। उनमें से एक मुंबई से आए युवा दंपति भी थे। हमने भी प्रणाम निवेदित किया शंकर भगवान को। कुछ देर मंदिर में रहकर लोगों को पूजा करते देखा। इसके बाद बाहर निकल आए।
वापस लौटते हुए वहाँ मंदिर के बाहर आने के रास्ते में बनी लोगों के बैठने के लिए बनी बेंच पर तमाम लोगों को बैठे देखा। उनमें से एक युवा लड़का-लड़की भी थे। आपस में एक-दूसरे को देखते हुए गुचुर-पुचुर बतिया रहे थे। उस दिन बसंत पंचमी थी। सड़क पर और कई जगह तमाम युवक-युवतियों को साथ घूमते देखा।
ये बालक-बालिका आपस में बतियाते हुए सेल्फिया भी रहे थे। उनका साथ बैठकर बतियाना, सेल्फ़ियाना बहुत प्यारा लगा। हम उनके पास से गुज़रे तो उनसे बतियाये। पता चला बालक रवि आई आई टी गुवाहाटी में पढ़ता है। बालिका आनंदिता बी कॉम में पढ़ती है। तेजपुर घर है। दोनों दोस्त हैं। वंसत पंचमी के दिन घूमने आए थे। हमको लगा कि वंसत पंचमी तो हमारे लिए भी है। लेकिन हम अकेले घूम रहे हैं। लेकिन फिर उनके साथ को अपना साथ समझकर प्रसन्न हो गए। हमने उनके मोबाइल में उनके सेल्फी के साथ अपना लिया फ़ोटो भी जोड़ा। इसके मेहनताने के रूप में अपने मोबाइल में भी उनका फ़ोटो, उनसे पूछकर, लिया। बता भी दिया कि इसे फेसबुक पर पोस्ट करेंगे।
रवि, आनंदिता से विदा लेकर अपन बाहर आए। पाँच रुपए भुगतान करके जूते वापस लिए। इसके बाद आगे बढ़े। आगे ब्रह्मपुत्र रिवर फ्रंट पर घूमने आए लोगों की भारी भीड़ थी। लोग रिवर फ्रंट जाने के लिए लाइन में लगकर टिकट ले रहे थे। इन लोगों में युवाओं की बहुतायत थी। लड़कियां अपनी सहेलियों के साथ, दोस्तों के साथ चहकते हुए घूमने निकले थे।
वहीं एक लड़का एक लड़की को बड़ा सा फूलों का गुलदस्ता देते हुए फोटो ले रहा था। मोटर साइकिल के पास खड़े उस जोड़े को फूल देते और फोटो खींचते देखकर हमने बगल में खड़े होने का फ़ायदा उठाते हुए फोटो खींचने के काम से मुक्त करते हुए तसल्ली से फूल देने में लगाया। लड़के ने लड़की को फूल दिया। लड़की ने मुस्कराते हुए फूल ग्रहण किया। हमने उनका फ़ोटो खींचा। हम बाहर आ गए।
सड़क पर ट्रैफिक नियंत्रित करने के लिए सिपाही लगे थे। एक महिला एक पुरुष। हमने कुछ देर खड़े होकर सड़क, ट्रैफिक और उसको नियत्रिंत करने वालों को देखा। हमारे वहाँ खड़े रहते हुए ही वही लड़के-लड़की बाहर आए। साथ में लिए-दिए फूल को किसी सामान की तरह लटकाये हुए थे। बताया कि दोस्त हैं। पास ही रहते हैं। घूमने आए थे। मौसम का तक़ाज़ा देखकर फूलबाजी भी हो गई। लड़के ने यह भी कहा -'हालांकि उसको फूलबाजी पसंद नहीं है। लेकिन दोस्त को पसंद है इसलिए उसको फूल दिए। फोटो खिंचाई।'
हमको लगा कि प्रेम और दोस्ती में लोग अपने साथी की ख़ुशी के लिए अपनी पसंद के विरुद्ध व्यवहार करते हैं। प्रेम , मित्रता विरुद्धों में सामंजस्य पैदा करता है।
आगे एक जगह संगीत संध्या का कार्यक्रम आयोजित होते दिखा। गायन के लिए मंच सजा था। मंच पर लगे बैनर से पता लगा कि असम के मशहूर गायक जुबिन गर्ग की स्मृति में संगीत संध्या का आयोजन हो रहा था। जुबिन गर्ग का हाल ही में सिंगापुर में निधन हो गया था।
आगे थोड़ी ही दूर पर रोप वे था इस पर से ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपर के नजारे को देखा जा सकता था। हम रोप वे की तरफ़ चल दिए।
(उमानंद मंदिर देखने का क़िस्सा यहाँ पढ़ सकते हैं : https://www.facebook.com/share/p/1GCpYEjGEf/)
गुवाहाटी की सड़क पर ट्रैफ़िक के लिए देखें पोस्ट : https://www.facebook.com/share/v/188j3GWVir/
https://www.facebook.com/share/p/1E3T8hJtCb/

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