काजीरंगा में 'जीप सफारी' से घूमने के बाद अगले दिन 'एलिफ़ेंट सफारी' से भी घूमने गए। हाथी से जंगल में घूमने का समय सुबह का होता है। हमें पहले सात बजे का समय मिला था। बाद में यह सुबह छह बजे हो गया। सही समय पर पहुँचने के लिए सुबह पाँच बजे जाग गए। सफारी शुरू होने वाली जगह पर समय पर पहुँच गए।
सबेरे का समय था। उजाला अभी हुआ नहीं था। हाथी सफारी की तैयारी हो रही थी। हाथियों के ऊपर हौदे रखे जा रहे थे। हौदों को हाथियों की पीठ पर बाँधा जा रहा था। हाथी पर बैठने के लिए एक ऊँचा प्लेटफार्म बना हुआ था। हाथी के ऊपर हौदा बाँधकर उसको प्लेटफार्म के बगल में खड़ा किया जाता। लोग हाथी के हौदे पर बैठ जाते। एक हाथी पर दो और कुछ पर तीन लोग भी बैठाये जा रहे थे। हाथी पर लोग बैठ जाते तो हाथी आगे बढ़ जाता।
हाथियों पर बैठने के लिए बने प्लेटफार्म देखकर मुझे अपनी फैक्ट्रियों में बने ऊँचे प्लेटफार्म याद आए जो ट्रकों पर सामान लादने के लिए बनाए जाते थे।अपनी बारी आने पर हम भी सामान की तरफ़ लद गए। हौदे पर टांगे इधर-उधर करके बैठे जैसे मोटर साइकिल पर बैठते हैं। मोटरसाइकिल तो कम चौड़ी होती है। लेकिन हौदा काफ़ी चौड़ा होता है। बैठते ही लगा हड्डियाँ बोल जायेंगी। कुछ देर तक जांघ के जोड़ में दर्द होता रहा। बाद में वह सामान्य हो गया।
हाथी पर बैठकर जंगल की तरफ़ बढ़े। अंधेरा अभी भी पूरी तरह छँटा नहीं था। लेकिन उजाला अपनी मौजूदगी दर्ज कर रहा था। हाथी मस्तानी चाल में चलते हुए ऊँची-ऊँची घास के बीच चलते हुए जंगल के बीच पहुँच गए।
कुछ देर में अंधेरा छंट गया। जंगल साफ़ दिखने लगा। जंगल के जानवर आसपास टहलते दिखे। कोई जानवर कपड़े पहने नहीं दिखा। किसी ने गुड मार्निंग नहीं बोला। कोई सुबह की चाय पीते नहीं दिखा। बस उठे और सीधे घास चरने लगे। उनके यहाँ फार्मेलिटी के चोंचले नहीं होते। कोई दिखावा नहीं।
छोटे-छोटे जानवर, हिरण, सुअर के बाद गैंडे दिखे। एकदम पास में। घास चरते हुए गैंडे। गैंडों को पास से देखने के लिए हाथी रोक दिए गए। गैंडों को घास खाते, खाने के बाद जंगल में जाते हुए फ़ोटो/वीडियो बनाते रहे लोग।
गैंडों के साथ हाथी भी दिखे। एक जगह गैंडे और हाथी अगल-बगल घास खाते दिखे। उनके सामने घास लगी हुई थी। ऐसा लगा मानों में 'बफे सिस्टम' में दोनों हाथी और गैंडे साथ-साथ घास खा रहे। उनके यहाँ घास को प्लेट में रखकर खाने का चलन नहीं। सीधे-सीधे मुँह में रखकर घास खाते दिखे दोनों जानवर।
हाथियों पर बैठे लोग आपस में भी एक-दूसरे के फ़ोटो ले रहे थे। ताकि सनद रहे। एक जगह एक हाथी चलते-चलते रुक गया। उसको पेशाब लगी थी। वह खड़े होकर पेशाब करने लगा। जंगल में सुलभ शौचालय नहीं होता। जानवरों के लिए पूरा जंगल ही सुलभ शौचालय होता है।
हाथी को पेशाब करते देखकर लोगों ने उसका वीडियो बनाया। हाथी की निजता का उल्लंघन हुआ लेकिन उसने कोई शिकायत नहीं की। आराम से खड़े-खड़े पेशाब करता रहा। पेशाब करने के बाद वह आगे बढ़ा।
हाथी की देखा-देखी एक गैंडे ने भी जंगल को 'रेस्ट रूम' के रूप में प्रयोग करते हुए अपना पेट साफ़ किया। लोगों ने उसका भी वीडियो बनाया। इंसान का यह व्यवहार मजेदार है। ख़ुद की जिन क्रियाओं को गोपनीय मानता है और उसको किसी के द्वारा छिपकर देखे जाने पर शिकायत करता है, जानवरों की उन्हीं क्रियाओं की खुले आम फ़ोटो खींचता है।
करीब घंटे भर जंगल में हाथी पर टहलने के बाद हाथी वापस लौटे। जंगल से चढ़ाई पर बनी सड़क पर चढ़कर हाथी उसी प्लेटफार्म के पास जाकर खड़े हो गए जहाँ से उन पर लोग बैठे थे। लोग एक-एक करके उतरते गए।
प्लेटफार्म से उतरने के बाद सब लोग बाहर की तरफ़ चले। वहीं एक चाय की दुकान थी। सबने वहाँ खड़े होकर चाय पी। जंगल में सुबह की चाय पीने के यह अच्छा अनुभव था। चाय पीकर हम लोग वापस होटल लौट आए। होटल में खिले हुए फूल मुस्कराते हुए पूछते हुए लगे -'मजा आया काजीरंगा में जंगल सफारी में?'
हम वापस लौटने की तैयारी लग गए। सामान और ख़ुद को तैयार करने लगे।
पोस्ट में फोटो के साथ वीडियो भी संलग्न हैं। देखिए अच्छा लगेगा।
काजीरंगा में जीप सफारी के किस्से यहाँ पढ़ सकते हैं : https://www.facebook.com/share/v/16f3rCvZi6/
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