Friday, December 07, 2007

आपत्ति फ़ूल को है माला में गुथने में

http://web.archive.org/web/20140419215559/http://hindini.com/fursatiya/archives/378

आपत्ति फ़ूल को है माला में गुथने में

अक्सर मैं ये दो लाइनें जहां-तहां ठेलता रहता हूं-

भाषा तो पुल है मन के दूरस्थ किनारों पर,
पुल को दीवार समझ लेना नादानी है।
आज ऐसे ही कुछ कागज खोज रहा था तो मुझे अपनी एक पुरानी डायरी मिली। इसमें यह कविता पूरी लिखी है। इसे मैंने करीब बीस वर्ष पहले किसी कवि सम्मेलन मेंसुना था। फिर उसका कैसेट मेरे पास सालों रहा। तदनन्तर वह कैसेट-गति को प्राप्त हुआ। लेकिन आज यह कविता पढ़कर लगा कि आपको भी इसे पढ़वाया जाये। नंदलाल पाठक जी की इस कविता में ये पंक्तियां गौरतलब हैं-

सम्मिलित स्वरों में हमें नहीं आता गाना,
बिखरे स्वर में ध्वज का वंदन कैसे होगा?
इसी मूड की बात ये पंक्तियां भी कहती हैं-

एकता किसे कहते हैं यह भी याद नहीं,
सागर का बंटवारा हो लहरों का मन है,
पाठक जी कविता की जब ये पंक्तियां पढ़ीं

क्या बंटवारा होगा सांवली घटाओं का,
इंन्द्रधनुष का, कोयल की कूं-कूं का,
चंदा की मुस्कानों का,लहरों के स्वर का,
अंबर के आंसू का, सूरज की कच्ची धूपों का?

तो अनायास स्व.रमानाथ अवस्थीजी आजादी के बाद बंटवारे की त्रासदी पर अपनी टीस व्यक्त करती हुयी कविता पंक्तियां याद आ गयीं-


धरती तो बंट जायेगी
पर नीलगगन का क्या होगा?
हम तुम ऐसे बिछड़ेंगे
तो महामिलन का क्या होगा?
बहराहाल ज्यादा और कुछ न कहते हुये आपके लिये पेश है मेरी एक पसंदीदा कविता-

आपत्ति फ़ूल को है माला में गुथने में

आपत्ति फ़ूल को है माला में गुथने में,
भारत मां तेरा वंदन कैसे होगा?
सम्मिलित स्वरों में हमें नहीं आता गाना,
बिखरे स्वर में ध्वज का वंदन कैसे होगा?
आया बसंत लेकिन हम पतझर के आदी,
युग बीता नहीं मिला पाये हम साज अभी,
हैं सहमी खड़ी बहारें नर्तन लुटा हुआ,
नूपुर में बंदी रुनझुन की आवाज अभी।
एकता किसे कहते हैं यह भी याद नहीं,
सागर का बंटवारा हो लहरों का मन है,
फ़ैली है एक जलन सी सागर के तल में,
ऐसा लगता है गोट-गोट में अनबन है।
कुछ बिना बात के बात हो गयी है पैदा,
कि अपने भी दीखने लगे हैं बेगाने से,
मोहन से राधा खिंची-खिंची सी रहती है,
दूरियां बढ़ गयी हैं,बस्ती बस जाने से।
कुछ लोग धार देने बैठे हैं शस्त्रों पर,
मधुॠतु के बांटे जाने की तैयारी है,
पंखुरी-पंखुरी से चाहती है अलग होना,
मासूम बहारों की पैमाइश जारी है।
हर चीज नहीं बांटी जाती है टुकड़ों में,
दौपद्री ने टुकड़े-टुकड़े बांटी जाती है,
रोटी तो बंटकर रहती है रोटी ही,
बच्चों में मां की कोख न बांटी जाती है।
क्या बंटवारा होगा सांवली घटाओं का,
इंन्द्रधनुष का, कोयल की कूं-कूं का,
चंदा की मुस्कानों का,लहरों के स्वर का,
अंबर के आंसू का, सूरज की कच्ची धूपों का?
संगीत एक ही दोनों में लहराता है,
गंगा गाये या हो कावेरी का गायन,
भारत की खुशबू दोनों में है,
पुरवैया हो या दक्षिणी पवन।
ये रंग-बिरंगी फ़ूलों जैसी भाषायें,
जिनसे शोभित होता बगिया का आंचल है,
दिल के कालेपन का इलाज करना होगा,
आदमी छली होता है ,भाषा निष्छल है।
भाषा तो है मुस्कानों का ही एक रूप,
अधरों से बहता यह आंखों का पानी है,
भाषा तो पुल है मन के दूरस्थ किनारों पर,
पुल को दीवार समझ लेना नादानी है।
नंदलाल पाठक

13 responses to “आपत्ति फ़ूल को है माला में गुथने में”

  1. नीरज रोहिल्ला
    अनूपजी,
    कल आज और कल के दौर की एक सार्थक कविता । इसको पढवाने के लिये साधुवाद,
    नीरज
  2. Gyan Dutt Pandey
    हर चीज नहीं बांटी जाती है टुकड़ों में
    ***************************
    बिल्कुल सत्य है पण्डिज्जी। सर्दी में गरीब की रजाई में बड़े से लेकर गदेला तक गुड़मुड़िया जाते हैं – रजाई चीथते-बांटते नहीं।
    क्या अच्छा हो कि हम लोग इतना विस्तार पा जायें कि सभी में अपनी और अपने में सबकी अनुभूति करें।
    लगता है सवेरे सवेरे कुछ ज्यादा ही बूंक दिया हमने टिप्पणी में! :-)
  3. Dineshrai Dwivedi
    यह कविता आज भी प्रासंगिक है। मगर अब वह भावनात्‍मक वातावरण हवा हो चुका है। इस कविता की भावना को यथार्थ भूमि पर लाने के लिए यथार्थ से सामना करना पड़ेगा। आप का स्‍मृति ग्रन्‍थालय अमूल्‍य है।
  4. आलोक पुराणिक
    ये तो सही है जी। पर वन लाइनरों का क्या हुआ।
  5. balkishan
    भाषा तो है मुस्कानों का ही एक रूप,
    अधरों से बहता यह आंखों का पानी है,
    भाषा तो पुल है मन के दूरस्थ किनारों पर,
    पुल को दीवार समझ लेना नादानी है।
    मुझे ये लाइने सबसे ज्यादा अच्छी लगी. बहुत दिनों से चिटठा जगत पर एक विवाद जैसा चल रहा था. लंबे-लंबे लेख लिखे जाते है पर ये चार लाइना सब को पीछे छोड़ देती है.
  6. चंद्रभूषण
    सुकुलजी, अपना पोस्टल ऐड्रेस मेहरबानी करके मेरे मेल ऐड्रेस पर या ब्लॉग पर डाल दें, एक चेक आपके पास भेजना है। बिना आपसे सूचना लिए आपकी एक सामग्री का इस्तेमाल कर लिए थे।
  7. मीनाक्षी
    भाषा तो पुल है मन के दूरस्थ किनारों पर,
    पुल को दीवार समझ लेना नादानी है। काश कि हम समझ पाएँ !!
  8. संजय बेंगाणी
    इस प्रकार की कविताएं लिखी जाये तो बात बने. एक दुसरे को कोसती कविताएं क्या खाक़ क्रांति लायेगी.
  9. अजित वडनेरकर
    बहुत सुंदर गीत। अंतिम पंक्तियां तो एकदम बोधवाक्य जैसी हैं। पूरे देश में प्रसार प्रचार होना चाहिए इनका ….धन्यवाद कि आपने पढवाई।
  10. ajit kumae verma
    whar happened in MUMBAI during last week , Mr Raj Thakre outburst , the poet words are still have the reference . specifically ‘kya batwara hoga sawali ghataion ka’
    ajit
  11. …जन भाषा के हायपर लिंक
    [...] कभी देखा जायेगा मामला। फ़िलहाल तो आप पाठकजी की बात सुनिये: भाषा तो है मुस्कानों का ही एक [...]
  12. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] आपत्ति फ़ूल को है माला में गुथने में [...]
  13. अन्ना का अनशन और कुछ इधर-उधर की : चिट्ठा चर्चा
    [...] तक चलाना अपने में एक बड़ी चुनौती है। नंदलाल पाठक की कविता याद आती है: आपत्ति फ़ूल को है माला में [...]

 

 

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