Thursday, September 14, 2006

मजाक,मजाक में हिंदी दिवस

http://web.archive.org/web/20110622182047/http://hindini.com/fursatiya/archives/188

मजाक,मजाक में हिंदी दिवस

लो कल्लो बात!
मजाक,मजाक में शुऐब एक साल और जवान हो गये।
मजाक,मजाक में चिट्‌ठाजगत के पितामाह के नाम से बदनाम देबाशीष एक साल और महान हो गये।
यह तो चलो होना ही था लेकिन उधर गजब ये हुआ कि मजाक,मजाक में नारदजी हलकान हो गये। बोलते, चहकते अचानक बेजबान हो गये। वे चलते-चलते थक गये और थककर बैठ गये। अब सब मना रहे हैं नारदजी आ जाइये,नारदजी आ जाइये। (जैसे कभी स्टोव के ऊपर ऊंगलियाँ रखकर कहते थे स्टोव देवता आ जाइये, स्टोव देवता आ जाइये)। लोग नारद जी को उठाने,मनाने में लगे हैं।आशा है जल्द ही वे ठीक होकर फिर से ब्लाग-वीणा बजाने लगेंगे।
कुछ और मजाक करने के पहले बता दूँ कि ये मजाक,मजाक में वाला अंदाज लाफ्टर चैलेंज के राजू श्रीवास्तव का है जो कि कनपुरिया हैं और हर कनपुरिया आइटम का मनमाफिक प्रयोग करने का हमारा अधिकार है चाहे वो राजू श्रीवास्तव हों या जीतेंदर चौधरी।
हां तो हम खडे़ थे वहाँ जहाँ पर नारद जी बैठे थे। नारद जी तो बैठ गये लेकिन अभी तक किसी संगठन ने इसकी जिम्मेदारी ली नहीं। लेकिन कोई बात नहीं,हम हैं न बताने के लिये। जैसे कि भारत में हुई हर खुराफात के लिये पाकिस्तान जिम्मेदार होता है वैसे ही चिट्ठाजगत में जो भी लफड़ा होता है उसके लिये जीतेंदर बाई डिफाल्ट जिम्मेदार होते हैं। तो जीतेंदर ही जिम्मेदार हैं नारदजी की इस दशा ,दुर्दशा के लिये।
यह मैं इसलिये भी कह रहा हूँ ताकि कोई यह न कह सके कि कनपुरिये गैरजिम्मेदार होते हैं। हमारे जीतेंदर,कानपुरी तक-जब किसी न किसी बात के लिये जिम्मेदार ठहराये जा सकते हैं। और जब जीतेंदर जैसे को जिम्मेदार बताया जा सकता है तो बाकी लोगों का कहना ही क्या!
अब जब निर्णय हो ही गया तो उसे सिद्ध भी कर दिया जाये।
बात यह है कि जीतेंद्र नारद को पालते-पोसते रहे। उन्होंने उसकी परवरिश की। अब जब उनके हालत हवा-हवा हो गयी तो दोष भी उन्हीं का । यहां तो भाई लोग घर से मरीज को कोमा में ले जाते हैं और मृत्यु प्रमाणपत्र देने वाले डाक्टर की कार पर गुम्मे बरसाते हैं। भारत की दुर्दशा के लिये लोग टिम्बकटू वाले को नहीं भारत के नेताओ को कोसते हैं,क्योंकि नेता के अलावा और है कौन जो देश की बरबादी जैसा महान आरोप अपने ऊपर वहन कर सके। सारी जिम्मेदारी तो नेता ही ओढ़ता-बिछाता है।
जीतेंदर और दूसरे साथी चिट्ठाकार भी ब्लागर-संख्या को भारत की जनसंख्या की तरह बढा़ने के लिये पसीना बहाते रहे।जिसने दो बार हिंदी में नमस्ते बोल दिया उसका ब्लाग बनवा दिया। जिस ब्लाग पर भी हिंदी दिखी उसे नारद नत्थी कर दिया -जैसे भारत के अतीत पर गर्व करने वाले दुनिया के किसी भी ‘आई.पी.पते.’ पर हुयी किसी भी तरह की प्रगति को ‘अरे ये तो हमारे महान देश में पहले ही हो चुका है ‘ से जोड़ देते हैं। कलाम साहब की तरह लक्ष्य ऊंचा रखा। नारद की क्षमता उनपर पड़े काम के मुकाबले कम थी।नारद की हालत सोवियत संघ की तरह हो गयी जो हर अमेरिका विरोधी को सहयोग देते देते बैठ गया । और अंतत: वे बैठ गये-स्व.रमानाथ अवस्थी की कविता दोहराते हुये-
मेरे पंख कट गये हैं,वर्ना मैं गगन को गाता।
अब नारदजी को मनाते हुये चिट्ठाकार रमानाथजी की ही लाइने उनको सुना रहे हैं:-
कुछ कर गुजरने के लिये मौसम नहीं,मन चाहिये।
थक कर बैठो नहीं ,प्रतीक्षा कर रहा कोई कहीं
दूरी कहीं कोई नहीं केवल समर्पण चाहिये।
कुछ कर गुजरने के लिये मौसम नहीं,मन चाहिये ।

बहरहाल,जैसा कि खबर है नारद्जी की तबियत जल्द ही ठीक होगी। लगभग सभी साथियों ने सहयोग का आश्वासन दिया है। कुछ लोगों ने सोचा खाली सहयोग खाली-खाली लगता है लिहाजा डब्बा भर उपदेश भी दे दिया,हिदायतें भी पैक कर दीं।हमने सोचा पैसा तो हाथ का मैल है ,मैल देना ठीक नहीं है लिहाजा तय किया कि उपदेश ही दिया जाये लेकिन पता चला कि हम परिचर्चा का पासवर्ड बोले त कूट शब्द ही भूल गये हैं। हमारे आंख के सामने तमाम साथी अपने सुझाव लहरा रहे थे और हम अपना पासवर्ड खोजने में बार-बार सफलतापूर्वक असफल होते रहे।
हमने फिर वही किया जो लोग करते हैं। दूसरा खाता खोल लिया परिचर्चा में और सहयोग का आश्वासन दे दिया गोलमोल। यह भी नहीं बताया कि चवन्नी देंगे या अठन्नी बस कह दिया सहयोगे देंगे ।अब हमने उपदेश देने के लिये डायलाग बना लिये और कीबोर्ड पर मत्था नवाकर टाइप शुरू ही करने वाले थे कि हमारे कने एक ई-मेल आकर टपकी। उसमें मंदक अमित ने हड़काया आप-वाप कहते हुये कि यह परिचर्चा के नियम के खिलाफ है कि दो पते नाम से भाग लिया जाय।
ये होता है सच बोलने का खामियाजा । हम अगर अपना नाम गलत लिखते,ई-मेल दूसरा वाला लिखते तो सबरे महारथी ई-मेल की दूरी बनाकर बधाई-गीत गाते।नाम कन्याराशि होता तो लोग हमारी भाषा में लालित्य खोज लेते लेकिन हम सच बोले और पकड़ गये।
हमको बताया गया केवल सूचनार्थ लेकिन हमने हड़क जाना बेहतर समझा।हम जितना परेशान दूसरा परिचर्चा खाता खोल के हुये उससे आधा भी अगर उदित नारायण अपनी दूसरी पत्नी का खाता खोलकर हुये होते तो दोनों दुलहिनों को तलाक देकर चले जाते हिमालय -मैली गंगा देखने (या करने!)। बहरहाल हमने अंग्रेजी के बडे़ अक्षर में सारी लिखा और उधर से भूल-चूक लेनी देनी का अभयदान पाया।
बात चली तो बतायें कि परिचर्चा में जो यह मंदक शब्द है वह कुछ अटपटा सा लगता है। लगता है शेयर बाजार आ गये हैं जहां जिसे देखो मंदड़िये छाये हैं , तेजड़िये का कहीं पता ही नहीं। पता नहीं कि यह मुझे ही लगता है या किसी दूसरे को भी!
बहरहाल ,बात हो रही थी नारद की। मेरे विचार में तो नारद बैठ गया अच्छा ही हुआ। तमाम सफलतायें जो नहीं सिखा पातीं वह एक असफलता सिखा देती है। लोगों ने सुझाव भी अपनी-अपनी समझ और अनुभव से दिये हैं। साइट को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का सुझाव और हम तो पहले ही कह रहे थे ऐसा करना जरूरी है ,वाला सुझाव राजपथ वाला सुझाव है।आपस में चंदा करने का सुझाव तात्कालिक हल है और उस पर काम शुरू भी हो चुका है।
एक सुझाव यह भी है कि लोग अपने ब्लाग को रजिस्टर कराते समय कुछ पैसा दें। लेकिन यह चलने का नहीं मेरे ख्याल में। मैं अपनी सोच बताऊं कि यदि
मैं जितना सहयोग दूंगा उससे कई गुना ज्यादा दिलवा दूंगा अपने सम्पर्कों से लेकिन अगर यह बात तय होती है कि अपने को रजिस्टर करवा कर पढ़वाना है तो हो सकता हैं मैं सबसे नमस्ते कर लूं। संभव है कि मेरी सोच बचकानी हो लेकिन अब है तो हम क्या करें।यही विचार ब्लाग में शुल्क लगाकर लेख पढ़वाने के बारे में है मेरा। चाहे जितना अच्छा लिखने वाला हो मैं उसे नेट पर पैसे देकर नियमित क्या कभी नहीं पढ़ना चाहूंगा। न अपने किसी पाठक से आशा करुंगा कि मेरा कोई लेख नेट पर पढ़ने के पहले अपनी टेंट ढीली करे। फिलहाल आज की मेरी सोच यह है आगे की खुदा जाने।
यह कोई न सोचे कि हम मांगकर पढ़ने वालों की जमात के हैं। हम नियमित किताबें खरीद कर पढ़ने वालों में हैं। लेकिन नेट पर पैसे देकर पढ़ना अभी तक समझ नहीं आया।
अव्वल तो चालू होने के बाद अब नारद फिलहाल पैसे के लिये बंद नहीं होगा। इंशाअल्लाह आगे भी चलता रहेगा। विज्ञापन की बात भी समय के हिसाब से तय होगी। लेकिन यह जो नया आइडिया है कुछ लोगों का कि अपना सर्वर हो ,अपनी क्षमतायें हों यह विचार कुछ जमने वाला सा है। क्या इसके परिणाम होंगे यह तो समय बतायेगा लेकिन यह लगता है कि ऐसा होना चाहिये। मुझे पता नहीं क्या इसका स्वरूप होगा लेकिन मेरे मन में यह है कि हिंदी का एक ऐसा सर्वर हो जिसमें सारे नहीं तो अधिकतर लोग जु़ड़े हों। सारा टीम-टामडा़ एक जगह हो।
ऐसा होना मुझे नहीं लगता कि कोई बहुत बड़ी बात है ।मेरा अपना अनुभव रहा है कि यदि आपके इरादे नेक हैं और साफ हैं तो और कोई अड़चन भले आये लेकिन पैसा कभी रुकावट नहीं बनता।
अब देखिये मजाक-मजाक में शुरू की गयी बात कितनी भारी हो गयी।अब जब बात पैसे की ही हो रही है तो कुछ समय और फ़ूंक दिया जाये इसपर। और कोई काम जरूरी न हो तो आगे भी पढ़ लिया जाय।
अक्सर लोग अपने ब्लाग को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की बात करते हैं। कुछ लोग तो इतने आशावादी हैं कि इधर विज्ञापन लगाया उधर लाकर लेने के लिये दौड़ पड़े। मुझे इस बारे में कोई अंदाजा नहीं लेकिन रवि रतलामी जी बताते हैं कि जहां ब्लाग पर द्स हजार हिट्स रोज हुई नहीं कि बस डालर गिनना शुरू हो जायेगा।
मुझे यह सही में समझ में नहीं आया कि द्स हजार हिट्स कब होंगे? भयंकर आशावादी होते हुये भी मुझे नहीं लगता कि कम से कम मेरे ब्लाग पर द्स हजार लोग रोज आयेंगे। यह विडंबना है लेकिन सच भी कि हिंदी के पाठक समाचारों के अलावा बहुत कम हैं।
अभिव्यक्ति शायद हिंदी की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली नेट पत्रिका है। पिछले माह इसने छह साल पूरे किये। देश-विदेश के पाठ्य क्रम में इसकी सामग्री संदर्भ के रूप में ग्रहण की जाती है। इतनी समृद्ध पत्रिका की औसत हिट्स मात्र ५०० प्रतिदिन है। द्स हजार का आंकड़ा न जाने कब छुयेगी यह पत्रिका।
मेरे काउंटर के हिसाब से मेरे ब्लाग पर अधिकतम हिट्स लगभग ३५० का रहा है। बाकी दिन आम तौर पर लगभग १०० रहता है(जिसमें से १०% तो मेरे ही होंगे)। ये अधिकतम हिट्स भी केवल मेरे लेखन के चलते नहीं हुये हैं।यह इसलिये हुये उस दिन मैंने व्यक्तिपरक लेख लिखे थे(पूर्णिमा वर्मन,देबाशीष आदि)। तो जो लोग मेरे ब्लाग में आये वो मेरे पाठक कम उनके प्रशंसक ज्यादा थे जिनके बारे में मैने लेख लिखे।
ऐसे में ब्लागलेखन के जरिये कमाई की बात और ऐसी कमाई कि पैसों की बरसात होने लगेगी ,सोचना कितना सही है यह मैं अभी तक तय नहीं कर पाया। दो-चार लोगों के लाखों कमाने की बात कुछ ऐसी ही है जैसे कि आई.आई.एम.से पास हुए किसी ग्रेजुएट का करोंड़ों रुपये से नौकरी शुरू करने की बात से यह निष्कर्ष निकालना कि सारे ग्रेजुएट करोंड़ों कमा रहे हैं। अपवादों का सामान्यी करण करना होगा यह।
प्रिंट मीडिया की भी कुछ बात हो जाय। हमारे मित्र गोविंद उपाध्याय ने करीब २००-२५० कहानी लिखीं हैं। भारत की लगभग कर अच्छी पत्रिका में छप चुके हैं। पिछ्ले दिनों बिहारी जी जब भारत आये तो अड़ गये उनका कहानी संकलन छपाने के लिये। बहुत मेहनत की तो प्रकाशक ने करार नामा भेजा। उसमें शर्तें थीं:-
१.सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन आगे की पीढ़ियों तक।
२.कुल पचास प्रतियां लेखक को मिलेंगीं।
३.सम्पादक की मर्जी वो जितनी चाहे उतनी किताबें छापे।
४.पैसे लेखक को एक नहीं मिलेंगे।
कुछ पत्रिकाऒं,अखबारों से भले मेहनताना मिल जाता हो लेकिन ज्यादातर पत्रिकायें हिंदी की सेवा वाली ही होती हैं जो खुद लेखक से सहयोग मांगती हैं।
लब्बोलुआब यही है कि हिंदी में लेखन मात्र से इतना पैसा जुटाना मुश्किल काम है कि इसे जीविका का सहारा नहीं बनाया जा सकता ।
पिछ्ले दिनों कानपुर से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका अकार में नामवर सिंह जी का इंटरव्यू छपा था। नामवर जी अनगिनत कमेटियों के अध्यक्ष हैं तमाम किताबें लिखीं हैं। प्रभाव के लिहाज से हिंदी साहित्य में सर्वाधिक प्रभावी लोगों में से हैं। उनका कहना है कि मात्र हिंदी में लेखन करके जीविका नहीं कमाई जा सकती ।
हो सकता है कि मेरी सोच सही न हो लेकिन अपने आस-पास किसी को भी अभी तक केवल हिदी में लेखन के बल पर जीविका चलाते मैंने नहीं देखा है। इसीलिये सवाल उठता है कि आये दिन ब्लाग से कमाई का जो हल्ला उठता है वह सही है या अतिआशावादिता!
यह कुछ बातें मैंने लिखनी शुरू की थीं हल्के-फुल्के मूड में लेकिन देखो माया ने भरमा दिया और माहौल बोझिल होकर हिंदी दिवस सा हो गया।
आज यानि कि १४ सितंबर को हमारे नामाराशि अनूप भार्गव जी को लखनऊ में मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिये हिंदी साहित्य अकादमी की तरफ से सम्मानित किया जायेगा। समय -दिन ११ बजे ,स्थान -गन्ना शोध संस्थान,लख्ननऊ।जो साथी लखनऊ में हैं वे पहुंचे इस घटना को यादगार बनते देखने के लिये।
नारद के शीघ्र ही पुन: अवतरित होने के लिये मंगलकामनायें।
हिंदी दिवस पर सभी साथियों को बधाई और शुभकामनायें।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

16 responses to “मजाक,मजाक में हिंदी दिवस”

  1. जगदीश भाटिया
    हिंदी दिवस पर आपको भी बधाई। लगे हाथ कोई यह भी बता पाता कि नारद पर प्रतिदिन औसत कितने हिट लगते हैं?
  2. सुनील
    अनूप जी, पुरस्कार के लिए बहुत बधाई और नारद के दुखों के विवरण के लिए धन्यवाद. यह सच है कि केवल हिंदी लेखन के बल पर जीना न पहले ही आसान था और न आज भी आसान है, पर यह आशा कि बदलती तकनीकी से ऐसा समय आये जब यह स्थिति बदल सके, वह अवश्य बनी रहती है.
  3. प्रत्यक्षा
    वाह ! बहुत बढिया लिखा । कई रंग हैं इस लेख में ।मज़ाक मज़ाक में गहरी बात कह दी ।
  4. आशीष
    ये तो जरूर है कि हिन्दी दिवस एक बहुत बडा मजाक है। किसी ने सुना है अंग्रेजी दिवस या फ्रेण्च दिवस के बारे मे ?
    हिन्दी के लिये एक दिन, बाकी ३६४ दिन का क्या ? हिन्दी को इतनी भीखारी भाषा मत बनाईये !
    मै हिन्दी दिवस का विरोध करता हूं, भले ही मुझे बजरंगदल जैसा कट्टर समझ लिया जाये !
  5. सागर चन्द नाहर
    एक कटु सत्य आपने लिखा कि हिन्दी की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पत्रिका अभिव्यक्ति के मात्र ५०० हिट्स रोजाना होते हैं। मैं एक जानकारी देना चाहता हुँ कि गुजराती चिट्ठे/ जालस्थल “रीड गुजराती” www. readgujarati.com के रोजाना ९००-१००० हिटस होते हैं और टिप्पणीयाँ अमूमन ४०-५० होती है।
    यहाँ भी देखें
    http://pustakparichay.wordpress.com/welcome-note/
  6. अफ़लातून
    उन्मुक्त ने नारद वाला काम बिना धन के शुरु कर दिया है http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/09/blog-post_11.html पर .चन्दा भी नहीं मांग रहे ,न पंजीकरण -शुल्क की चर्चा है .हिन्दी दिवस पर अपने अपने चिट्ठों के प्रचार से अलग भी सोचें .
    क्या चिट्ठेबाज सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग से सम्पूर्ण गांधी वाङमय हिन्दी में उपलब्ध कराने के लिये एक ई-अभियान छेड सकते हैं? अंग्रेजी में सभी १०० खण्ड जाल पर उपलब्ध हैं .
  7. eswami
    अफ़लातूनजी महाराज,
    नारद के अनेकों स्थायी, अस्थायी विकल्प जैसे http://feeder.amitgupta.in, चिट्ठा-विश्व मुफ़्त में मुहैया थे, हैं और रहेंगे!
    नारद की अनुपलब्धी की वजह तकनीकी है आर्थिक नहीं! वो छोटे सेट-अप पर चलने वाली जुगत थी – अब जरूरतें अधिक हैं. उन्मुक्त ने बस सक्रिय चिट्ठों की सूची दी है – नई प्रविष्ठियों की सूचना देने का प्रबंध नहीं.
    आपकी जानकारी के लिए बता दूं की पंजीकरण-शुल्क उन्मुक्त जी का ही आईडिया था (http://akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?pid=4818#p4818
    ) – वे शायद यह कहना चाहते थे की अगर नारद को बडे सेट-अप पर ले जाना है और हमनें अर्थदान का जिम्मा लोगों के स्वविवेक पर छोडा तो वे शायद ना ही करें – उनका भय भी अनुभवजन्य रहा होगा. शायद वे चाहते होंगे की गंभीर ब्लागर्स ही जुडें समूह से या एक न्यायिक तरीका सबके जिम्मेदारी के निर्वाह का की कुछ ही सदस्यों पर आर्थिक जिम्मा ना आए- वे ही बेहतर बता सकते हैं अपने विचारों की वजह.
    इस समूह में सभी ने अपने अपने तरीके से जनहित की बात ही की है. हमारी बढती जरूरतों को सलीके से पूरा करने के लिए हमें अव्यावसायिक सहकार करना ही होगा -शुल्क ही एक तरीका नही है आत्मानुशासित सक्रिय और उत्साही सदस्यों के रहते कोई समूह पीछे नही रहता! अधिक जानकारी के लिए परिचर्चा फ़ोरम पर पढते रहिए और चिट्ठाकार समूह की मेलें भी – पूरी तरह सूचित रहेंगे समूह के क्रिया कलाप से.
  8. अफ़लातून
    ई स्वामीजी महाराज ,
    उन्मुक्त जी ने http://unmukts.wordpress.com/ पर नई प्रविष्टियों की फ़ीड का लिंक (http://hindi-b-h.blogspot.com/) भी दिया है . Feedburner भी यह सेवा देता है .उन्मुक्त जी ने शुरु में गैर मशीनी मेहनत भी की जब सभी चिट्ठों का फ़ीड जुटाया . उन्हें यह आशा है कि ऐच्छिक दान के बावजूद नारद जब शुरु होगा तब बगैर पंजीकरण शुल्क के ही होगा .
    चिट्ठाकार (गूगल समूह ) का सदस्य मैं भी हूं . मैं अनूप और उन्मुक्त की भांति आशा करता हूं कि नारद या उसके जैसी सेवा में पंजीकरण शुल्क नहीं होना चाहिये .हिन्दी चिट्ठेकारों के लिए यह और जरूरी है.
  9. SHUAIB
    आपको बधाई और हिंदी दिवस पर भी बधाई।
    आप भी मज़ाक मज़ाक मे बहुत कुछ लिख गए।
    मुझ से एक गलत काम ये हुआ कि पहले तो मैं ने अपने चिट्ठे से दूसरे हिन्दी चिट्ठों के लिंक्स निकाल दिया था, क्योंकि नारद जी के ज़िनदा रहते सभी के ब्लॉग्स पर आना-जाना आसान था। दुआ है के नारद जी की थकावट खतम हो और फिर जवान जवान चलते रहें :)
  10. समीर लाल
    मेरे काउंटर के हिसाब से मेरे ब्लाग पर अधिकतम हिट्स लगभग ३५० का रहा है। बाकी दिन आम तौर पर लगभग १०० रहता है (जिसमें से १०% तो मेरे ही होंगे)। अच्छा है, हम तो अभी इसकी भी राह तक रहे हैं. :) हमें तो यही १०००० का सा लग रहा है.
    वैसे अन्य बातों को ध्यान मे ना रखा जाये तो हिन्दी चिठ्ठाकारी मे बढत देखते हुये भविष्य के प्रति आशस्वत रहा जा सकता है. वैसे अभी तो शुरुवात है, बहुत काम बाकी है…वक्त तो लगेगा..और वो तो हर अच्छे कार्य को उन्नत स्वरुप देने मे लगता है.कुछ भी सृजनात्मक तो रातों रात नही होता.
    हिन्दी की उन्न्ती के लिये ढेरों शुभकामनाऎं…बस हम संकल्पित रहें कि हम अपना कार्य करते चलेंगे, देखिये कैसे कारवां बनता जायेगा…
  11. Mitul
    अनूप, यह बताने के लिए कि आज हिंदी दिवस है काफी धन्यवाद। अन्य लेखो के जैसे ही हमे यह लेख भी काफी अच्छा लगा। मजाक मजाक मे ही आपने काफी सारी व्यावहारिक बाते कह दी।
    हमे तो हिंदी दिवस का अस्तित्व याद करता है कि हिंदी के विकास के बारे मे और काम करना चाहिए। अब यह व्यक्तिगत सोच है कि आप इसको कैसे मानते है। कुछ तर्क है कि बाकि के दिनो का क्या? तो उनके लिए – आप बच्चो और अपने माता-पिता का जन्मदिन एक दिन मनाते है, शादी की सालगिरह एक दिन मनाते है। तो बाकी के दिनो का क्या?? उनको भूल जाते है??
    शिकायते क्यों?? जब लोग शिकायत कर रहे है, तो हमे भी करनी है शिकायत। हमे शिकायतो से शिकायत है। नकारत्मक सोच को जन्म देती हुई शिकायते, आत्मविश्वास को डगमाती हुई शिकायते, कुछ न करने का बहाना देती शिकायते।
    मैने विकिपीडिया पे हिंदी के लेखो को एकत्रित करके विकिपोर्टल बनाया है: http://hi.wikipedia.org/wiki/Portal:हिंदी । वहाँ कुछ पसंद नही आए तो बद्ल दे या बदलने के लिए चर्चा करे।
    हमे भी समीर लाल जी के ही शब्द दोहराने है “हिन्दी की उन्न्ती के लिये ढेरों शुभकामनाऎं…बस हम संकल्पित रहें कि हम अपना कार्य करते चलेंगे, देखिये कैसे कारवां बनता जायेगा…”
  12. सृजन शिल्पी
    “नामवर जी….का कहना है कि मात्र हिंदी में लेखन करके जीविका नहीं कमाई जा सकती।”
    शायद इसीलिए नामवर जी ने पिछले बीस वर्षों से लिखना लगभग छोड़ ही दिया है और अध्यक्षीय भाषण देने का पेशा अपना लिया है। बोलने में लिखने की तुलना में कहीं ज्यादा और तत्काल नगद नारायण की प्राप्ति होती है। उनके पटु शिष्य पुरुषोत्तम अग्रवाल भी उन्हीं के नक्शेकदम पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ख़ैर…
    आप जो कह रहे हैं वह स्वतंत्र लेखन के संदर्भ में कुछ हद तक सही है। साहित्य अर्थात् कविता-कहानी-समीक्षा आदि लिखने में अधिक आमदनी की गुंजाइश शायद नहीं हो, लेकिन यदि पेशेवर कुशलता के साथ हिन्दी में तमाम प्रासंगिक विषयों पर लगातार स्तरीय लेखन किया जाए, तो आज भी हिन्दी में जीविका कमाई जा सकती है। ऐसे दर्जनों उदाहरण आज भी मौजूद हैं, लेकिन आप अंग्रेजी से उनकी तुलना करके नहीं चल सकते। यह सही है कि हिन्दी के प्रकाशकों और संपादकों द्वारा स्वतंत्र लेखकों का शोषण किया जाता है।
    हिन्दी में लिखने वालों को इंटरनेट की संभावनाओं और ई-कॉमर्स की तरकीबों का दोहन करने की कला सीखनी पड़ेगी। आदर्शवाद और सेवा भावना के साथ-साथ व्यावहारिकता एवं व्यावसायिकता को अपनाना कोई ओझी बात नहीं है।
  13. रवि
    …हिन्दी में लिखने वालों को इंटरनेट की संभावनाओं और ई-कॉमर्स की तरकीबों का दोहन करने की कला सीखनी पड़ेगी। आदर्शवाद और सेवा भावना के साथ-साथ व्यावहारिकता एवं व्यावसायिकता को अपनाना कोई ओझी बात नहीं है।…
    यही तो मेरा भी कहना है. परंतु शायद मैं ठीक से नहीं कह पाया था. और शायद लोग भी इसी वजह से समझ नहीं पा रहे थे.
  14. जीतू
    हिन्दी लेखन मे अपार सम्भावनाएं है, इन्टरनैट के आने से प्रकाशक वर्ग बीच से निकल गया इसलिए दोहन का भी खतरा नही।
    आज जरुरत है तकनीक और लेखन के तालमेल की। जो लोग ब्लॉग लिखते है, लगभग सभी तकनीकी लोग है। जो लोग लेखन के क्षेत्र से आएं है उन्हे तकनीकी रुप से स्वावलम्बी होना ही पड़ेगा। ये वक्त की जरुरत है।
    रही बात पैसा कमाने की, विज्ञापनों को एक किनारे करिए, कन्टेन्ट से ही वारे न्यारे हो सकते है। बशर्ते लेखनी मे दम हो। सम्भावनाएं अपार है।
    लेकिन हम लोग आपसे मे इतनी पिल्लम पिल्ली काहे कर रहे है? वक्त बदल रहा है, लोग भी बदलेंगे। समय के साथ साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा।
  15. kali
    आप मजाक मजाक में सब कथा व्यथा बता गऍ. स्वामी बिना मजाक के उपाय गिना गऍ. हम भी मजाक मजाक में नारद से आषीष नारायण की शरण में चले गऍ.
  16. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] मेरे लाल 4. गालिब भी गये थे कलकत्ता… 5. मजाक,मजाक में हिंदी दिवस 6. अनूप भार्गव सम्मानित 7. …अथ लखनऊ [...]

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