Monday, May 02, 2005

ठेलुहई की परम्परा



HPIM0090
डा.अरुण प्रकाश अवस्थी
दुनिया को अपने ठेंगे पर रखकर मस्त रहने के तेवर अवध के लोगों की खासियत है ।इस ठेलुहई के अंदाज से लोग बमार्फत इंद्र अवस्थी तो परिचित हैं।कुछ दिन पूर्व इनके पिताजी डा.अरुण प्रकाश अवस्थी से काफी दिन बाद मुलाकात हुई । कलकत्ते के किसी भी साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन में उनकी उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती थी। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेख-कविता-संस्मरण छपते रहते हैं।कविता संग्रह रावीतट,क्रांति का देवता ,महाराणा का पत्र,असुवन जल सींचि-सींचि,राम-श्याम शतक तथा उपन्यास सिन्धु शार्दूल दाहिरसेन सबसे ऊपर कौन प्रकाशित प्रकाशित।सेंट्रल बैंक से अवकाश प्राप्ति के बाद आजकल अपने गांव मौरावां में शैक्षणिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं।उनको जब इंद्र अवस्थी उर्फ ‘पुत्तन’के लेख पढ़ाये तो उन्होंने अपनी ठेलुहई की वंश परम्परा के बारे में बातें की।जो कुछ बताया वह जस का तस यहां प्रस्तुत है।
लल्ला पर जो पुत्तन का जो लेख पढ़ा वह वास्तव में बड़ा सशक्त रेखाचित्र है. -रेखैचित्र कहा जायेगा इसे ,हय कि नहीं !.लल्ला भी एक अद्वितीय जीव हैं।जैसे जीवन में कुछ बुराइयां होती हैं लेकिन वे अनिवार्य बुराइयां होती हैं जैसे हमारे मौरावां के फकीरे हैं।वैसे ही लल्ला में चाहे जो बुराई हों लेकिन लल्ला की उपस्थिति हर मौके पर अनिवार्य रहती है।पुत्तन का लेख मैंने पढ़ा और पढ़कर मुझे लगा जैसे जो वंश परम्परा में ठेलुहई के कीटाणु होते हैं वे पुत्तन में मौजूद हैं।
पुत्तन के बाबा पंडित जगदीश शरण अवस्थी उर्फ गुरुजी अपने जमाने के नामी ठेलुहा थे.एक बार पोरबंदर,गुजरात के नामी विद्वान महंतजी मौरावां आये थे.वो कहीं दो-चार दिन से ज्यादा रुकते नहीं थे ,लेकिन जब मौरावां आये तो छह महीने रहे थे ।जब उनका विदाई समारोह हुआ तो उसकी अध्यक्षता गुरुजी ने की थी.हम लोग भी थे वहां. तो महंतजी ने कहा-जिस व्यक्ति ने सारा संसार देख घूम लिया लेकिन अगर भारतवर्ष नहीं आया तो उसने कुछ नहीं घूमा और जिसने पूरा भारतवर्ष घूम लिया लेकिन अगर उत्तरप्रदेश नहीं आया तो उसने कुछ नहीं घूमा और पूरा उत्तरप्रदेश घूमने के बाद अगर वह उन्नाव जिला नहीं आया तो उसने कुछ नहीं घूमा और जिसने पूरा उन्नाव घूम लिया लेकिन अगर मौरावां नहीं आया तो उसने कुछ नहीं घूमा और मौरावां आकर जो गुरुजी से नहीं मिला तो समझ लो उसने कुछ नहीं देखा.यद्यपि पुत्तन और गुरुजी में ठेलुहई के गुण तो मिलते हैं लेकिन पुत्तन में बौद्धिकता थोड़ा ज्यादा है(नेपथ्य से आवाज आती है बरबाद हो गया लड़का).
Mrs and Mr Awathi
इंद्र अवस्थी के माता-पिता
पुत्तन ज्यादा पढ़ गये हैं.जबकि गुरुजी पढ़ने में जी चुराते थे.स्कूल नहीं जाते थे.सबेरे घर से स्कूल के लिये निकलते तो फुलवारियों,बगीचों में घूमा करते.फल -फूल तोड़ा करते थे.शाम को कपड़ों मे स्याही गिरा के घर आ जाते थे.ताकि लगे स्कूल होकर आये हैं.बड़े होने तक मां की गोद में घुस जाते रहे.रोज आकर अपनी मां से पूछते थे – हमारा नाम कब कालेज से कटेगा?तो उनकी मां बोलती थीं – जब तुम्हारा विवाह हो जायेगा तब तुम्हारी पढ़ाई छूट जायेगी.तो गुरुजी का संयोग से विवाह तय हुआ ,हो गया.पुरवा बारात गयी.जैसे ही बारात पुरवा से लौटकर मौरावां वापस आयी ,गुरुजी तमाम रस्मों को छोड़कर डोली से कूदकर अपनी मां की गोद में घुस गये और बोले -कल से स्कूल तो नहीं जाना पड़ेगा?
गुरुजी बहुत ऊंची चीज थे.एक बार हमारी भाभी के ऊपर भूत आ गया.गांव का मामला .एक तंत्र-मंत्र वाले थे .वे झाड़-फूक के लिये बुलाये गये.वे झाड़ने लगे.अंत में भूत ने कहा-(भूत जिसके ऊपर आता है उसी के माध्यम से बोलता है)कि हम लंबरदार हलवाई के यहां की रबड़ी खायेंगे.लंबरदार हलवाई की दुकान मशहूर मिठाई की दुकानों में थी मौरावां में.तो भइया खड़े थे वहीं.उन्होंने झट से पचास का नोट निकला और अपने लड़के से कहा-जाओ ओमी भाग के रबड़ी ले आओ.तो गुरुजी उस जगह हाजिर थे.गुरुजी ने कहा-रुक जाओ ओमिया(ओमी)और भाभी (अपनी बहू)के सामने हाथ जोड़ के खड़े हो गये. बोले-भूत बाबा ,अगर लंबरदार हलवाई के यहांकी रबड़ी खतम हो गयी होगी तो क्या बाबू हलवाई के यहां की रबड़ी ले लेंगे.तो भाभी ने हां में सिर हिला दिया लेकिन सर पर घूंघट कर लिया.तो गुरुजी बोले-तुम्हारी तो अइसी की तइसी भूत की.अगर रबड़ी ही खाने का शौक है तो जाके लंबरदार की दाढ़ी काहे नहीं हिलाते हो?
HPIM0086
डा.अवस्थी अपने साले डा.त्रिपाठी के साथ
गुरुजी स्वगत संवाद ज्यादा बोलते थे.अपने आप को संबोधित करके कुछ कहते थे फिर उसका जवाब भी खुद ही देते थे.मैं शुरु-शुरु मे कलकत्ता से मौरावां आया तो इस बारे में जानता नहीं था.गुरुजी के बगल वाले कमरे में लेटा था.सबेरे चार बजे नींद खुली तो सुना वो अपने को जगा रहे थे:-उठो जगदीश नारायन सबेरा हो गया .उठ जाओ नहीं तो पड़ेगी लात तो होश ठिकाने आ जायेंगे.मुझे लगा कि शायद बाबू के पास कोई और लेटा है.पूछने जाता था कि और कोई लेटा है क्या यहां ?वे गुस्से में कहते -यहां कौन है?फिर थोड़ी देर बाद नींद मुझे लगने लगे तो फिर गुरुजी के संवाद सुनायी देते:-जगदीश नारायण ये कलकत्ता से आये हैं.तुम्हारा जीना मुहाल कर देंगे.किसी तरह अपने दिन काटो लेकिन तुम भी कम नहीं हो.पूरी ताजी राते हिंद (कानून की किताब)तुम्हें जबानी याद है.तुम इनकी कविता-अविता निकाल दोगे सब एक ही झटके में.
गुरुजी हेमामालिनी की रोज पूजा करते थे.फोटो लगा रखी थी.आता-जाता कुछ नहीं था.धूप बत्ती जलाकर रोज जय देवीजी, जयदेवीजी रोज करते थे.गुरुजी का जब भोजन रखा जाता था तो थाली की आवाज होती थी.गुरुजी पीछे घूम के देखते थे.कहते -जगदीश नारायण खाना खा लेव नहीं तो कुत्ता खा जायेगा बैठे रहोगे रात भर भूखे.ये देवी तो कहीं जायेंगी नहीं. इनको फिर धूप बत्ती दिखा देना.
अद्भुत थे गुरुजी महीने में आठ दस बार बाल्टी कुयें में फेंक आते.जैसे पानी मांगा-एक गिलास पानी देव.गिलास जूठा होता तो धोने में दो मिनट लग जाता है.पर इतनी ही देर में गुरुजी की भौंहें चढ़ जाती थीं.पानी लाया जाता तो गुस्से में कहते-अब जगदीश नारायण पानी के लिये नहीं तरसेंगे.उठा के गिलास सड़क पर फेंक देते.और घर की सबसे भारी वजन की बाल्टी लेकर कुयें की तरफ चल पानी भरने के लिये.घर में पाइप है,बोरिंग है सब है लेकिन वो कुंये जाते थे.अब इतनी भारी बाल्टी उठा कहां पाते बीस-पचीस किलो वजन की.उसे वहीं कुयें में डाल के घर चले आते थे.महीने में पन्द्रह-बीस बार बाल्टी निकलवानी पड़ती थी.
गुरुजी बहुत जल्द नाराज होते थे.खुश भी.जब वे खुश या नाराज होते तो इजहार भी करते.तरीका यह कि तब वे अपनी धोती समेट के नितम्ब खुजलाने लगते.ऐसे ही किसी मौके पर आनन्दातिरेक में वे नितम्ब-घर्षण कर रहे थे.अचानक उनको अपने हाथ के अलावा कुछ खुरदुरा गीलापन भी महसूस हुआ .देखा तो पाया कि एक भैंस का बच्चा उनके नितम्ब-घर्षण में अपनी जीभ का योगदान कर रहा था.वे गुस्से में फिर नितम्ब-घर्षण में जुट गये.
ठेलुहई की यह परंपरा आगे की पीढ़ियों को भी हस्तान्तरित होती रही.जब देहावसान हुआ गुरुबाबा का तो उनके पोते का स्वत: स्फूर्त बयान था:-”आज पंद्रह अगस्त है.आज के ही दिन देश आजाद हुआ था.आज ही गुरुबाबा भी आजाद हो गये”.
अनगिनत यादें हैं गुरुजी से जुड़ी.वे ठेलुहई के चलते-फिरते स्कूल थे.अब ऐसे अद्भुत लोग कम होते जा रहे हैं.

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

4 responses to “ठेलुहई की परम्परा”

  1. विजय ठाकुर
    अहोभाग्य उन्नाव के, अब तो लगता है उन्नाव से गुजरने ही पड़ेगा।
  2. फ़ुरसतिया » जहां का रावण कभी नहीं मरता
    [...] के अवसर पर ठेलुहा नरेश के पिताश्री डा.अरुण प्रकाश अवस्थी से सुने मौरावां के � [...]
  3. फुरसतिया » याद तो हमें भी आती है
    [...] इंद्र अवस्थी खानदानी ठेलुहा हैं। आलस्य से इनका चिरस्थायी गठबंधन है। इंद्र अवस्थी में ठेलुहई के कीटाणु होने की बात की ठेलुहई को पुष्टि करते हुये उनके पिताजी ने कहा- लल्ला पर जो पुत्तन का जो लेख पढ़ा वह वास्तव में बड़ा सशक्त रेखाचित्र है. -रेखैचित्र कहा जायेगा इसे ,हय कि नहीं !.लल्ला भी एक अद्वितीय जीव हैं।जैसे जीवन में कुछ बुराइयां होती हैं लेकिन वे अनिवार्य बुराइयां होती हैं जैसे हमारे मौरावां के फकीरे हैं।वैसे ही लल्ला में चाहे जो बुराई हों लेकिन लल्ला की उपस्थिति हर मौके पर अनिवार्य रहती है।पुत्तन का लेख मैंने पढ़ा और पढ़कर मुझे लगा जैसे जो वंश परम्परा में ठेलुहई के कीटाणु होते हैं वे पुत्तन में मौजूद हैं। [...]

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