Saturday, February 07, 2026

कामख्या देवी मंदिर

 


गुवाहाटी में दर्शनीय स्थलों में सबसे प्रमुख कामख्या देवी मंदिर है।

धर्मस्थलों में मेरी रुचि पूजा-पाठ के हिसाब से कभी नहीं रही। कानपुर के उन मंदिरों में भी कभी अंदर जाकर पूजा करने का मन नहीं होता जहाँ दर्शन करने लोग दूर-दूर से आते हैं।ra
गुवाहाटी के कामख्या मंदिर के साथ भी ऐसा ही भाव था। पूजा के हिसाब से नहीं लेकिन एक ऐसे स्थल के रूप में देखने का मन था जिसके प्रति अनगिनत लोगों की आस्था है। जिसके दर्शन करने दूर-दूर से लोग आते हैं।
मंदिर के दर्शन के लिए भीड़ बहुत होती है। मुफ्त दर्शन में दिन भर लाइन में लगकर दर्शन करने में पूरा दिन लग जाता है। वीआईपी दर्शन के लिए आनलाइन बुकिंग की व्यवस्था है। पाँच सौ रुपए फीस। बुकिंग के लिए साइट खोली तो पता चला कि अगले सात दिन तक सब सीटें फुल हैं। दर्शन के लिए ऑनलाइन बुकिंग उपलब्ध नहीं थी। हमने सोचा कोई बात नहीं। बाहर से ही मंदिर, माहौल और भक्तों को देखकर लौट आयेंगे।
लेकिन जब हमारे मेजबानों को मेरी दर्शन की इच्छा की जानकारी हुई तो मेरे लिए दर्शन का इंतजाम किया गया। तय हुआ कि सुबह दर्शन करने जायेंगे।
गुवाहाटी के पास नीलांचल अथवा नीलशैल पर्वतमालाओं पर स्थित मां भगवती कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ सती के इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। कामाख्या मंदिर की असली कहानी देवी सती के योनि भाग से जुड़ी है, जहाँ भगवान शिव सती के शरीर को ब्रह्मांड में ले जा रहे थे, तब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर सती का योनि भाग असम के नीलांचल पर्वत पर गिरा, और इसी स्थान पर कामाख्या देवी के रूप में योनि (गर्भ) की पूजा होती है।
पौराणिक संदर्भों के अनुसार अम्बूवाची पर्व ( यह कामाख्या मंदिर का सबसे प्रमुख वार्षिक उत्सव है, जो हर साल जून (आषाढ़ मास) में मनाया जाता है) के दौरान माँ भगवती रजस्वला होती हैं और मां भगवती की गर्भ गृह स्थित महामुद्रा (योनि-तीर्थ) से निरंतर तीन दिनों तक जल-प्रवाह के स्थान से रक्त प्रवाहित होता है। इस पर्व के दौरान मां भगवती के गर्भगृह के कपाट स्वत ही बंद हो जाते हैं और उनका दर्शन भी निषेध हो जाता है।
कामाख्या देवी के कई अन्य नाम और रूप हैं, जिनमें मुख्य रूप से कामेश्वरी, काली, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, और कामाक्षी शामिल हैं, जो उनके विभिन्न स्वरूपों और तांत्रिक परंपराओं से जुड़े हैं, लेकिन 'कामाख्या' स्वयं ही 'इच्छा की देवी' का रूप है और इस स्थान को कामरूप भी कहते हैं, क्योंकि यहीं कामदेव को नया रूप मिला था।
कामरूप में मातृसत्तात्मक समाज होने के कारण यहाँ की महिलाओं द्वारा पुरुषों का रूप परिवर्तन करके अपने वश में कर लेने के किस्से भी प्रचलित हैं।
मंदिर दर्शन करने के लिए हम सुबह नहा-धोकर पहुँचे। पहाड़ी पर स्थित मंदिर के आसपास पूजा के सामान , प्रसाद , ख़ाने-पीने की दुकानें थीं। दूर-दूर से लोग दर्शन करने लोग आए हुए थे। मंदिर प्रांगण के सामने भक्त लोग दर्शन के लिए अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। मंदिर के आसपास भक्तों की भारी भीड़ थी। मंदिर से जुड़े लोग वहीं आसपास मंदिर की व्यवस्था में जुटे हुए थे।
लोग दर्शन के लिए अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए या दर्शन के बाद बाहर निकलकर मंदिर के सामने खड़े होकर फ़ोटो खिंचा रहे थे। लोग परिवार सहित दूर-दूर से दर्शन करने आए हुए थे।
मेरे देखते हुए मुंबई से आया एक युवा जोड़ा दर्शन करके निकला। लड़की मंदिर के सामने खड़े होकर फ़ोटो खिंचा रही थी। लड़का फ़ोटो खींच रहा था। लड़की जगह-जगह खड़े होकर अलग-अलग पोज में फोटो खिंचा रही थी। इसके बाद वीडियो कॉल करके अपने घर में बात करके मंदिर दिखाया। अपनी फ़ोटो खिंचाने के बाद लड़की ने अपने लड़के के फोटो खींचे। लड़का एकाध पोज में फ़ोटो खिंचाने के बाद झुंझलाने लगा। लड़की उसकी फोटो खींचना चाहती था। लड़के का मन नहीं था।
काफ़ी देर तक उनकी फ़ोटोबाजी देखने का बाद हमने उनसे कहा -'लाओ तुम लोगों का साथ में फ़ोटो खींच दें।' दोनों खुशी-ख़ुशी तैयार हो गए। साथ में खड़े हो गए। फोटो खींचते हुए हमने लड़के से कहा -'झुँझलाओ मत यार। तसल्ली से फ़ोटो खिंचवाओ।' लड़का सहज हुआ। हमने तीन-चार अलग-अलग पोज में उनके फोटो खींचे। फोटो देखकर वे दोनों खुश हो गए। कुछ देर और वहाँ रहकर वे चले गए।
मंदिर प्रांगण के चारों तरह कबूतर, बकरी आदि टहल रहे थे। एकाध बिल्लियाँ भी दिखीं। सिंदूर लगे सफेद कबूतर सुंदर लग रहे थे। कुछ छुटकी बकरियां भी टहलती दिखीं। कामख्या देवी मंदिर में पशुओं की बलि दी जाती है। स्वस्थ बकरियां वहाँ बेफिक्री से टहल रहीं थे। मानों उनको अभयदान मिला हो। पता चला यहाँ नर (male) बकरों और भैंसों की बलि दी जाती है। यहां मादा (female) जानवरों की बलि पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके अतिरिक्त, ऐसे जानवर जो बीमार, कमजोर या शारीरिक रूप से दोषपूर्ण (विकलांग) हों, उनकी बलि नहीं दी जाती है; केवल स्वस्थ पशुओं को ही स्वीकार किया जाता है।
जिन पंडित जी के माध्यम से हमारे दर्शन की व्यवस्था कराई गई थी उनको फ़ोन किया तो पता चला कि वे मंदिर में पूजा का इंतजाम करा रहे थे। आधे घंटे बाद आने के लिए कहा उन्होंने। हम इंतज़ार करते रहे। घंटे भर इंतजार करते रहे।
मंदिर के सामने लगे डिजिटल बोर्ड में दर्शन करने वाले लोगों की संख्या दर्शाई जा रही थी। दस बजे तक 1418 लोग दर्शन कर चुके थे।
मंदिर के अहाते में कई भक्त लोग कॉपियों में कुछ लिखते हुए बैठे थे। नाम-जप जैसा कुछ। पास में ही एक बाबा जी अपना श्रृंगार करते हुए मोबाइल में अपनी शक्ल देख रहे थे। आसपास से गुजरते लोग भक्तिभाव से मंदिर में टहल रहे थे। फोटो खिंचा रहे थे।
हमने भी मंदिर के फ़ोटो अपने घर वालों को भेजे। वीडियो कॉल करके उनको मंदिर के प्रांगण के दर्शन कराये। घर के लोगों ने हमारे मजे लेते हुए (जो ख़ुद कभी मंदिर नहीं जाता वह हमको मंदिर के दर्शन करा रहा है) मंदिर के बाहर से ही दर्शन किए।
काफ़ी देर इंतज़ार के बाद पंडित जी आए। हमको अंदर ले गए। हम दर्शनार्थी भक्तों की लाइन में लग गए। लाइन आहिस्ते-आहिस्ते आगे बढ़ रही थी।
मंदिर के अंदर जाने पर देवी की मूर्ति दिखी। उसके आसपास पुजारी लोग भक्त लोगों को पूजा करा रहे थे। शायद यह स्पेशल पूजा थी। देवी की मूर्ति देखकर हमको लगा कि शायद यही मुख्य मूर्ति है। इसी की पूजा होती है। लेकिन बाद में पता कि मुख्य पूजा स्थल आगे, नीचे है।
आगे बढ़ने पर जगह सँकरी और अँधेरी होती गई। दीवारों पर मूर्तियां बनी हुई थीं। अलग-अलग अंदाज में। दीवार में दो सांपों की एक-दूसरे से जीभ लड़ाते हुए मूर्ति बनी हुई थी। नीचे जाने पर अँधेरा और घना हो गया। आगे बढ़ने पर एक और रास्ते से आते हुए लोग दिखे।
नीचे जाने पर मुख्य पूजा स्थल पर पुजारी जी बैठे हुए देवी जी की मूर्ति के आसपास बिखरे जल को लोगों को स्पर्श करा रहे थे। भक्तों के माथे पर देवी की मूर्ति का सिंदूर लगा रहे थे। देवी जी को प्रणाम करके हम बाहर निकल आए।
बाहर आकर हमने फिर मंदिर के सामने फोटो खिंचाये। आगे एक जगह दीपक और अगरबत्ती जला रहे थे लोग। हमने भी दीप जलाया। अगरबत्ती सुलगाई। अगरबत्ती जलाते हुए मेरी जैकेट में अगरबत्ती छू गई। जैकेट सुलग गई। अगरबत्ती के साइज का छेद हो गया जैकेट में। यह यादगार लेकर हम वापस लौटे मंदिर से।
आगे एक जगह पशुओं की बलि का स्थल था। एक मासूम सा बकरी का बच्चा बलि के लिए ले जाया जा रहा था। उसके गले में बढ़ी रस्सी उसकी बलि देने वाले आदमी के हाथ में थी। उसको पता नहीं था कि कुछ देर बाद उसकी बलि दे दी जायेगी। वह निश्चिंत भाव से इधर-उधर देखते हुए मटक रहा था। वहीं आसपास स्वस्थ, मोटी -ताजी बकरियां , अभय मुद्रा में, निश्चिंत भाव से बिना रस्सी के टहल रहीं थीं ।
मंदिर के आसपास बनी सीढ़ियों में दर्शनार्थी लोग अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। पटना से आए हुए कुछ लोगों ने बताया -' हज़ार किलोमीटर दूर पटना से यहां दस घंटे में आ गए। लेकिन मंदिर में दर्शन में बारह घंटे से ऊपर लग गए।'
मंदिर की सीढ़ियो पर एक बिल्ली गुनगुनी धूप सेंकती हुई तसल्ली से भक्तों को देख रही थी। हम भी उस बिल्ली को देखते हुए आगे बढ़े। बिल्ली का फ़ोटो खींचा। उसने एतराज नहीं किया। हमको तसल्ली से देखती रही।
वहीं मंदिर में एक बाबा जी लेटकर परिक्रमा करते दिखे। वे पहले सीढ़ियों में और बाद में मंदिर प्रांगण में लेट जाते। हाथ में पकड़ी हुई लकड़ी से ज़मीन पर निशान बनाते जाते । इसके बाद लकड़ी से बनाए हुए निशान के आगे फिर लेट जाते और फिर लकड़ी से निशान बनाते। इस तरह परिक्रमा करते हुए वे आगे बढ़ रहे थे। लोग उनके चरण स्पर्श कर रहे थे।
हमने उनसे बात की तो पता चला कि वे मुजफ्फरपुर, बिहार के रहने वाले हैं। राघवेंद्र कुमार चौधरी नाम है। घर में पत्नी और बेटा हैं। वे नवरात्रि और अमावस्या में इसी तरह देवी के मंदिर की परिक्रमा करते हैं। बात करते-करते वे लेटकर हाथ में ली हुई लकड़ी से सर के आगे निशान बनाते। खड़े होते। जहाँ निशान बनाया था वहाँ पैर रखकर लेट जाते और हाथ की लकड़ी से फिर निशान बनाते। इस तरह उनकी परिक्रमा जारी रही। हम आगे बढ़ गए।
आगे उज्जैन , महाकालेश्वर से आए हुए दंडी बाबा समाधि मुद्रा में बैठे थे। शरीर पर भभूत लगाए, हाथ में गदा थामे हुए दंडी बाबा का फ़ोटो खींचकर हम बाहर निकल आए। बाहर आकर देखा तो बारह बजे तक कुल 1590 लोग दर्शन कर चुके थे।
मंदिर से वापस लौटते हुए रास्ते में एक बाबा जी सड़क पर खड़े हुए हड़काऊ मुद्रा में दान देने की अपील कर रहे थे। लेकिन हम उंनके प्रभाव में नहीं आए। कामख्या देवी के दर्शन से हममें भी शक्ति आ गई थी। हम उनको बगलियाकर आगे बढ़ गए। आगे हमारी गाड़ी हमारा इंतजार कर रही थी। हम गाड़ी में बैठकर वापस लौट लिए।

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