Monday, December 10, 2007

आलोक पुराणिक किंड्यूटीविमूढ हो गये

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आलोक पुराणिक किंड्यूटीविमूढ हो गये


चिठेरा समूह
सबेरे की ड्यूटी बजा के आये तो देखा चिठेरी-चिठेरी अपनी बजा रहे थे। चिठेरहाव इतना मचा था कि कुछ सुनायी नहीं दे रहा था। जो समझ पाये वह यहां दिया है। अपना दिमाग लगाकर समझने का प्रयास करियेगा। शायद कुछ समझ आ जाये।
चिठेरी: अरे चिठेरे आ कुछ बतिया। तू तो कल दिखा ही नहीं। क्या पांडेयजी के साथ नत्थी हो गया था।
चिठेरा: अरी कहां री। पांडेयजी कल न जाने कहां गायब हो गये। लगता है कुछ दफ़्तर में हड़काई भयी है। तब्बी आज धमका रहे थे- ब्लाग बंद कर देंगे। विषय केन्दित हो जायेंगे।
चिठेरी: ई विषय केंद्रित क्या होवै है जी? कौनौ नवा चोंचला है का?
चिठेरा: विषय केंद्रित बोले तो टापिक बेस्ड। आई मीन फ़ोकस्ड ब्लाग।
चिठेरी: तेरे को आता नहीं है तो काहे फोकस मारता है रे। बार-बार एक ही बात समझा रहा है। शास्त्रीजी की नकल कर रहा है। जरूरी हैं अंग्रेजी ठेलनी। यहां ज्ञानी लोग भी हिंदीगिरी पर उतर आये और तू उल्टी गंगा बहा रहा है।
चिठेरा: अरे सबर कर जानी, सबर कर। संजय तिवारी की तरह हड़बड़ मत कर कि चिट्ठाजगत फ़ौक्स है। विषय केन्दित माने कि अलग-अलग विषय के ब्लाग अलग-अलग रखे जायेंगे। किसी को को किसी से मिलने न दिया जायेगा। जहां किसी एक विषय के ब्लाग ने दूसरे से सटने के कोशिश की एग्रीगेटर संचालक उसे हड़क देगा। ये समाज वाला ब्लाग लोग कला वाले सटने का नईं। पाडकास्ट वाला तू मस्ती वाले से दूर हट। ये सेहत तू घरबार में घुसपैठ मत कर। चल विज्ञान तू धंधा मत खोटी कर। ऐसेइच होगा कुछ्।
चिठेरी: अरे तू तो एकदम आलोक पुराणिक हो गया रे। ऐसे पल्टी मार रहा है इधर से उधर कि कुछ कहने का नहीं। पल में राखी सावंत पल में मधुबाला। अभी वेंगसरकर से लड़िया रहा है और उधर बिल्लो रानी से नैनमटक्का करने लगा। तेरी तो हिन्दी हो जाये मुये। तू किंड्यूटीविमूढ़ हो जाये।

हंसे तो फ़ंसे
चिठेरा: ये किंड्यूटीविमूढ़ क्या होवै है री? क्या ये भी विषयकेंद्रित होवै है।
चिठेरी: अरे रजा, इहै तो हिंग्लिस बा। नहीं बूझ पाये न! इसीलिये कहते हैं कि औरतन की अकल बड़ी तेज होती हैं।
चिठेरा: चल मान लिया तेरे भी कुछ अकल है लेकिन बता ये किंड्यूटीविमूढ़ कैसे हुआ जाता है?
चिठेरी: जैसे ज्ञानजी की अम्मा-बाबू वाली :)
चिठेरी: चल मान गई । तू भी क्या याद करेगा! ले एक स्माइली रिटर्न गिफ़्ट। :) अच्छा बता मैं कैसी लग रही हूं।
चिठेरा: एकदम
हंसमुंखलाल समीरलाल की तरह। बिन्दास च झकास!
चिठेरी: सच! :)
चिठेरा: मुच! :)
चिठेरी: चल तू कहता है तो मान लेती हूं। अच्छा ये बता कि ये समीरलाल इत्ता उदास काहे दिखे जी मुंबई में?
चिठेरा: उनके साथ झाम हो गया।
चिठेरी: क्या झाम हो गया?
चिठेरा: सबने उनको बंबई बुलाया झांसा देकर कि उनको हीरो का रोल देंगे। लेकिन जब वहां पहुंचे तो पता लगा कि सबने उनके अपने पीछे लाइन में लगा लिय। बोले नम्बर से हीरो बनेंगे।

गये काम से
चिठेरी: अच्छा! उनके आगे कौन थे? सब लोग जिनकी फोटो ऊपर लगी है। बाकी लोग यहां दिये हैं? सब हीरो बन के एक-एक पिक्चर फ़्लाप कर लेंगे तब इनका नम्बर आयेगा। इसीलिये ये दुखी दिखे।
चिठेरा: समीरलाल ने डायलाग नहीं मारा -लाइन वहां से शुरू होती है जहां हम खड़े होते हैं?
चिठेरी: मारा वो भी आजमाया लेकिन सब हंसने लगे।बोले- हम सब यही डायलाग मार के यहां आये थे। इलाहाबाद में यही सीखे थे खाली। लेकिन आज देखो ब्लागर बन के रह गये हैं। न साहित्यकार भाव देता है न पत्रकार।
चिठेरा: फिर क्या हुआ?
चिठेरा: होना क्या था? समीरलाल भी हंसने लगे। बोले-रोने में बहुत मेहनत है। फोटो खराब होता है सो अलग। हंसना ज्यादा मजेदार काम है। वैसे अगले ने एक्टिंग अच्छी की। हंसने की भी और रोने की भी। पता ही नहीं लगने दिया कि हंस रहे हैं कि रो रहे हैं। :)
चिठेरी: चल अच्छा अब जा सो जा। तू ज्यादा पास आने की कोशिश कर रहा है। तेरे लच्छन ठीक नहीं लग रहे हैं।
चिठेरा: ऐसा क्यों कहती हो मेरी चिठेरी। तुम्हारे जाने की बात करते ही जिया उदास हो जाता है। अभी मत जा। तुझे तेरे ब्लाग की कसम। कुछ देर और ठहर जा। कुछ बात कर।
चिठेरी: क्या बाते करनी है। जल्दी कर। फ़टाक से।
चिठेरा: तू ही कुछ कह। लेडीज फ़र्स्ट होता है न! हमारे सब जगह।
चिठेरी: अच्छा। तो सुन मुझे तेरे आलोक पुराणिक पर बहुत गुस्सा आता है। बहुऊऊऊऊत ज्यादा।
चिठेरा: क्यों भाई। उसने क्या तेरी भैंस खोली है।
चिठेरी: अरे देख न। दुनिया भर की छिकरियों का इधर-उधर जिकर करता है। न जाने कैसी-कैसी, ऐसी-वैसी बातें करता है। लेकिन एक बार अपने माउस से मेरा जिकर नहीं कर सकता। क्या घट जाता उसका भला। सच बोलने से क्यों डरता है वह? हमें अच्छा नहीं लगता।
चिठेरा: अच्छा मैं अभी उनसे कहता हूं। वे इस बात को तव्वजो देंगे।
चिठेरी::खबरदार जो तुमने उनको बताया इस बारे में। मैं तुमसे नाराज हो जाउंगी। फिर कभी बात नहीं करूंगी। नेवर।
चिठेरा: : तू तो इत्ती सीरियस हो गयी कि अंग्रेजी बोलने लगी। इससे तो देश का कल्याण नहीं होने का। वाट अलग से लग जायेगी। चल अच्छा नहीं बताउंगा।
चिठेरी: अच्छा अब चलूं। अम्मा डांटेगी घर में कि कहां डांय-डांय डोलती घूमती हो। सहेली का नाम पूंछेंगी। कहां से नये-नये नाम लाउंगी। काश हमारे भी प्रत्यक्षाजी की तरह अकल होती। न जाने कहां-कहां से नाम लाती हैं।
चिठेरा: तो क्या अजब-गजब, कनगोजर, अजिया, दिदिया जैसे नाम के लिये अकल चाहिये? तब फिर प्रमोद सिंह कैसे कानू, मानू, छानू जैसी चीनी नाम की छुआ-छुवौल खेलते रहते हैं? चाइना परेड करते रहते हैं।
चिठेरी: ये तुम नहीं बूझोगे बेअकले। हम भी तो नहीं बूझते। सच तो यह है कि प्रमोद सिंहौं कहां बूझ पाते हैं। चलते हैं अब यार, तैने बहुत माथा खराब कर दिया।इतना अझेल तो फ़ुरसतिया की पोस्ट भी नहीं होती।
(चिठेरी मुद्रा स्फ़ीति की तरह सरपट चली जाती है। चिठेरा सेन्सेक्स की तरह उचक-बिचक कर उसका पीछा करता है।)

मेरी पसन्द


निधि
जिन कुछ लोगों की बिन्दास लेखन शैली का मैं मुरीद हूं उनमें एक नाम निधि का भी है। जब मैंने निरंतर में उनका परिचय लिखा था तब उन्होंने अपनी आवाज में गाया एक गाना भी भेजा था। गाना मुझे अच्छा लगा इसलिये सोचा आपको भी सुनवाया जाये। इसे सुनवाने की अनुमति इस वायदे के साथ मिली है कि अगर लोगों ने पसंद किया तो वाह-वाही गाने वाले की। और अगर नापसंद किया तो जिम्मेदारी मेरी। सुनिये और बताइये कैसा लगा?

दम भर जो इधर मुंह फ़ेरे ओ चन्दा
मैं उनसे प्यार कर लूंगी
बातें हजार कर लूंगी।
दिल करता है प्यार के सजदे,
और मैं भी उनके पास
रात को चंदा रोज ही देखे
मेरी पहली रात।
बादल भी अब छुप जाये ओ चन्दा,
मैं उनसे प्यार कर लूंगी,
बातें हजार कर लूंगी।
दम भर जो इधर मुंह फ़ेरे ओ चन्दा
मैं उनसे प्यार कर लूंगी
बातें हजार कर लूंगी।
……..

12 responses to “आलोक पुराणिक किंड्यूटीविमूढ हो गये”

  1. RC Mishra
    चिठेरी-चिठेरा संवाद पढ़ के मज़ा आ गया, उस पे निधि जी का गीत ..सोने पे सोडियम मेटा बोरेट (Na2B4O7)
  2. अजित वडनेरकर
    ये तो शुक-सारिका संवाद सा आनंदलोक है। ब्लागजगत और ब्लागर मीट के घटे पर शानदार रूपक। सबको ही खींच कर लंबा कर लिए हैं। हर कोई इसी खुशफहमी में रहेगा कि पट्ठे को अच्छा खींचा। हमारी पोस्ट का हवाला भी दे दिया वो भी हायपरलिंक में। चलिये हमार तेरह साल का बेटवा खुश हो जाएगा । पढ़ाई से फुर्सत मिलने पर वो अक्सर पूछता है कि बाबा , आपकी धाक कितनी हो गई। उसे चिट्ठाजगत की धाक देखकर मजा आता है। अभी काहे की धाक, अभी तो धक्के खा रहे हैं।
    मज़ा आया जी…कनपुरिया ठाठ वाला मज़ा ।
  3. Dineshrai Dwivedi
    निधि को सुना, गीत तो दमदार था ही, उन की आवाज भी। आप की पोडकास्टिंग रंगदार है। रोज इन्तजार रहने लगा है। रिकार्ड करने का मन किया पर जुगाड़ नहीं बैठा। किसी का बैठ गया हो तो बताए।
  4. Gyan Dutt Pandey
    शीर्षक है – आलोक पुराणिक और चमक रहे हैं समीर लाल! चिठेरा-चिठेरी चर्चा में ही हो सके है ये कमाल!
    वैसे आजकल समीर जी कर क्या रहे हैं? हमारी बकाया पोस्टों पर टिप्पणी में ही कई दिन लगेंगे उन्हे। मिलें तो बोलिये काम पे लौटें।
  5. प्रत्यक्षा
    :-) सुबह सवेरे ?
  6. आलोक पुराणिक
    भई भौत बढ़िया है जी। जमाये रहिये जी।
  7. संजय बेंगाणी
    ज्ञानजी समीरानन्दजी भारतवर्ष के भ्रमण पर है. पूण्य कमा कर लौटेंगे फिर टिप्पणीदान शुरू करेंगे :)
  8. शास्त्री जे सी फिलिप्
    वाह, आज सुबह सुबह अच्छा चिट्ठा-तोहफा दिया आप ने. समीर जी कि चित्रों के लिये विशेष आभार !!
  9. balkishan
    पोस्ट और गीत ये सब तो ठीक ही नही बहुत ठीक है.
    उड़नतश्तरी को भी उड़ाया.
    पर हमारी धाक का क्या?
    जिया धक् कर दिए आप तो.
    कौनो जवाब है का?
  10. Sanjeet Tripathi
    “है यह प्रयोग पहिलौठा
    अनूप ने बनाया जिसे अनूठा”
    आपकी यह चिठेरी चिठेरा संवाद तो वाकई अद्भुत है।
    गीत और निधि जी की आवाज़ , दोनो ही मस्त!!
  11. राकेश खंडेलवाल
    सुर की नौका में शब्दों की ले पतवारें झूम रहा हूँ
    और कहानी के संग मैं भी बना कथानक घूम रहा हूँ
    अब समीर तो खिसक लिये हैं इसीलिये मैं खुद टिपिया कर
    अपने ही चिट्ठे पर, अपनी आप हथेली चूम रहा हूँ
  12. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
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