Thursday, March 30, 2006

छत पर कुछ चहलकदमी

http://web.archive.org/web/20110101225524/http://hindini.com/fursatiya/archives/116

छत पर कुछ चहलकदमी

जम्हुआने के बाद हमारी नींद लग गयी। आज जब उठे तो प्रत्यक्षाजी की छत देखी। इनकी छत देखकर मुझे भी लगा कि हम भी कुछ अपनी छत देखें। सो हम भी कविता के जीने चढ़कर आ गये अपनी छत पर। अब हम प्रत्यक्षाजी जैसे काबिल छतबाज तो हम हैं नहीं लेकिन जैसे कि रविरतलामी जी ने कहा था कि नये कवियों को फुरसतिया जैसे लोगों की आलोचना की परवाह किये बिना कविता करना जारी रखना चाहिये तो उसी प्रोत्साहन की बल्ली लगाकर हम कविताप्रदेश में घुसपैठ की कोशिश कर रहे हैं । हमारा पूरा जोर मौज मजे पर है लेकिन फिर भी अगर किसी को कविता का कोई सबूत मिल जाय तो दोष हमें न देकर रतलामी जी को दिया जाय।दोष देने के लिये ‘सेविंग क्रीम वाला’ आधुनिकतम तरीका अपनाया जा सकता है।
१.
मेरी छत
तुम्हारी छत से सटी खड़ी है-
किसी परेड में
सावधान खड़े जवान की तरह।
छत से नीचे जाते
‘रेन वाटर पाइप’ एक दूसरे को
दूर से ताकते हैं -
सामांतर रेखाओं की तरह
जिनका मिलन नामुमकिन सा है।
छत का पानी
अलग होकर पाइपों  से गुजरता है-
अलगाव की तड़प से पाइपों को सिहराता हुआ।
थरथराते पाइप पानी को
आवेग के साथ मिलते देखते हैं
सामने के नाले में
संगम सा बनाते हुये।
२.
मेरी छत
तुम्हारी छत के सामने है
बीच में पसरी है-
चंद मीटर हवा।
हवा ठेलती है
छतों को -
एक दूसरे की ओर
मिलन के लिये उकसाती हुई।
मिलन-ज्वार को जब्त किये छतें
खड़ी रहती हैं अहिल्या सी
बीच की दूरी की
पवित्रता बनाये हुये।
३.
मेरी छत से
तुम्हारी छत से जुड़ी है
तुम्हारी छत उसकी छत से।
मेरी-तेरी-उसकी छतें
जुड़ीं है एक-दूसरे से
रक्तवाहिनी शिराओं की तरह।
छतों पर मेरा-तुम्हारा-उसका
आना-जाना तो बदस्तूर जारी है
लेकिन मिलना-जुलना कम होता जा रहा है।
हर बार छत पर
आकर मैं-तुम-वो
सोचते हैं काश हम भी छत होते
मिलते रहते रोज-हमेशा-
एक-दूसरे की गर्मी-सर्दी महसूसते।
४.
मेरी छत पर उतरते कबूतर
तुम्हारी छत पर नाचते मोर को
गुटरगूं-गुटरगूं करते घूरता है
जैसे कोई नेता घूरता रहा हो
किसी नृत्यांगना को
-काजू चबाते,मोबाइल पर बतियाते हुये।
कुछ देर बाद
कबूतर पर फड़फड़ाकर
उड़ जाता है दूर आकाश में
जैसे नेता चल देता है
हाथ झाड़ते हुये
किसी दूसरे मंच पर फीता काटने के लिये।
मोर कुछ देर बाद
थककर टहलने लगता है
उसका नृत्योत्साह चुक जाता है
सरकारी अनुदान बंद हो चुके
किसी एनजीओ के उत्साह की तरह।
५.
उसकी छत
मोहल्ले की सबसे ऊंची छत है
मेरी-तेरी छतों से बहुत-बहुत ऊंची
एकदम आसमान से बतियाती।
उसकी छत पर हमेशा कबूतर
फड़फड़ाते हैं
-शांति के,
सद्भावना के,
बराबरी के।
हवा में खुशहाली के गीत
बगीचे की खुशबुंओ
सरीखे तैरते हैं।
हर छत
सपना देखती है
उसकी छत सा बनने का।
कभी-कभी उस छत से
निकलती चीख चौंकाती है
जैसे किसी ने फिर बम बरसायें हों निहत्थों पर
उनको सभ्यता का ककहरा सिखाने के लिये।
चीख को तुरंत घेर कर
मिटा दिया जाता है
कबूतरों की गुटरगूं,
पाप संगीत की धुन
तथा सभ्यता के उदघोष से।
हमारी छत की हर फुसफुसाहट
याद दिलाती है सबसे ऊंची छत से
निकली चीख की
जिसका गला पैदा
होते ही घोंट दिया गया
६.मेरी छत से निकले कुछ ईंटें
तुम्हारी छत से टकराकर
मेरे तुम्हारे बीच के रास्ते
पर पसर गये हैं।
एक पार्टी से निकले विधायको नें
दूसरी पार्टी में जाने की घोषणा करके
अलग दल बना लिया है।
विधायकों की तरह
ईंटे भी तय नहीं कर पायी हैं
अपना कार्यक्रम।
फिलहाल दोनों जनता की अदालत में हैं।
७. मेरी छत से
तुम्हारा पर्दा दिखे
सरसराता।
पानी बरसा
छत पर ठहरा
जरा सुस्ताने।
कैसे पुकारूं
दिखे नहीं दिनों से
छत सूनी है।
छत उसी की
जो समय बिताये
छत पर ही।
पतंग उड़े
हवा से बतियाते
मेरी छत की।
इस छत से
उस छत का कुछ
याराना सा है।
ये यहां पड़ी
उसको ताकती है
क्या जमाना है।
८.
मेरी छत को मुझसे मत जुदा करो
हमको इस कदर तो न विदा करो।
जिंदगी सारी गुजार दी हंसते-हंसते
अब तो खुशियों से खुद को जु़दा करो।
सुख इतना भी तकलीफदेह नहीं होता
बेवजह हंसने से मत किनारा करो।
हम तो छत के पानी है,बह जायेंगे
 उचककर बेवजह हमें न निहारा करो।
तड़पने में मेहनत बहुत हो जाती है
भूल जाओ अब मुझे तुम, किनारा करो।
९.
ये छत सालों से ऐसे ही पसरी है
इसका हर कोना
हमारे अतीत की दास्तान है।
बीच का हिस्सा,
जिसके पास ही बना है
नीचे जाने का जीना,
तो मानो कोई धड़कता हुआ सामान है।
इसी कोने से मैंने देखा था तुम्हें
-पहली बार
भरी दोपहरी में आंखे मिचमिचाते हुये-
(धूल भरा अंधड़ जो आया था
ज्योंही मैंने तुम्हें आंखें फैलाकर
ताकना शुरू किया था।)
मुझे अब भी याद है
तुम्हारा तिरछे अंदाज में
आसमान  ताकते
कुछ अकड़ा सा कुछ सिकुड़ा सा चेहरा।
मैंने समझा था तुम मुझे ही ताक रही हो
तिरछी निगाहों से जैसे कि ताकती रहती हैं
दुनिया की सारी बिछुड़न-अभिशप्त नायिकायें।
मैंने गला खखारकर हकलाने का नाटक करते हुये
-चांद सी महबूबा होगी कब ऐसा मैंने सोचा था
गाने का निश्चय किया ही था कि
तुम भागकर जीने से नीचे चली गयी थी
उस चाट के ठेले की पास
पानी के बतासे खाने जिसे
तुम बहुत देर से ताक रही थी
तिरछी निगाहों से
मुझे यह भ्रम पालने का मौका देते कि
तुम्हारे निगाहें के तीर
हमारे ही दिल में
धंसने के लिये बेकरार हैं।
१०.
ये मेरी छत
मुझे याद दिलाती है
वो दोपहर जब हम आखिरी बार मिले थे
यहीं
इसी जगह।
 वो दोपहर मुझे रोज याद आती है
तड़पाती है
चौंकाती है
हड़काती है
डराती है
मानो कोई छत न हो
हिटलर का नाती हो।
यहीं मैंने पहली बार थामा था
तुम्हारा थरथराता हाथ
हमेशा के लिये
छोड़ देने ले लिये।
यहीं मुझे पता चला था
पहली बार कि
बरसात में लोग डूब कैसे जाते हैं।
इसी जगह मैंने जाना था
कि कैसे सुलगते रहते हैं
लोग ताजिंदगी किसी छुअन के अहसास से।
मैं इस छत पर खड़ा
तुम्हारे बारे में सोच रहा हूं
तुम पता नहीं किस छत पर खड़ी
किसके बारे में क्या सोच रही हो।
लेकिन मेरे मन में
यह खुशनुमा अहसास
अभी भी महक रहा है
कि मेरी इस छत पर
जब हम आखिरी बार मिले थे
तो हम हर सोच से दूर थे।
११.
एक टुकड़ा उजास
थोड़ी मिट्टी, थोड़ी घास
पानी भी मिलेगा आसपास
सबका तैयार करो सत
बन गई अपनी छत।
थोड़ा हैया थोड़ा हुश
थोड़ा धक्का थोड़ा पुश
न ज्यादा रोना न बहुत खुश
सारी चिंतायें होंगी चित
बन जायेगी तेरी भी छत।
बस करते-करते बातें
कुछ दिन बीतेंगे कुछ रातें
कुछ भरमाते कुछ शरमाते
आयेंगे इधर-उधर से खत
लो सबकी बन गई छत।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

12 responses to “छत पर कुछ चहलकदमी”

  1. अतुल
    पानी के पाइप वाली कविता तो गजब है।
  2. ई-स्वामी
    सच पानी के पाईप वाली शानदार है!
    और मुझे ये वाली पंक्तियां भी जाने कहां ले गईं –
    इस छत से
    उस छत का कुछ
    याराना सा है।

  3. रवि
    यह है असली कविता…
    छत पर भी उसी तीव्रता से लिखा है जिस तीव्रता से बरसाती पर, छत से तीव्रता से बहने वाले पानी पर और छत से निकलने वाले पाइप पर भी!
    पर, कवि के बारे में पता नहीं… :)
    (वैसे तो लोग आजकल बशीर बद्र को भी शायर मानने से इंकार कर रहे हैं, और उनके शहर के रहने वाले दूसरे शायर गण ही!)
  4. प्रत्यक्षा
    रवि जी, ये आपने क्या कर दिया, देखिये अब फुरसतिया जी की कविता रेन वाटर पाईप से बरसाती नदी की तरह उफनती , घुमडती, सारे बहाव तोडती , निकल पडी है.किसी छत की क्या मज़ाल कि रोक ले अब .
    वैसे फुरसतिया जी ,अपने ‘एक्स्पीरीयंस’ काव्यशैली में बडा बढिया लिखा है
  5. जीतू
    वैधानिक चेतावनी:इस टिप्पणी को पढकर आप अपना सर पीटने वाली हालत मे आ सकते है, इसलिये बेहतर होगा, कोई डन्डा आसपास रख ले, आसानी होगी)
    अब जब तुमने छतों की कविताओं की बात कर ही दी है तो मेरी भी झेलो
    (नोट:सरदर्द की गोलियों का स्टाक शुकुल से लिया जाए)
    तेरी मेरी गुमसुम छतें…अक्सर ये बाते करती हैं
    ये बीच मे गली ना होती तो कैसा होता..
    ये गन्धाते पाइप ना होते तो कैसा होता…
    वो वर्मा की छत के एन्टीना का गिरना, तेरा घायल होना
    ये सब ना होता तो कैसा होता।
    तेरी मेरी गुमसुम छतें…अक्सर ये बाते करती हैं
    एक और झेलो…
    चुपके चुपके रात दिन….कागज चबाना याद है।
    वो तेरा(शुकुल) छत पर आकर चुपके चुपके कविता लिखना..
    बार लिखना, बार बार मिटाना…
    कलम ना चलने पर खिजियाना
    खिजियाकर, बीबी बच्चों पर गुर्राना
    कविता लिखकर, दुनिया भर को झिलाना…
  6. SHUAIB
    फुरसतिया जी, कवीता पढ कर बहुत मज़ा आया सच में :)
  7. समीर लाल
    “ये छत सालों से ऐसे ही पसरी है
    इसका हर कोना
    हमारे अतीत की दास्तान है।”
    बहुत सही है “हमारे” शब्द का इस्तेमाल “मेरे” की जगह…सभी के अतीत किसी ना किसी छतिया कहानी से जुडे हैं.
    समीर लाल
  8. राकेश खंडेलवाल
    हाय अगर हम भी छ्त होते तो जाने विधि का क्या जाता
    हम पर भी ऐसे ही कोई फ़ुरसतिया कविता लिख जाता
    उपालंभ से उपमानों तक नई शैलियों के प्रयोग से
    पानी बारिश अंधड़ बिजली से फिर और निखार आ जाता
  9. रवि कामदार
    बस कुछ कविताए ओर लिखलो और छ्त शास्त्र में Phd मिल जायेगा। जबरजस्त कविताए है। मैं तो सोचता ही रह गया इस क्रिएटीविटी के बारे में। साला मेरा दिमाग एसा चलता ही नही है।
  10. फ़ुरसतिया »
    [...] छत पर चहलकदमी करके नीचे आये तो देखा कि टीवी पर हल्ला मचा था। मुंबई में किसी माडल का ‘बिल्ली भ्रमण’ करते हुये कोई कपड़ा चू गया होगा। माडल ने,जैसा कि होता है,पूरे आत्म विश्वास से अपना कैट-वाक पूरा किया। इसके बाद फिर जैसा होता है वही हुआ-कुछ भारतीय संस्कृति की चिंता करने वालों की मांग पर सारे मामले की जांच कराई गयी।जांच में भी जैसा होता है कुछ निकला नहीं। इसके बाद फिर वही हुआ जैसा कि होता है-दुबारा जांच के आदेश हुये हैं। पहली जांच के विवरण पता नहीं चले कि कैसे जांच हुई लेकिन सहज मन से अनुमान लगा सकता हूं कि सजग जांच अधिकारी की तरह शायद माडल के कपड़े फिर से गिरवा के देखे जायें। [...]
  11. world from my eyes - दुनिया मेरी नज़र से!! » हम हैं इस पल यहाँ …..
    [...] इधर लोग बाग़ बराबर अपनी अपनी छतियाने में लगे हुए थे(फ़िलहाल रूक गए, भई आखिर कितना छतियाएँगे)। एकबारगी तो मुझे लगा कि कही यह बर्ड फ़्लू की तरह न फ़ैल जाए, क्योंकि उस हाल में अपने को इसके टलने तक नारद दर्शन के लिए जाना बन्द करना पड़ता, नहीं तो अपने बीमार होने का खतरा होता। वैसे तो अपन इससे पूरी तरह निरापद हैं पर फ़िर भी क्या भरोसा, जाने कब क्या हो जाए!! [...]
  12. world from my eyes - दुनिया मेरी नज़र से!!
    हम हैं इस पल यहाँ ……..
    ….. और आप?
    ……

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