Friday, February 13, 2026

पैर में लिपस्टिक


 आज सुबह दूध लेने गए। दुकान कालोनी के पास ही है। आम जरूरत का सामान मिल जाता है दुकान में । दुकान पर पहुंचकर दूध के लिए बोला।दुकान वाले भाई हमसे पहले वाले ग्राहक को निपटा रहे थे। इंतजार में खड़े हो गए।

हमको बगल में खड़े देख दुकान पर पहले से खड़ी महिला ग्राहक ने मुझे अवांछित आइटम की तरह देखा। पहली बार उसका देखना मुझे घूरना लगा। बाद में लगा कि वह मुझे घूर नहीं बस देख ही रही थी। उनके चेहरे पर थोड़ी नाराजगी सी लगी मुझे । ऐसे मुझे लगा लेकिन क्या पता वह उनका सामान्य अंदाज़ हो। हम दूसरे के चेहरे के भाव अपने हिसाब से ग्रहण करते हैं न।
मुझे देखे जाने के जवाब में मैने भी महिला को देख देखा। पहले चेहरे पर और फिर निगाह पैर की तरफ गई। पैर में चमकदार गुलाबी 'लिपस्टिक' लगी थी। 'पैर में लिपस्टिक' पढ़कर किसी को ताज्जुब हो सकता है। हमको भी हुआ। मुझे पता है कि पैर के नाखून में लिपस्टिक नहीं नेल पॉलिश लगाती हैं महिलाएं। लेकिन सुबह मुझे सबसे पहले मुझे लिपस्टिक ही याद आई। मौके पर सही शब्द अक्सर याद नहीं आता। अक्सर होता है यह मेरे साथ। आपके साथ भी होता होगा। हो सकता है कुछ और होता हो।
सही समय पर सही बात/चेहरा/नाम/शब्द याद न आने को भूलने की बीमारी कहा जाता है। आज अखबार में पढ़ा कि नई भाषाएं सीखने से भूलने की बीमारी पर अंकुश लगाया जा सकता है। तय किया कि स्पेनिश और उर्दू का अभ्यास दुबारा शुरू करेंगे। लेकिन यह बात भी अक्सर भूल ही जाती है।
दूध लेकर वापस लौटे। दो लीटर दूध के 138 रुपए हुए। मतलब एक लीटर का 69 रुपया। आधे-आधे लीटर के पैकेट लेते दो रुपये और लगते। आजकल दूध में मलाई की पर्याप्त मात्रा देखकर लगता है कि कहीं नकली दूध तो नहीं पी रहे। हालांकि मलाई से घी बनाया जाता है तो लगता है ठीक ही होगा दूध।
कल किसी रील में सुनी हुई बात याद आई कि स्वस्थ रहने के लिए सारी सफेद चीजें छोड़ देनी चाहिए - चीनी, चावल, नमक, मैदा और तमाम सफेद चीजें। तसल्ली हुई कि रील बनाने वाले ने सफेद झूठ से परहेज के बारे में कुछ नहीं कहा।
लौटते हुए कालोनी का कूड़ा बटोरने वाले मिले। बालक कृष्णा ने हमारे घर की सफाई में काफी सहायता की थी। हमने उससे हाल - चाल पूछे तो साथ में गीता बोली - " हम कहती रहन कृष्णा ते कि तुम्हार अंकल नाई दिखे बहुत दिन ते। दिखात तौ चाय पानी करवावात।" (मैं कह रही थी कृष्णा से कि तुम्हारे अंकल नहीं दिखे बहुत दिन से। दिखते तो चाय-पानी करते) हमने कहा -" घर तौ पता है। चली अवतिऊ । चलो अबही पियो चले चाय। (घर तो पता है। चली आती। चलो अभी पियो चल कर चाय)"
गीता बोली - " अब और कौनों दिना आईबे। अभय छुट्टी का टाइम हुई गवा।"
खड़े खड़े बात होती रही। पता चला गीता मौरावां की रहने वाली है। इंद्र अवस्थी Indra Awasthi के गांव की। मौरावां के कई किस्से याद आए। कहा जाता है कि मौरावां का रावण कभी नहीं मरता। हमने यह बात कही तो गीता बोली - "रावण तौ हर साल मरत है हुआं।" हमने उनको रावण के न मरने की कथा नहीं सुनाई।
कृष्णा उन्नाव जिले के मोहान कस्बे के रहने वाले हैं। लेकिन उनको हसरत मोहानी के बारे में पता नहीं। सुबह से दोपहर तक काम में जुटे रहने वाले कृष्णा को कोई काम, जैसे कि ड्राइविंग, सीखने की सलाह दी जिसे वह करते हुए अपनी कमाई में इजाफा कर सके। उसने मेरी बात उसी तरह सुनी जिस तरह मन की बात को देश के बच्चे सुनते होंगे।
पता चला उनको कूड़ा उठाने के आठ हजार रुपए महीने के मिलते हैं। इस महीने की तनख्वाह अभी तक नहीं मिली है। ऐसा अक्सर होता है।
मुझे याद आया कि फैक्ट्री में कामगारों का वेतन दस तारीख तक हर हाल में भुगतान करना संस्था प्रमुख की जिम्मेदारी होती थी। एक बार कुछ तकनीकी कारणों से बैंक वाले खातों में पैसा नहीं भेज पाए तो हमारे हाल कई घंटे बेहाल रहे। यूनियन की तरफ से कोई बवाल न हो इसके लिए देर तक बातचीत की।
असंगठित क्षेत्रों के कामगारों का कोई माई बाप नहीं होता। वेतन अक्सर लेट हो जाता है। अक्सर ठेकेदार पैसे दबा भी लेता है।
हाल के दिनों में श्रम कानूनों में तमाम संशोधन हुए हैं पता नहीं उन पर यूनियन के लोगों में प्रतिक्रिया कैसी है?
चलते समय फोटो ली। गीता बोली - "हमार तौ दिन भर फोटो खिंचत रहत है। हर आधा घंटा मां फोटो। कहां हौ, का करि रहे हौ? जित्ता काम नहीं, ओहते जादा फोटू।" (हमारी तो दिन भर फ़ोटो खिंचती रहती है। हर आधे घंटे में फोटो। कहाँ हो, क्या कर रहे हो? जितना काम नहीं उससे ज़्यादा फ़ोटो।)
गीता को उनकी फोटो दिखाई तो बोली -" बढ़िया नाई आई।" (अच्छी नहीं आई)
हमने दुबारा ली फोटो। इस बार साथ में दूसरी कामगार की भी ली फोटो। बोली -" हां, या वाली बढ़िया आई है।"
साथ वाली महिला का नाम पूछा तो उन्होंने बताया -" श्रीमती।"
हमने पूछा - " कुछ तो नाम होगा श्रीमती के आगे।"
बोली -" नहीं। यही हमारा नाम है। पूरा नाम।"
हम ताज्जुब करते रहे कि ऐसा कैसा नाम? श्रीमती। लेकिन उन्होंने बताया कि हमारा यही नाम है।
हमको कानपुर में गंगा पुल पर हुई एक बातचीत याद आई। एक महिला ने कहा था - " हमार नाम हेरा गा है।" (हमारा नाम खो गया है)
हम वापस लौट आए। सोचते हुए कि फिर कभी मुलाकात हुई तब पूछेंगे कि बचपन में श्रीमती नाम कैसे रखा गया होगा।
1. मौरावाँ जहाँ का रावण कभी नहीं मरता : https://www.facebook.com/share/p/1Gsmnr1SGU/
2. नाम कुछ नाईं है हमार, नाम हेरा गा है: https://www.facebook.com/share/p/1BszdLvcQN/

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