Wednesday, February 18, 2026

अख़बार में ख़बरें


 आज अखबार की शुरुआत खबरों से हुई। शायद विज्ञापन कम मिले आज के लिए। कभी टाइम्स ग्रुप के सर्वेसर्वा की कही बात याद आई -"हम विज्ञापन से बची हुई जगह पर ख़बरें छापते हैं।"

अख़बार में पहले पेज पर देश/प्रदेश के नामचीन लोगों से जुड़ी ख़बरें होती हैं। उनके बयान होते हैं। दैनिक जागरण के पूर्व संपादक नवीन जोशी जी ने एक बातचीत में बताया कि आजकल शाम को अखबारों के पास सरकार से जुड़े कार्यालयों से खबरों की सूची आती है। ये छापना है, ये नहीं छापना है।
अख़बार में लोगों के आँय - बाँय -साँय बयान पढ़कर लगता है कि काश इनकी जगह भी विज्ञापन छपते तो बेहतर होता।
आज स्वयं सेवक सर संघ संचालक जी ने आव्हान किया -'हिंदू परिवार के कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए।' मजेदार बात है यह भी। आए दिन कोई भी धर्माचार्य ,ख़ुद गृहस्थ जीवन से दूर रहते हुए , अपनी-अपनी क़ौम के लोगों के लिए बच्चे पैदा करना का लक्ष्य निर्धारित कर देता है। कोई बाबा कहता है चार बच्चे पैदा करो, कोई कहता है पाँच से कम बच्चे पैदा करोगे तो क़ौम ख़तरे में पड़ जायेगी। लेकिन लगता है कि देश के लोग इनकी बात मानते नहीं है। तमाम युवा देर से शादी कर रहे हैं। कुछ बच्चे पैदा करने के मूड में नहीं है।
टूटते संयुक्त परिवार, बढ़ती समस्याओं और तमाम दीगर परेशानियों के चलते बच्चे पैदा करना और पालना कितना कितना कठिन काम है यह वही जानते हैं जो इसके काबिल और इस काम में सहयोग दे सकते हैं। जिनको बच्चे पैदा करना नहीं है वे इसका लक्ष्य निर्धारित कर रहे हैं। 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे'।
कुछ अगल-बगल छपी खबरें होती हैं जिनको देखकर लगता है कि वे एक दूसरे से मजे ले रही हैं। आज दैनिक हिन्दुस्तान की एक खबर का शीर्षक था -'परीक्षा को उत्सव की तरह लें, भय और तनाव से दूर रहें' उसके बगल में सटी हुई ख़बर है ' कीलें निकली बेंचों पर बैठना छात्रों के लिए इम्तहान।'
दोनों खबरों को मिलाकर पढ़ें तो लगेगा -' कीलें निकली बेंचों पर बैठकर इम्तहान देते हुए परीक्षा को उत्सव की तरह लें, भय और तनाव से दूर रहें।'
एक खबर में बताया गया कि लखनऊ के होटलों में बैठकर डिजिटल अरेस्ट का काम अंजाम करने वाले पकड़े गए। होटल में ऑफिस का सेटअप तैयार करके पुलिस की वर्दी में लोगों से संपर्क करके डिजिटल अरेस्ट करते हुए उनसे पैसे बसूलते थे।
डिजिटल अरेस्ट की खबरों में आता है कि कैसे पुलिस की वर्दी में अपराधी लोगों से पैसा उगाहते थे। लोग वर्दी के डर से पैसा दे देते हैं। इससे समाज में पुलिस के आतंकी छवि का अन्दाज़ा लगता है। पुलिस मतलब बवाल। पुलिस महकमें में तमाम अच्छे , मानवीय, सेवा भाव वाले लोग हैं/होंगे लेकिन एक विभाग के रूप में पुलिस की छवि डरावनी ही बनी हुई है।
पुलिस के साथ-साथ अदालत की इमेज भी ऐसी है कि वाहन गए तो बवाल ही है। तमाम चेतावनियों के बावजूद लोग इस शिकंजे में फँस रहे हैं। रोज़ लोगों के डिजिटल अरेस्ट के शिंकजे में फँसने की खबरें आती हैं।
तकनीक के दुरुपयोग, पुलिस और अदालत के डर तथा लोगों की अज्ञानता का फ़ायदा उठाकर लोगों को लूटते लोग 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम को अपने हिसाब से अंजाम दे रहे हैं।
'विदाई कराने पहुंचे दामाद की चाकू से गोदकर हत्या' की खबर बताती है कि समाज में प्रेम विवाह को लोग अभी भी स्वीकार नहीं करते हैं। काकोरी में हुई हत्या का बदला हरदोई में लिया गया जहाँ एक 'दामाद ने सरेराह श्वसुर को हॉकी से पीटकर मार डाला।'
दामाद द्वारा श्वसुर की हत्या में मामला पैसे से जुड़ा बताया गया है । दामाद पैसे माँगता था, श्वसुर ने दिए नहीं। दामाद ने श्वसुर को निपटा दिया। काश श्वसुर के पास वेनेजुएला की तरह संसाधन होते और दामाद के पास अमेरिका जैसी व्यवस्था तो दामाद श्वसुर को उठवा लेता। श्वसुर के संसाधन पर कब्जा लेता। एक हत्या बच जाती।
इन दोनों हत्या की खबरों को जोड़कर देखें तो एक दामाद का क़त्ल हो गया, दूसरा जेल चला गया। इन परिवारों में बच्चे पैदा करने का लक्ष्य अधूरा रह गया। इसी तरह खबरें पढ़कर धर्माचार्य प्रति परिवार बच्चे पैदा करने का लक्ष्य बढ़ा देते हैं।
खबरें और भी हैं लेकिन सब पढ़ेंगे तो जायका ख़राब होगा। फ़िलहाल इतना ही। आपका दिन शुभ हो।

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