गुवाहाटी में तीन दिन रहने के दौरान आर्मी के ऑफिसर्स मेस में रहना हुआ। मेस में हमारी देखभाल के लिए नेपाल के रहने वाले मीन बहादुर थापा तैनात थे। उनका परिवार नेपाल में रहता है। छुट्टियों में घर आते-जाते हैं। जल्द ही दो महीने के लिए घर जाने वाले थे। चलते समय हमने उनको बख़्शीस के रूप में कुछ देना चाहा तो उन्होंने विनम्रता पूर्वक, अपने कान छूते हुए, मना कर दिया। हमने उनके साथ फोटो लिए। फिर मिलने के वादे के साथ विदा हुए।
गुवाहाटी के बाद हमारी अगली मंजिल काजीरंगा नेशनल उद्यान थी। काजीरंगा उद्यान एक सींग वाले गैंडों के लिए खास तौर पर प्रसिद्ध है। गुवाहाटी से काजीरंगा क़रीब दो सौ किलोमीटर दूर है। करीब चार घंटे की दूरी। गुवाहाटी से बाहर निकलते हुए कुछ दूर ऐसी सड़क पर चले जिसका एक छोर असम में था तो दूसरा मेघालय में। गाड़ी में पेट्रोल हमने मेघालय में भरवाया। इसके बाद असम में दौड़ने लगी गाड़ी।
रास्ते में हमने एक ढाबे में नाश्ता किया । वहाँ हमको ऐसे मोटरसाइकिल वाले मिले जो अपनी राइड पर वर्मा जा रहे थे।
गुवाहाटी से सुबह चलकर हम दोपहर तक हम काजीरंगा पहुंचे। ठहरने वाली जगह पर पहुंचकर दोपहर बाद की 'जीप सफारी' से हम काजीरंगा उद्यान देखने निकल लिए। बुकिंग केवल हमारी थी लेकिन हमारे जीप चालक मंजॉय पात्रा (Monjoy Patra ) ने हमारे साथ आए हमारे ड्राइवर संजय को भी हमारे साथ 'ढुका 'दिया।
Monjoy Patra के पूर्वज कई पीढ़ियों पहले उड़ीसा से असम आए। काजीरंगा के पास के एक गाँव में बस गए। Mojoy जीविका के लिए मुंबई, कोलकाता और कई जगहों पर अलग-अलग समय रहे। अंत में वापस लौटकर घर आ गए। वापस आने के बारे में अपना अनुभव बताते हुए कहा -"यहाँ पैसे कम हैं लेकिन घर में, अपने घर परिवार के साथ के लोगों के साथ रहने का सुकून तो है।"
सफारी जीप जंगल में घुसते ही लोगों की आंखे जानवर तलाशने लगीं। कहीं कोई जानवर दिखता, जीपें खड़ी हो जातीं। लोग उन जानवरों को देखने लगते। वो दिखा, वो उधर। देखो आगे पानी के किनारे। अरे वो घुस गया जंगल में। सामने आ गया। इसी तरह की बातें करते हुए लोग जंगल में जानवर दर्शन कर रहे थे।
अधिकतर लोगों के हाथों में मोबाइल थे। वे मोबाइल से फोटो ले रहे थे। वीडियो बना रहे थे। कुछ लोगों के हाथों में गन सरीखे बड़े-बड़े कैमरे थे। जहाँ को जानवर या पक्षी दिखता वे अपने कैमरे को उसकी तरफ़ तान देते। एक जगह एक पेड़ पर चील बैठा था। पेड़ के नीचे तालाब के पानी में मछलियों की तलाश में था। हमारे देखते-देखते एक बगुला तालाब से ऊपर आई मछली को झपट्टा मारकर चोंच में दबाकर उड़ता हुआ दूर चला गया। लोग उस उड़ते हुए पक्षी को कैमरे में कैद करने लगे।
जंगल में हिरण कई जगह दिखे। सबसे ज्यादा हिरण ही दिखे। नर हिरण, मादा हिरण। एक सींग वाले, कई सींग वाले। कई जगह पानी के किनारे समूह में घास चरते दिखे हिरण। एकाध जगह पानी के किनारे पेड़ की डाल पर आराम करते कछुए भी दिखे। अलसाये हुए वे पानी किनारे की डाल पर बैठे, लेते जंगल की हवा खा रहे थे। ये वे कछुए थे जिन्होंने प्रसिद्ध खरगोश और कछुए की दौड़ से अपना नाम वापस ले लिया था। पता नहीं उन्होंने कछुए और खरगोश की दौड़ की कहानी सुनी थी कि नहीं, जिसको पढ़कर तमाम इंसानों के बच्चे बड़े होते हैं। हो सकता हैं उनके यहाँ कोई और कहानी प्रचलित हो।
घास के बीच भैंसे, सुअर भी टहलते दिखे। हाथी भी अपने बच्चों के साथ घास के जंगल में टहलते हुए दिखे। एक जगह बड़ा सा अजगर टाइप सांप भी गोल आकार में आरामफ़र्मा दिखा। (बाद में पता चला कि यह अजगर नहीं गोह था)।
जिसके लिए काजीरंगा नेशनल पार्क प्रसिद्ध है वह एक सींग वाला गैंडा सबसे आख़िर में दिखा। वी आई पी की तरह सबसे बाद में उसकी इंट्री हुई। एक बार दिखे तो फिर कई बार दिखे। एक जगह घास खाते हुए गैंडे की पीठ पर एक पक्षी बैठा दिखा। गैंडे को अपनी पीठ पर पक्षी के बैठने से कोई तकलीफ़ नहीं थी। होती भी तो क्या कर लेता ? उसके कोई लंबी पूंछ तो थी नहीं जिससे वह उसे भगा देता। ज़मीन में लोटपोट भी मुश्किल थी उसके लिए। एक बार बैठ जाता तो उठना मुश्किल हो जाता उसका।
करीब दो-ढाई घंटे के जंगल भ्रमण के बाद हम लोग वापस लौटे। वापस आकर एक जगह चाय पी गई। monjoy ने कहा आपको 'मटका चाय' पिलाते हैं। हमने सोचा कि ये 'मटका चाय' कौन सी होती है? पता चला 'कुल्हड़ वाली चाय को मटका चाय कहते हैं यहाँ। अलबत्ता दो दिन बाद हमने शिलांग में घड़े में गरम होती चाय भी पी जिसको सही मायने में 'मटका चाय' कहा जा सकता है।
चाय पीने के बाद हम लोग विदा हुए। शाम हो गई थी। रात में होटल में खाना खाया गया। असमिया शाकाहारी थाली में चावल, खार, दाल, सब्जी, सलाद, भुनी सब्जी, टेंगा,पीटिका और मीठा था। मीठे में खीर थी। बहुत स्वादिष्ट खीर थी। खाकर हमें पाँच नम्बर गुमटी के वैष्णव भोजनालय की खीर की याद आ गई। हमने दोबारा खीर माँगी लेकिन हमको बताया गया कि खीर अलग से नहीं मिलती। और खीर खाना है तो पूरी थाली लेनी पड़ेगी। हमारा पेट भर चुका था। केवल खीर खाने के लिए एक और थाली मंगाने का मन नहीं किया। लिहाजा और खीर खाने की इच्छा को दबाकर भुगतान करके बाहर आ गए।
सुबह हमको हाथी वाली सफारी में भी जाना था।
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