Wednesday, April 04, 2007

जूते का चरित्र साम्यवादी होता है


जूते का चरित्र साम्यवादी होता है

समीरजी से हमें ये आशा नहीं थी! :)
हमने अप्रैल फूल वाले दिन, जो कि खास उनका ही दिन होता है, उनको ही खुश करने के लिये उनके साथ साइट बनाने की बातकही। इस पर वे जूते बाजी पर उतर आये और बोले लो हमने अपने अपने हिस्से की कर दी। अब आपकी बारी है। जूते बाजी उन्होंने करके जूता फाड़ दिया और अब हमसे कहते हैं -आप फटे जूते की व्यथा कथा लिखो।
फटा हुआ जूता मतलब चला हुआ जूता। जो जूता चलेगा वही फटेगा। शो केस में रखे जूते बेकार हो जाते हैं , सड़ सकते हैं लेकिन फटते नहीं। फटने के लिये चलना जरूरी होता है। फटेगा वही जिसने राहों के संघर्ष झेले होंगे।
समीरजी ने लिखा है- जूते की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा। यह कहते हुये उन्होंने जूतों की दर्दीली दास्तान बयान की है। जूते का दर्द अपने शब्दों में बड़ी खूबसूरती से बयान किया है। जूते के दर्द को महसूसना और पूरी शिद्धत से उसे बयान करना यह समीर भाई के ही बस की है। वे बहुत विश्वास से कहते हैं – जूते की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा। उनके विश्वास को देखकर लगता है कि वे जूते की भाषा बहुत अच्छी तरह समझते हैं। यह तो कहो समीरजी अजातुशत्रु टाइप के आइटम हैं वर्ना उनका कोई चाहने वाला कह सकता था- समीरजी को जूते की ही भाषा समझ में आती है। लेकिन हम जानते हैं कि समीरजी केवल जूतों की ही भाषा नहीं बल्कि हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू आदि के अलावा प्रेम की भाषा पर अधिकार रखते हैं। उनकी यह पोस्ट उनके जूतों के प्रति उनके अनन्य प्रेम की परिचायक है।
हमें लिखना है फटे जूते की व्यथा-कथा। व्यथा-कथा मतलब रोना-गाना। आंसू पीते हुये हिचकियां लेते हुये अपनी रामकहानी कहना। हाय हम इत्ते खबसूरत थे लोग हम पर फिदा रहते थे और अब देखो चलते-चलते हमारा मुंह भारतीय बल्लेबाजी की दरार का कैसा खुल गया है। लुटने पिटने का अहसास, ठोकरों के दर्द की दास्तान बताना। मतलब अपने दर्द को गौरवान्वित करना। मुक्तिबोध के शब्दों में दुखों के दागों को तमगों सा पहनने का प्रयास करना। यह रुदाली तो हमसे न सधेगी भाई।
राम सिंहासन के लिये अपनी खड़ाऊं इसलिये छोड़ गये होंगे ताकि भरत को सिंहासन पर बैठने की आदत न लग जाये। वे अपनी खड़ाऊं उसी तरह सिंहासन पर रखने के लिये छोड़ गये जैसे लोकल ट्रेन में डेली पैसेंजर सीट पर रूमाल रखकर अपना कब्जा जमाते हैं। खड़ाऊं उन्होंने सिंहासन पर कब्जे के लिये छोड़ीं।
फटा हुआ जूता मतलब चला हुआ जूता। जो जूता चलेगा वही फटेगा। शो केस में रखे जूते बेकार हो जाते हैं , सड़ सकते हैं लेकिन फटते नहीं। फटने के लिये चलना जरूरी होता है। फटेगा वही जिसने राहों के संघर्ष झेले होंगे। कठोर जगहों पर ठोकरें मारी होंगी। राणा सांगा कहलाने के शरीर पर घाव खाने जरूरी होते हैं वैसे ही अच्छे चले हुये जूते पर चिप्पियों की सनद जरूरी होती है। चिप्पियों से फटे जूते का रुतबा उसी तरह जिस तरह तमाम आपराधिक मुकदमों की खेप से जनप्रतिनिधियों का रुतबा बढ़ता है।
जूते का प्रधान कर्तव्य अपने मालिक पैरों की रक्षा करना होता है। जो अपने कर्तव्य का निर्वहन न कर सके, चलते-चलते पैर को बचाने के लिये अपने सीने पर ठोकरें न खा सके , धूलि-धूसरित न हो सके वह जूता कैसा? जूते के नाम पर कलंक है ऐसा जूता जो पैरों की रक्षा करते-करते फट न गया। किसी ब्लागर कवि ने सही ही कहा होगा-
जो चला नहीं है राहों पर, जिस पर चिप्पी की भरमार नहीं,
वह जूता नहीं तमाशा है, जिसको मालिक पैरों से प्यार नहीं।

जैसे भारत में जब भी भ्रष्टाचार की बात चलती है, नेताऒं का जिक्र आता है वैसे ही जब भी जूतों की जिक्र होता है राम की खड़ाऊं सामने आ जाती हैं। बड़े चर्चे हैं राम की खड़ाऊं के। भरत वन जाते हुये राम की खड़ाऊं अपने लिये मांग लाये थे। उसे सिंहासन पर रख लिया था और चौदह साल चलाते रहे राजकाज! भरत के मांगने और राम के देने के पीछे तो तमाम कारण रहे होंगे। राम का भाई के प्रति प्यार। पुराने जमाने में घर परिवारों में छोटे भाई के पल्ले बड़े भाइयों की उतरन ही पड़ती थी। भरत ने कहा होगा भैया तुम जा ही रहे हो अपनी खड़ाऊं देते जाऒ। या उन दिनों शायद जूते बहुत मंहगे मिलते होंगे सो रामजी ने सोचा होगा कि चौदह साल जंगल में रगड़ने अच्छा है इसे यहीं छोड़ जायें। यहां भरत पालिस-वालिस करवाते रहेंगें। यह भी हो सकता है कि उनके पांव के जूते काटते हों यह सोचकर छोड़ गये होंगे कि जंगल में दूसरे मिल जायेंगे! चौथा और सबसे अहम कारण यह होगा कि राम सिंहासन के लिये अपनी खड़ाऊं इसलिये छोड़ गये होंगे ताकि भरत को सिंहासन पर बैठने की आदत न लग जाये। वे अपनी खड़ाऊं उसी तरह सिंहासन पर रखने के लिये छोड़ गये जैसे लोकल ट्रेन में डेली पैसेंजर सीट पर रूमाल रखकर अपना कब्जा जमाते हैं। खड़ाऊं उन्होंने सिंहासन पर कब्जे के लिये छोड़ीं।
मुझे राम की खड़ाऊं से अधिक नाकारा और कोई खड़ाऊं नहीं लगतीं। राम की पादुकायें जूते के इतिहास का सबसे बड़ा कलंक हैं। जूते का काम पैरों की धूल-धक्कड़, काटें-झाड़ियों से पैरों की रक्षा करना होता है। ऐसे में राम खड़ाऊं उनके पैरों से उतरकर सिंहासन पर बैठ गयीं।
बहरहाल यह तो उन महान भाइयों के बीच की आपसी बात है। सच क्या है यह वे ही जानते होंगे। लेकिन मुझे राम की खड़ाऊं से अधिक नाकारा और कोई खड़ाऊं नहीं लगतीं। राम की पादुकायें जूते के इतिहास का सबसे बड़ा कलंक हैं। जूते का काम पैरों की धूल-धक्कड़, काटें-झाड़ियों से पैरों की रक्षा करना होता है। ऐसे में राम खड़ाऊं उनके पैरों से उतरकर सिंहासन पर बैठ गयीं। यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसे कि सरकार गिरने का आभास होते ही जनप्रतिनिधि आत्मा की आवाज पर दल परिवर्तन कर लेते हैं। अपराधी जैसे जेल जाने का नाम सुनते अस्पताल में भरती हो जाते हैं वैसे ही राम की खड़ाऊं जंगल जाने की खबर उड़ते ही जुगाड़ लगाकर उचककर सिंहासन पर बैठ गयीं।
राम की खड़ाऊं को जंगल में जाकर राम के पैरों की रक्षा करना था। खुद ठोकर खाते हुये राम के पैर बचाने थे। लेकिन वे काम से मुंह चुराकर सिंहासन पर बैठ गयीं। भरत ने उसे पूजा की वस्तु बना दिया। शोभा की चीज बना दिया। आराधना करने लगे। कामचोर, कर्तव्य विमुख, नाकारा, अप्रासंगिक, ठहरी हुयी पादुकायें पूजनीय बन गयीं। वंदनीय हो गयीं। हमारे देश में यह हमेशा से होता आया है कि जो अप्रासंगिक हो जाता है, ठहर जाता है, चुक जाता है वह पूजा की वस्तु बन जाता है। जो जितना ज्यादा अकर्मण्य, ठस, संवेदनहीन होगा वह उतना ही अधिक पूजा जायेगा। क्या बिडम्बना है।
जूते की जब भी बात होती है तब जुतियाने की जिक्र भी होता है। जुतियाने के सौंदर्य शास्त्र का गहन विश्लेषण रागदरबारी में श्रीलाल शुक्लजी कर चुके हैं। वे बताते हैं-
जूता अगर फटा हो और तीन दिन तक पानी में भिगोया गया हो तो मारने में अच्छी आवाज़ करता है और लोगों को दूर-दूर तक सूचना मिल जाती है कि जूता चल रहा है। दूसरा बोला कि पढे-लिखे आदमी को जुतिआना हो तो गोरक्षक जूते का प्रयोग करना चाहिए ताकि मार तो पड़ जाये, पर ज्यादा बेइज़्ज़ती न हो। चबूतरे पर बैठे-बैठे एक तीसरे आदमी ने कहा कि जुतिआने का सही तरीक़ा यह है कि गिनकर सौ जूते मारने चले, निन्यानबे तक आते-आते पिछली गिनती भूल जाय और एक से गिनकर फिर नये सिरे से जूता लगाना शुरू कर दे।

हमारे देश में यह हमेशा से होता आया है कि जो अप्रासंगिक हो जाता है, ठहर जाता है, चुक जाता है वह पूजा की वस्तु बन जाता है। जो जितना ज्यादा अकर्मण्य, ठस, संवेदनहीन होगा वह उतना ही अधिक पूजा जायेगा। क्या बिडम्बना है।
इसके वैज्ञानिक पक्ष का अध्ययन किया जाये तो पता लगा है जूता दिमाग में भरी हवा निकालने के काम आता है। आपने देखा होगा जहां हवा भर जाती है वहां कसकर दबाने से समस्या हल हो जाती है। पेट की गैस बहुत लोग पेट दबाकर निकालते हैं। ऐसे ही दिमाग में हवा भर जाने से व्यक्ति का दिमाग हल्का होकर उड़ने सा लगता है। व्यक्ति आंय-बांय-सांय टाइप हरकतें करने लगता है। ऐसे व्यक्ति के उपचार के लिये कुछ लोग मानसिक रोग शाला जाना पसंद करते हैं। अपने लिये हो तो मानसिक चिकित्सालय जाने की बात समझ में आती है। लेकिन दूसरों के लिये आदमी सरल उपाय ही खोजता है और जूते से मार-मार कर हवा निकाल देते हैं।
जूतेबाजी का मतलब है दिमाग को जमीनी हकीकत का अहसास कराना! चढ़े हुये दिमाग को धरती पर लाने। इसका असर वैसे ही होता है जैसे विद्युत धारा के धनात्मक और ऋणात्मक आवेश वाले तारों को एक साथ मिला देना। सर से जूते के मिलन होते ही सारे दिमाग का फ्यूज भक्क से उड़ जाता है। दिमाग में घुप्प अंधेरा छा जाता है। दिन में तारे दिखने लगते हैं। फिर बाद में धीरे-धीरे स्थिति पर नियंत्रण होता है।
बचपन से हम सुनते आये हैं कि आदमी की पहचान उसकी सोहबत से होती है। पिछ्ले दिनों हमें झटका लगा जब हमारे फटे जूतों को बदलने का आग्रह करते हुये नया संवाद फेका गया- आदमी की पहचान उसके जूतों से होती है। जूते फटे-पुराने हैं मतलब आदमी चिथड़ा है। हमने तमाम तर्कों से इस बात को यथासंभव खारिज करने की कोशिश की लेकिन यह संवाद कानों में बजता रहता है- आदमी की पहचान जूतों से होती है।
वैसे पुराने जमाने में ऐसा होता आया है जब आदमी की औकात के लिये जूता भी एक पैमाना माना गया। सुदामा के लिये दरबान ने कहा- पांय उपानहु की नहिं सामा! पैरों में जूतों की भी औकात नहीं है। धूमिल ने भी कहा है- 
यहाँ तरह-तरह के जूते आते हैं
और आदमी की अलग-अलग ‘नवैयत’
बतलाते हैं
सबकी अपनी-अपनी शक्ल है
अपनी-अपनी शैली है


ये बात औकात की है। लेकिन आदमी की पहचान जूतों से होती है यह सुनकर लगा कि किसी ने पूरे व्यक्तित्व को पर जूते बजा दिये हों।
एक साइज का जूता एक ही तरह से व्यवहार करेगा, चाहे पहनने वाला अरबपति हो या खाकपति। जूता केवल पैर का साइज देखता है, पैर की औकात नहीं। जूता इस मामले में आदमी से ज्यादा साम्यवादी होता है!
वैसे जूते की एक खासियत होती है। लोग भले जूते अपनी औकात के अनुसार खरींदे लेकिन जूता पैरों की औकात देख कर अपना काम नहीं करता। एक साइज का जूता एक ही तरह से व्यवहार करेगा, चाहे पहनने वाला अरबपति हो या खाकपति। जूता केवल पैर का साइज देखता है, पैर की औकात नहीं। जूता इस मामले में आदमी से ज्यादा साम्यवादी होता है!
आज जमाना हाइटेक है। जूते बाजी तकनीक-पालकी (तकनीक-पालकी शब्द राकेश खंडेलवालजी से साभार) बैठकर नये रूप में सजधजकर सामने आ रही है। आभासी जूतम पैजार का चलन बढ़ रहा है। लोग क्रिकेट में हार के लिये खिलाड़ियों को गरिया रहे हैं, कोच को कोस रहे हैं। जनता के दीवाने पन और मानसिक दीवालिये पन पर खीझ रहे हैं।
ब्लाग जगत में यह आभासी जूताबाजी एक और रूप में प्रचलित है। इसे ब्लाग जगत में टिपियाना कहा जाता है। लोग ऐसे-ऐसे टिपियाते हैं कि पढ़ने वाले का सर क्या पूर बदन झनझना जाये। कोई अनाम लेखक के रूप में नाम वालों को जुतिया रहा है, कोई नाम वाले अनाम जुतियाने वालों पर कपड़े फाड़ रहा है। कोई इस बात पर कोस रहा है कि उसकी कविताऒं की चर्चा नहीं हुयी कोई इस बात पर कि उसकी कविता अचर्चित रह गयी। इसी क्रम में कोई मसिजीवी के लिये अनाम टिप्पणी कर जाता है, वे उसका दुख मनाते हैं, हम भी उस दुख में शामिल होते हैं। इस दुख पर अभय जी कुछ सवाल उठाते हैं और सृजन शिल्पी हाइटेक अंदाज में जुतियातेहैं। ये ऐसी चोट है कि खाने वाला न हंस सकता है न रो सकता है।
बहरहाल, अब आगे क्या लिखें समीरभाई! आप हमसे ज्यादा समझदार हो। आपको क्या सुनायें फटे जूते की कहानी! जो लिखने के लिये फटफटा रहा था वह निकल आया। आपके सामने है। आप बताओ कैसे लगे हमारे फटे जूते! :)

32 responses to “जूते का चरित्र साम्यवादी होता है”

  1. PRAMENDRA PRATAP SINGH
    अच्‍छा लिखा है। यह तो हमे नही पता था कि जूते का चरित्र सम्‍यवादी होता है पर इतना जरूर पता था कि चड्डी जरूर वामपंथी होती है। देखना हो तो आईये मेरे ब्‍लाग पर :-)
  2. जगदीश भाटिया
    शानदार लेख :)
  3. समीर लाल
    धासूँ है भाई धासूँ. जो जो रेफरेंस लाये हैं कि गजब ही ढहा दिये. बस पोस्ट चलते चलते एकाएक ब्रेक लगा दिये, बड़ा झटका खाकर रुके.

    उनके विश्वास को देखकर लगता है कि वे जूते की भाषा बहुत अच्छी तरह समझते हैं। यह तो कहो समीरजी अजातुशत्रु टाइप के आइटम हैं वर्ना उनका कोई चाहने वाला कह सकता था- समीरजी को जूते की ही भाषा समझ में आती है। लेकिन हम जानते हैं कि समीरजी केवल जूतों की ही भाषा नहीं बल्कि हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू आदि के अलावा प्रेम की भाषा पर अधिकार रखते हैं। उनकी यह पोस्ट उनके जूतों के प्रति उनके अनन्य प्रेम की परिचायक है।
    पूरी रोलर कोस्टर राईड–खुद ही नीचे ले गये, खुद ही उपर…हम तो बस पट्टा बांधे बैठे रहे. बहुत खूब.
    -बाकि आप इसे आगे नहीं बढ़ाये किसी और को अपनी पसंद देकर?? काहे भाई?
    पूरा शो बढ़िया रहा. मजा आ गया.
  4. समीर लाल
    जो चला नहीं है राहों पर, जिस पर चिप्पी की भरमार नहीं,
    वह जूता नहीं तमाशा है, जिसको मालिक पैरों से प्यार नहीं।
    –यह किन महान ब्लागर कवि की पंक्तियां है, भाई जी?? :)
  5. काकेश
    आपने जूते की व्यथा कथा कही तो जूते खाने खिलाने के शौकीन लोगों की जमात में हलचल हुई . लोग सोचने लगे की हम तो इन पादुकाओं को निर्दलीय समझते थे क्योंकि हम तो मानते थे की जूता पार्टी में तो वामपंथी और दक्षिणपंथी बराबर मात्रा में हैं तो ये निर्दलीय ही हुआ पर ये क्या जूते ने भी पार्टी बदल ली … अच्छा लगा.
  6. masijeevi
    अच्‍छा जूता विमर्श है। वैसे अयोध्‍या और त्रेता ही नहीं वरन कलियुगी दिल्‍ली में भी पादुकाएं सिंहासन पर हैं केकैयी ने ले जा रखी हैं वहॉं पर जब तक भरत तैयारी कर रहे हैं। पादुकी शासन तो इस देश की नियति हो गया है।
  7. notepad
    भई आप लोग खूब है!
    कहां से लाते है इतनी रचनात्मकता {खाली टाइम} :)))
    जो भी हो लेख तो बेशक मज़ेदार है।
    आपकी और समीर जी की रेटिंग करे तो ….?
    रहने दीजिए, रेटिंग वेटिंग से सब सौंदर्य नष्ट हो जाएगा।
    बधाई आप दोनो को!इतिहास का पहला जूता पुराण लिख्ने के लिए
  8. pankaj bengani
    वाह चाचु, बहुत खूब.
    वैसे आपने जूते की तूलना वामपंथीयो से करके बडा अतुलनीय कार्य किया है. साधुवाद.
    वामपंथीयों ने कभी किसी को अपने राज्य से जूते मारकर भगाया था आज उसीके जूते सर पर रखने के लिए अपनी प्रजा को जूते मारने में संकोच नही करती. ;)
    आज वामपंथीयो की हालत ऐसी है कि उनके पास एक ही जोडा जूता है जो फटा हुआ है, ना पहनते बनता है ना फेंकते बनता है. :)
    वैसे आपका लेख अचानक खत्म हो गया ऐसा लगा… और पढना चाहता था. ;)
  9. संजय बेंगाणी
    खुब चले जुते, कि जुतमजुता हो गए.
    जो गया है फट, देख तेरा है या मेरा.
    अगर दो हास्य-चिट्ठाकार जुतम-जुता पर उतर आए तो समझीए पाठक पेट पकड़ कर ही पढ़ेगा.
    मस्त हास्य विनोद हुआ. अंत तक लग ही नहीं जुता पूरी तरह से फटा है. कहीं कोई गुंजाइस है तो और फाड़ो जुता :)
  10. जूता- सैंडल पुराण - भाग 1 « हम भी हैं लाइन में
    [...] 5 Apr 2007 जूता- सैंडल पुराण – भाग 1 Posted by kakesh under हास्य व्यंग्य  जूतमबाजीजारी है..कोई सिले जूते की भाषा सुनते सुनते इतना पक गया है कि कहता है जूते की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा कोई फटे जूते की व्यथा कथा कहते नहीं थक रहा. . लेकिन मजे की बात यह है कि ये तो कोई बता ही नहीं रहा जूते का इतिहास ,भूगोल ( आप चाहें तो और विषय भी जोड़ लें ) क्या है ? आज के युग में जूतमबाजी का क्या महत्व है ?… .जूता बिरादरी के अन्य सदस्य मसलन जूते की प्रेमिका सैंडल रानी , छोटी बहिन चप्पल और भी अन्य सदस्य जैसे जूती , बूट इत्यादि नाराज हैं कि ये भेदभाव क्यों ..अब कल ही सैंडल रानियों से पाला पड़ गया ..कैसे पड़ा ये तो बाद में बताऊंगा लेकिन उन्होने भी कल मेरे सर में अपनी छाप छोड़ने के बाद  ढेर सारा उपदेश दे डाला और सर का तबला कुछ ज्यादा ही देर तक बजाया ..मेरे विरोध करने पर कहने लगी कि तुम चिट्ठाकार केवल जूते की ही बात क्यों करते हो मैं इतनी सुंदर , सुशील ,स्लिम एंड ट्रिम हूं मेरे बारे में क्यों नही लिखते .हम गिड़गिड़ाकर बोले अरे अपन तो अभी इस ‘लाईन’ में नये नये आये हैं बहनजी ..आप शायद नही जानती कि जूतमबाजी के दंगल में उतरे दोनों खिलाड़ी धुरंधर खिलाड़ी हैं ..एक फुरसत से लिख्नने वाले इंसान हैं (उनके पास बहुत फुरसत है)  दूसरे इंडी-ब्लौग पुरस्कार प्राप्त … बात को काटकर फिर से सर में बजते हुए वो बोलीं कि फिर क्यों नारा लगाये फिरते हो कि “हम भी हैं लाईन में”….जब लाईन में हो तो लिखो हम पर ..और हाँ… हमारी हिस्ट्री पर भी लिखियो .. उन से ये वादा कर कि जरूर एक चिट्ठा लिखेंगे हम किसी तरह जान बचाकर भागे…तो पेश है ये चिट्ठा..  [...]
  11. rachana
    पता नही कहना चाहिये या नही लेकिन इस लेख के पहले हिस्से मे आपके अन्य लेखों की तरह मजा नही आया….वैसे कुल मिला कर फटे हुए जूते ने जूते को अच्छी टक्कर दी है.
    ये बातें खास पसँद आईं-
    /आराधना करने लगे। कामचोर, कर्तव्य विमुख, नाकारा, अप्रासंगिक, ठहरी हुयी पादुकायें पूजनीय बन गयीं। वंदनीय हो गयीं। /
    /जूता केवल पैर का साइज देखता है, पैर की औकात नहीं। जूता इस मामले में आदमी से ज्यादा साम्यवादी होता है!
    मसिजीवी जी की सामयिक टिप्पणी बढिया रही!
  12. Neelima
    बहुत खूब, खूब मजा आया
    :)
  13. मृणाल कान्त
    “खड़ाऊं इसलिये छोड़ गये होंगे ताकि भरत को सिंहासन पर बैठने की आदत न लग जाये। वे अपनी खड़ाऊं उसी तरह सिंहासन पर रखने के लिये छोड़ गये जैसे लोकल ट्रेन में डेली पैसेंजर सीट पर रूमाल रखकर अपना कब्जा जमाते हैं। खड़ाऊं उन्होंने सिंहासन पर कब्जे के लिये छोड़ीं।”
    मेरा सदैव यही मानना रहा है। आजकल भी किसी कारण से सिंहासन से वन्चित रहने पर लोग कुछ ऐसी ही चीज़ों को मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बना देते हैं। दक्षिण के एक राज्य का एक दृश्य भी ध्यान है मुझे जहाँ सिंहासन के लिए जिसे चुना गया उसने अपनी पादुका-तुल्यता दर्शाने हेतु दण्डवत ज़मीन पर लम्बे हो गए।
    और हमेशा की तरह बहुत सुन्दर लेख। कितने सारे विचारों को कितनी सरलता के साथ एक उपमा के इर्द-गिर्द रहते हुए भी कितनी अच्छी तरह से प्रकट किया है। आपकी शैली अतुल्य है। जितना भी हिन्दी साहित्य पढ़ा है, उसे देखते हुए यह दावा तो अवश्य कर सकता हूँ कि आपकी शैली शीर्ष की ओर वाले समूह मे पड़ती है। सच मे बहुत अच्छा लिखा है।
  14. राजीव
    अब जूते का मामला हो तो कोई भी कनपुरिया कैसे पीछे रहे! कई तरह का तजुरबा होती है कनपुरियों को इस मुआमले में… अरे… अरे… साहब कुछ ग़लत न सोचें, जो नही जानते है उनके लिये यह कि कानपुर के व्यवसायों में जूता उत्पादन और निर्यात एक मुख्य व्यवसाय है। और तो और यहाँ की ही एक कम्पनी ने सबसे पहले भारत के बाहर (ब्रिटेन में) अपने उत्पाद को निर्यात न करते हुए, अपने खुद के ब्रांड-नाम से वैश्विक बाज़ार में उतारा था और तब से आज तक लगतार सफलता की ऊँचाइयों को प्राप्त किया है।
    सो, ऐसे शहर में रहकर तो जूते से सम्बद्ध सम्पूर्ण ज्ञान का होना लाज़मी ही है।
    वैसे फुरसतिया जी, आपने “जो भरा नही है भावों से…” का बहुत सटीक रूपांतरण पेश किया है।
  15. सृजन शिल्पी
    समीर जी का ‘जूता-पुराण’ और आपका ‘जूता-दर्शन’ अदभुत है। हो सकता है कि आपलोगों से प्रेरणा पाकर कुछ और साथी ‘आओ जूतम-जूता खेलें’ नामक इस मौज-मस्ती का आनंद लेने के लिए कूद पड़ें। परसाईजी का सहज, गहन और विलक्षण प्रभाव आपके और समीर जी, दोनों की लेखन शैली में साफ दिखता है। हिन्दी चिट्ठा जगत में आप दोनों उनके अंदाज-ए-बयां को आगे बढ़ाते हुए इसकी छटा में कम से कम दो चांद तो लगा ही रहे हैं। लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जो मुझे समीर जी की शैली में कुछ अधिक और आपकी शैली में अपेक्षाकृत कुछ कम खटकती हैं। जिन बातों की तरफ मैं संकेत करना चाहता हूं, उन्हें विस्तार से मेरे लेख व्यंग्य के प्रतिमान और परसाई में देखा जा सकता है। लेकिन संक्षेप में, यहां कुछ बातें दोहरा रहा हूं। परसाई जी ने एक बार अपने लेखन के बारे में कहा था:
    मैं अपनी कैफियत दूँ तो यह हँसना और हँसाना, विनोद करना अच्छी बातें होते हुए भी मैंने केवल मनोरंजन के लिए नहीं लिखा।
    परसाई को पढ़कर मैंने जो समझा वह यह है कि “व्यंग्यकार अपने भीतर से ठोस और निश्चिंत हो तभी व्यंग्य कर सकता है। जिसको अपनी चारित्रिक सुगठता और दृष्टिगत तर्कसंगतता का पक्का यकीन नहीं हो वह व्यंग्य कर ही नहीं सकता। वह अपने प्रति निश्चिन्त होता है कि जिस विद्रूपता को अपने व्यंग्य वाणों से वह मर्माहत करने जा रहा है वह उसके अपने अंदर नहीं है। अपनी चेतना के प्रति असुरक्षा का भाव जहाँ है वहाँ व्यंग्य करने का सात्विक, नैतिक साहस पैदा हो ही नहीं सकता।”
    ख़ैर, आपलोग खुद ही इतने मूर्धन्य लेखक और विद्वान हैं, आपको ये सब बातें बताना सूरज को दीपक दिखाने जैसा ही होगा। फिर भी, मैंने यह लिखना क्यों जरूरी समझा, वह सामने रखना चाहता हूं।
    पुरानी बातों का संदर्भ छोड़ भी दें तो आपकी इसी पोस्ट की आखिरी पंक्तियों में आपने कहा कि अभय जी के एक पोस्ट पर की गई मेरी एक टिप्पणी आपको “हाईटेक अंदाज में जूतियाने” जैसी लगी। उसके असर के बारे में आपने लिखा, “ये ऐसी चोट है कि खाने वाला न हंस सकता है न रो सकता है।”
    ऐसा क्यों लगा आपको? अब तो अभय जी ने वह पोस्ट और आपकी एवं मेरी, दोनों की टिप्पणियाँ हटा दी हैं, इसलिए शायद आप या अन्य पाठक उसके संदर्भ पर फिर से गौर नहीं कर पाएंगे। लेकिन मसिजीवी जी के जिस “दु:ख” में (या वहम में?)शामिल होने और उस दु:ख या वहम (?) के “मूल कारण” को नष्ट कर दिए जाने के आपके सुझाव पर आपको ऐसी चोट अवांछित रूप से झेलनी पड़ी, वह संदर्भ आपके समक्ष है। ऐसा एक बार नहीं, बार-बार हुआ कि कुछ ऐसी बेनाम और बदनाम टिप्पणियों के कर्ता होने का शक मेरे ऊपर किया गया, जिनका वास्तव में मेरे से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं था। मुझे लक्षित करके ऐसे आरोप या कयास छद्म भाषा में लगाए गए और उन आरोपों या कयासों को आप भी किसी गफ़लत या यकीन में सही मानते रहे। मान कर मन में नहीं रखे, उसे सरेआम जाहिर भी कर दिए, अपनी सहमति का ठप्पा लगाकर। यहां तक कि मेरे स्पष्टीकरण देने के बावजूद। अब, वहम का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं था, मेरे पास कहां से होगा ! भैया, मेरे पर शक था तो मुझसे मेल पर, चैट पर या फोन पर निजी रूप से पूछ सकते थे, सार्वजनिक रूप से जताने से पहले। अब किसी निर्दोष व्यक्ति पर आप पब्लिकली झूठा इल्जाम लगाएंगे तो जूते किसे खाने पड़ेंगे? फिर भी, अब भी मैं अपने कहे पर कायम हूं कि
    कोई आदमी इतना बुरा नहीं होता कि
    अपनी गलती का अहसास कभी कर न सके।
    वहम का कोई जाल इतना सघन नहीं होता कि
    उसको काटकर ग़लतफ़हमी दूर न की जा सके।
    कोई जख्म इतना गहरा नहीं होता कि
    वक्त के साथ भर न जाए।
    हो सकता है कि आपको लगे कि मुझे लड़ने-भिड़ने में बहुत मजा आता है और अपनी यह धारणा आप यदा-कदा व्यक्त भी करते हों। लेकिन ऐसा वास्तव में है नहीं। जहाँ तक मुझे ध्यान है कि मैंने अपनी तरफ से कोई विवाद खड़ा नहीं किया और किसी पर पहला वार कभी नहीं किया। हां, यह जरूर आप कह सकते हैं कि पहला तमाचा एक गाल पर झेलने के बाद मैंने दूसरा गाल क्यों आगे नहीं किया। लेकिन, आप तो जानते ही हैं कि ऐसा मैं नहीं कर सकता। मैं घोषित रूप से गांधी का नहीं, नेताजी का अनुयायी हूं। आप मुझसे यह उम्मीद क्यों करते हैं कि मैं सहनशील बनूं? फिर भी, कई बार अनुजवत चिट्ठाकार साथियों की कई अप्रिय बातों को मैंने चुपचाप सहन भी किया है। लेकिन जो उम्र, अनुभव और दुनियादारी में मेरे से बड़े हैं, उनके ऐसे घातों को मैं क्यों सहन करूं?
    किसी को जूता मारने का मेरा कोई इरादा कभी नहीं रहा। गफ़लत से ही सही, आप किसी के गम में शरीक होने के बजाय वहम में शरीक हो गए, इसलिए अनजाने में आपको चोट लग गई होगी। मुझे इसके लिए खेद है। हालांकि आपका चिर-परिचित जवाब मैं जानता हूं कि आप कहेंगे, मैं इतनी गंभीरता से इन बातों को नहीं लेता, बस मौज-मजे के रूप में ही लेता हूं। उम्मीद है कि इसे इसी तरह से लेंगे।
  16. ratna
    I just read both the posts. It is difficult to say which one is better. both are superb. Though I think it difficult to write on “phatta joota” than just “joota”
  17. सागर चन्द नाहर
    पहली बार आपकी पोस्ट पढ़ कर आनन्द नहीं आया, कुछ ऐसा लगा मानो सत्यजीत रे खाज खुजली की दवा का विज्ञापन फिल्म का निर्देशन कर रहे हों। या रविम्दर नाथ टैगोर विज्ञापनों के लिये जिंगल लिख रहे हों।
  18. Ripudaman Pachauri
    मन्त्र मुग्ध कर देने वाला लेख है, गुरु देव ! बहुत आनन्द आया|
    रिपुदमन पचौरी
  19. masijeevi
    सीधे और संयम से खरी बात यही तो बात हे जो आप को फुरसतिया बनाती है वरना ऐसा कहते हुए हम इतना संयम नहीं रख पाते हैं। सृजन से सीधे व परोक्ष संदेशों से यही सब कहने का प्रयास हम कर चुके हैं पर वे अपने ‘ज्ञान’ का भार संभाल नहीं पा रहे हैं, खैर मेरी सदा शुभकांक्षाएं रही हैं उनके लिए और दुर्भाव कभी नहीं रहा। आगे भी नहीं रहेगा। मुझे एक क्षण के लिए नहीं लगा कि अभय के यहॉं टिप्‍पणी सृजन ने की थी यह अलग बात है कि वह चिंतन के स्‍तर पर ‘सृजनवाद’ से ऊर्जा प्राप्‍त करती थी।
    आशा हे आपसे ऊपर व्‍यक्‍त स्‍नेह पाकर सृजन के मन से हमारे लिए जमा मैल मिट गया होगा।
  20. सृजन शिल्पी
    1. यह साफगोई अच्छी लगी कि आपने जो लिखा वह मौज-मजे के लिए नहीं, जान-बूझकर लिखा।
    2. बातों के अर्थ को संदर्भ से काटकर देखने और दिखाने की कला आपमें पाई जाती है, यह भी पता चला। मेरे हवाले से जो तीन वाक्य आपने उद्धृत किए हैं उनमें पहले दो वाक्य का संदर्भ मेरे चिट्ठे पर यथावत मौजूद है। वे दोनों वाक्य मेरी एक पोस्ट में, एक व्यक्ति विशेष की बातों पर उसी की भाषा और शैली में की गई प्रतिक्रिया मात्र थी। मेरी वैसी प्रतिक्रिया भी शांत मन से और जान-बूझकर व्यक्त की गई थी, किसी आवेश, उत्तेजना और उत्साह में नहीं।
    3. आपके इस आरोप की पुष्टि तो मेरे नियमित पाठकों का बहुमत ही कर सकता है कि मेरी पोस्टों में उपर्युक्त किस्म के डायलाग ‘अक्सर’ पाए जाते हैं या नहीं। क्या इसके लिए एक सर्वेक्षण (poll) करा लें?
    4.
    हमें शिवजी के बराबर खड़ा करके उस देवता की तौहीन कर रहे हो। दूसरी तरफ़ कह रहे हो कि शंकरजी के सर्प प्रेम के बनिस्बत गरुड़ की सांपों के शिकार करने बात का उदाहरण देते हुये गरुड़ को शिवजी से बेहतर बता रहे हो।
    शिव तो गरुड़ के स्वामी के भी स्वामी हैं, गरुड़ कभी शिव की तौहीन करने की सोच भी नहीं सकता। गरुड़, साँप और शिव की उपमाएँ कहीं से भी ‘हाईटेक’ श्रेणी की नहीं हैं। इन्हें पौराणिक आख्यानों के संदर्भ में समझें तभी स्पष्ट रूप से समझ में आएगा। आप तो जानते ही होंगे कि आख्यानों में गरुड़ और सांप सौतेले भाई और शाश्वत दुश्मन माने जाते हैं और त्रिलोक में केवल दो ही स्थल ऐसे हैं जहां सांप गरुड़ से महफूज़ रह सकता है, एक तो क्षीरसागर में विष्णुशय्या बनकर और दूसरा कैलाश पर महादेव की गले की शोभा बनकर।
    4. यहां भी एक प्रति-टिप्पणीकर्ता इसलिए महफूज़ है, क्योंकि उसने आपकी प्रति-टिप्पणी की आड़ ले ली है।
    5. मेरे प्रति कटुता का भाव नहीं रखने और शुभकामनाएँ व्यक्त करने की आपकी उदारता के सम्मुख नतमस्तक हूं। मेरी प्रतिकूल टिप्पणियाँ संदर्भ के अनुरूप थीं, लेकिन आपके प्रति मेरे मन में आदर-सम्मान का भाव हमेशा अक्षुण्ण रहा है।
  21. ई-स्वामी » ब्लाग मस्ती - दूसरों का माल कैसे चुराएं - २
    [...] पिटोगे बबुआ, पिटोगे! सच ऐसे बयान नहीं किये जाते! वैसे एक बात काबिले संशोधन है। हम जो लिखते हैं वह बताकर लिखते हैं कि ये फलाने का है वो अलाने का है। ऐसा करना चोरी में तो नहीं आना चाहिये। ये डकैती हो सकती है चोरी नहीं। हम तो इस्टाइल तक बताके लिखते हैं। पिछले लेख में तकनीक पालकी लिखा तो बताया कि ये शब्द राकेश खंडेलवाल की इस्टाइल का है। बाकयदे आभार व्यक्त किया है। ये चोरी नहीं है, डकैती मान सकते हैं। वैसे तुमको बतायें कमलेश्वर कहा करते थे- मेरी उमर ५५५० साल है। इसमें ५० साल उनकी उमर ५५०० साल उनके पूर्वज लेखकों की उमर। अपने पूर्वजों का माल हमारे बाप का माल है। उसमें कैसी चोरी। भाई हमे चोरी के आरोप से बरी करो,भले ही डकैती का मुकदमा चलाओ। वैसे लेख चौकस है। आगे का इंतजार है। बहुत दिन बाद मौज-मजे के मूड में आये हो। इसे बनाये रखो। दुनिया में कुछ और है नहीं बस कुछ दिन की मौज है। ले लो! [...]
  22. nahimaloom
    बेहद भोंडी और विकृत सर्जनात्मकता का प्रदर्शन.एकदम घटिया…
  23. ताऊ रामपुरिया
    कल इस पस्त का लिंक हमारे हाथ लग गया था ! बहुत शान्दार अचना ! लगता है आ ज्योतिषी भी हो तभी तो इतना एडवांस में ये लिख दिए रहे ! शुकल जे के साथ साथ ज्योतिषी जी को भी प्रणाम !
    राम राम !
  24. deepak dubey
    fursatiyaji kya aap antaryami hain jo aapne BUSH ko padne wale jute se kaphi pahle Jooton par likh diya….. khair jo likha achcha likha ,padhne me deri ki iski kshamayachna ahit.— Deepak Dubey (would be blogger)Bhopal(m.p.)
  25. Deepak Dubey
    fursatiyaji kya aap antaryami hain jo aapne BUSH ko padne wale jute se kaphi pahle Jooton par likh diya….. khair jo likha achcha likha ,padhne me deri ki iski kshamayachna sahit.— Deepak Dubey (would be blogger)Bhopal(m.p.)
  26. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] जूते का चरित्र साम्यवादी होता है [...]
  27. Benam badshah
    जो चला नहीं है राहों पर, जिस पर चिप्पी की भरमार नहीं,
    वह जूता नहीं तमाशा है, जिसको मालिक पैरों से प्यार नहीं।
    rastrakavi ki rachna ki parodi
    1.nindniya
    2.achamya
    3. deshdroh
  28. चंदन कुमार मिश्र
    पढे नहीं अभी लेकिन परसाई जी शैली की नकल का आभास हुआ यहाँ। शीर्षक भी वैसा ही है।
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..हिन्दी.blogspot.com या हिन्दी.tk लिखिए जनाब न कि hindi.blogspot.com या hindi.tk
  29. site
    I like that site layout . How was it made. It is very sweet.

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