Thursday, February 05, 2026

पुष्कर भट्ट से मुलाक़ात


 शिलांग शहर घूमकर शाम वापस लौटे। लौटकर Pushkar Bhatt t जी को फोन किया। पुष्कर जी उत्तराखंड के बागेश्वर के रहने वाले हैं। पिताजी शिलांग आए थे। यहीं बस गए। मिठाई की दुकान शुरू की। पुष्कर जी की पैदाइश और लिखाई पढ़ाई शिलांग में ही हुई। लेकिन वे यहां अपने नाम घर नहीं खरीद रखते। किराए पर ही दुकान है, किराए पर घर। वे और उनके आगे की जनरेशन भी NRU ही रहेगी नॉन रेजिडेंट उत्तराखंडी।

पुष्कर जी मिलने आए। उन्होंने मेघालय और शिलांग के बारे में जानकारी दी। अपने बारे में भी। उत्तराखंड से बहुत दूर शिलांग में रहने के कारण शादी के लिए उत्तराखंडी लड़की खोजना भी चुनौतीपूर्ण रहा। फिलहाल तो बच्चे कॉलेज में हैं। सब कुछ अच्छा होने के बावजूद पुष्कर जी का वापस उत्तराखंड लौटने का मन है।
पुष्कर जी को मेरे बारे में मेरे मित्र Niraj Kela के मित्र Pratul Joshi i जी ने बताया था। प्रख्यात कथाकार शेखर जोशी जी के सुपुत्र प्रतुल जोशी स्वयं भी अच्छे साहित्यकार हैं। आकाशवाणी शिलांग में पोस्टिंग के दौरान उनको पुष्कर भट्ट जी के बारे में जानकारी हुई तो उन्होंने पुष्कर जी को आकाशवाणी से जोड़ा। उसी के चलते पुष्कर जी आकाशवाणी शिलांग में अक्सर हिंदी से जुड़े कार्यक्रमों में प्रतिभाग करते रहते हैं। खासकर बातचीत। उन्होंने कहा कि पहले पता होता तो आकाशवाणी शिलांग के लिए हमसे बातचीत करते।
पुष्कर भट्ट से बातचीत के बाद पता चला कि मेघालय में यहां के बाहर के लोगों के लिए खुद की जमीन और दुकान न खरीद पाना बड़ी समस्या है। लोग सीधे हैं, अच्छे हैं लेकिन स्थानीय प्रशासन से कोई नई अनुमति लेने में मेघालय से बाहर के लोगों के लिए तमाम अड़चनें हैं।
मेघालय एक मातृसत्तात्मक समाज है। शादी के बाद लड़का लड़की के यहां जाकर रहता है। पितृसत्तात्मक समाज में जिस तरह लड़की विदा होकर पति के घर जाती है उसी तरह मातृसत्तात्मक समाज में लड़का विदा होकर पत्नी के घर रहने जाता है। मेघालय से बाहर पढ़ने और काम करने गए लड़के वापस लौटने पर इस व्यवस्था में बदलाव का प्रयास करने की कोशिश करते दिखते हैं। लड़की के यहां जाकर रहने की बजाय नई जगह घर लेकर रहना चुन रहे हैं।
पुष्कर जी बातचीत के बाद तय हुआ कि अगली बार जब शिलांग आयेंगे तब उनकी दुकान की मिठाई खाएंगे और आकाशवाणी शिलांग में बातचीत होगी।
अगले दिन प्रस्थान करना था। सरपैलिन, जो हमको गुवाहाटी से शिलांग लाए थे, से बात हो गई थी कि वे हमको गुवाहाटी हवाई अड्डे तक ले जायेंगे।। सुबह फोन किया तो उन्होंने बताया कि वे नहीं आ पाएंगे। उनकी जगह उनका भाई बलारी balari khymdeit आयेगा।
भाई को फोन किया तो पता चला कि गुवाहाटी से शिलांग आ रहे हैं। दस बजे तक पहुंचेंगे। इस बीच मेस के लोगों से और वहां सुरक्षा दरबान से बात की और विदा की। सुरक्षा दरबान विश्वा सेना से रिटायर होने के बाद यहां गार्ड के रूप में काम कर रहे हैं। मूलतः आसाम से हैं। उनकी स्थिति भी मेघालय में प्रवासी जैसी है।
मेस के केयरटेकर हवलदार रवि (हरियाणा) , कुक पंकज दास (आसाम) और सहायक अल्फ्रेडी (मेघालय) से विदा ली। चार दिन के प्रवास ने सब से हुए परिचय के बाद विदा होते समय तय हुआ कि अल्फ्रेडी की शादी में शामिल होंगे। शामिल भले न हों लेकिन बात तो हुई।
बलारी के आने के बाद हम शिलांग से चल दिए। सुबह के समय सड़क पर भीड़ थी।। लाइन में लगकर चलते हुए शहर के बाहर आए।
रास्ते में Umiam झील देखी। Umiam नदी के पानी से चलने वाली पनबिजली परियोजना के लिए बनी यह झील barapani झील कहलाती है। यहां वहां वोटिंग और दूसरे पानी के खेल होते हैं।
झील का व्यू प्वाइंट सड़क किनारे ही है। ड्राइवर ने गाड़ी व्यू प्वाइंट पर खड़ी कर दी। बोला देख लीजिए झील। हमने झील देखी। कुछ फोटो लिए। वहां खड़े और दर्शकों में से एक परिवार से बताइए। बनारस का परिवार था। बीएचयू से पढ़े लोग। गुरुकुल एक होने के कारण सहज यायावरी अपनापा स्थापित हुआ।
कुछ देर बतियाने के बाद हम आगे चल दिए।
रास्ते में छैनी सर्पलिन का फोन आया। बताया कि वे बीच में कहीं मिलेंगे। हमने सोचा पता नहीं कहां मिलेंगे। लेकिन मिले वो रस्ते में। एक जगह बलरी ने गाड़ी रोकी। वहां सरप्लिन खड़े थे। मिलते ही हाथ में पकड़े हुए दो ठो पपीते हमको थमा दिए। बोले ये आपके लिए। घर के हैं।
हमने कहा फ्लाइट में कैसे ले जायेंगे? वो बोले - ये हमको नहीं पता लेकिन हमारी तरफ से ये आपको गिफ्ट है। हमने उनको धन्यवाद दिया। गले मिले और गुवाहाटी की तरफ चल दिए।
चलने से पहले हमने फिर से उनकी पत्नी की और उनकी उम्र का अंतर कुछ कम करने को कहा। इस पर वो हंसते हुए बोले - अगली बार आपको मिलवाएंगे तब खुद देख लेना।
इसके पहले सरप्लिन के भाई से बात हुई तो उसमें बताया कि पच्चीस के करीब होंगी उनकी भाभी। तो अगली मुलाकात तक सरप्लिन की उम्र चालीस और उनकी पत्नी की उम्र पच्चीस तय हुई।
सरप्लिन से शिलांग आते समय बातचीत और लौटते समय उसका मुझसे मिलना और उसका मेरे लिए पपीते लाना याद करके मुझे प्रमोद तिवारी का लोकप्रिय गीत याद आ गया:
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।
(गीत का लिंक टिप्पणी में दिया है। सुनिए बहुत प्यारा गीत है)
गुवाहाटी एयरपोर्ट के सस्ते में डाक्टर लंगथासा Mohanta Langthasa जी का घर पड़ा। हम उनके घर उनसे मिलने के लिए रुके। उनके यहां चाय पी। उन्होंने मुझे अपने यहां का अंग वस्त्र भेंट किया। उनके प्यार और सम्मान को ग्रहण करके बहुत आत्मीय विदाई की याद के साथ हम गुवाहाटी एयरपोर्ट की तरफ चल दिए।
चलते समय सरप्लपिन के दिए हुए दो पपीतों में से एक को मैंने डाक्टर साहब को भेंट कर दिया। दूसरा किसी तरह हैंड बैग में घुसा कर लखनऊ तक लाया। अगले दिन खाया तो अलग तरह का स्वाद लगा।
इस स्वाद में शिलांग की खुशनुमा यादें जुड़ी थीं।

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