Sunday, January 21, 2007

१८५७ के पन्ने: मदाम एन्जेलो की डायरी

http://web.archive.org/web/20110926072714/http://hindini.com/fursatiya/archives/230

१८५७ के पन्ने: मदाम एन्जेलो की डायरी

[मैंने कानपुर के बारे में नियमित लेख लिखने की बात सोची थी लेकिन अभी तक कुल जमा तीन लेख इस बारे में लिख पाया।
इस बीच तमाम बार कानपुर के बारे में खासकर के कानपुर की लोगों के बारे में ,शख्सियतों के बारे में लिखने के बारे में सोचा और बस सोचते रहे। कुछेक मित्रों ने तमाम चरित्रों के बारे में भी लिखने के लिये उकसाया लेकिन उनका उकसाना हमारे जड़त्व से पिट गया। बहरहाल आज एक बार फिर कानपुर-कथा की शुरुआत करते हुये एक अंग्रेज महिला की डायरी के कुछ पन्ने आपको पढ़ा रहा हूं। यह महिला मादाम फ़्रेडरिक एंजेलो भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों की तरफ़ से मोर्चा संभाले के अंग्रेज सुपरिन्टेंडेन्ट की पत्नी थीं। इन्होंने अपनी डायरी के पन्नों में कानपुर से कलकत्ता जाने के हालात बयान किये हैं। इस डायरी से यह साफ़ पता चलता है कि उस लड़ाई में भारतीयों में एकता की कमी थी। सिख सैनिक भारतीय विद्रोह (जिसे अंगेज महिला ने उपद्रव लिखा है) को कुचलने में अंग्रेजों का सहयोग दे रहे थे तथा आम जनता के लोग अंग्रेजों के यहां काम करने में लगे हुये थे।
यह लेख मुझे कानपुर के इतिहास और धरोहर को संजोने के कार्य में संलग्न संस्था कानपुरियम द्वारा प्रकाशित पुस्तक कानपुर-कल आज और कल के खंड २ में मिला। इस डायरी का अनुवाद श्री रामकृष्णजी तैलंग ने किया है। श्री तैलंग कानपुर के एनसाइक्लोपीडिया माने जाते हैं। वे आचार्य नगर स्थित भारतीय विद्यालय इंटर कालेज के अवकाश प्राप्त प्रधानाचार्य है।]
लेफ़्टिनेंट फ्रेडरिक कोर्टलैण्ड एन्जेलो १६ नम्बर नेटिव पैदल टुकड़ी में था । वह किसी अफसर का पौत्र था जिसने वारेन हेस्टिंग्स की निजी सुरक्षा टुकड़ी में काम किया था। वह १४ मई, १८५७ को कानपुर में गंगा नहर की रक्षा टुकड़ी में सुपरिंण्टेंण्ट के पद पर तैनात था। जिस दिन वह अपनी दो पुत्रियों और गर्भवती पत्नी के साथ कानपुर में ड्यूटी पर आया उसने पाया कि सभी अंग्रेज(स्त्री,पुरुष) व्हीलर बैरक में पनाह ले रहे हैं। वह भी वहां गया। श्रीमती एन्जेलो ने अपनी डायरी में घटनाऒं का थोड़ा-थोडा़ विवरण लिखा। प्रस्तुत है उसका हिंदी अनुवाद:

डायरी का अंश

२५ मई, १८५७: पिछली शाम जनरल ने खबर कराई कि रात या अगले दिन हमला हो सकता है।
२६ मई: फ़्रेडरिक ( एन्जेलो का पति) ने वह नाव त्याग दी है जिसमें हम अब तक थे। आज शाम हम बैरकों वाले कैम्प में चले जायेंगे। तत्पश्चात- यह घेराबन्द कैम्प अजीब नमूना है। कहीं मर्द और औरतें झुण्ड बनाये हंसी ठ्ट्टा कर रहे हैं। भद्रपुरुष एक खुले मैदान में हैं-चारो ओर शोरगुल छाया है जैसे खुशी का कोई जमावड़ा हो।
२७ मई: फ्रेड को तोपखाने में लगाया है। वह गंभीर और चितित लगता है।
२८ मई: फ्रेड का पक्का विचार है कि मैं बच्चों को लेकर कलकत्ते चली जाऊं। साथ में मिसेज वोल्क होंगी। आज शाम हमें अपनी मर्जी के खिलाफ जाना पड़ेगा क्योंकि उसकी यही मर्जी है। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि यह कदम परमेश्वर की दया से कुशल पूर्वक हो और हम दोनों के लिये मंगलकारी बने। जबकि मेरे विचार से पति और पत्नी की जुदाई कम से कम होनी चाहिये। शाम ६ बजे हम रवाना हुये। हे ईश्वर, मेरे स्वामी की रक्षा करना!
(टिप्पणी- अगले इंदराज नदारद हैं लेकिन ज्ञात हुआ कि उसने नाव में पटरे के नीचे एक नौकर की मदद से छिपे-छिपे गंगा द्वारा इलाहाबाद तक यात्रा की थी।)
३० मई: कल रात १० बजे यहां(इलाहाबाद) पहुंची। स्टेशन (छावनी क्षेत्र) में सन्नाटा छाया था। सब लोग किले(जो यमुना किनारे बना है) में चले गये हैं।मैं नूरमुहम्मद के होटल में पहुंचकर टिक गयी जहां केवल कहने भर को छोटी सी जगह थी। गर्मी बहुत थी और अब भी है। मिसेज वोल्फ़ को साथ लेकर मैंने एक पर्देदार पालकी गाड़ी ली और घाट पर पहुंची। वह जहाज(स्टीमर) आज ही खुलने वाला है, पर मेरे अन्दर की औरत जाने के लिये तैयार नहीं है। मुझे दुख है,कि प्यारे फ्रेंड को बड़ी निराशा होगी। तब मैं किले की ओर गयी, शायद वहां कुछ रहने योग्य जगह मिल जाये। वहां किले का एडजूटेण्ड नहीं था। फलत: मैं थक कर चूर हो गयी। तब मिसेज पोट्स अपने घर ले गईं। और बोल के होटल में जाने से मना करने लगीं। इन्होंने कृपा करके अपने कमरे में आधी जगह मेरे लिये कर दी, फोर्ट की इस जगह मैं सो गई- बड़ी गर्मी लगती रही।
३१ मई, रविवार: दिन काफ़ी चढ़ आया है। मैं अभी होटल में ही हूं। मि. बालकाट आये और मुझे फोर्ट ले जाने की सिफारिश कर दी। अत: जल्दी रात का खाना खाकर हम सब चले गये। मेजर मूर हाउस ने मिसेज पाट्स के बगल वाला कमरा दे दिया है। गर्मी बड़ी सताने लगी है।
१ जून, सोमवार: पूरा दिन किले में गुजारा। मिसेज हावर्ड, तोपखाने वाली मिलने आई। लखनऊ से खराब-खराब खबरें आई हैं, यह सब कैसे निबटेगा?
२ जून: अभी (मैं) किले में ही हूं। पूरे दिन नेल (बिटिया) बीमार रही। शाम को छ: नम्बर वाली मिसेज विलियम्स मिलने आयीं थी। बड़ी दिलचस्प महिला लगीं। श्रीमती न्यूमेन के बैठक वाले कमरे में सोने को
जगह मिली। यहां दिन भर की गर्मी और क्वार्टरों की शोरगुल से बचे रहे तो अच्छा लगा।
३ जून: बच्चों को देखने डा. स्टूज आय-आगरे के टेलीग्राम से खुशखबरी आई कि मेरठ के पास उपद्रवियों के ऊपर कुछ सफलता हाथ लगी है। एक नया कुली रखा है।
५ जून: अफ़वाहों का दिन रहा, कैण्ट में जाने की आज्ञा न थी। सबेरे स्टीमर में अपना केबिन ले लिया। शाम को पता चला कि बनारस में यूरोपियन सैनिकों को लाने उसे भेजा गया था। वेन के रेजिमेण्ट का जिक्र हुआ। सिखों और यूरोपियन सैनिकों ने अच्छी लड़ाई करके उन्हें भागने पर मजबूर कर दिया। अपने प्यारे पति की भेजी पांच चिट्ठियां मिलीं। कानपुर में सर्वत्र शान्ति का समाचार पाकर ईश्वर को धन्यवाद दिया। नावों के पुल की ओर दो तोपें भेजी गयीं।
६ जून: जब मैं बिस्तर में ही थी कि श्रीमती पोट्स ने तुरन्त उठकर कपड़े पहनने को कहा। कारण कि कुछ गंभीर मामला हो गया लगता है। छावनी की तरफ़ से बड़ी आवाजें सुनाई दे रही हैं। पलटन नं. ६ ने(म्यूटिनी) विप्लव
कर दी है और सब अफसर तथा यूनिट के लोगों को मार रहे हैं। हम लोगों ने उपद्रवियों की आवाजें और बंदूकों का शोर सुनते पूरी रात बरामदे में गुजारी।
७ जून, रविवार: करीब १२ बजे दिन में ईश्वर से प्रार्थना नीचे बरामदे में हुई। हाय, पन्द्रह अफसर हलाक हो गये! कैसे बुरे दिन हैं। उस पर कानपुर से खबर नहीं है। दिन और रात तक शहर में बंदूकों और तोपों से आग निकलती रही।
८ जून, सोमवार: वूजीखान ने शहर से कुछ आटा और खराब डबल रोटियां लाकर दीं। मिसेज पाट्स का खानसामा स्टेशन स्टेशन गया पर लौट नहीं सका। सुनने में आया है कि शहर में मुस्लिमों ने अपना परचम फहराकर सबको साथ देने का न्योता दिया है। हिन्दुस्तानी नीचों की हिम्मत देखो! कानपुर से कोई खबर नहीं आई!
९ जून: कमरे से मुझे निकाल दिया गया। मजबूरी में मिसेज पाट्स के साथ दो लोगों को रहना पड़ रहा है। हमलावरों पर फायरिंग अभी जारी है। बताया गया है कि कोई दो भले मानुस कानपुर से होते हुये आये हैं। वहां उन्होंने फायरिंग सुनी थी। ईश्वर करे खंदकों में गुजारा कर रहे कैम्प वाले मुकाबला करें और मेरे प्यारे खाविंद कुशल से हों।
१० जून: न तो खाना मिल रहा है न नौकर। एक भिश्ती (पानी वाला) को मजदूरी पर रखा था। पूरा दिन इस खुश फ़हमी में गुजरा था कि शाम को वह भाग गया। आज तो बड़ी गर्मी हैं। रेलवे के १५ लोग और आ गए हैं किन्तु बेचारी मिसेज वेविस लू और ताप से चल बसीं। आज का दिन लूटका है। दो सौ भेड़े लाई गई।सिखों को लूटने की इजाजत दी गई हैं। लगता है पूरा जिला कथित महमूदी झण्डे के तले आ गया है प्रतिशोध की घड़ी आ गई है-कानपुर से खबर नहीं आ रही और न कहीं अन्यत्र से। सब ओर के टेलीग्राफ़ के तार काट दिये गए है, कोई डाक भी नही मिल रही हैं। स्टीमर आना बंद है। मिसेज पोटस आज श्रीमती बालकोट को लेकर मिर्जापुर जाना चाहती हैं। पूरी रात कल और आज और दिन भर लगातार फ़ायरिंग सुनाई पड़ती रही। अब तो इन डरावनी आवाजों का अभ्यास हो गया है। कोई कहता है यह सिर्फ़ मुसलमानों का उपद्रव है, जिसमें हिन्दू लोग तो डर के मारे जुड़ गये हैं। मिसेज (नाम अज्ञात) ने मुझे बताया कि कानपुर मे चौबीस घण्टे चली फ़ायरिंग की खबर सुनी गई थी। ओंह, उनकी क्या हालत है ,जानने के लिए मैं क्या दे डालूं? मेरे प्यारे शौहर, तुम कहां हो!
११ गुरूवार: कल सिखों को लूट पाट करने की अनुमति दी गई थी २०० भेड़े लाई गई हैं। कप्तान एलगिन को लू लग गई है, आज सबेरे फ़कीर बने हुए एक भेदिये को पकड़ा गया। था। कानपुर से खबर नहीं आ रही। यहां तो खाने के लिये बाकायदा लड़ई मची है। कर्नल नील चालीस यूरोपियनों को साथ में लेकर आये हैं। यहां अब तक की कमान एक बूढ़ी औरत के हाथ में रही थी उसका ऊबाऊ शासन खत्म करके उन्होंने कमान लेली है, सब खुश हैं। एक फ़्रांसीसी कानपुर से आया है, बताता है कि वहां के कैम्प में ठीक-ठाक हैं। बताते है घुड़सवार पलटन ने खजाने से लूटमार की थी-सर हयु व्हीलर ने फ़ायर करके बचाव किया। पूरा कैन्टोनमेंट आग में। (कोई नाम) इतना बेहूदा था कि मुझे उसे निकालना पड़ा। मौसम की गर्मी और मामूली भोजन मिलने पर भी बच्चे सलामत हैं, ईश्वर के प्रति मैं आभारी हूं।
१२ जून: कर्नल नील ने आज सुबह से काम शुरू किया है। पांच सौ सिखों और यूरोपियनों को तड़के रवाना किया गया कि वे पुल के पड़ोस के गांव को नष्ट कर दें। सुबह से बनदूकों की धांय-धांय सुन पड़ रही है। शाम से रात गये तक औरतें बैरकों की छाती पर चढ़कर शहर को जलते हुए देखती रहीं। रात बड़ी गर्म रही।
१३ जून: कल रात मद्रास से बन्दूकधारी फ़ौजियों को लेकर एक स्टीमर पहुंचा है। सुबह से घमासान मचा है। सिर्फ़ १०० सिख जो भेजे गए थे पराजित लौटें है, वे किले में चढ़ी तोपों की आड़ लिये हैं। कानपुर से खबर नहीं आ रही। बड़ी उत्सुकता है कि कानपुर में क्या हो रहा है, जान सकूं। मेरा साहसी शौहर! कैसा है। कर्नल का आदेश लेकर मिसेज एल आई है कि जो जो औरतें जा सकती हों, स्टीमर से कलकत्ते रवाना हो जाये जिसका खर्च सरकार उठायेगी।
१४,जून:आज दिन भर जहाज में जाने की तैयारी में बीता। कैसा तो इतवार था! चारो ओर अफ़रातफ़री मची है, शोर भरा है। सवा चार बजे तड़के सवार हुई। भारी गर्मी और परेशानी हाल में दिन गुजरा। मैने कोशिश करके अपने हिस्से का स्थान दो भागों में बांट लिया, यही किसी कदर हो सकता था।
१५,जून: बड़े तड़के रवाना हुए। हमसे पहले छुटने वाले एक स्टीमर ने आगे निकलकर एक गांव पर गोलाबारी की जो नदी से करीब १० मील ऊपर था, हमारे चलते ही गोले दगने लगे। जिससे हमें जलते हुए शहर का धुंआ साफ़ नजर आने लगा। बड़ी उमस हो रही है, मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मै बच्चों के साथ कैसे पार करूगीं? यहां आधी जात वाले (वर्ण संकर) लोगों का अजीव जमावड़ा हो गया है, सब लोग मुफ़लिस है, और कलकत्ते पहुंचने को बेताब हैं जबकि जेब में एक रूपया भी नही है, बेचारे लोग! इनमें से मेरी जैसी चिन्ता लिये अपने खाबिन्दों की खैरियत के लिये परेशान हाल लोग बैठे हैं – सबेरे ४ बजे मीरजापुर पहुँच गए। मिसेज वोल्क और विन्सेण्ट तो मिसेज पोट्स के साथ नदी के किनारे पहुंची और स्टेशन जाने के लिए एक पालकी कर ली। शाम को उसने अपना सामान मेरे पास से मंगा लिया लेकिन मुझे एक लाइन भी न लिख भेजी। उसकी भरोसे की बातें औरों जैसी ही तो हैं।
१६जून, मंगलवार: मुझे लग रहा है कि देर तक यहां रूकना पड़ेगा क्योंकि बहुत से माल की लदान है। गर्मी तो जान लेवा है।
१७ जून: करीब १० बजे दिन चढ़े हम चले और १ बजे चुनार से गुजरे। यहां की पुरानी और यादों भरी दीवालें देखकर खुशी हुई। शाम होते बनारस आ गये मिसेज गांर्डन मुझे और मिसेज बुडहाउस को लेने को मौजूद थी। हमें रामनगर के पास कुछ यूरोपियन औरते और बच्चे दिखे थे, लेकिन जहाज ने इनको सवारी देने के लिए रूकना पसन्द न किया। वालांटीयरों ने इस व्यवहार की शिकायत कर्नल को भेजी है, इस जहाज में एक फ़्रेंच कर्नल जो कानपुर से आया था, मुझसे शाम को काफ़ी देर कानपुर के बारे में बातें करता रहा, जिससे मुझे अपने प्यारे शौहर के भाग्य की भारी चिंता हो गई है और डर लग रहा है।
१८ जून: मिसेज गार्डन ने मुझको कुछ बिस्कुट और रोटी भेजी है। सवेरे ९ बजे बनारस से रवाना हुए। मिसेज बोल्क बताने लगी कि उन्हें कानपुर के बारे में आज सुबह की खबर मिली थी कि कानपुर के खन्दकों वाली छावनी में सभी लोग सुरछित हैं। ईश्वर करे यह सच हो। किन्तु लगता है कलकत्ता पहुंच कर ही ठीक-ठीक खबर मिलेगी।
२४ जून: राजमहल पहुंचकर जहाज में कोयला भरा गया। पिछले कुछ दिनों से मैं कुछ नही लिख पाई। मौसम बेरूखा रहा, हवायें तेज है लेकिन ठंडी और गीली। कैसी अजीब मौसम वाला देश है। जैसी उम्मीद न थी। मुझको और बेटी हेलेमा को थोड़ी पेट की तकलीफ़ हो गई थीं। महीना भर हुआ जबसे मैं प्यारे खाबिन्द से अलग हूं-ईश्वर की क्रपा है कि मेरा स्वामी अभी तक है!
कैसा सौभाग्य है! कलकत्ता पहुंचकर और खबर पाकर कितना मजा आयेगा।
२६ जून, शुक्रवार: आज सबेरे हम गंगा छोड़कर हुगली (स्पेलिंग गुगली लिखी है) में आ गये-यह बड़ी संकरी है और गंगा से ज्यादा गहरी है। किनारे खूबसूरत लगते हैं। दोपहर १२ बजे कोयला लेने के लिए कोमिल्ला पर जा लगे। बड़ी प्यारी मीठी जगह है-किनारे ऎसे घेरा डाले हैं जैसे कोई झील हो, यहां अच्छा दूध और फ़ल भी मिले। *
(अनुवाद एवं साभार प्रस्तुति: रामकृष्ण तैलंग)

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

6 responses to “१८५७ के पन्ने: मदाम एन्जेलो की डायरी”

  1. प्रेमलता
    बहुत बढ़िया। शुभकामनाएं।
  2. eswami
    यह लेख हट कर लगा और अच्छा भी!
  3. समीर लाल
    पढ़नीय सामग्री, बधाई.
  4. rachana
    इसे पढकर युद्ध के दौरान किसी स्त्री, जो एक पत्नी और माँ भी है की मानसिक स्थिती को जानने-समझने का अवसर मिला.धन्यवाद.
  5. ravish kumar
    मैं एनडीटीवी इंडिया का संवाददाता हूं । ब्लाग की आदत अभी अभी लगी है । १८५७ पर लेख पढ़ कर अच्छा लगा । और भी स्थानीय जानकारी हो तो देते रहिए।
    लेकिन क्या मुझे कानपुरियम के किसी व्यक्ति का संपर्क मिल सकता है और उनका भी जिन्हें आप एनसाइक्लोपीडिया कहते हैं । मेरा कोई ब्लाग नहीं है। मगर आप मुझसे ०९८११५१८२५५ पर एसएमएस कर सकते हैं। इंतज़ार रहेगा । रवीश कुमार
  6. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] का दरिया, बसंती की अम्मा और कुछ हायकू 6.१८५७ के पन्ने: मदाम एन्जेलो की डायरी 7.यह कवि है अपनी जनता का 8.यह कवि [...]

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