Saturday, May 28, 2005

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ



मैं ,
अक्सर,
एक गौरैया के बारे में सोचता हूं,
वह कहाँ रहती है -कुछ पता नहीं।
खैर, कहीं सोच लें,
किसी पिजरें में-
या किसी घोसले में,
कुछ फर्क नहीं पड़ता।
गौरैया ,
अपनी बच्ची के साथ,
दूर-दूर तक फैले आसमान को,
टुकुर-टुकुर ताकती है।
कभी-कभी,
पिंजरे की तीली,
फैलाती,खींचती -
खटखटाती है ।
दाना-पानी के बाद,
चुपचाप सो जाती है -
तनाव ,चिन्ता ,खीझ से मुक्त,
सिर्फ एक थकन भरी नींद।
जब कभी मुनियाँ चिंचिंयाती है,
गौरैया -
उसे अपने आंचल में समेट लेती है,
प्यार से ,दुलार से।
कभी-कभी मुनिया गौरैया से कहती होगी -
अम्मा ये दरवाजा खुला है,
आओ इससे बाहर निकल चलें,
खुले आसमान में जी भर उड़ें।
इस पर गौरैया उसे,
झपटकर डपट देती होगी-
खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

6 responses to “ऐसा पहले कभी नहीं हुआ”

  1. neha

  2. ringtone
    ringtone
    ringtone And what a snow-pass vestures it, ringtone and secret-place to be target-shooting danger from frasers gray-stone people! It has
  3. फुरसतिया » मोहल्ले की प्रकृति और नारद
    [...] आज मेरी पसंद में, महिला दिवस के अवसर पर, अपनी एक पुरानी कविता पोस्ट कर रहा हूं। यह कविता मैंने करीब बीस साल पहले लिखी थी लेकिन मुझे लगता है कि आज भी यह समाज के एक बड़े हिस्से का सच है। मेरी पसंद मैं , अक्सर, एक गौरैया के बारे में सोचता हूं, वह कहाँ रहती है -कुछ पता नहीं। [...]
  4. गौतम राजरिशी
    प्रविष्टि की तारीख देखता हूँ, मई २००५….और फिर कविता पढ़ने लगता हूँ। वैसे आज मुझे पढ़ना नहीं चाहिये था इसे, क्योंकि अभी “ओस की बूंद” का जादू घेरे हुये है। लेकिन फुरसत से हूँ अभी “फुरसतिय” पे।
    और अब इस कविता को पढ़कर सोच रहा हूँ कि हर हमेशा मौज लेने वाले, परसाई के व्यंग्य और हँसी-मजाक के जुमले बिखेरने वाले फुरसतिया के इस रूप की जानकारी जाने कितने लोगों को होगी…???
    …वो अभी जो “पत्नि” वाला लिंक था, वो कोई दूसरा ब्लौग है क्या आपका? क्योंकि उसका ले-आउट कुछ दूसरा था
  5. ghughutibasuti
    हाँ, आज भी यही सच है।
    घुघूती बासूती
  6. …कविता का मसौदा और विश्व गौरैया दिवस
    [...] इस पर गौरैया उसे, झपटकर डपट देती होगी- खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। अनूप शुक्ल [...]

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