फ़ुरसतिया

Sunday, November 28, 2004

मेरा पन्ना मतलब सबका पन्ना

मैं काफी दिनों से विभिन्न चिट्ठाकारों के चिट्ठों के बारे में लिखने की सोच रहा था.ठेलुहा ,हां भाई, रोजनामचा,मेरा पन्ना.पंकज की मोहनी सूरत और मुस्कान देखकर कौन न मर जाये.इनकी जालिम मुस्कान देखने हम बार-बार चिट्ठाविश्व पर जाते हैं.रोजनामचा में अतुल की फोटो देखकर लगता है किसी फास्ट बालर का बाऊंसर फेकने के तुरंत बाद का पोज है .अवस्थी,जिनका लिखा पढने के लिये हम सबसे ज्यादा उतावले रहते हैं पर जो आलस्य को अपना आभूषण मानते हुये सबसे कम लिखते हैं,के बारे में लिखने को बहुत कुछ है .पर इन महानुभावों को छोङकर मैं शुरुआत मेरा पन्ना के जीतेन्द्र चौधरी से करता हूं .इनकी चाहत भी है कि कोई बंधु इनके लेखों का उल्लेख करके इनके दिन तार दे.हालांकि यह पढकर जब अतुल ने धीरज रखने का उपदेश दिया तो फटाक से अच्छे बच्चों की तरह मान गये.ऐसे अनुशासित बंधुओं की जायज मांगें पूरी होनी चाहिये इस कर्तव्य भावना से पीङित होकर मैं जीतेन्द्र और उनके पन्ने के बारे में लिखने का प्रयास करता हूं.

गोरे ,गोल ,सुदर्शन चेहरे वाले जीतेन्द्र के दोनों गालों में लगता है पान की गिलौरियां दबी हैं.इनके चमकते गाल और उनमें दबी गिलौरी के आभास से मुझे अनायास अमृतलाल नागर जी का चेहरा याद आ गया.आखें आधी मुंदी हैं या आधी खुली यह शोध का विषय हो सकता है.इनकी मूछों के बारे में मेरी माताजी और मेरे विचारों में मतभेद है.वो कहती हैं कि मूछें नत्थू लाल जैसी हैं जबकि मुझे ये किसी खूबसूरत काली हवाई पट्टी या किसी पिच पर ढंके मखमली तिरपाल जैसी लगती हैं.नाक के बारे में क्या कहें ये खुद ही हिन्दी ब्लाग बिरादरी की नाक हैं.

जनसंख्या का समाधान तब तक नही हो सकता, जब तक हम अपनी जिम्मेदारी नही समझेंगे.अभी भी समय है, हम चेते, अन्यथा आने वाली पीढी हमे कभी माफ नही करेगी.(20 सितंबर)से अपने लिखने की शुरुआत की जीतेंन्द्र ने.नियंत्रण जनसंख्या पर होना चाहिये लिखने पर नहीं यह जताते हुये उसी दिन राजनीति पर भी नजर दौङाई और लिखा

इस सरकार मे चार चार PM है....
PM: मनमोहन सिंह जी : जो सिर्फ सुनते है
Super PM: मैडम सोनिया :जो सिर्फ हुक्म सुनाती है
Virtual PM: CPM :जो जल्दी ही सुनाने वाले है.
Ultra PM :ळालू यादव :जो किसी की नही सुनता


अचानक इनको लगा कि अरे हम तो पोस्ट चपका दिये और कारण बताया नहीं सो इन्होंने बताया कि ये लिखते क्यो हैं .

मेरे कुछ मित्रो ने पूछा है कि मेरे को चिट्ठा(Blog) लिखने का शौक क्यो चर्राया, क्या पहले से चिट्ठा लिखने वाले कम थे जो आप भी कूद गये. मेरा उनसे निवेदन है कि इस कहानी को जरूर पढे.ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ, जिससे मुझे चिट्ठा लिखने की प्रेरणा मिली.अब मै कहाँ तक सफल हो पाया हूँ, आप ही बता सकते है(21 सितंबर).21 सितंबर का दिन मंगलवार का था. हनुमान की फुर्ती से ये दौङ-दौङ के सबके ब्लाग में गये .तारीफ का तीर चलाया और अपने पन्ने पर आने की सुपारी बांट आये.नये ब्लाग के जन्म से खुश लोग इनके यहां सोहर (नवजात के आगमान पर गाये जाने वाले गीत)गाने इनके पन्ने पर पहुंचे.

1. Welcome to hindi blogdom. Der Aayad durast aayad :)देबाशीष

2.बधाई स्वीकार करो धुंआधार लिखाई के लिये.लिखते रहो .पढने के और तारीफ करने के लिये तो हम हइयैं है.अनूप शुक्ला

3.जीतेंद्र जी,आपके ब्लाग की भाषा तो खालिस कनपुरिया है. बधाई. एक छोटा सी धृष्टता करने के लिए क्षमा कीजियेगा, जनाब आप अपने पुराने अँक वाले लिंक का समायोजन कुछ बेहतर करे , काफी भटकना पड़ता है.महीनेवार क्रम या जैसा मैनें कर रखा है वैसा कर दीजिए|अतुल अरोरा

यहां से शुरु हुआ इनका धुंआधार सफर जारी है यह बात अलग है कि अतुल की चाह पूरी करने का मौका नहीं मिला अभी इन्हें.

खाङी में प्रवासियों की हालत के बाद राजेश प्रियदर्शी के लेख पर नजरें इनायत की इन्होंने.राजेश प्रियदर्शी का लेख सपने,संताप और सवालकाफी चर्चा में रहा.हर चर्चित चीज को किसी फार्मूले में बांधने की अमेरिकी आदत का मुजाहिरा हुआ अतुल के लिटमस टेस्ट में.एक टेस्ट चला तो इन्होंने लगे हाथ दूसराटेस्ट भीउतार दिया बाजार में.कुछ लोग उस टेस्ट से असहमत थे.पर हिट्स के नक्कारखानें में असहमतियां तूतियों की आवाज की तरह पिट गयीं.


कोई भी नही सोचता जो बच्चे स्कूल मे बात कर रहे थे, वो आपके बच्चे भी हो सकते है.कहकर फिर राजनीति, क्रिकेट और कुछ तकनीकी पोस्ट लिखी.सबसे बढिया पोस्ट पहले माह की आयी इनकी आखिरी दिन.क्रिकेट बोर्ड की राजनीति का बयान किया सटीक तरीके से.

अक्टूबर में धुंआधार बैटिंग की गयी.अभी तक स्वागत की कुंकुम रोली के अलावा एक अज्ञात वाह(Exellent) के अलावा टिप्पणी
के स्थान पर सन्नाटा पसरा था.हालात को काबू में लाने कि तमाम सवाल-जवाब जो इनके शर्मीले दोस्त इनसे अकेले में पूंछते हैं वो इन्होने बताये.यौन विषयों के बारे में न लिखने की मजबूरियां भी बतायीं.फिर तोसिलसिला चल निकला.मिर्जा,छुट्टन ,पप्पू,स्वामी के आने से इनके ब्लाग पर चहल-पहल बढी.

अक्टूबर माह में जितेन्दर जी ब्लाग मशीन हो गये.अइसा थोक में लिखा अगर थोङी जहमत उठाई जाये तो अक्टूबर माह में दुनिया में हिन्दी ब्लाग में सबसे ज्यादा शब्द लिखने के लिये गिनीज बुक में नाम छप सकता है.खाली मात्रा ही नहीं पठनीयता की नजर से सारे पोस्ट धांसू रहे.मिर्जा का अवतार हुआ.उनका, गुस्सा दिखा.पंडों की हकीकतबयान की.मिर्जा का हीरोइनों से लगाव पता चला:-

अब जहाँ तक मिर्जा का फिल्मी प्रेम की बात है, वैसे तो मिर्जा की वफादारी किसी एक हिरोइन मे कभी नही रही.. बाकायदा नर्गिस,मीनाकुमारी से लेकर ऐश्वर्या राय,अम्रता राव तक को समान रूप से चाहते रहे , उनके खुशी गम मे हँसे रोय े, ....सिन्सीरियली सब पर पूरा मालिकाना हक जताते रहे,मजाल थी जो हीरो किसी हिरोइन को छू ले..तुरन्त चैनल बदल देते ....शायद मिर्जा की बदौलत ही ऐश्वर्या और सलमान का इश्क परवान नही चढ पाया...

यह पढकर मुझे हास्टल का एक वाकया याद आ गया.एक दिन चित्रहार के दौरान कोई पुराना फिल्मी गाना आ रहा था.किसी जिज्ञासु ने हवा में सवाल उछाला- अबे ये कौन हीरोइन है.एक ने बङी मासूमियत से बताया-पता नहीं यार आजकल हम हीरोइनों के टच में नहीं रहते.

अपने प्रवासी होने को लेकर मिर्जा भावुक हो गये.बोले :-
हम उस डाल के पन्क्षी है जो चाह कर भी वापस अपने ठिकाने पर नही पहुँच सकते या दूसरी तरह से कहे तो हम पेड़ से गिरे पत्ते की तरह है जिसे हवा अपने साथ उड़ाकर दूसरे चमन मे ले गयी है,हमे भले ही अच्छे फूलो की सुगन्ध मिली हो, या नये पंक्षियो का साथ, लेकिन है तो हम पेड़ से गिरे हुए पत्ते ही, जो वापस अपने पेड़ से नही जुड़ सकता.

उधर मिर्जा आंखें गीली कर रहे थे इधर मेरे दिमाग में भगवती चरण वर्मा की कविता गूंज रही थी और जिसे मैं चाहता था कि मिर्जा सुन सकें:-

हम दीवानों का हस्ती ,हम आज यहां कल वहां चले,
मस्ती का आलम साथ चला हम धूल उङाते जहां चले.

आंसू पोछने के बाद मिर्जा दावतनामें मे मसगूल हो गये.फिर छुट्टन की शानदार पार्टी हुयी.इसके बाद आया सवाल-जवाब का झांसा.बतया गया:-

जीवन मे हास्य हमारे आस पास फैला रहता है, जरूरत है तो बस उसे देखने की.सुबह सुबह जब नित्य क्रिया मे होते है,तेब आइडिया मिलते है

यहां पर आकर रहा नहीं गया इनसे और सामने आयी बचपन की कुटेव-छुटकी कविता:-

अश्क आखिर अश्क है,शबनम नही
दर्द आखिर दर्द है सरगम नही,
उम्र के त्यौहार मे रोना मना है,
जिन्दगी है जिन्दगी मातम नही


स्वामी का क्रिकेट प्रम और महाराष्ट चुनाव विश्लेषण के लिये ज्यादा सोचना नहीं पङा होगा इनको.कल्पना में किसी पनवाङी क ेयहां खङे हो गये होंगे थोङी देर और दो धांसू पोस्ट चिपका दी.

पप्पू भइया की इन्डिया ट्रिप के बहाने बताये प्रवासियों के वो कष्ट जो वे झेलते हैं वतन आने पर.इन कष्टों का मुझे तो अन्दाज नहीं पर जब सीसामऊ मोहल्ले में पप्पू के घर वालों से बात की तो उनके भी कुछ कष्ट पता चलेे.कुछ निम्न हैं:-

1.पप्पू के घर वाले अभी तक उस जनरेटर और एअर कंडीशनर का किराया किस्तों में चुका रहे है जो उन्होने पप्पू के आने पर लगवायेथे.

2.पप्पू के दोस्त अभी भी इस आशा में है कि पप्पू से उनको वो पैसे वापस मिल जायेंगे जो उन्होंने भारतीय मुद्रा उपलब्ध न होने के बहाने
मासूमियत से लिये थे तथा बाद में उसी तरह भूल गये जैसे दुश्यंत शकुन्तला को भूल गये थे.यह सुनकर उन मित्रों का जी और धुक-पुक कर रहा है जिनको यह पता चल चुका है कि पप्पू भइया को दूसरों से लिये पैसे के बारे में याद नहीं रहता .

३.पप्पू भइया के घर के बाहर चाय वाला अभी तक यह तय नहीं कर पाया है कि उनके आने पर जो चाय पिलाईं उसने उनको वो पप्पू के
शाश्वत खाते में डाले या बट्टे खाते में.

इसके अलावा भी कुछ बातें वो बताने जा रहे थे तब तक किसी बुजुर्ग ने टोंक दिया -क्या फायदा रोने-गाने से ? लङका जब प्रवासी हो गया तो यह सब तो झेलना ही पङेगा.

आह क्रिकेट-वाह क्रिकेट के बाद लिखा गया मोहल्ले का रावण.यह मेरे ख्याल से मेरा पन्ना की सबसे बेहतरीन पोस्ट है.चुस्त कथानक,
सटीक अंदाज .पर यहां भी जितेन्दर बेदर्द लेखक रहे.वर्मा जी की बिटिया को कुंवारा छोङ दिया.मैंने पूंछा तब भी अभी तक कहीं गठबंधन नहीं कराया अभी तक.अतुल ने बताया कि सबसे हंसोङ ब्लाग है यह.

अंग्रेजी,हिंन्दी के बाद फिर हुआ सिन्धी ब्लाग का पदार्पण.अब फोटो ब्लाग भी आ गया है.जितेन्दर की लिखने इस क्षमता देखकर मुझे
जलन होती है उनसे.इसी दौङधूप नुमा अंदाज के लिये मनोहर श्याम जोशी ने लिखा है-ये मे ले ,वो मे ले वोहू मे ले(इसमें लो,उसमें लो उसमें भी लो)

नवंबर माह में कुवैत में जाम और बिजली गुल के वावजूद लिखा.देह के बारे में फिर भारतीय संस्कृति के बारे में.चौपाल पर चर्चा हो चुकी
है इनकी.क्रिकेट के बारे में तो मेरा पन्ना बहुत उदार है.अक्सर कृपा कर देते हैं.विधानसभा में चप्पलबाजी पर जब लिखा तो मुझे लगा कि
शायद ये नेताओं की पीङा नहीं समझ पा रहे हैं.आखिर कब तक नेतागुंडे के भरोसे रहेगा? गुंडागर्दी में आत्मनिर्भरता की तरफ कदम है यह मारपीट.

मुझे धूमिल की कविता अनायास याद आ गयी:-

हमारे देश की संसद
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
आधा पानी है.

मेरा पन्ना में जब धुंआधार बैटिंग शुरु हुयी तो अंग्रेजी के वो शब्द मुझे अखरते थे जिनके प्रचलित हिंदी शब्द मौजूद हैं.इसके अलावा हर दूसरे वाक्य के बाद की बिन्दियां(.....)मुझे अखरती थीं.अब जब मैं सोचता हूं लो लगता है कि ये बिन्दियां उन तिलों की तरह हैं जो खूबसूरती में इजाफा करते हैं.पर यह सोच के डर भी लग रहा है कि ं यह पढकर चौधरी जी कहीं ज्यादा खूबसूरती के लालच में न पङ जायें.

मेरा पन्ना के लेखक की टिप्पणियों का रोचक इतिहास है.टिप्पणी को इन्वेस्टमेंट मानने वाले जीतू तारीफ में कंजूस नहीं है.शुरुआत में जो उदासीन टिप्पणी शून्य दौर झेला है इन्होंने ये नहीं चाहते कि कोई नया चिट्ठाकार वैसा अकेलापन झेले.अक्सर यह भी हुआ कि ब्लाग अभी मसौदा स्थिति (Draft Stage)में है पर उधर से जीतेन्द्र की वाह-वाह चली आ रही है.कई बार ऐसा हुआ टिप्पणी के मामले में कि
क्रिकेट कमेंन्टेटर की भाषा में कहें तो उसमें उत्साह अधिक और विश्वास कम था.अइसी जगहों में ये मेरा मतलब यह था या यह नहीं था कहकर
बचने की कोशिश करते हैं पर अम्पायर कब तक संदेह का लाभ देगा.

हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि यह सलाह उछाल दो कि ब्लाग लिखने मे भले दिमाग का इस्तेमाल न करें पर टिप्पणी करते समय ध्यान रखना चाहिये.पर जब हमें याद आया कि ये महाराज तो ब्लाग पर टिप्पणी का महत्व जैसा कुछ लिख चुके हैं तब लगा बूढे तोते को राम-राम सिखाना ठीक न होगा.

यहां तक मामला ठीक था अब हमें लग रहा है कि थोङा ब्रम्हास्त्र का उपयोग जरूरी हो गया है.हिंदी चिटठा संसार में जीतेन्द्र के पन्ने का उदय धूमकेतु की तरह हुआ और छा गया.नयी चीजों को सीखने और अपनाने की ललक काबिले तारीफ है.जितेन्द्र का मेरा पन्ना हमारा ऐसा ही एक खूबसूरत पन्ना है .आशा है कि जीतेन्द्र तारीफ का बुरा नहीं मानेंगे.

लगातार अच्छा लिखते रहने के लिये जीतेन्द्र को मेरी मंगलकामनायें.













10 Comments:

  • At 9:39 AM , Blogger Kalicharan said...

    बधाई स्वीकार करो धुंआधार लिखाई के लिये.लिखते रहो .पढने के और तारीफ करने के लिये तो हम हइयैं है. (http://merapanna.blogspot.com/2004/09/blog-post_21.html#comments)

    माफ किजिऐगा, हँू , कट पेसट तो करुँगा :)

     
  • At 10:33 AM , Blogger Jitendra Chaudhary said...

    अनूप जी,
    धन्यवाद,
    आपका प्यार और स्नेह देखकर, गला रूंध गया है,
    मै आपसे क्या कहूँ, शब्द ही नही मिल रहे है.
    बस इतना कह सकता हूँ, कि इससे अच्छी और कोई समीक्षा नही हो सकती.
    आपको ढेर सारा धन्यवाद

     
  • At 11:03 AM , Anonymous Anonymous said...

    भई जितेन्द्र की यह पंक्तियाँ

    "हम उस डाल के पन्क्षी है जो चाह कर भी वापस अपने ठिकाने पर नही पहुँच सकते या दूसरी तरह से कहे तो हम पेड़ से गिरे पत्ते की तरह है जिसे हवा अपने साथ उड़ाकर दूसरे चमन मे ले गयी है,हमे भले ही अच्छे फूलो की सुगन्ध मिली हो, या नये पंक्षियो का साथ, लेकिन है तो हम पेड़ से गिरे हुए पत्ते ही, जो वापस अपने पेड़ से नही जुड़ सकता."

    जब पहली बार पढ़ी थी तब भी निहाल हुए थे और जब आप ने दुबारा से याद दिलाया तो अब भी। और शुक्ला जी आप तो हमें आज इतना फुला दिए कि हम उड़ने लगे कार-पूल मित्रों को रस्सी के साथ कार से बाँधना पड़ा नहीं तो अभी हवा में ही होते।

    लिखते रहिए काम से वापिस आके हंसी की फुहार मिल जाए तो क्या बात है। अवस्थी जी को कुछ न कहिए उन के पोर्टलैंड में बारिश इतनी आती है कि जो भी लिखते हैं बह जाता है।

     
  • At 7:44 PM , Blogger Atul Arora said...

    शुकुल जी , यह प्रविष्टी तो चिठ्ठा विश्व में स्थान पाने का हक रखती है| "मेरा पन्ना" की अधिकारिक समीक्षा है यह| देवाशीष बाबू को ईसकी प्रति भेज मारिए| भईया दो बातो का लगे हाथ खुलासा कर डालो, तो मजा दुगुना हो जाये, आप कानपुर में कहाँ निवास करते है? दूसरी जिज्ञासा मेरी पत्नी ने आपका पन्ना पड़ कर की है कि अगर शुक्ल जी कंप्यूटर की फील्ड में काम कर सकते हैं तो मैं खुद भी वहाँ वापस जाने के बारे में क्यों नही सोचता | अमाँ मेरी बड़ी शोचनीय स्थिती हो गई है| जरा रोशनी डालिए क्या कानपुर वाकई तरक्की कर चुका है?

     
  • At 1:07 AM , Blogger इंद्र अवस्थी said...

    This post has been removed by a blog administrator.

     
  • At 1:11 AM , Blogger इंद्र अवस्थी said...

    पंकज भैया, नक्शानुसार यहाँ से जो बहता है वह आपके यहाँ ही पहुँचता होगा. कहीं माल की पैकिंग पर हमारा नाम लिखा मिल जाय तो रोक लें, आते-जाते हम कलेक्ट कर लेंगे.

    फाइनली, शुकुल ने जो तारीफ़ास्त्र चलाया है हम देख रहे हैं कि वह अच्छा इनभेस्टमेंट सिद्ध हो रहा है. लोगों के गले रुंधे हैं, हवा-हवाई भी हुए हैं और कुछ शोचनीयता की दशा में भी पहुँचे हैं

    इसका इलाज यही है कि जितेंदर भइया (और पंकज भी, जब वह नीचे उतर आयें बिना कारपूलयात्री मित्रों की मदद के) भी जवाबी डाक से अपनी मिसाइल लांच करें, (झेलने के लिये हम अपने को सादर प्रस्तुत करते हैं, वैसे तारीफ का मनोविज्ञान कहता है कि अगली बौछार शुकुल पर होगी, हम तो योंही चांस मार रहे थे)

     
  • At 1:28 AM , Blogger अनूप शुक्ला said...

    कालीचरन जी स्वागत आपका हिंदी चिट्ठा जगत में.
    जीतेन्द्र आशा है अब तक गला ठीक हो गया होगा.यह पोस्ट लिखकर मुझे संतोष हुआ.आपको अच्छा लगा यह खुशी की बात है.थोङा हङबङी के कारण कुछ लिक छूट गये तथा कुछ मसाला भी.एकाध दिन में ठीक हो जायेगा तब फिर पङना .
    पंकज चिंता न करो जैसे ही मौका मिला तो तुम्हारे साथ भी इंसाफ होगा.तब नहीं रोक पायेंगे तुम्हारे मित्र.अवस्थी का तो अइसा है कि वह किसी भी तरह की मेहनत तभी करते हैं जब उसके सिवाय सारे विकल्प समाप्त हो चुके हों. भारतीय संस्कृति की खिचङी अभी इनके पीसी की हांडी में आधी पकी है .देखो कब पूरी हो.
    अतुल भाई जो मैं लिख चुका वो सबका हो गया. जो चाहेगा हम भेज देंगे.कानपुर में मैं अर्मापुर में रहता हूं .मैं कंप्यूटर के बारे में कुछ नहीं जानता सिवाय ब्लाग लिखने के.कानपुर के हालात आप पिछली गर्मी में देख चुके हैं.कुछ बदला नहीं है .बकिया कुछ
    करने के लिये सोचने में जाता क्या है जेब से.रोज सोचिये .

     
  • At 2:23 PM , Blogger आशीष said...

    बहुत अच्छा लिखा है, मज़ा आ गया पढ़ के। हम तो यहां लड़कों की कापियां जांचने में अपना दिमाग खपा रहे थे और उनके अनुत्तरित उत्तरों को देख रहे थे और अपना सर खुजला रहे थे, तब आपका लेख पढ़ा और थोड़ा मज़ा आया। हम जल्द ही वापस आयेंगे मैदान-ए-ज़ंग में। तब तक आप लोग झंडा ऊंचा रखें।

    आशीष

     
  • At 2:38 PM , Blogger Vijay Wadnere said...

    बाबा रे!!

    ये सब पढ कर तो दिल से यही आह निकली-
    या ईलाही! हम ना हुए!!

    वैसे:-
    हम भी अगर ब्लागर होते,
    नाम हमारा होता जितेंदर उतेंदर,
    बदले में मिलती तारीफ़,
    और दुनिया कहती वेल्डन विजय मासटर!!
    (मासटर - मास्टर का अपभ्रंश है, तुक मिलाने के लिये उपयोग किया गया है)

    बालीवुड चलचित्र "अंदाज़ अपना अपना" का (विकसित)डायलाग:-
    "अरे विजय, तू लोगों के भरोसे बैठा रहेगा तो लोग तेरा ही गेम बिछा डालेंगे। इससे पहले की लोग और आगे निकल जायें, अपने पैरों पे खडा होजा - तेजा-खडा होजा!"

    जी और कुलबुलाने लगा है, अभी "कुछ" लिखता हूँ!!

    बाई द वे- शुकुलजी ने सही ही लिखा है, जितेंद्रजी हैं भी इसी तारीफ़ के काबिल।

     
  • At 12:03 PM , Blogger Shrish said...

    आपका यह लेख पहले भी थोड़ा पढ़ा था पर आज पूरा तसल्ली से पढ़ा, मजा आ गया। आपका और जीतू भैया का प्यार देखकर जलन होती है। :)

     

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