आज सबेरे ब्लिंकिट से कुछ सामान मंगाया। डिलीवरी करने आए भाई जी साइकिल से आए थे। आमतौर पर डिलीवरी करने वाले लोग बाइक से आते हैं। साइकिल से सामान देने पहली बार कोई आया था।
सामान लेने के बाद हमने कहा -'पिछले पहिए में हवा में कम है।'
वो बोले -' सबेरे कोई दुकान खुली ही नहीं हवा भरने वाली। थोड़ी देर में खुलेगी तो भरवायेंगे।'
हमने कहा -'पंप दें, भर लो हवा?'
वो बोले -'है क्या पंप? दे दीजिए।'
संयोग से पंप तुरंत मिल गया। वो हवा भरने लगे। पंप को छुच्छी में लगाते हुए बोले -'पाँच रुपये बच गए।'
हवा भरने से साइकिल चलाने में होनी वाली सहूलियत पर पाँच रुपये बचने की बात को तरजीह से पैसे के महत्व का एहसास हुआ।
साइकिल में चेन कवर नहीं है। पूछने पर बताया -'लगवाना है।'
हवा भरते हुए बात करते रहे। बताया कि रायबरेली घर है। परिवार गांव में रहता है। दो बच्चे हैं। जुड़वाँ। चौदह साल उमर है। आठवीं में पढ़ते हैं।
हमने कहा -' चौदह साल की उमर के बच्चे! इतनी उमर तो नहीं लगती तुम्हारी। जल्दी शादी हुई होगी।'
बबलू यादव ने बताया -'हाँ, जब हम आठवीं में पढ़ते थे तब माँ नहीं रही। बड़े भाई बाहर रहते थे। घर में कोई खाना बनाने वाला नहीं था। पिताजी ने हमारी जल्दी शादी कर दी। हाई स्कूल में थे जब हमारी शादी हुई। गांव में ऐसा ही होता है।'
हमने पूछा -'तुम्हारा नाम बबलू यादव है। बबलू तो घर के नाम होते हैं। स्कूल में भी यही लिखवाया गया?'
बबलू बोले -'हाँ, स्कूल में भी यही लिखवा दिया। मास्टर साहब ने लिख दिया। वही बना रहा। गांव में ऐसा ही होता है।'
जूते फ़ौज टाइप के थे। पूछने पर बताया बबलू ने कि वे एक जगह सिक्योरिटी दरबान का काम करते हैं। आज छुट्टी थी तो ब्लिंकिट की डिलीवरी करने लगे। आज दिन भर करेंगे। दिन भर करने पर पाँच सौ रुपये तक कमाई हो जायेगी। तीन चार घंटा काम करने पर सौ-दो सौ मिल जाते हैं। शाम को भी ड्यूटी से छुट्टी मिलने पर अक्सर डिलीवरी कर लेते हैं। कुछ कमाई हो जाती है। खाना ख़ुद बनाते हैं।
जल्दी शादी के कारण पढ़ाई छूट जाने और पिछड़ जाने का भी हल्का अफ़सोस जाहिर किया बबलू ने। लेकिन मेहनत की कमाई पर भरोसा बना है।
सबेरे की पहली डिलीवरी थी बबलू की।
हमने पूछा -'नाश्ता किया कुछ सुबह? '
बबलू ने कहाँ -'हाँ चाय पी थी। कुछ नमकीन साथ में खाई थी।'
बबलू चलने को हुए तो हमने कहा -'पानी पी लो।'
बोले -'ठीक है।'
लेकिन हमने ज़बरियन जैसा रोक लिया। रुको कहने के बाद फ्रिज से एक अलसी का लड्डू निकला और ग्लास में पानी भरकर बबलू को दिया। लड्डू Nirupma दीदी बनाकर दे गईं थीं। आजकल ह्यूस्टन में अमेरिका गिरी कर रही हैं।
लड्डू खाकर बबलू ने ग्लास से पानी सीधे न पीकर हथेली का चुल्लू बनाया। हमने कहा ऐसे ही पी लो सीधे। लेकिन बबलू ने पानी चुल्लू से ही पिया। ग्लास जूठा न हो इसलिए चुल्लू से पानी पीते हुए किसी को वर्षों बाद देखा। गांव में ( शहर में भी) एक लोटे से, बिना ग्लास के, कई लोग इसी तरह से पानी पीते थे।
हमने पूछा -'रायबरेली घर है। जाते रहते होगे।'
'हाँ, काम-काज होता है तो जाते हैं। ऐसे भी कभी-कभी चले जाते हैं जरूरत पड़ने पर।'-बबलू ने कहा।
हमने कहा -' गांव में परिवार है। पत्नी है। बच्चे हैं। हर हफ़्ते जाना चाहिए।'
बबलू बोले -' हाँ, लेकिन अब यहाँ काम कर लेते हैं। उमर भी हो गई।'
बबलू चले गए। हम सोच रहे थे कि चालीस साल की उमर का आदमी कह रहा है -'अब उमर हो गई।'
बबलू की यह बात भी याद आई -' गांव में ऐसा ही होता है। '
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