Saturday, September 23, 2006

फप्सी हाट में कविता का ठाठ

http://web.archive.org/web/20110910021551/http://hindini.com/fursatiya/archives/191

फप्सी हाट में कविता का ठाठ

[हमारे तमाम दोस्त आज सप्ताहांत सुरूर में होंगे जो नहीं होंगे वे होने वाले होंगे।इसी सप्ताहांत में टोरंटो के पास हमारे कवि ब्लागर बंधु कवि सम्मेलन में धमाल करने वाले हैं।इस मौके पर कुछ तुकबंदियां भी होंगी जिनको कविता के नाम पर झेलाया जायेगा। ऐसी ही एक तुकबंदी यहां हम भी झेला रहे हैं ।
यह कविता उड़ीसा के बोलनगीर जिले के बडमल नामक स्थान में लिखी गयी थी। यह वह जगह है जहां स्व.इंदिरा गांधी जी ने अपनी असामयिक मौत से एक दिन पहले आयुध निर्माणी की स्थापना की थी। बीहड़ जंगल में स्थित यह स्थान कितना विकसित था उन दिनों इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पेट्रोल और गैसे जैसी चीजों के लिये पचास किलोमीटर दूर बोलनगीर जाना पड़ता था। अन्य सामानों की तरह यहां सब्जी भी दुर्लभ होती थी और सप्ताह में मात्र एक दिन मिलती थी।उस दिन सारे लोग स्थानीय फप्सी हाट में सब्जियां खरीदते पाये जाते।उन दिनों रामायण ,महाभारत के सीरियल मनोरंजन के एक मात्र माध्यम थे।

इस बीहड़ में मौज-मजे मस्ती करने वाले लोग थे। मैं भी वहां ढाई साल रहा। हमारे सीनियर मित्र आर.के.तिवारी के ऐसे ही एक हाट के दिन की कहानी लिखी था जो बाद में कविता के नाम से जानी गयी। दुबले-पतले शरीर वाले तिवारी जी विराट व्यक्तित्व के धनी हैं और साथियों में बाबा के नाम से तब से जाने जाते हैं जब उनके एक भी बच्चे पैदा नहीं हुये थे।तिवारीजी आजकल आयुध निर्माणी ,खमरिया ,जबलपुर में कार्यरत हैं।]
फप्सी हाट,संडे का हाट,
टाइम हुआ है सबेरे का आठ।
आफिस में छुट्टी,टी वी से कट्टी,
संडे प्रोगाम अब लगते हैं खट्टी।
रामायन की भक्ति,महाभारत की शक्ति,
अब तो है सबसे मुक्ति ही मुक्ति।।
टी वी के कीडे़ भी जाते हैं फप्सी,
संडे प्रोग्राम छोड़ आते हैं फप्सी।
टीवी की बोरियत से पीछा छुडा़कर,
अब औरतें और बच्चे भी जाते हैं फप्सी।।
थम्स अप न कोला, लिम्का न पेप्सी,
फिर भी सभी दौड़ पड़ते हैं फप्सी।
न गाड़ी न मोटर न रिक्शा न टैक्सी,
फिर भी न कोई छोड़ पाता है फप्सी।।
कब तक सोऒगे पत्नी ने डांटा,
जाते हो फप्सी कि लगाऊं चांटा।
जल्दी जाओ वर्ना कुछ न मिलेगी,
स्कूटर अलग से तेल पी लेगी।।
मधुर मल्हार पति के कानों तक आया,
आंख खुली और दिल घबराया।
सूट पहनकर स्कूटर दबाया,
पर स्कूटर है रिजर्व में यह न देख पाया।।
स्कूटर बेचारी बस मंदिर तक पहुंची,
आगे की दूरी – कृपा जगन्नाथ की।।
चल पड़े बेचारे वह मंदिर पैदल,
साथ उनके था पैदलों का एक दल।
पगडण्डी पर चलने की आदत नहीं थी
पर संभलकर चलने की फुर्सत कहां थी।।
कर गये जल्दी संभल न पाये एक पल,
ढाल पर फिसलकर तोड़ लिये चप्पल।
चप्पल उठाने में चश्मा गिराये,
फिर उस चश्में से कभी न देख पाये।।
फप्सी जब पहुंचे तो सिर्फ आलू बचा था,
उसके लिये भी लंबा लाइन लगा था।
आलू तौलाकर जब जेब में हाथ डाली
पता चला कि जेब बिल्कुल थी खाली।।
उनके सर में पसीना और मुंह में था सारी,
और मन ही मन थी मार खाने की तैयारी।
नजर घुमाई तो पटेल जी दिये दिखायी,
जल्दी से जाकर उनसे पूरी बात बतायी।।
पटेल जी मुस्कराये बोले बताता हूं,
सिर्फ पांच रुपये लेकर फप्सी आता हूं।
उसमें जो सब्जी मिलती है लेता हूं,
और उसी को लेकर घर चला जाता हूं।।
अब तो लगभग निश्चित थी उनकी पिटायी,
फिर उन्होंने अपनी निरीह नजर दौडा़यी।
संयोग से मैं उनको पड़ गया दिखायी,
और उन्होंने मुझको अपनी कहानी बतायी।
बातें सुनकर मैंने जेब से कलम निकाली,
और वहीं खड़े-खड़े ये कविता लिख डाली।
आप भी कुछ करिये -हाथ आजमाइये,
और कुछ न कर बने तो ताली तो बजाइये।

-आर.के.तिवारी
रचनाकाल १९९१

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

8 responses to “फप्सी हाट में कविता का ठाठ”

  1. संजय बेंगाणी
    उन पर हँसना लग सकता है गाली
    इसलिए हमने सिर्फ बजाई ताली.
  2. निधि
    अपने मक़सद में सफल रहे आप
    हम सच में झिल गये माई-बाप :(
  3. आशीष
    हमने ताली बजायी है पूरे तिन बार !
  4. ratna
    आसमान में बिन बादल के बिजली दिखी है
    यकीनन किसी ने फिर ऐसी कविता लिखी है।
  5. समीर लाल
    झेल रहे हैं बैठ कर, तुकबंदी हम श्रीमान
    मकसद पूरा कर लिये, आप बहुत महान.
    आप बहुत महान,जो भी कुछ करना चाहो
    सफल रहोगे हरदम,चाहे कितना झिलवाओ.
    कहे समीर कविराय, तेरे गजब रहे हैं खेल
    जो भी तू लिख देगा, सारे ब्लागर लेंगे झेल.
    —-आप को बधाई..हमने बहुत ताली बजाई.
    >
  6. समीर लाल
    उपरोक्त टिप्प्णी मे तू, तेरे का प्रयोग मात्र काव्यत्मकता के लिये गया है, कृप्या अन्यथा न लिया जाये :)
  7. अनूप भार्गव
    पता नहीं क्यों लेख से ज्यादा ‘निधि’ की टिप्पणी अच्छी लगी …:-)
  8. फुरसतिया » फ़ुरसतिया-पुराने लेख

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