सुबह आराम से निकले। रैपिडो से स्कूटी बुक की। लासन (Lashen) आए हमें लेने के लिए। आते ही हमको हेलमेट थमा दिया। हम हेलमेट पहनकर बैठ गए पीछे। चल दिए डॉन बॉस्को म्यूजियम की तरफ़।
लासन कॉलेज में पढ़ते हैं। पिता मेघालय सरकार के मुलाजिम हैं। लासन ख़ाली समय में जेबखर्च के लिए रैपिडो चलाते हैं। शौक के बारे में पूछने पर बोले -
'फुटबॉल खेलते हैं। वैसे जब भी टाइम मिलता है रैपिडो चलाते हैं।पैसा कमाते हैं। अपनी पसंद की चीजें खरीदते हैं। फुटबॉल खेलने के लिए जूते खरीदने हैं।'
लासन ने यह भी बताया कि रैपिडो के लिए स्कूटी लासन की माँ ने ख़रीदकर दी है। गर्लफ्रेंड के बारे में पूछने पर बताया कि उनकी कोई गर्ल फ्रेंड नहीं है। बहुत खर्चीला शौक है गर्लफ्रेंड बनाना। उपहार और दीगर खर्चों के लिए इंतजाम करना पड़ता है। शिलांग में यह पहला युवा मिला मुझे जिसकी कोई सहेली नहीं थी।
शिलांग की सड़कों पर ट्रैफिक का नजारा देखने को मिला। सड़क के दोनों तरफ़ कारों/चौपहिया वाहनों की लंबी कतारें। लोग आगे की गाड़ी बढ़ने का इंतज़ार कर रहे थे। कोई भी आगे की गाड़ी को ओवरटेक करने की कोशिश करते नहीं दिखा। सड़क के दो छोरों पर खड़ी कारों के बीच से दुपहिया वाहन सटासट-सटासट निकलते रहे।
हमारे देखते एक एंबुलेंस हार्न बजाते हुए पीछे से आई। सबने उसको रास्ता दिया। एंबुलेंस गाड़ियों की भीड़ में वीआईपी की तरफ़ निकल गई। शिलांग का ट्रैफ़िक सेंस ग़ज़ब का है।
शिलांग की लहरियादार सड़कों पर लासन स्कूटी तेज लहराते हुए चला रहे थे। हर मोड़ पर मुझे लगता कि गाड़ी कहीं फिसल न जाये। शिलांग में आते ही स्कूटी से फिसलने की याद ताजा हो जाती। हम लासन से कहते -'मोड़ पर गाड़ी आहिस्ते चलाओ।' वह हँसते हुए गाड़ी धीमी कर देता लेकिन अगले मोड़ पर फिर वही 'जेन जी ' वाली स्पीड। हमारी 'गाड़ी वाले गाड़ी धीमी हाँको जी' की अपील को नकारकर वह गाड़ी चलाता रहा। करीब आधे घंटे बाद हम डॉन बास्को म्यूजियम पहुँच गए।
हमने लासन का नंबर ले लिया। तय किया कि शहर के बाक़ी बचे हुए हिस्से म्यूजियम देखने के बाद देखने चलेंगे। पैसे के बारे में पूछने पर लासन ने कहा -'पूछकर बतायेंगे कि कितने पैसे पड़ेंगे।' लासन चला गया। हम म्यूजियम के प्रांगण में दाखिल हो गए।
टिकट काउंटर पर टिकट लिया। सौ रुपए टिकट। चाय भी उसी बगल के काउंटर पर मिल रही थी। धूप में बैठकर पहले चाय पी। चाय पीते हुए फोटो खींचने का अनुरोध करने पर टिकट बेचने वाले बुजुर्ग काउंटर से निकलकर बाहर आये। हमारी फ़ोटो खींची और वापस काउंटर के पीछे खड़े हो गए। एक ही आदमी टिकट बेचने, चाय बेचने और अनुरोध पर फ़ोटो खींचने का काम भी कर रहा था।
चाय पीने के बाद म्यूजियम के अंदर घुसे तो सुरक्षा के लिए तैनात आदमी हमको वीआईपी की तरह गैलरी से होते हुए अंदर की तरफ़ ले गया। गैलरी के झरोखों में उत्तर-पूर्व के लोगों की मूर्तियां लगी हुईं थीं। गैलरी से गुज़रकर हम अंदर मुख्य काउंटर पर पहुंचे। हमें बताया गया कि अगर फ़ोटो खींचना है तो सौ रुपए का कूपन और भी ले लीजिए। बिना अनुमति फोटो लेने पर फ़ाइन पड़ेगा। हमने सौ रुपए भुगतान करके फोटो खींचने का अधिकार हासिल कर लिया और म्यूजियम देखने घुसे।
म्यूजियम सात मंजिला है। दो मंजिल नीचे पाँच मंजिल ऊपर। सबसे नीचे की मंजिल से मंजिल से म्यूजियम देखने की शुरुआत की।
म्यूजियम में भारत के पड़ोसी देशों के विवरण और फोटो लगे हुए थे। भूटान, चीन, बांगलादेश, वर्मा और नेपाल का जिक्र था पड़ोसी देशों के रूप में। लेकिन पाकिस्तान का नाम नहीं था वहाँ। शायद पाकिस्तान को पड़ोसी देश नहीं मानते म्यूजियम वाले।
म्यूजियम में उत्तर-पूर्व के लोगों के बारे में, जनजातियों, रहन-सहन, संस्कृति, पहनावा, ख़ान-पान, खेती, घर-बार, शकल सूरत, बनावट, गहने, त्योहार, शिकार के तरीके, हथियार आदि तमाम विवरण अलग-अलग मंजिलों पर मौजूद थे। इसके अलावा देश के विज्ञान, स्पेस और प्रमुख क्षेत्रों से जुड़ी उपलब्धियों का विवरण था। मानव सभ्यता के विकास के बारे में भी जानकारी दी थी। एक कक्ष में ईसाई धर्म के बारे में शुरुआत से लेकर अभी तक की जानकारी दी थी। डॉन बास्को समूह का पूरा विवरण भी संजोया हुआ था वहाँ। डॉन बास्को स्कूल की गतिविधियों का विवरण भी दिया हुआ था।
म्यूजियम इस तरह बना था कि एक कमरे के बाद दूसरे पर पहुँचते जाते। रोशनी का इंतजाम ऐसा कि कमरे में घुसते ही रोशनी जल जाती। किसी के न रहने पर रोशनी बंद हो जाती। हर मंजिल पर शौचालय की व्यवस्था। आराम से देखते हुए क़रीब घंटे भर में हमने पूरा म्यूजियम देख डाला। हर कक्ष में देखने के साथ वहाँ के फोटो लेते, वीडियो बनाते। हमारा मोबाइल म्यूजियम के फोटो से भर सा गया।
म्यूजियम में एक बर्तन धोने के उपकरण का जिक्र किया था। PRIMAVERA नामक यह उपकरण हाल के दिनों तक डॉन बास्को समुदाय की Salesian Sisters द्वारा खाने के बाद अपने बर्तन धोने के काम में उपयोग किया जाता था। Sr Ciceri Chiara (1884-1963) द्वारा विकसित एल्मुनियम का यह उपकरण खाने के मेज़ पर रखा रहता। खाने के बाद इसे सबके सामने रख दिया जाता जिसमें लोग अपने बर्तन Salesian Sisters साफ़ कर लेतीं। PRIMAVERA नाम से जुड़ी कहानी का जिक्र संबंधित फोटो में किया है।
म्यूजियम की पाँचवी मंजिल पर म्यूजियम के स्टाफ़ के बैठने की जगह है। चौथी मंजिल पर कैफेटेरिया है। कैफेटेरिया में चाय, कॉफ़ी और नाश्ते का सामान मिलता है। दाम भी सामान्य। किफायती।
कैफ़े के काउंटर पर मौजूद महिला कर्मचारी Berna से बातचीत हुई। नाम का मतलब पूछने पर उसने संत बताया। लेकिन अभी नेट पर खोजने पर Berna का मतलब Brave as bear भालू की तरह बहादुर।
नामों के मतलब अलग-अलग हो सकते हैं। अपने नाम अनूप का मतलब हम 'अनोखा, जिसके कोई उपमा न हो' समझते रहे बताते रहे। इसी बात का उल्लेख करते हुए हमने एक जगह टिप्पणी की तो हमारे नाम राशि Anup Sethi जी ने बताया कि वे भी इसी भ्रम में रहे जिंदगी भर लेकिन अनूप का एक और मतलब भी होता है। अनूप सेठी जी ने जो एक और मतलब बताया अनूप नाम का वह हम यहाँ नहीं बतायेंगे। क्यों अपने नाम के ख़राब मतलब का प्रचार किया जाये।
Berna ने बताया कि वे पिछले पंद्रह साल से म्यूजियम में काम कर रहीं हैं। उनके दो बच्चे हैं। शादी के पहले पाँच साल तक 'प्रेम प्रसंग' चला इसके बाद शादी हुई। शादी के पहले 'प्रेम प्रसंग' यहाँ का आम चलन है क्या यह पूछने पर Berna ने कहा -' जान पहचान और मेल मिलाप आम चलन है। दोनों के आपस में रिश्ते और व्यवहार कैसा यह है दोनों के बीच की समझ और सहमति पर निर्भर करता है।'
मेरी राय शिलांग और मेघालय के बारे में पूछने पर मैंने यहाँ के लोगों की तारीफ़ की तो Berna का चेहरा खिल गया। इसके बाद उसने मुझसे वही सवाल किया जो यहाँ के हर इंसान ने बातचीत शुरू करते हुए पूछा -' अकेले घूमने क्यों आए?' हमने कहा -'हमको हमारे घर वालों ने देखने के लिए भेजा है कि घूमने लायक़ है कि नहीं शिलांग। अब सब लोग साथ आयेंगे।' इस पर Berna हँसते हुए बोली -' जरूर आइए अपने परिवार के साथ।'
Berna के आगे की तरफ़ काढ़े गए बाल के बारे में मैंने पूछा -'क्या यह स्टाइल यहाँ चलन में है? ' इस पर वह हँसते हुए बोली -' नहीं, ऐसे ही। मुझे ऐसा बाल काढ़ना अच्छा लगता है।'
इस बीच Berna का ड्यूटी का समय पूरा हो गया। उनकी जगह काम करने दूसरी महिला स्टाफ आ गई। हमने दोनों के साथ भी फोटो लिया। Berna अपना बैग उठाकर चल दी। हम भी अपनी चाय उठाकर सामने बनी बेंच पर बैठकर चाय पीते हुए डॉन बास्को म्यूजियम की चौथी मंजिल से शिलांग को देखते रहे। दूर -दूर तक शिलांग के घर दिख रहे थे।
इस बीच एक बार रैपिडो बालक लासन का फ़ोन आ चुका था। हमने उससे कहा था कि हम ख़ाली होने के बाद फ़ोन करेंगे। हमने फ़ोन किया तो उसने दस मिनट में आने के लिए कहा। हम नीचे आ गए। ग्राउंड पर मौजूद काउंटर पर अपना परिचय पत्र जमा किया और वहाँ मौजूद दुकान से फटाफट कुछ ख़रीददारी की। ख़रीद में वहाँ के कुछ बैग, माला आदि थीं। कैलेंडर मुफ्त में मिला। चाय भी खरीदने की सोची थी लेकिन बाद में भूल गए। पैसे बचने की ख़ुशी के साथ शिलांग की चाय साथ न ला पाने का अफ़सोस भी है।
म्यूजियम से बाहर आकर लासन का इन्तज़ार किया। बालक जल्दी ही आ गया। उसने बताया कि इस बीच वह पास ही रहने वाली अपनी बहन के यहाँ चला गया था। वहाँ से खाना खाकर आया है। हमने तय किया कि हम लोग शिलांग व्यू प्वाइंट और दो गिरजाघर देखने जायेंगे। शिलांग व्यू प्वाइंट करीब बीस किलोमीटर दूर था। घंटे भर की दूरी बता रहा था। सब मिलकर करीब चार-पाँच घंटे लग जाने थे घूमने में। इसके लिए लासन ने कहा -'आठ सौ रुपए पड़ेंगे।' हमने कहा -'ठीक है। चलो।'
लासन ने हमको अपनी स्कूटी से निकालकर हेलमेट थमाया। हम हेलमेट सर पर धारण करके उचककर पीछे बैठ गए। चल दिए शिलांग व्यू प्वाइंट देखने।
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