Sunday, December 24, 2006

बेल्दा से बालासोर

http://web.archive.org/web/20110926100817/http://hindini.com/fursatiya/archives/221

बेल्दा में हम एक मंदिर में रुके थे। सबेरे वहां से नाश्ता करके हम आगे के लिये चल दिये। थोड़ी ही देर में हम उड़ीसा राज्य की सीमा पर मौजूद थे। “उड़ीसा आपका स्वागत करता है” के पत्थर के दोनों तरफ खड़े दिलीप गोलानी और विनय अवस्थी के फोटो हमने खींचे थे। २३ साल पहले के खींचे फोटो में चेहरे पहचाने जा रहे हैं यह कम बड़ी बात नहीं है। ये फोटो क्लिक-III कैमरे से खींचे गये थे। लगभग तीन महीने तक ये रोल बिना डेवलप हुये हमारे पास रखे रहे।

कुछ दिन पहले पंकज बेंगाणी उर्फ मास्साब ने कहा था कि वे इन फोटुऒं को बेहतर बनाने की तरकीब जानते हैं। लेकिन अभी तक वो इनको बेहतर बनाने के लिये हमारे निमंत्रण पत्र का इंतजार करते दिखते हैं। देखो भाई, इनको और कितना चमका सकते हो! कुछ करोगे-धरोगे या ऐसे ही बातें हांकते रहोगे!

हमारा अगला पड़ाव बालासोर था। बेल्दा से बालासोर की हमारी यात्रा में कोई खास बात नहीं हुई। शाम होते-होते हम बालासोर पहुंच गये थे। बालासोर के बारे में उन दिनों हम ज्यादा जानते नहीं थे और उस समय न हमें इसकी इसकी आवश्यकता महसूस हुयी। लेकिन आज जब मैं अपनी यात्रा के बारे में लिख रहा हूं तो बालासोर के बारे में जानकारी इकट्ठा कर रहा हूं।

दिलीप गोलानी, विनय अवस्थी
दिलीप गोलानी, विनय अवस्थी
बालासोर भारत के पूर्वी समुद्र के किनारे स्थित एक शहर है। यह कभी कलिंग राज्य का अंग रहा फिर उत्कल राज्य में शामिल हो गया। बाद में मुगल साम्राज्य में शामिल हुआ और इसके बाद मराठों के अधीन हुआ। इसके बाद अंग्रेजों की अधीनता से मुक्त होकर बालासोर १ अप्रैल, सन १९३६ को उड़ीसा राज्य का अभिन्न अंग बन गया।
ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर पता लगता है कि बाणेश्वर( भगवान शंकर) के कारण इस शहर को पहले बाणेश्वर के नाम से जाना जाता था जो कि बाद में मुगलकाल में बदलकर बालासोर हो गया। ऐसा शायद मुगलकाल में फारसी के प्रभाव के कारण हुआ हो। फारसी में बालासोर शब्द का अर्थ है-समुद्र में स्थित शहर।
यहां का समुद्र तट अपने ढंग का अनूठा है। यहां समुद्र अपने तट से पांच किलोमीटर तक पीछे लौट जाता है। अपनी इस अनूठी विशेषता के कारण यहां तमाम तरह की तोपों, तोप के गोलों और मिसाइलों की टेस्टिंग होती है।

तोपों और तोप के गोलों की टेस्टिंग के लिये पी.एक्स.ई.(प्रूफ एन्ड एक्सपेरीमेंटल इस्टब्लिशमेंट)बालासोर में खास सुविधायें हैं। यहां सारे देश के विभिंन्न हिस्सों से आयी तोपों और तोप के गोलों की जांच की जाती है। जांच का तरीका उनको तरह-तरह से फायर करके ही होता है। इनकी जांच की प्रक्रिया बड़ी जटिल होती है। देश की सेना में शामिल कोई भी तोप बिना उसके फायरिंग परीक्षण के सप्लाई नहीं होती। तोप की हर बैरल की टेस्टिंग होती है।

तोपों की टेस्टिंग तो आसान है। इनको सीधा ऊपर या कुछ अंश पर फायरिंग करके इनकी जांच की जा सकती है। हर तोप के गोले का व्यास अलग-अलग होता है। आजकल विश्व में जिन गोलों का सबसे ज्यादा चलन हैं वे १५५ मिमी व्यास के होते हैं। पुरानी तोपों के लिये १०५ मिमी,१२५ मिमी, १३० मिमी के गोले भी बनते हैं। सारी दुनिया धीरे-धीरे १५५ मिमी तोप की तरफ बढ़ रही है।

तोप की बैरल की लम्बाई और उसके व्यास (बोर) के अनुपात को कैलीबर कहते हैं। अगर किसी तोप के बारे में कहा जाये कि वह १५५ मिमी ,३९ कैलीबर की तोप है तो इसका मतलब है कि उसका व्यास १५५ मिमी और उसकी बैरल की लम्बाई १५५x ३९ होगी। तोप की प्रहार क्षमता आदि में इन सब बातों का बहुत प्रभाव पड़ता है।
तोप के गोलों के दो तरह के प्रूफ टेस्ट होते हैं। एक जिनमें कि केवल फायरिंग करके टेस्ट होते हैं। दूसरे जिसमें फायर किये गये गोलों के खोल बरामद करके उनका परीक्षण किया जाता है। इसे रिकवरी प्रूफ कहते हैं। इसमें गोले के खोल का परीक्षण करके देखा जाता है कि गोले सही बने हैं या कुछ गड़बड़ है। गोलों के प्रकार के अनुसार गोलों की ५००/१०००/२००० की लाट बनती हैं। इन लाटों में से कोई ५-१० गोले निकालकर उनकी फायरिंग करके टेस्ट होते हैं।

बालासोर में समुद्र अपने तट से पांच किमी तक पीछे लौट जाता है। इसकी इसी विशेषता के कारण इसे ‘रिकवरी प्रूफ’ के आदर्श स्थान माना जाता है। गोलों को जब फायर किया जाता है तो वे समुद्र में जा गिरते हैं। जब समुद्र पीछे जाता है तो फायर किये गये गोलों को खोज कर उनका परीक्षण किया जाता है।
यह सब बड़ी जटिल प्रक्रिया है। एकदम साधारण सा दिखने वाला एक तोप का गोला फायरिंग होने की स्थिति तक पहुंचते-पहुंचते हजारों चरणों से गुजरता है। कुछ तोप के गोलों की कीमत लाख रुपये के आसपास तक जा पहुंचती है। लाखों रुपये की कीमत की एक टैक गन अक्सर २५० गोलों को फायर करने के बाद बेकार हो जाती है।

विदेशी पर्यट्रक
विदेशी पर्यट्रक
यही कारण है कि विकासशील देशों के लिये युद्ध एक विलासिता है। एक दो हफ्ते की लड़ाई में ही देशों का बारह बज जाता है।
बालासोर प्रूफ रेंज के पास ही स्थित है अंतरिम टेस्ट रेंज। यहां मिसाइलों के परीक्षण चलते रहते हैं।

बालासोर का समुद्र तट शहर से करीब चालीस किमी दूर है। हम वहां भी गये। हमारे देखते-देखते एक विदेशी पर्यटक ने अपने सारे कपड़े उतार दिये और एक दम नंगा होकर समुद्र में कूद गया। काफी देर तक वह तैरता रहा। तमाम लोग उसे कौतूहल से देखते रहे। हमारी निगाहें भी दूर से उसका मुआयना कर रहीं थीं। जब वह समुद्र से बाहर निकला तो वहां पानी में तैरते नारियल के पेड़ के पत्ते को लपेटकर बाहर आया। हमने दूर से उसकी फोटो भी खींची।

पिछले दिनों बालासोर एक और खबर के लिये चर्चा में था। यहां के 13 गांवों के लोगों ने करीब दो दशकों तक सरकारी विभागों और अधिकारियों के चक्कर काटने के बाद एक नदी पर अपने पैसे से लकड़ी का पुल बनाकर विकास की रोशनी अपने इलाके तक पहुंचाने की कोशिश की।

बालासोर में हम लोगों का कोई रहने का जुगाड़ नहीं था। लिहाजा हम फ्री के जुगाड़ की तलाश में थे। अंतत: हम एक थाने में रुक गये। आज ताज्जुब होता है यह सब सोचकर कि जहां जाना हम गवारा नहीं करते उन जगहों पर हम ऐसे रह जाते रहे गोया वो हमारी खाला के घर के हों।

अपनी साइकिल यात्रा के दौरान हम अनेक ऐसी जगहों पर रुके जो हमारे लिये बिल्कुल अनजानी थीं। बिल्कुल अजनबी लोगों ने पांच-दस मिनट की बातचीत में अपने दिल और घर के दरवाजे हमारे लिये खोल दिये। आज जब मैं देखता हूं कि टीवी पर तमाम तरह की चेतावनियां आती हैं कि ‘अजनबियों से सावधान रहें’, ‘अनजान व्यक्ति की दी हुई चीज न खायें’ तो लगता है कि क्या सचमुच दुनिया इतनी बदल गयी है पिछले २३ सालों में कि कोई भरोसे काबिल नहीं रहा!

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

12 responses to “बेल्दा से बालासोर”

  1. हिंदी ब्लॉगर
    तोपों, तोप-गोलों और बालासोर परीक्षण स्थल के बारे इतनी स्पष्ट जानकारी देने के लिए धन्यवाद! समुद्र के पीछे हटने के फ़ायदे के बारे में जानकारी चकित करने वाली लगी.
  2. श्रीश । ई-पंडित
    कुछ दिन पहले पंकज बेंगाणी उर्फ मास्साब ने कहा था कि वे इन फोटुऒं को बेहतर बनाने की तरकीब जानते हैं। लेकिन अभी तक वो इनको बेहतर बनाने के लिये हमारे निमंत्रण पत्र का इंतजार करते दिखते हैं। देखो भाई, इनको और कितना चमका सकते हो! कुछ करोगे-धरोगे या ऐसे ही बातें हांकते रहोगे!
    अगर फोटुओं की सपष्टता बढ़ाई जाए तो ठीक है लेकिन उन्हें रंगीन आदि करने की बात हो रही है तो हम कहेंगे कि मूल रुप में ही वो ज्यादा अच्छी लगेंगी।
  3. Pratik Pandey
    बढ़िया संस्मरण और अच्छी जानकारी
  4. bhuvnesh
    बालासोर से आगे सायकिल कहां पहुँची??????
  5. Pramendra Pratap SIngh
    अच्‍छा सस्‍मरण था, वर्णन भी उतनी तनमयता से किया गया, हमे आपनी यात्रा मे शामिल करने के लिये धन्‍यवाद। अगली बार कहॉँ घूमाने ले चल रहे है।
  6. समीर लाल
    गोला बारुदी जानकारी से भरपूर यात्रा वृतांत बढ़ियां रहा. अब साईकिल में हवा भर आगे चला जाये… :)
  7. अन्तर्मन
    काफ़ी रोचक एवं ज्ञानवर्धक वर्णन है – साइकिल आगे बढ़ाई जाए। हमेशा की तरह। नव वर्ष की मंगलकामनायें!
  8. amit tiwary
    गोला बारुदी जानकारी से भरपूर यात्रा वृतांत बढ़ियां रहा. अब साईकिल में हवा भर आगे चला जाये
  9. r p singh sadana
    dear friends ,
    hi’ this is rajendra pal singh from kanpur ,India. i m overjoyed to find my high school friend Dilip Golani in this feature. i d be obliged if u can help me by sending his e mail i d to me. is been around 20 odd years since we met . he is a great pal.
    thanks…
  10. r p singh sadana
    it has been a nice experience to go thru ur blog. i have become addicted to this! it makes me nostalgic…this is my e-mail address- rpsinghsadana@yahoo.co.in …if u have any information about Dilip Golani kindly pass it to me…
  11. फुरसतिया » ब्लागिंग् के साइड् इफ़ेक्ट्…
    [...] हमारे ब्लाग की पोस्ट पढ़कर कई लोगों ने अपने पहचान वालों के पते खोजे। दिलीप गोलानी के बारे में पता करने को उनके मित्र मेरे आर.पी.सिंह सदाना मेरे ब्लाग पर आये और उससे मुझे दिलीप गोलानी का जो हमारे साइकिल यात्रा के साथी थे के बारे में दुबारा पता चला। [...]

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