आज सुबह 'सैंट्रो सुंदरी' को दिखाने के लिए सर्विस सेंटर गए। 26 साल की युवा सैंट्रो सुंदरी पिछले महीने ही सर्विस कराकर घर लौटी है। चकाचक चलती है। लेकिन दो दिन पहले चलते-चलते अचानक रुक गई। ऐसे जैसे हिचकी आई हो उसे। हमने थोड़ी देर रुककर इंतज़ार किया। फिर स्टार्ट किया। नहीं हुई स्टार्ट। थोड़ी देर बाद घुर्र-घुर्र किया लेकिन चली नहीं। शायद नई गाड़ी के मुकाबले अपनी बेकदरी से नाराज हो गई है। हम उसको खड़ी करके घर आ गए।
लेकिन अगले दिन चाबी घुमाते ही स्टार्ट हो गई। पिछली रात की नाराज़गी दूर हो गई शायद। जितनी बार स्टार्ट किया स्टार्ट हुई। पिछली रात के एकदम ऊपट व्यवहार। हमें लगा ठीक हो गई। बल्कि लगा, खराब हुई ही नहीं थी। लेकिन सोचा दिखा लें।
आज ले गए सर्विस सेंटर। आज भी फौरन चल दी। ख़ुशी-ख़ुशी। लगा कि हमारा वहम था कि स्टार्ट होने में कुछ दिक्कत है। लेकिन हमने सोचा कि दिखा ही लें। सर्विस सेंटर के रास्ते में एक जगह फिर हिचकी के साथ रुकी तो दुबारा स्टार्ट नहीं हुई। हमने उसको धकिया के किनारे किया। ढाल में तेजी से लुढ़कने लगी। हम दरवाजा खोलकर उचक कर गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर बैठ गए। गियर में डाला। गाड़ी स्टार्ट हो गई। चल दी।
हमने गाड़ी सर्विस सेंटर में जमा की। लौट लिए। पैदल।
लौटते हुए याद आया कि पिछले हफ़्ते वहीं कहीं एक चाय की दुकान दिखी थी। उस पर नाम लिखा था -'शुक्ला टी स्टॉल।' उस दिन तो कहीं जा रहे थे। पूछा नहीं। आज सोचा कि पता किया कि कहाँ के 'सुकुल जी ' यहाँ दुकान खोले बैठे हैं। पता करना इसलिए भी जरूरी लगा कि कोई देखकर कहे रिटायरमेंट के बाद बेच रहे हैं अनूप शुक्ल तो उसको असलियत तो बता सकें।
'शुक्ला टी स्टॉल' तो किन्ही शुक्ला जी की दुकान होगी। लेकिन आजकल दुकानों के नाम बड़े रोचक दिखते हैं। कानपुर के 'ठग्गू के लड्डू' की दुकान तो बहुत पुरानी है। उसी की नक़ल करते हुए लखनऊ में भी कई दुकानों के नाम दिखे।कल आशियाना में 'लड्डू बेईमान' का बोर्ड दिखा। मतलब कोई खराबी बताये लड्डू में तो दुकान वाला कह सकता है -हम तो पहले ही बताये थे 'लड्डू बेईमान' है। बेईमान लड्डू से आप ईमानदारी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। हम बेईमान बताये हैं तो बेईमान हैं। कोई ईमानदारों की तरह थोड़ी कि कहें ईमानदार लेकिन निकलें बेईमान।
ऐसे ही कल एक स्टेशनरी की दुकान भी दिखी -'माँ बाऊ जी स्टेशनरी हाउस।' माता-पिता को समर्पित होगी शायद दुकान। उनके नाम पर चल रही होगी। माँ-पिता के प्रति प्यार प्रदर्शित करने के तरीक़ा होगा। इसी से याद आया कि बहुत पहले एक दोस्त ने अपनी मेल का पासवर्ड बनाया था -'मम्मी-पापा।'
बहरहाल 'शुक्ला टी स्टॉल' की तरफ़ बढ़ते हुए रास्ते में और चाय की दुकान दिखी -'जायका दरबार।' तरह-तरह के सामानों का दरबार लगा था 'जायका दरबार' में। जायका दरबार की फ़ोटो जितने अच्छी आई, वास्तव में वैसी थी नहीं। सरकारी योजनाओं की तरह मामला था यहाँ भी। घोषणा कुछ, असलियत कुछ और।
'शुक्ला टी स्टॉल' की ठेलिया जहाँ देखी थी वहाँ दुकान थी नहीं। बगल में जूस वाले ने बताया -'आज आए नहीं शुक्ला जी।' बगल में इंदौरी पोहे की दुकान वाला मोबाइल में कुछ देख रहा था। शायद Pradeep Sharma जी की पोस्ट पढ़ रहा हो। लखनऊ से उनको समर्थन दे रहा हो। हमने उसको डिस्टर्ब नहीं किया। लौट लिए। पैदल।
लौटते हुए एक दुकान का पर बोर्ड लगा देखे -'मन की चाय, मन की लस्सी।' हमें लगा कि कहीं 'मन की बात' भी न करने लगे चाय वाला। हम आगे बढ़ गए। बाद में पीछे मुड़ के देखा तो वहाँ श्री सीता राम भोजनालय का बोर्ड भी लगा था।
ट्रांसपोर्टनगर आज बंद था। सड़कें सुनसान। एक जगह रिक्शे पर नवाब की तरह दो आदमी बैठे थे। पता होने के बाद भी बात करने के लिहाज से हमने उनसे पूछा कि आज इतवार को बंद रहता है क्या ट्रांसपोर्ट नगर?
उनमें से एक जिनकी आँखों में काला चश्मा लगा था उन्होंने बताया -'इतवार के अलावा आज महाशिवरात्रि भी है। इसलिए बंद है ट्रांसपोर्टनगर।' आँख में काला चश्मा के बारे में बताया कि 'माड़ा' पड़ गया था। ऑपरेशन कराया है। अगले हफ़्ते नंबर मिलेगा नम्बर तब बनेगा चश्मा। हमने सोचा उनका फ़ोटो लिया जाये लेकिन सोच पर अमल करने तक हम आगे बढ़ गए थे। फिर आगे बढ़कर सोचा कि लौटकर फ़ोटो लिए जाये लेकिन नहीं लौटे। एक बार फिर सोच पर अमल नहीं किया। दो मिनट के भीतर दो बार सोच पर अमल मुल्तवी करना कितने लोग कर पाते हैं? बड़े जिगर का काम है ।
रास्ते में तमाम दुकानों पर मुरादाबादी चिकन और बिरियानी की दुकानें दिखीं। क्या पता मुरादाबाद में इसी तरह लखनऊ के तमाम सामान बिकते हों। एक नुक्कड़ पर अंडा सेल, मुरादाबादी चिकन बिरियानी कार्नर के बगल में द्विवेदी पूड़ी बिकती दिखीं। दुकानों का सांप्रदायिक सद्भाव देखकर अच्छा लगा।
गोमती नदी के शहर में गंगा मैया कैफ़े देखकर नदियों के आपसे सद्भाव का अंदाज़ लगा।
आगे दो लड़के पोस्टर लगाते दिखे। सड़क पर पोस्टर को पेट के बल लिटाकर उसकी पीठ पर गोंद लगाकर पोस्टर पास की दीवार पर चिपकाया। गोंद से पोस्टर लगाते देखकर लगा कि अब शायद लेई का चलन कम हो गया है।
पोस्टर एसी रिपेयर से संबंधित था। सद्दाम नाम था कारीगर का। बताया पंद्रह साल बॉम्बे में एसी का काम किया। कमाई की। अब लखनऊ में काम करेंगे। परिवार के कारण वापस लौट आए। हमने मजे लेते हुए कहा -‘ परिवार के कारण घर वापसी हुई। बीबी ने बुलाया है।’ सद्दाम मुस्कराते हुए पोस्टर लगाते रहे।
दुकान का साई A/C सर्विसिंग है। शिरडी वाले साई बाबा के नाम पर। साई बाबा मतलब सबका मालिक एक है। एक एसी की सर्विसिंग 425 रुपए में। दो की आठ सौ रुपये में। लखनऊ वाले साथी लोगों को सर्विसिंग करानी हो तो संपर्क करें।
मोटर साइकिल में बैठते हुए सद्दाम के साथ वाले बालक ने कहा -' आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। हमने कहा। हमको भी अच्छा लगा।दुकान अच्छी चलने के लिए शुभकामनाएँ।'
चलते समय सद्दाम के साथ वाले वाले बालक का नाम पूछा तो उसने बताया -'इकरार।'
हमको गाना याद आ गया -' प्यार हुआ, इकरार हुआ है, प्यार से फिर क्यों डरता है दिल। अभी गाना सुनते हुए यह पोस्ट कर रहे हैं। आप भी सुनिए गाना। लिंक टिप्पणी में दिया है।
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