Thursday, March 30, 2006

छत पर कुछ चहलकदमी

http://web.archive.org/web/20110101225524/http://hindini.com/fursatiya/archives/116

छत पर कुछ चहलकदमी

जम्हुआने के बाद हमारी नींद लग गयी। आज जब उठे तो प्रत्यक्षाजी की छत देखी। इनकी छत देखकर मुझे भी लगा कि हम भी कुछ अपनी छत देखें। सो हम भी कविता के जीने चढ़कर आ गये अपनी छत पर। अब हम प्रत्यक्षाजी जैसे काबिल छतबाज तो हम हैं नहीं लेकिन जैसे कि रविरतलामी जी ने कहा था कि नये कवियों को फुरसतिया जैसे लोगों की आलोचना की परवाह किये बिना कविता करना जारी रखना चाहिये तो उसी प्रोत्साहन की बल्ली लगाकर हम कविताप्रदेश में घुसपैठ की कोशिश कर रहे हैं । हमारा पूरा जोर मौज मजे पर है लेकिन फिर भी अगर किसी को कविता का कोई सबूत मिल जाय तो दोष हमें न देकर रतलामी जी को दिया जाय।दोष देने के लिये ‘सेविंग क्रीम वाला’ आधुनिकतम तरीका अपनाया जा सकता है।
१.
मेरी छत
तुम्हारी छत से सटी खड़ी है-
किसी परेड में
सावधान खड़े जवान की तरह।
छत से नीचे जाते
‘रेन वाटर पाइप’ एक दूसरे को
दूर से ताकते हैं -
सामांतर रेखाओं की तरह
जिनका मिलन नामुमकिन सा है।
छत का पानी
अलग होकर पाइपों  से गुजरता है-
अलगाव की तड़प से पाइपों को सिहराता हुआ।
थरथराते पाइप पानी को
आवेग के साथ मिलते देखते हैं
सामने के नाले में
संगम सा बनाते हुये।
२.
मेरी छत
तुम्हारी छत के सामने है
बीच में पसरी है-
चंद मीटर हवा।
हवा ठेलती है
छतों को -
एक दूसरे की ओर
मिलन के लिये उकसाती हुई।
मिलन-ज्वार को जब्त किये छतें
खड़ी रहती हैं अहिल्या सी
बीच की दूरी की
पवित्रता बनाये हुये।
३.
मेरी छत से
तुम्हारी छत से जुड़ी है
तुम्हारी छत उसकी छत से।
मेरी-तेरी-उसकी छतें
जुड़ीं है एक-दूसरे से
रक्तवाहिनी शिराओं की तरह।
छतों पर मेरा-तुम्हारा-उसका
आना-जाना तो बदस्तूर जारी है
लेकिन मिलना-जुलना कम होता जा रहा है।
हर बार छत पर
आकर मैं-तुम-वो
सोचते हैं काश हम भी छत होते
मिलते रहते रोज-हमेशा-
एक-दूसरे की गर्मी-सर्दी महसूसते।
४.
मेरी छत पर उतरते कबूतर
तुम्हारी छत पर नाचते मोर को
गुटरगूं-गुटरगूं करते घूरता है
जैसे कोई नेता घूरता रहा हो
किसी नृत्यांगना को
-काजू चबाते,मोबाइल पर बतियाते हुये।
कुछ देर बाद
कबूतर पर फड़फड़ाकर
उड़ जाता है दूर आकाश में
जैसे नेता चल देता है
हाथ झाड़ते हुये
किसी दूसरे मंच पर फीता काटने के लिये।
मोर कुछ देर बाद
थककर टहलने लगता है
उसका नृत्योत्साह चुक जाता है
सरकारी अनुदान बंद हो चुके
किसी एनजीओ के उत्साह की तरह।
५.
उसकी छत
मोहल्ले की सबसे ऊंची छत है
मेरी-तेरी छतों से बहुत-बहुत ऊंची
एकदम आसमान से बतियाती।
उसकी छत पर हमेशा कबूतर
फड़फड़ाते हैं
-शांति के,
सद्भावना के,
बराबरी के।
हवा में खुशहाली के गीत
बगीचे की खुशबुंओ
सरीखे तैरते हैं।
हर छत
सपना देखती है
उसकी छत सा बनने का।
कभी-कभी उस छत से
निकलती चीख चौंकाती है
जैसे किसी ने फिर बम बरसायें हों निहत्थों पर
उनको सभ्यता का ककहरा सिखाने के लिये।
चीख को तुरंत घेर कर
मिटा दिया जाता है
कबूतरों की गुटरगूं,
पाप संगीत की धुन
तथा सभ्यता के उदघोष से।
हमारी छत की हर फुसफुसाहट
याद दिलाती है सबसे ऊंची छत से
निकली चीख की
जिसका गला पैदा
होते ही घोंट दिया गया
६.मेरी छत से निकले कुछ ईंटें
तुम्हारी छत से टकराकर
मेरे तुम्हारे बीच के रास्ते
पर पसर गये हैं।
एक पार्टी से निकले विधायको नें
दूसरी पार्टी में जाने की घोषणा करके
अलग दल बना लिया है।
विधायकों की तरह
ईंटे भी तय नहीं कर पायी हैं
अपना कार्यक्रम।
फिलहाल दोनों जनता की अदालत में हैं।
७. मेरी छत से
तुम्हारा पर्दा दिखे
सरसराता।
पानी बरसा
छत पर ठहरा
जरा सुस्ताने।
कैसे पुकारूं
दिखे नहीं दिनों से
छत सूनी है।
छत उसी की
जो समय बिताये
छत पर ही।
पतंग उड़े
हवा से बतियाते
मेरी छत की।
इस छत से
उस छत का कुछ
याराना सा है।
ये यहां पड़ी
उसको ताकती है
क्या जमाना है।
८.
मेरी छत को मुझसे मत जुदा करो
हमको इस कदर तो न विदा करो।
जिंदगी सारी गुजार दी हंसते-हंसते
अब तो खुशियों से खुद को जु़दा करो।
सुख इतना भी तकलीफदेह नहीं होता
बेवजह हंसने से मत किनारा करो।
हम तो छत के पानी है,बह जायेंगे
 उचककर बेवजह हमें न निहारा करो।
तड़पने में मेहनत बहुत हो जाती है
भूल जाओ अब मुझे तुम, किनारा करो।
९.
ये छत सालों से ऐसे ही पसरी है
इसका हर कोना
हमारे अतीत की दास्तान है।
बीच का हिस्सा,
जिसके पास ही बना है
नीचे जाने का जीना,
तो मानो कोई धड़कता हुआ सामान है।
इसी कोने से मैंने देखा था तुम्हें
-पहली बार
भरी दोपहरी में आंखे मिचमिचाते हुये-
(धूल भरा अंधड़ जो आया था
ज्योंही मैंने तुम्हें आंखें फैलाकर
ताकना शुरू किया था।)
मुझे अब भी याद है
तुम्हारा तिरछे अंदाज में
आसमान  ताकते
कुछ अकड़ा सा कुछ सिकुड़ा सा चेहरा।
मैंने समझा था तुम मुझे ही ताक रही हो
तिरछी निगाहों से जैसे कि ताकती रहती हैं
दुनिया की सारी बिछुड़न-अभिशप्त नायिकायें।
मैंने गला खखारकर हकलाने का नाटक करते हुये
-चांद सी महबूबा होगी कब ऐसा मैंने सोचा था
गाने का निश्चय किया ही था कि
तुम भागकर जीने से नीचे चली गयी थी
उस चाट के ठेले की पास
पानी के बतासे खाने जिसे
तुम बहुत देर से ताक रही थी
तिरछी निगाहों से
मुझे यह भ्रम पालने का मौका देते कि
तुम्हारे निगाहें के तीर
हमारे ही दिल में
धंसने के लिये बेकरार हैं।
१०.
ये मेरी छत
मुझे याद दिलाती है
वो दोपहर जब हम आखिरी बार मिले थे
यहीं
इसी जगह।
 वो दोपहर मुझे रोज याद आती है
तड़पाती है
चौंकाती है
हड़काती है
डराती है
मानो कोई छत न हो
हिटलर का नाती हो।
यहीं मैंने पहली बार थामा था
तुम्हारा थरथराता हाथ
हमेशा के लिये
छोड़ देने ले लिये।
यहीं मुझे पता चला था
पहली बार कि
बरसात में लोग डूब कैसे जाते हैं।
इसी जगह मैंने जाना था
कि कैसे सुलगते रहते हैं
लोग ताजिंदगी किसी छुअन के अहसास से।
मैं इस छत पर खड़ा
तुम्हारे बारे में सोच रहा हूं
तुम पता नहीं किस छत पर खड़ी
किसके बारे में क्या सोच रही हो।
लेकिन मेरे मन में
यह खुशनुमा अहसास
अभी भी महक रहा है
कि मेरी इस छत पर
जब हम आखिरी बार मिले थे
तो हम हर सोच से दूर थे।
११.
एक टुकड़ा उजास
थोड़ी मिट्टी, थोड़ी घास
पानी भी मिलेगा आसपास
सबका तैयार करो सत
बन गई अपनी छत।
थोड़ा हैया थोड़ा हुश
थोड़ा धक्का थोड़ा पुश
न ज्यादा रोना न बहुत खुश
सारी चिंतायें होंगी चित
बन जायेगी तेरी भी छत।
बस करते-करते बातें
कुछ दिन बीतेंगे कुछ रातें
कुछ भरमाते कुछ शरमाते
आयेंगे इधर-उधर से खत
लो सबकी बन गई छत।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

12 responses to “छत पर कुछ चहलकदमी”

  1. अतुल
    पानी के पाइप वाली कविता तो गजब है।
  2. ई-स्वामी
    सच पानी के पाईप वाली शानदार है!
    और मुझे ये वाली पंक्तियां भी जाने कहां ले गईं –
    इस छत से
    उस छत का कुछ
    याराना सा है।

  3. रवि
    यह है असली कविता…
    छत पर भी उसी तीव्रता से लिखा है जिस तीव्रता से बरसाती पर, छत से तीव्रता से बहने वाले पानी पर और छत से निकलने वाले पाइप पर भी!
    पर, कवि के बारे में पता नहीं… :)
    (वैसे तो लोग आजकल बशीर बद्र को भी शायर मानने से इंकार कर रहे हैं, और उनके शहर के रहने वाले दूसरे शायर गण ही!)
  4. प्रत्यक्षा
    रवि जी, ये आपने क्या कर दिया, देखिये अब फुरसतिया जी की कविता रेन वाटर पाईप से बरसाती नदी की तरह उफनती , घुमडती, सारे बहाव तोडती , निकल पडी है.किसी छत की क्या मज़ाल कि रोक ले अब .
    वैसे फुरसतिया जी ,अपने ‘एक्स्पीरीयंस’ काव्यशैली में बडा बढिया लिखा है
  5. जीतू
    वैधानिक चेतावनी:इस टिप्पणी को पढकर आप अपना सर पीटने वाली हालत मे आ सकते है, इसलिये बेहतर होगा, कोई डन्डा आसपास रख ले, आसानी होगी)
    अब जब तुमने छतों की कविताओं की बात कर ही दी है तो मेरी भी झेलो
    (नोट:सरदर्द की गोलियों का स्टाक शुकुल से लिया जाए)
    तेरी मेरी गुमसुम छतें…अक्सर ये बाते करती हैं
    ये बीच मे गली ना होती तो कैसा होता..
    ये गन्धाते पाइप ना होते तो कैसा होता…
    वो वर्मा की छत के एन्टीना का गिरना, तेरा घायल होना
    ये सब ना होता तो कैसा होता।
    तेरी मेरी गुमसुम छतें…अक्सर ये बाते करती हैं
    एक और झेलो…
    चुपके चुपके रात दिन….कागज चबाना याद है।
    वो तेरा(शुकुल) छत पर आकर चुपके चुपके कविता लिखना..
    बार लिखना, बार बार मिटाना…
    कलम ना चलने पर खिजियाना
    खिजियाकर, बीबी बच्चों पर गुर्राना
    कविता लिखकर, दुनिया भर को झिलाना…
  6. SHUAIB
    फुरसतिया जी, कवीता पढ कर बहुत मज़ा आया सच में :)
  7. समीर लाल
    “ये छत सालों से ऐसे ही पसरी है
    इसका हर कोना
    हमारे अतीत की दास्तान है।”
    बहुत सही है “हमारे” शब्द का इस्तेमाल “मेरे” की जगह…सभी के अतीत किसी ना किसी छतिया कहानी से जुडे हैं.
    समीर लाल
  8. राकेश खंडेलवाल
    हाय अगर हम भी छ्त होते तो जाने विधि का क्या जाता
    हम पर भी ऐसे ही कोई फ़ुरसतिया कविता लिख जाता
    उपालंभ से उपमानों तक नई शैलियों के प्रयोग से
    पानी बारिश अंधड़ बिजली से फिर और निखार आ जाता
  9. रवि कामदार
    बस कुछ कविताए ओर लिखलो और छ्त शास्त्र में Phd मिल जायेगा। जबरजस्त कविताए है। मैं तो सोचता ही रह गया इस क्रिएटीविटी के बारे में। साला मेरा दिमाग एसा चलता ही नही है।
  10. फ़ुरसतिया »
    [...] छत पर चहलकदमी करके नीचे आये तो देखा कि टीवी पर हल्ला मचा था। मुंबई में किसी माडल का ‘बिल्ली भ्रमण’ करते हुये कोई कपड़ा चू गया होगा। माडल ने,जैसा कि होता है,पूरे आत्म विश्वास से अपना कैट-वाक पूरा किया। इसके बाद फिर जैसा होता है वही हुआ-कुछ भारतीय संस्कृति की चिंता करने वालों की मांग पर सारे मामले की जांच कराई गयी।जांच में भी जैसा होता है कुछ निकला नहीं। इसके बाद फिर वही हुआ जैसा कि होता है-दुबारा जांच के आदेश हुये हैं। पहली जांच के विवरण पता नहीं चले कि कैसे जांच हुई लेकिन सहज मन से अनुमान लगा सकता हूं कि सजग जांच अधिकारी की तरह शायद माडल के कपड़े फिर से गिरवा के देखे जायें। [...]
  11. world from my eyes - दुनिया मेरी नज़र से!! » हम हैं इस पल यहाँ …..
    [...] इधर लोग बाग़ बराबर अपनी अपनी छतियाने में लगे हुए थे(फ़िलहाल रूक गए, भई आखिर कितना छतियाएँगे)। एकबारगी तो मुझे लगा कि कही यह बर्ड फ़्लू की तरह न फ़ैल जाए, क्योंकि उस हाल में अपने को इसके टलने तक नारद दर्शन के लिए जाना बन्द करना पड़ता, नहीं तो अपने बीमार होने का खतरा होता। वैसे तो अपन इससे पूरी तरह निरापद हैं पर फ़िर भी क्या भरोसा, जाने कब क्या हो जाए!! [...]
  12. world from my eyes - दुनिया मेरी नज़र से!!
    हम हैं इस पल यहाँ ……..
    ….. और आप?
    ……

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Tuesday, March 28, 2006

मैं और मेरी जम्हाई

http://web.archive.org/web/20110101201217/http://hindini.com/fursatiya/archives/115

मैं और मेरी जम्हाई

मैं और मेरी जम्हुआई
अक्सर बातें करते हैं।
सोते रहे थे रात भर
क्यों खर्राटे भरते हो।
कुछ ऐसी सी ही पैरोडियां तबसे फुदक रहीं हैं जबसे टीवी पर लाफ्टर चैलेंज द्वितीय में एक डाक्टर का कार्यक्रम देखा जिसमें वे कहते हैं-
मैं और मेरी तन्हाई,
अक्सर बातें करते हैं
नौकर नहीं है परसों से
 पति वही है बरसों से।
लेकिन हमारी ये फुदकती पैरोडियां आगे नहीं बढ़ पायीं । आलस्य ने उनके पर कतर के गर्दन मरोड़ दी(गोया पैरोडियां बर्ड-फ्लू वायरस युक्त मुर्गियां हों ) और हम खडे़-खड़े गुबार देखते रहे।
गुबार देखते रहे’ का कापीराइट गोपालदास’नीरज‘ जी के पास है। वे जिंदगी भर कारवां गुजर जाने के बाद का गुबार देखते रहे।अब जाकर उनको कारवां का साथ नसीब हुआ है।उन्हें उ.प्र. सरकार ने मंत्रीपद की सारी सुविधायें प्रदान की हैं।
राज्य,राजनीति से अलग कुछ मामलों में उ.प्र.के मुख्यमंत्री मुलायमसिंहजी का अंदाज एकदम आश्रयदाता राजाओं जैसा रहता है। उनको जो जंच जाता है वे कर डालते हैं।नीरज लोकप्रिय कवि हैं। वे नीरज को पसंद करते हैं,नीरज उनको। सो तड़ से उनको लालबत्ती दे दी।
इसके पहले भी कई मौंको पर वे त्वरित उदारता दिखा चुके हैं। पिछले वर्ष जब उप्र साहित्य अकादमी के पुरस्कार बंट रहे थे तो कुछ इनाम पांच-दस हजार रुपये के थे । मुलायमसिंहजी बोले ये भी कोई इनाम होते हैं? तुरन्त पांच-दस हजार रुपये के इनामों को एक लाख दो लाख में तब्दील कर दिया। कवि-साहित्यकार गदगद!
 बहरहाल, हम बात कर रहे थे मैं और मेरी तन्हाई की। तन्हाई तो अब हमारे लिये वैसी हो गई है जैसे अमेरिका के लिये ओसामा बिन लादेन, मिल के ही नहीं देता।
 आजकल हम हर जगह घिरे रहते हैं। घर में घरवालों से,आफिस में बवालों से,नींद में सवालों से।
तन्हाई हमारे लिये अमेरिका का ग्रीनकार्ड हो गयी है- मिलना मुश्किल है।
 कुछ लोग भीड़ में भी तन्हा रह लेते हैं जैसाकि गीतकार भारत भ्रमर कहते हैं:-
भीड़ का अकेलापन जब बहुत खलने लगा
 दर्द की धूनी रमाकर प्राण जोगी हो गये
जोग ही संजोग का शायद कभी कारण बने
 इसलिये हम रूप के मारे वियोगी बन गये।
कभी-कभी मैं सोचता हूं कि काहे को मैं तन्हाई की बाट जोह रहा हूं। संयोग की स्थितियां होने पर वियोग के लिये तड़पना पागलपन ही तो है। लेकिन हमें लगता है कि इस पागलपन में हम अकेले नहीं हैं। पूरा कारवां इसी अदा से गुजर रहा है।
जगजीतसिंह-चित्रा सिंह ने एक गजल गाई है जिसमें प्रेमी-प्रेमिका मिलन का सार्थक उपयोग करने के बजाय भविष्य में बिछड़ने की स्थितियों के लिये तैयारी कर रहा है:-
मिलकर जुदा हुये तो न सोया करेंगे हम
एक दूसरे की याद में रोया करेंगे हम।
बिछड़ने की हालत में चूंकि प्रेमी की याद में करवटें बदलने का रिवाज है और हर जोड़े को नींद में करवटें लेने की आदत नहीं होती लिहाजा यह तय किया गया कि अगर बिछुड़ गये तो सोयेंगे ही नहीं। जब सोयेंगे ही नहीं तो करवट-बदल अनुष्ठान आसानी से पूरा हो सकेगा। यह भी हो सकता है कि कोशिश के बावजूद झपकी लग जाये ,नींद आ जाये तो उसका भी जुगाड़ है- एक दूसरे की याद में रोया करेंगे। जब रोयेंगे तो एकाध आंसू निकलेंगे ही ।वही आंसू पानी के छींटे बनकर नींद को भगा देगी,जैसे कभी-कभी आतंकवादियों को देखकर पुलिस भाग खड़ी होती है।
ये प्रायोजित सुबुक-सुबुकपन प्रेम का आदर्श तत्व सा बन गया है। जो जितना रोने की स्थितियों से गुजर सकता है उसके प्रेम का झंडा उतना ही ऊंचा तथा देर तक फहराता रहता है।
हमें लगता है इसी रोने-धोने से बचने के लिये भारत में शादी के पहले प्यार की प्रथा नहीं है। एक व्यक्ति-एक पद के सिद्धांत का अनुसरण करते हुये ,जिससे शादी की उसी से प्यार करने लगे। जिंदगी भर प्यार करते रहे,करते रहे,करते रहे- जब तक प्यार या प्रेमी-प्रेमिका में से एक खतम नहीं हो गया।
प्यार का एक नया आयाम हास्यकवि सुरेन्द्र शर्मा ने मुछ दिन पहले एक कवि सम्मेलन में बताया।उन्होंने बताया कि हर एक की जिंदगी में प्यार का कोटा निश्चित रहता है। ज्यादा प्यार करोगे ,जल्दी खतम होगा। बचा-बचाकर करोगे तो देर तक बचेगा। चलेगा।
भारत में लोग इजहारे-मुहब्बत में काफी बचत से काम लेते हैं लिहाजा प्यार की फिजूल खर्ची बच जाती है। मान लो अगर धोखे में किसी से ज्यादा प्यार खर्च हो गया तो विपरीत परिस्थितियों से नुकसान की भरपाई का प्रयास किया जाता है।
तमाम लोग तो प्यार में फिजूलखर्ची के कारण हुये नुकसान की भरपाई के
लिये मारपीट का सहारा लेने तक को मजबूर होते हैं।
अमेरिका जैसे विकसित देश में और तमाम चीजों की तरह लोग प्रेम के मामले में बहुत खर्चीले होते हैं। कभी-कभी तो अपनी पूरी जिंदगी भर के प्यार का कोटा साल भर में हिल्ले लगा देते हैं।फिर दूसरी जगह लाइन लगाते है। प्यार उनके लिये कंचन मृग बना रहता है।वे तन्हा ही रहते हैं।
यह तन्हाई का अहसास बीजमंत्र बनकर तमाम कविताओं में छितरा जाता है जैसे नेहरूजी की हड्डियों की राख पूरे भारत भर में नदियों,पर्वतों में बिखरा दी गयी थी। नतीजतन लोग अपने साथी को बावरे बने खोजते रहते हैं। कोई सपने में,कोई इंद्रधनुष में कोई कहीं-कोई कहीं । आधुनिकता की हफड़-दपड़ में भी बहुतों को बावरेपन का पुरातन आसन ही पसंद आता है तथा वे अपने प्रिय को चातक के आसन में खोजते हैं। अनुभवी लोग लोग-टिकाऊ पसंद।
हम और कुछ भी बहुत कुछ गड्ड-मड्ड खुलासा करना चाहते हैं। लेकिन नींद है कि जम्हाईयों की फौज भेज रही है लिहाजा हम जम्हुआई से फिर से बतियाने जा रहे हैं। वहीं से नींद के पास चले जायेंगे।तब तक आप अपनी कहानी कहिये:-
 मैं और मेरी जम्हाई
 अक्सर बातें करते हैं,
मुंह खुला-खुला रह जाता है
चेहरे पर बारह बजते हैं।

जब जम्हाई विदा ले लेती है
निदिया रानी की बन आती है
वो मदमाती सी आती हैं
संग खर्राटा प्रियतम लाती हैं।

खर्राटों के कोलाहल में
सासों की नानी मरती है,
सहमी-सहमी सी चलती हैं,
भीगी बिल्ली बन जाती हैं।

कुछ हल्ले-गुल्ला कर लेने पर
खर्राटे का भी बाजा बजता
वो सांसों से मिल जाता है
इक नया राग सरगम बजता।


इस राग-ताग,सरगम-हल्ले में
सब समय सरक सा जाता है
फिर नयी सुबह खिल जाती है
सूरज भी नया-नया खिलता।

कलियां खिलती हैं फूलों में
पंखुडियां धरती पर चू जाती हैं
फिर कुछ अलसाया सा लगता है
जम्हुआई का डंका बजता है।

मैं और मेरी जम्हुआई
फिर गुपचुप-गुपचुप करते हैं,
जो सुन पायें वे मस्त हुये
बाकी औंघाया करते हैं।
 

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

One response to “मैं और मेरी जम्हाई”

  1. फ़ुरसतिया » छत पर कुछ चहलकदमी
    [...] जम्हुआने के बाद हमारी नींद लग गयी। आज जब उठे तो प्रत्यक्षाजी की छत देखी। इनकी छत देखकर मुझे भी लगा कि हम भी कुछ अपनी छत देखें। सो हम भी कविता के जीने चढ़कर आ गये अपनी छत पर। अब हम प्रत्यक्षाजी जैसे काबिल छतबाज तो हम हैं नहीं लेकिन जैसे कि रविरतलामी जी ने कहा था कि नये कवियों को फुरसतिया जैसे लोगों की आलोचना की परवाह किये बिना कविता करना जारी रखना चाहिये तो उसी प्रोत्साहन की बल्ली लगाकर हम कविताप्रदेश में घुसपैठ की कोशिश कर रहे हैं । हमारा पूरा जोर मौज मजे पर है लेकिन फिर भी अगर किसी को कविता का कोई सबूत मिल जाय तो दोष हमें न देकर रतलामी जी को दिया जाय।दोष देने के लिये ‘सेविंग क्रीम वाला’ आधुनिकतम तरीका अपनाया जा सकता है। १. मेरी छत तुम्हारी छत से सटी खड़ी है- किसी परेड में सावधान खड़े जवान की तरह। छत से नीचे जाते ‘रेन वाटर पाइप’ एक दूसरे को दूर से ताकते हैं – सामांतर रेखाओं की तरह जिनका मिलन नामुमकिन सा है। छत का पानी अलग होकर पाइपों  से गुजरता है- अलगाव की तड़प से पाइपों को सिहराता हुआ। थरथराते पाइप पानी को आवेग के साथ मिलते देखते हैं सामने के नाले में संगम सा बनाते हुये। [...]

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Monday, March 20, 2006

मुट्ठी में इंद्रधनुष

http://web.archive.org/web/20110101203140/http://hindini.com/fursatiya/archives/114

मुट्ठी में इंद्रधनुष

 जीतू की  होली
आज जीतेंदर का फोटो देखा। पूरे कादर खान लग रहे हैं । कादर खान, जिनके मुंह से दादा कोंडके का कोई डायलाग बस निकलना ही चाहता है। ये फोटो जीतू की होली के अवसर की है(कोई मानेगा भला!)।
चूंकि बात होली की तथा जीतू की हो रही है लिहाजा मुझे याद आया कि मेरे पिछले लेख जो कि जीतू के आइडिये पर मैंने लिखा था मानोशीजी ने टिप्पणी की थी-जीतु जी बिचारे…कभी तो छोड दिया करें उन्हें।
हम बहुत देर सोचते रहे कि हम जीतू को क्या पकड़े हुये हैं जो उन्हें छोड़ दें! या जीतेन्दर  कोई चर्चा समूह हैं जिसे हम मतभेद होने पर किसी कम्प्यूटर
विशेषज्ञ ब्लागर की तरह मुंह फुला के छोड़ दें? या कि जीतू कोई अपहरणकर्ता/ आतंकवादी हैं जिन्हें हम भारत सरकार की तरह किसी वीआईपी बंधक को मुक्त कराने के लिये छोड़ दें।या फिर हम कोई मनचले शेख हैं और जीतू हमारी चार बीबियों में से एक हैं जिनको हम जब छोड़ेंगे तभी शेख साहब अपनी नयी माशूका से निकाह पढ़वा सकेंगे।
लब्बोलुआब यह कि मानवाधिकार आयोग के प्रवक्ता के अंदाज में हमें यह अहसास कराया मानसीजी ने कि हम मानव अधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं।हम  मानोशी जी  की बात मान के अपराधबोध के पाले में जाने ही वाले थे कि जीतेन्दर की टिप्पणी दिखी-
फुरसतिया जी तो उस महबूब की तरह हैं कि जिसकी गालियां भी फूलों की तरह लगती है।
हमने कहा वाह पट्ठे! छिड़ने वाला होय तो जीतेंदर जैसा चाहे फिर एक
ही होय।
अब देखो अगला हमें महबूब मान रहा है। हमारी गाली को फूल बता रहा है। लेकिन मोहल्ले वाले कह रहे हैं कि छोड़ दो। महबूब छोड़ने के लिये होते हैं? न भइया न! महबूब तो दिल से लगाने के लिये होते है। होली में मौज मनाने के लिये होते हैं। छोड़ने के लिये कत्तई नहीं होते हैं। तीज-त्योहार में तो वैसे भी लोग-बाग घर-परिवार-शहर वालों से जुड़ने के लिये हुड़कता है। सूखी होली खेलता है तब भी मन गीला होता रहता है बचपन की यादों से। ऐसे गीलेपन में कइसे छोड़ दें एक कनपुरिये को जो बेचारा ऐसी होली खेलने को अभिशप्त हो जिसमें उसका कुर्ता तक नील-टीनोपाल का विज्ञापन कर रहा हो।

तो भइया हम तो न छोड़ेंगे। खेलेंगे हम होली टाइप जिसमें मौज-मजा तो होगा ही नहीं तो जीतू बुरा मान जायेंगे।
एक बात और ध्यान देने की है कि छेड़ हम रहे हैं,मजा जीतू को भी आ रहा है लेकिन तकलीफ मानोशीजी को हो रही है। धन्य हैं देवी ।
संजय बेंगानी बोले कि हमारा टाइटिल गायब है। अब भइया टाइटिल क्या दें। आपका मामला तो रागदरबारी के डायलाग की तरह है- जीप से अफसर नुमा चपरासी तथा चपरासीनुमा अफसर उतरे। नाम है आपका संजय जो कि अहिंसक माने जाते थे लेकिन आप धारण करते हैं तरकश। तरकश में तीर हैं  जोगलिखे। इतने विरोधाभासी महापुरुष को कइसे टाइटिलियाया जाय!हम पहले ही कह चुके हैं-
जिनके (टाइटिल) छूट गये वे समझें कि वे वर्णनातीत हैं।
जिन साथियों ने होली के टाइटिल वाली पोस्टों पर कमेंट किये उनका शुक्रिया साथ ही यह भी साबित हुआ कि जैसा बोओगे वैसा काटोगे।करनी का फल सब यहीं मिल जाता है।हमने लोगों को एक-एक ही टाइटिल दिये लेकिन हमें कई मिले। जो काहू को गढ्ढा खोदै वाके लिये कुंआ तैयार!
हां ,तो बात हो रही थी जीतेंदर की। हमने पूछा भइये क्या था तुम्हारा आइडिया जो हम चुरा लिये?
जीतू बोले -हमने प्रत्यक्षाजी के साथ मिलकर टाइटिल देने का प्लान बनाया था। कुछ नाम भी तय किये थे। हम बोले धत्तेरे की।खाली नाम तय किये -बोले आइडिया था ये।गठबंधन तो कायदे से किया होता। प्रत्यक्षाजी को जो तुम योजना दिये होगे उसका प्रिंट आउट लेकर वो उसके पिछवाड़े कुछ कवितायें घसीट दी होंगी । देखना कुछ दिन मेंजहां समय मिला वे कवितायें आ जायेंगी सामने फिर बिना समझे तारीफ करने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा तुम्हारे पास।
जीतू अपने चुनाव को लेकर कुछ ज्यादा ही आश्वस्त थे लिहाजा वोफिर बोले -नहीं यार मेरी बात हो गयी थी। तैयारी थी लेकिन…। हम बोले-भइया की बातें। तुम चूंकि कविता समझते नहीं लिहाजा प्रत्यक्षाजी का स्वभाव भी नहीं समझते।
जीतू आंखे मिचमिचाते खड़े रहे। हम बोले हम कोई कविता थोड़ी सुना रहे हैं जो तुम ‘नासमझ मोड’ में चले गये। अरे भाई, जो शख्स प्रेमी के आने की बात से इतना नींद में गाफिल /बेखबर रहे कि सबेरे फूलों की खूशबू से सूंघकर कहे -
 रात भर ये मोगरे की
खुशबू कैसी थी
अच्छा ! तो तुम आये थे
नींदों में मेरे ?

 उसको तुम्हारा मेहनत का काम याद रहेगा यह सोचते हो तुम बहुत भोले हो(बेवकूफ हम नहीं लिखेंगे काहे से कि फिर कहा जायेगा कभी तो छोड़ दिया करो)
हमने फिर प्रत्यक्षाजी से पूछा कि काहे को जीतू से वायदाखिलाफी की आपने? तब पता लगा कि मामला ही दूसरा था। बताया गया कि जीतू ने कुछ नाम नोट कराये थे कि इन लोगों के टाइटिल दिये जायें। फिर मिलने का वायदा था लेकिन
बाद में नेट पर मुलाकात नहीं हो पायी।
तब हमारे सामने सारी बात साफ हो गयी। दरअसल जीतू प्रत्यक्षाजी को बाकी ब्लागरों की तरह समझे होंगे। बहुत दिन से जीतू की अदा रही है कि कोई योजना बनाना,साथी को शामिल करना, फिर अचानक व्यस्त हो जाना। फिर होता यह कि अगला मारे शरम के सारा काम पूरा करता। लेकिन इस बार ऐसा हो नहीं पाया। सेर को सवा सेर मिला और आइडिया ,आइडिया ही रह गया।
जैसे इनके दिन बहुरे,वैसे ही सबके बहुरें।
अब बात इन्द्रधनुष की। कुछ दिन पहले  मानसीजी ने ई-कविता पर एक कविता लिखी थी। उस कविता में कुछ ऐसा सा होता है कि जैसे आदमी का पर्स,
मोबाइल, पेन खो जाता है न फिर जिसका  खोता है वो  अनाउन्समेंट  करवाता है कि जिस सज्जन को मिला हो वापस कर दें ।लौटाने वाले को  उचित   इनाम  दिया  जायेगा। वैसे ही मानोशीजी की इस कविता में इंद्रधनुष का एक रंग खो जाता हैं फिर वो प्रिय से  तकादा करती हैं :-
 प्रिय तुम वो रंग आज ला दो
जिसे तोडा था उस दिन तुमने
और मुझे दिखाये थे छल से
बादलों के झुरमुट के पीछे
छ: रंग झलकते इन्द्रधनुष के

लेकिन नहीं यहां खोने की बात नहीं तोड़े जाने की बात कही है। मतलब इंद्रधनुष का रंग किसी बाग में खिला कोई फूल या बगीचे का फल है जिसे प्रिय तोड़ ले गया। अब वो लौटा दे इंद्र धनुष मुकम्मल हो जाये। ये ‘जोड़-तोड़ घराने’ की कवितायें बहुत मजेदार लगती हैं। टूट-फूट बचाने का सराहनीय प्रयास!
इन्द्रधनुष आमतौर पर बारिश में दिखता है। बरसात में जब सूरज की रोशनी होती है तो प्रकाश के कारण इंद्रधनुष दिखता है।लेकिन कल हमें लगा कि ये इन्द्रधनुष तो हम जब मन आये तब देख सकते हैं।
हुआ दरअसल यह कि प्रत्यक्षाजी की टिप्पणी को ख्याल में रखते हुये हम कल मय कैमरे के पार्क में गये। यह पार्क कुछ दिन पहले तक एकदम जंगल था। क्षेत्रफल इतना कि चार फुटबाल मैदान बन जायें। हम आजकल अपने स्टेट का रखरखाव का  काम देखते हैं। जनवरी में पता नहीं कैसे ख्याल आया कि इस जंगल को पार्क में तब्दील किया जाय। सो जुट गये पूरे अमले के साथ। सरकारी नौकरी के साथ यह खाशियत मैंने देखी है कि यदि आप कुछ नहीं करते तो कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन यह भी सच है कि आप कुछ करना चाहते हैं तो कोई रोकता भी नहीं।लिहाजा दो महीने से भी कम समय में जहां जंगल था वहां अब पार्क बन रहा है। तीन चौथाई बन गया। जहां कोई नहीं आता है वहां अब सैकड़ों लोग आते हैं। पार्क सुबह पांच बजे से रात ग्यारह बजे तक गुलजार रहता है।
पार्क में ढेर सारे झूले लगाये गये हैं जिनमें बच्चे,महिलायें झूलते रहते हैं। पार्क के ही बीचोबीच में एक फव्वारा भी बना है। इसकी भी कहानी मजेदार है। जब हम सोचे कि फव्वारा बनाया जाय तो दाम पता गया। कोई कहे चालीस-हजार लगेंगे कोई कहे पचास हजार। हम सोच रहे थे कि क्या किया जाय। इतना पैसा हम खर्चा करने के मूड में थे।
 इन्द्रधनुष
अचानक हमें याद आया कि हम तो इंजीनियर हैं वो भी मेकेनिकल। फिर तो हमने सोचा खुदै काहे न बनाया जाय! फिर हम एक चार इंच व्यास का एक ठो छ: इंच लंबा पाइप लिये। उसके दोनों तरफ आधा सेमी मोटी सीट वेल्ड करा दिये। फिर उसमें दस ठो छेद करा दिये। उनमें धांस दिये पचहत्तर रुपये वाली दस ठो नोजल । पीछे से जोड़ दिये ८००० रुपये की दो हार्स पावर की मोटर।सारा खर्चा दस हजार रुपये से भी कम हुआ। ये सब भानुमती का पिटारा जोड़ कर जहां हम बटन दबाये पानी सर्रररर से निकला तथा हवा के इशारे पर हमें भिगोने लगा।
पार्क की रौनक देखकरमन खुश हो जाता है। जनता खुश। जनता को देखकर हम खुश!
इसी फव्वारे का जिक्र हमने प्रत्यक्षाजी से किया था तभी उनकी टिप्पणी थी-
हम तो सोच रहे थे कि फव्वारे के रंगीन पानी के नीचे, होली खेलते हुये तस्वीरें होंगी. एक पंथ दो काज !
तो कल जब हम फोटो खींचने गये तो धूप खिली थी।फव्वारा आन किया तो धूप तथा फव्वारे के पानी के गठबंधन से इंद्रधनुष दिखा। पहले तो हमें लगा कि नजर का धोखा है लेकिन हर बार जब तक धूप रही किसी न किसी तरफ से इंद्रधनुष दिखता रहा। आज भी देखा तथा उसकी फोटो लेने की कोशिश की। फोटो में बहुत साफ नहीं दिखता लेकिन पता चलता है- फव्वारे की धार के बीच में बायीं तरफ।मुझे लगा कि अब तो इंद्रधनुष हमारी मुट्ठी में है। जब देखने का मन किया पार्क गये। फव्वारा चलाया इंद्रधनुष देख लिया। किसी मौसम का  मोहताज भी नहीं होना पड़ेगा। न किसी से याचना करनी पड़ेगी कि  रंग लौटा दो ताकि हमारा इंद्रधनुष पूरा हो जाये।
वैसे भी महापुरुष लोग कहते रहे हैं कि मेहनत,लगन तथा लक्ष्य के प्रति समर्पण वह चाभी है जिससे दुनिया का कोई भी इंद्रधनुष मुट्ठी में किया जा सकता है।
मुट्ठी में इन्द्रधनुष मतलब आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ते कदम बकौल
नंदनजी-
ओ माये काबा से जाके कह दो
कि अपनी किरणों को चुनके रखलें,
मैं अपने पहलू के ज़र्रे-जर्रे को
खुद चमकना सिखा रहा हूं।


मेरी पसंद

एक सलोना झोंका
भीनी-सी खुशबू का,
रोज़ मेरी नींदों को दस्तक दे जाता है।एक स्वप्न-इंद्रधनुष
धरती से उठता है,
आसमान को समेट बाहों में लाता है
फिर पूरा आसमान बन जाता है चादर
इंद्रधनुष धरती का वक्ष सहलाता है
रंगों की खेती से झोली भर जाता है
इंद्रधनुष
रोज रात
सांसों के सरगम पर
तान छेड़
गाता है।
इंद्रधनुष रोज़ मेरे सपनों में आता है। पारे जैसे मन का
कैसा प्रलोभन है
आतुर है इन्द्रधनुष बाहों में भरने को।
आक्षितिज दोनों हाथ बढ़ाता है,
एक टुकड़ा इन्द्रधनुष बाहों में आता है
बाकी सारा कमान बाहर रह जाता है।
जीवन को मिल जाती है
एक सुहानी उलझन…
कि टुकड़े को सहलाऊँ ?
या पूरा ही पाऊँ?
सच तो यह है कि
हमें चाहिये दोनों ही
टुकड़ा भी,पूरा भी।
पूरा भी ,अधूरा भी।
एक को पाकर भी दूसरे की बेचैनी
दोनों की चाहत में
कोई टकराव नहीं।
आज रात इंद्रधनुष से खुद ही पूछूंगा—
उसकी क्या चाहत है
वह क्योंकर आता है?
रोज मेरे सपनों में आकर
क्यों गाता है?
आज रात
इंद्रधनुष से
खुद ही पूछूंगा।
-कन्हैयालाल नंदन
 
 

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

8 responses to “मुट्ठी में इंद्रधनुष”

  1. समीर लाल
    बहुत ही सुंदर और मज़ेदार….आनंद आ गया पढ कर. क्या लेखनी है, माँ शारदा कृपा बनायें रखें, इतनी हरकतों के बाद भी, यही कामना है. :)
    समीर लाल
  2. sanjay | joglikhi
    वर्णनातीत काहे रहे? अफसर कहो या चपरासी क्या फरक पङता हैं, बस वर्णन होना चाहिए. संजय को आप ‘अंधे का दूरदर्शन मान रहे हैं’ जब कि हमारा मानना हैं कि यह महादेव का एक और नाम हैं. पूजो तो भोले भंडारी वरना तांडव करते कहां देर लगती हैं. जीतूभाई पर यह आपने लगातार ‘दुसरा’ फेंका हैं. सही भी हैं क्योंकि जीतूभाई तन और मन सें इस योग्य हैं. बन्दा मनमौजी पर जिम्मेदार किशम का हैं जो व्यंग्य कि समझ रखता हैं.
    आपका यह लिख भी अच्छा रहा ( कविताएं ज्यादा नहीं हो गयी?) तस्विर देख का मैने समझा था फव्वारा होली खेलने के काम में लिया होगा. नेक काम के लिए साधुवाद.
  3. रवि
    यह बात सही है – जैसा बोओगे, वैसा पाओगे.
    आम के पेड़ पे इमली नहीं फला करती.
    कवि और कविताओं से आपको अ-प्रेम सा है, पर, आप खुद देखेंगे कि आपके टाइटल ने कितने नए कवि और, कितनी सारी कविताएँ पैदा कर दीं.
    अब झेलते रहें.
    वैसे, नए कवियों को बधाई, और, सचमुच उनका नया-नया प्रयास सराहनीय है, और उम्मीद है कि वे अपनी कविता लेखन में नियमितता लाएंगे.
  4. प्रत्यक्षा
    यहाँ (मतलब हमारे ब्लॉग पर )भी देख लें, रवि जी ने सही ही कहा है ,अब झेलिये ;-)
  5. Manoshi
    ये तो कुछ यूँ हुआ कि दूसरों पर लगी चुइंग छुडाने की कोशिश करने में खुद पर ही लग जाये। जीतु जी ही ठीक थे, उन्हें पकडे रहिये। :-) और ये मेरा इन्द्रधनुष, फ़व्वारे से मुट्ठी और मुट्ठी से फ़व्वारे के चक्कर काटते-काटते छ: रंगी से रंग हीन हो चुका है अब तक। उसे भी बख्श दिया जाये।
  6. शालिनी नारंग
    आपके लेख की भाषा बहुत ही सरल और प्रवाहमयी है। पढ़कर मज़ा आ गया।
  7. फ़ुरसतिया » छत पर कुछ चहलकदमी
    [...] फ़ुरसतिया » छत पर कुछ चहलकदमी on मैं और मेरी जम्हाई शालिनी नारंग on मुट्ठी में इंद्रधनुष Manoshi on मुट्ठी में इंद्रधनुष फ़ुरसतिया on मुट्ठी में इंद्रधनुष प्रत्यक्षा on मुट्ठी में इंद्रधनुष [...]

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Thursday, March 16, 2006

आइडिया जीतू का लेख हमारा

http://web.archive.org/web/20110101193726/http://hindini.com/fursatiya/archives/113

आइडिया जीतू का लेख हमारा

कली-भौंरा वार्तालाप सुनकर जीतेंदर सबसे तेज चैनेल की तरह  भागते हुये सबसे नजदीक के थाने पहुंचे। थानेदार से मिले। बोले -हमारे आइडिये की चोरी हो गयी है। हम रिपोर्ट लिखाना चाहते हैं।
थानेदार बोला-अरे लिख जायेगी रिपोर्ट भी। पहले तफसील से बताओ। कित्ता बड़ा आइडिया था? कौन से माडल का था?ये स्वामीजी की भैंस भी चोरी गयी है। ये देखो ये है फोटो। इसी तरह से था कि कुछ अलग?
जीतू बोले-ये देखो मैं पूरा प्रिंट आउट लाया हूं। ये लेख है। इसी में मेरा आइडिया लगा दिया गया है।
थानेदार बोला- तुम्हारा आइडिया भी सोना-चांदी की तरह हो गया है क्या? इधर चोरी हुआ उधर गला दिया गया!किसने चुराया आइडिया? किसी ने चोरी करते देखा उसे?कहां रखा था?
जीतू बोले-ये मेरा दिमाग में था।शुकुल ने चुराया। देखने को तो किसी ने देखा नहीं लेकिन है  हमारा ही।
थानेदार ने जीतू को सर से पेट तक देखा ।बाकी का छोड़ दिया।बोला- कोई सबूत है कि ये आइडिया तुम्हारा ही है। कोई स्टिंग आपरेशन का टेप वगैरह है जिसमें तुम्हारे आइडिये की चोरी किये जाने की हुये फोटो हो?
मियां-बीबी-बच्चा
इतना हाईटेक दरोगा देखकर जीतू की ऊपर की सांस ऊपर ही रह गयी। नीचे की नीचे निकल गयी। लेकिन वाणी ने साथ दिया तथा वे हकलाते हुये बोले-
साहब बात यह है कि आप देख ही रहे हैं कि ये जो भौंरा-तितली संवाद लिखा गया है उसमें निहायत बेवकूफी का आइडिया इस्तेमाल किया गया है और यह बात सारी दुनिया जानती है कि बेवकूफी की बात करने का आधिकारिक कापीराइट मेरे ही पास है। मेरे अलावा इतनी सिरफिरी बातें सोचने का माद्दा किसी के पास नहीं है। यहां तक कि कविता लिखने वाले ब्लागर तक इतनी सिरफिरी बात नहीं सोच सकते। लिहाजा यह तो तय है कि आइडिया मेरा ही है। आप जल्दी से रिपोर्ट लिखकर कापी मुझे दे दीजिये ताकि उसका स्कैन करके मैं नेट पर डाल दूं।
थानेदार ने कोने में ले जाकर जीतू से पता नहीं क्या कहा कि वे चुपचाप नमस्ते कहकर वापस आ गये।
कुछ लोग कहते हैं कि थानेदार ने जीतू से रिपोर्ट लिखने के १०० रुपये मांगे थे लेकिन मुफ्त के साफ्टवेयर प्रयोग करने के आदी हो चुके जीतू इसके लिये तैयार नहीं हुये।
कुछ दूसरे लोग कहते हैं कि जीतू से थानेदार ने कहा कि यह बात मान ली ये आइडिया तुम्हारा होगा लेकिन उसका उपयोग अकलमंदी से हुआ है लिहाजा उस पर तुम्हारा हक नहीं बनता।जहां तक बेवकूफी की बात पर तुम्हारे कापीराइट का सवाल है तो जान लो कि देश एक से एक धुरंधर बेवकूफों से भरा पड़ा हैं। केवल तुम्हारी बेवकूफी के भरोसे रहते तो न जाने कब देश हिल्ले लग गया होता।केवल खुद को बेवकूफ समझने की बात सोचना ही निहायत बेवकूफी की बात है।
जीतू थाने से निकलकर फुरसतिया के यहां पहुंचे। फुरसतिया होली के रंग में रंगे बैठे थे। जीतू ने बतियाना शुरू किया-
अनन्य
गुरू बहुत सही लिखे हो लेकिन ये कुछ लोगों को टाइटिल दिया कुछ को नहीं दिया ये क्या नाइंसाफी किये हो?
फुरसतिया, जो थानेदार से हुयी सारी बातें थानेदार से फोन से सुन चुके थे, आंख मूंदे हुये ही बोले- दे देंगे टाइटिल भी यार। टाइटिलै तो है कउनौ पदमश्री तो है नहीं जो जनवरी में ही देना हो।
जीतू बोले-है कैसे नहीं देखो अमित का जब तक नाम नहीं दिखा तब तो वो परेशान रहे। जब नाम दिखा तब चैन मिला।
फुरसतिया बोले- मतलब हमारा टाइटिल न हो गया देवरहा बाबा का लात हो गयी। जिसके पड़ गयी वो धन्य !
जीतू बोले- तुम यार,हमेशा उल्टी ही बात सोचते हो। सबके साथ बराबर का सलूक करना चाहिये। सबके बारे में लिखना चाहिये।
फुरसतिया-किसके-किसके बारे में लिखें? अब देखो आज इन्दौर में पुलिस अधिकारी पांडा नाचते हुये देखे गये। उनके दो मिनट के नाच को चैनेल वाला घंटों दिखाता रहा।
जीतू बोले-लेकिन तुम हमें काहे नचा रहे हो? जो लिखना हो लिखो हम चलें।
फुरसतिया मौज लेते हुये बोले- जीतू भइया तुम भी पूरे हैंड पंप हो। दो फुट जमीन के
ऊपर तो सौ फुट नीचे। चाहते हो हम लिखें ताकि तुम सबको भड़का सको। बाद में हम
कुछ कहेंगे तो  हेंहेंहें करते हुये कहोगे नाराज होते हो।
बहरहाल तमाम फालतू बातों के बाद कुछ और  लोगों के बारे में टैरो कार्ड के अंदाज में
टाइटिल लिखे गये। जो यहां दिये जा रहे हैं।
जिनके छूट गये वे समझें कि वर्णनातीत हैं। साथ की फोटो हमारी ही हैं। डराननी लगें
तो आंख मूंद के देखें डर की मात्रा कम हो जायेगी।
तरुन:-
हर तरफ फैला उजाला, हर कली खिलने लगी,
इक निठल्ली सी हवा, हर तरफ बहने लगी।
रजनीश मंगला:-
चिट्ठों का छापा किया ,नारद का अवतार,
हिंदी में छापत रहो, होगा खूब प्रचार ।
संजय विद्रोही
सीधे-सीधे खड़े हुये हो,फिर काहे को डरे हुये हो।
मासूमों से दिखते हो,विद्रोह भाव से भरे हुये हो।
 दीपशिखा:-
अल्पविराम है चिट्ठा,पूर्णविराम से लेख,
महीने में एक लिखें,कैसे निकाले मीन-मेख!

नितिन बागला 
लातों के भूत हैं बातों से ही मान जाइये,
इन्द्रधनुष दिखा नहीं जरा लिख के दिखाइये।


जयप्रकाश मानस:-
मानसजी अब तो आप ही लिखो,ब्लागिंग का इतिहास,
मानसी की खुब तारीफ की,बाकियों को भी डालें घास।


अभिनव:-
गोली देकर नींद की,  पत्नी को दिया  सुलाय,
ज्यादा यदि खा गयी वो ,हो अंदर जाओगे भाय।

हिंदी ब्लागर:-
बढ़िया-बढ़िया लेख तो देते हो पढ़वाय,
अपने बारे में जरा कुछ और बतायें भाय!

विजय वाडनेरे:-
ये काम नहीं आसां, ये तो समझ गये,
सिर्फ इतना बताने को सिंगापुर चले गये!

आलोक:-
बंगलौर की बाकी भारत से,तुलना करा दिया,
लोग पूछते हैं ये कैसे लिखा,कितना समय लिया!

अतुल श्रीवास्तव:-
मिलें विधाता गलीं में,पकड़ कहूंगा हाथ,
इतना गंदा देश मेरा,काहे बनाया नाथ?
कालीचरण-भोपाली:-
हांका-बाजी बंद है, काली जी महाराज,
देख बसंती क्या हुआ,मौज-मजे या काज?
राकेश खण्डेलवाल:-
कैद सरगम दर्द की शहनाइयों में रो रही है,
खुशनुमा सा गीत छलके,मस्त होली हो रही है।
सुनील दीपक:-
जो कह न सके वो तो पढ़ना अच्छा लगता है,
लिखना सुंदर,फोटो सुंदर, सबकुछ बढ़िया लगता है।
अनुनाद सिंह:-
हिंदी का झण्डा गगन में ऐसे ही फहराते रहिये,
इधर-उधर से जो कुछ पाओ,यूं ही सजाते रहिये।
अनूप भार्गव:-
हथेली पे सूरज
 उगाया है तुमने,प्यार भी बहुत फैलाया है तुमने,
लफड़े भी कम नहीं किये भैये,सामांतर रेखाओं को मिलवाया है तुमने।
रामचन्द्र मिश्र:-
फोटो वाला ब्लाग है,ये तो अच्छा महाराज,
चेहरा रोज बदलता,इसका है क्या राज।
विनय जैन:-
बिना ब्लाग के ब्लागर हैं ये, लिखने को उकसाते रहते हैं,
खुद तो बस पढ़कर खुश रहते हैं,सबसे लिखवाते रहते हैं।
लेख पोस्ट करके देखा गया कि जीतू टिप्पणी लिखने के लिये फूट गये हैं।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

16 responses to “आइडिया जीतू का लेख हमारा”

  1. विनय
    और फुरसतिया को ये मेरी गुलाल -
    बड़े दमदार हैं ये, बड़े उस्ताद हैं
    लिखने में हैं धुरंधर, बातों में भी घाघ हैं
    हम तो प्रशंसक ठहरे, जीतू जी भी मानते हैं ;)
    हिंदी चिट्ठों के तो ये सचिन हैं, अमिताभ हैं
  2. Manoshi
    सबके लिये टाइटल लिख पाने का करेज रखने व सबके लिये समय निकाल कर लिखने के लिये ‘वाह’। जीतु जी बिचारे…कभी तो छोड दिया करें उन्हें। :-)
  3. अभिनव
    अनूप फुरसतिया भए, अनुपम इनकी बात,
    परसाई, श्रीलाल की दिखे छवि दिन रात,
    दिखे छवि दिन रात धकाधक ब्लाग बनाते,
    शब्दों का भण्डार अनोखा खेल सजाते,
    कह अभिनव कवि खिले सदा खुशियों की धूप,
    जग में ध्रुव तारे से चमकें सदा अनूप।
  4. sanjay | joglikhi
    हमारे बारे में लिखा हैं क्या, जो कोमेंट दे..;) (यह होली का वह गुब्बारा हैं जो लगता हैं पर फटता नहीं.)
    वाह! अपनी बिना मेकअप वाली फोटो भी संलग्न की हैं, अच्छे लग रहे हो.
    होली की रंग भरी शुभकामनाएं.
  5. जीतू
    अबे! होली के मौसम मे तो कम से कम बख्श दो। अब तो लगता है एक बार विशेष रुप से तुम्हारे लिये भारत यात्रा करनी पड़ेगी।
    फुरसतिया जी तो उस महबूब की तरह हैं कि जिसकी गालियां भी फूलों की तरह लगती है।दिए जाओ,दिये जाओ, किसी दिन एक साथ वसूल लेंगे।
  6. आशीष
    नजर बचा बचा कर ब्लागीये,लिखिये नजर बचाये
    जाने किस मोड पर शुकुल देव मिल जाये
    शुकुल देव मिल जाये, कर दे खूब चिकायी
    कर दे खूब चिकायी, शुकुल देव मंद मंद मुस्कायी
    चिकायी कहां मूढ बालक, हम तो मौज ले रहे है भाई
    वैसे फुटवा मे फटफटीया अच्छी लग रही है :-)
  7. प्रत्यक्षा
    हम तो सोच रहे थे कि फव्वारे के रंगीन पानी के नीचे, होली खेलते हुये तस्वीरें होंगी. एक पंथ दो काज !
    होली की मस्ती मस्त रही
  8. विजय वडनेरे
    हमें तो जो सुझा हमने उसे ही लिख मारा,
    जीतू जी के सुझावों ने हमारे ब्लाग को भी तारा,
    ब्लाग ने तो दे दिया हमारी कुलबुलाहट को एक सहारा,
    वरना तो मैं बेचारा,
    था नून तेल लकडी के बोझ का मारा,
    पर लगा बडा ही अच्छा
    जब पढा टाईटल हमने हमारा,
    सिंगापुर तो छोटी-सी जगह है
    पर अब लगता है सारा ब्लाग जगत हमारा!!
    बहुत बहुत धन्यवाद अनुप भाई!
  9. भोला नाथ उपाध्याय
    बहुत अच्छा लिखा भाई साहब, मज़ा आ गया। ये स्वामीजी की भैंस प्रेम की क्या कथा है? वैसे उनका भैंसप्रेम तो “कोईली” प्रकरण में भी परिलक्षित हुआ था, जब नाम सुनते ही उन्हें यह इतना पसन्द आया था कि फटाफट इस नाम से ब्लॉग बना डाला था(गुस्ताखी के लिये क्षमा याचना)। होली की ढेर सारी शुभकामनायें ।
  10. फ़ुरसतिया » मुट्ठी में इंद्रधनुष
    [...] भोला नाथ उपाध्याय on आइडिया जीतू का लेख हमाराविजय वडनेरे on आइडिया जीतू का लेख हमाराप्रत्यक्षा on आइडिया जीतू का लेख हमाराआशीष on आइडिया जीतू का लेख हमाराजीतू on आइडिया जीतू का लेख हमारा [...]
  11. फुरसतिया » तोहरा रंग चढ़ा तो मैंने खेली रंग मिचोली
    [...] आज की फोटो-कार्टून तरकश से लिये गये हैं। कार्टून का पूरा मजा लेने के लिये और होली के टाइटिल देखने के लिये तरकश देखिये। मेरी पसंद में आज आपके लिये भारत के प्रख्यात शायर ‘ प्रोफेसर वसीम बरेलवी’ का गीत खासतौर से तमाम टेपों के बीच से खोजकर यहां पोस्ट किया जा रहा है। हमारी पिछले साल की होली से संबंधित पोस्टें यहां देखिये:- बुरा मान लो होली है भौंरे ने कहा कलियों से आइडिया जीतू का लेख हमारा [...]
  12. फुरसतिया » जीतेंन्द्र, एग्रीगेटर, प्रतिस्पर्धा और हलन्त
    [...] इसके बाद तो तमाम खिंचाई-लेख लिखे गये जो सिर्फ़ और सिर्फ़ जीतू पर केंद्रित थे। ये हैं- १. जन्मदिन के बहाने जीतेन्दर की याद २. गरियाये कहां हम तो मौज ले रहे हैं! ३. आइडिया जीतू का लेख हमारा ४. अथ कम्पू ब्लागर भेंटवार्ता [...]
  13. जीतेंन्द्र चौधरी के जन्मदिन पर एक बातचीत
    [...] २. गरियाये कहां हम तो मौज ले रहे हैं! ३. आइडिया जीतू का लेख हमारा ४. अथ कम्पू ब्लागर भेंटवार्ता ५. [...]
  14. LanseloT
    {Читаю {ваш|этот|} блог, и понимаю, что {ничего|нифига} не понимаю. Все так запутано. :)
  15. Адриан
    Интересно! Надеюсь продолжение будет не менее интересным…
  16. जीतू- जन्मदिन के बहाने इधर उधर की
    [...] २. गरियाये कहां हम तो मौज ले रहे हैं! ३. आइडिया जीतू का लेख हमारा ४. अथ कम्पू ब्लागर भेंटवार्ता ५. [...]

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