कामाख्या मंदिर दर्शन के बाद हम वहाँ से वापस ब्रह्मपुत्र तट पर पहुँचे। वहाँ से हमें ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य स्थित उमानंदा द्वीप पर स्थिति शिव मंदिर देखने जाना था। उमानंदा द्वीप को मोरद्वीप भी कहते हैं। लेकिन प्रचलित नाम उमानंदा द्वीप ही है।
(कामाख्या देवी मंदिर के विवरण के लिए पोस्ट देखें : https://www.facebook.com/share/p/1Tytsb4R2U/)
इसे दुनिया का सबसे छोटा बसा हुआ 'नदी द्वीप' कहा जाता है। द्वीप के जिस पर्वत पर मंदिर बना है, उसे भस्मकला के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण 1694 ईस्वी में अहोम राजा गदाधर सिंह के आदेश पर हुआ था, लेकिन 1897 के असम भूकंप में यह क्षतिग्रस्त हो गया था ।
उमानंदा मंदिर के बारे में कथा है कि भगवान शिव ने यहाँ भयानंद रूप में निवास किया था। कालिका पुराण के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में शिव ने इस स्थान पर राख (भस्म) छिड़की और पार्वती (अपनी पत्नी) को ज्ञान प्रदान किया। ऐसा कहा जाता है कि जब शिव इस पहाड़ी पर ध्यान कर रहे थे, तब कामदेव ने उनके योग में खलल डाला और शिव के क्रोध की अग्नि से जलकर राख हो गए, और इसीलिए इस पहाड़ी का नाम भस्मकला पड़ा।
इस पर्वत को भस्मकूट भी कहा जाता है। कालिका पुराण के अनुसार, यहाँ उर्वशीकुंड स्थित है और यहाँ देवी उर्वशी निवास करती हैं, जो कामाख्या के आनंद के लिए अमृत लाती हैं, इसीलिए इस द्वीप का नाम उर्वशी द्वीप पड़ा।
उमानंदा द्वीप जाने के लिए ब्रह्मपुत्र नदी किनारे स्थित नावें चलती हैं। नावों की नियमित आवा जाही चलती रहती है। नदी किनारे स्थित कई घाटों से नावें उमानंदा द्वीप जाने के लिए मिलती हैं।
एक घाट से नाव के लिए टिकट कटाकर हम नाव में बैठ गए। जरा देर में ही नाव चल भी दी। नाव में बैठे लोग नदी का, द्वीप का फ़ोटो लेने में जुट गए। हमने भी अपने मोबाइल का उपयोग किया। कुछ फोटो लिए। एकाध वीडियो बनाए। इसके बाद साथ में बैठे यात्रियों को देखते द्वीप पहुँचने का इंतज़ार करते रहे। नाव नदी के हरियल पानी को चीरती हुई उमानंदा द्वीप की तरफ़ बढ़ी। 10-15 मिनट में हम उमानंदा द्वीप पहुँच भी गए।
उमानंदा द्वीप पर पहुँचने के बाद हम पहाड़ी पर स्थित मंदिर की तरफ़ बढ़े। मंदिर की तरफ़ जाने के लिए सीढ़ियाँ दो तरफ़ से बनी हुई थीं। एक तरफ़ ढलान थोड़ी कम थी, रास्ता लंबा। दूसरी तरफ़ से चढ़ाई ज़्यादा थी, रास्ता कुछ कम लंबा। दोनों तरफ़ फल, जूस, मंदिर से संबंधित सामान और तरह-तरह के आइटम बेचते हुए लोगों की दुकानें थीं। हम सबसे बचते हुए लेकिन उनको देखते हुए ऊपर पहुँचे। बीच में रुक-रुक कर नदी , पहाड़ी और नीचे का नजारा देखते रहे। इसी बहाने थकान से बचते और साँस फूलने से बचते रहे।
मंदिर के सामने, नीचे ही सीढ़ियों पर लोगों ने अपने जूते-चप्पल उतार कर रखें थे। हमने भी रख दिए। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर पहुँचे।
मंदिर के प्रांगण में दर्शन के लिए भक्तों की लाइन लगी थी। लाइन का आकार टेढ़ा-मेधा होता हुआ उसको लंबा बनाता गया। कई जगह से मुड़ी-तुड़ी लाइन देखकर नोटबंदी के समय बैंकों के सामने पुराने नोट बदलने के लिए लगी लाइनों की याद आ गई। वो लाइने तो खतम हो गयीं लेकिन यहाँ दर्शन के लिए लाइनें जारी थीं।
करीब आधे घंटे लाइन में लगे रहने के बाद लाइन कुछ कदम आगे खिसकी। उचक कर, गर्दन हिलाकर और आगे देखा तो पता चला लाइन काफ़ी लंबी थी। आगे जाने पर वही लाइन यू टर्न लेकर वापस हमारी तरफ़ आती दिखी इसके बाद भक्तों की लाइन फिर समकोण पर घूमकर मंदिर के मुख्य दरवाजे की तरफ़ जा रही थी। यह मामला तो वहाँ तक था जहाँ तक दिख रहा था। इसके आगे लाइन कहाँ जा रही है आगे इसके कुछ अंदाजा नहीं लग रहा था।
लाइन में लगे-लगे कुछ देर और खड़े -सोचते रहे। आसपास देखते रहे। अंदाजा लगाया तो एहसास हुआ कि कम से कम दो-तीन घंटे लगेंगे लाइन में अगर दर्शन करना है शंकर जी के। हम कुछ देर और लगे रहे लाइन में। इसके बाद बाहर आ गए। बाहर आने के पहले हमने नेट पर मंदिर के अंदर का विवरण देखा। उसके अनुसार -'मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियों में सूर्य, शिव, गणेश और देवी जैसे हिंदू देवी-देवताओं के चित्र शामिल हैं। इनके अलावा, इस मंदिर के आसपास भगवान विष्णु और उनके दस अवतारों की मूर्तियां भी देखी जा सकती हैं।' हम सभी देवी-देवताओं का ध्यान करके बाहर से ही शंकर जी और सभी देवी-देवताओं को प्रणाम करके वापस लौट लिए।
वापस लौटने तक दोपहर हो चुकी थी। भूख लग आई थी। मंदिर के बाहर ही सीढ़ियों के पास एक ढाबा टाइप होटल में खाने का इंतजाम था। छोटी-छोटी मेज कुर्सियों में दूर-दूर से आए भक्त लोग खाना खा रहे थे। फ़ास्ट फ़ूड में चाऊ मीन, पूड़ी , पराठा, सब्जी, चाय आदि मिल रहे थे। हमने भी पराठे का आर्डर दिया। खाने की सब मेजें और कुर्सियाँ भारी थीं। रसेदार सब्जी डिस्पोजेबल थर्मोकोल की प्लेट में खड़े होकर खाना मुश्किल था। हमने पास ही बनी सीढ़ियों पर बैठकर खाना खाया।
खाना खाने के बाद वहीं एक स्थानीय मीठा काउंटर के अंदर दिखा। उसको और उसके साथ चाय भी ली। तब तक दुकान के अंदर ही बैठने की जगह खाली हो गई थी। हमने वहीं बैठकर मीठा खाया और चुस्की लेते हुए चाय पी। भूखे होने के कारण सब कुछ बड़ा स्वादिष्ट लगा।
चाय पीने के बाद हमने भुगतान के लिए मोबाइल देखा। बैटरी बहुत कम बची थी। मोबाइल चार्ज करने के लिए पावर बैंक खोजा तो पता वह बैग पास में था ही। बैग के न मिलने पर हड़बड़ा के उसे आसपास देखा। फिर भी कहीं दिखा नहीं। बैग में पावर बैंक के साथ दूसरा मोबाइल और चार्जर वगैरह थे। पहला ख्याल यही आया कि कहीं ग़ायब हो गया चार्जर, दूसरा मोबाइल और पावर बैंक।
फिर ख्याल आया कि पास में सीढ़ियो पर खाना खाते समय बगल में रखा था बैग। लपककर वहाँ गए। बैग वहाँ तसल्ली से रखा हुआ था। बैग को अपने उठाकर वापस आए। बैग वापस मिल जाने की खुशी एक चाय और पी। इसके बाद भुगतान करके सीढ़ियों से आहिस्ते-आहिस्ते उतरते हुए उस जगह पर आए जहाँ से वापस जाने के लिए नावें और स्टीमर मिलते हैं।
लौटने के समय स्टीमर लगा हुआ था किनारे। जिस टिकट पर आए था उसी पर वापस लौटने का जुगाड़ था। स्टीमर में लोग बैठ गए तो स्टीमर चला। लौटते समय भी वही सीन था जैसा जाते समय था। लोग फ़ोटो खींच रहे थे। हमारे बगल में बैठे परिवार ने कोलकाता में अपने परिवार के लोगों को ब्रह्मपुत्र नदी और स्टीमर का सीन दिखाया। हमको लगा कि ब्रह्मपुत्र नदी को दिखाते हुए उन्होंने नदी से अनुमति तो ली नहीं थी। इसे नदी अपनी निजता का उल्लंघन तो नहीं माँनेगी?
किनारे पर स्टीमर लगने के बाद लोग उससे उतरे। हम भी उतरे। उतर कर डाक पर बनी बैंचों में से एक पर बैठकर हम नदी और उसके जलप्रवाह को देखते रहे। हमको अनायास रामनाथ अवस्थी जी की कविता याद आ गई :
'आज आप हैं हम हैं लेकिन
कल कहाँ होंगे, कह नहीं सकते,
जिंदगी ऐसी नहीं है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।'
हमको वहाँ बैठे देखकर डाक पर तैनात एक महिला सुरक्षाकर्मी ने हमसे कहा -' यहाँ बैठने की परमिशन नहीं है। आप प्लीज बाहर चले जाइए।'
हमने उसकी बात को माना। फौरन उठे और बाहर की तरफ़ चल दिए। बाहर ही एक और शिव मंदिर बताया गया था। उसको देखकर उमानंदा मंदिर भगवान शिव के दर्शन की कमी पूरी करने का विचार था। हम शिव मंदिर की तरफ़ चल दिए।
(पहले की पोस्ट के लिए देखें : https://www.facebook.com/share/p/1Tytsb4R2U/)


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