Saturday, July 05, 2008

पानी बरसा जोर से

http://web.archive.org/web/20140419215322/http://hindini.com/fursatiya/archives/457

20 responses to “पानी बरसा जोर से”

  1. अभय तिवारी
    आप का गीत भी सफ़दर की टक्कर का है!
  2. प्रभाकर पाण्डेय
    बहुत ही मजेदार रचनाएँ। सादर आभार।
  3. Gyan Dutt Pandey
    हचक के पढ़े दोहे। इतने मस्त कि बार-बार पढ़ने पर हिचकी आने लगी। लगता है – कवि महराज ही याद करने लगे – “अब पढ़ना छोड़ो, टिपियाओ!”
  4. Shiv Kumar Mishra
    आती बारिश देख के कवी गए बौराय
    ब्लॉगर सारे पढ़ रहे सर पे मस्ती छाय
    बहुत खूब धोये…सॉरी दोहे.
  5. सतीश पंचम
    सूरज भागा जोर से, छुपा बादलों की ऒट,
    जैसा कोई नेता भगे, डलवा के सब वोट।
    - बहुत अच्छा
  6. दिनेशराय द्विवेदी
    बारिश से फिसलन भई, फिसलें लोग-लुगाय।
    फिसल रहे जै सबद भी, छंदन में न समाँय।।
  7. Ghost Buster
    भीगे भीगे से कवित्त फुरसतिया बिखराएँ
    संभल संभल कर पढ़ रहे कहीं फिसल ना जायें
    कहीं फिसल ना जायें कि टूटे हड्डी पसली
    श्रीमती घोस्ट बस्टर को हो जाए तसल्ली
    कब से कहती रहीं कि छोडो चिट्ठा विट्ठा
    पड़ें झेलने सौ पचास डायलॉग इकठ्ठा
  8. विवेक रस्तोगी
    बहुत ही बढिया, आपकी साहित्यिक शैली बहुत ही पसंद आयी ।
  9. संजय बेंगाणी
    पूरे के पूरे भीग गए….यू छमछम बरसे सबद.
  10. डा०अमर कुमार
    सूखाग्रस्त की फ़ाइल पे साहेब दीन टिपियाय
    पकौड़ी मुँह मा टूँगि कै, बोलै धीमें से मुस्काय
    एहिमाँ अब का धरा है एहिका देयो बिसराय
    बाढ़ग्रस्त की फाइल चलाओ पइसा वहीं दिखाय
  11. abha
    ज्ञान भाई की तरह मै भी पढ़ रही हूँ. जोर की बारिश का रंग जोरदार है..।
  12. Advocate Rashmi Saurana
    bhut sundar. pahali bar aapke blog par aai. aapko padhana bhut achha laga. ati uttam. jari rhe.
  13. RC Mishra
    बहुत मज़ेदार, यहां भी इस समय रिमझिम चल रही है!
  14. प्रभात टन्डन
    बच्चा भीगत देखि के, मम्मी दिहिन एक कंटाप,
    रेन डांस जब शुरू भा, फ़ट थिरकन लगीं आप।
    जबर्दस्त :) बिल्कुल मूसलाधार बारिश की तरह :)
  15. लावण्या
    वाह जी वाह अँदाज खालिस सुकुल जी का
    कविता, बरसात की ,तब तो,
    आनँद ही आनँद :)
  16. समीर लाल
    बारिश बरसत जात है, भीगत एक समान,
    पानी को सब एक हैं, हिन्दु औ’ मुसलमान.
    फुरसतिया भी भीगकर, बदल गये हैं यार
    गद्य छोड़ कर आ गये, कविता के दरबार.
    अब तो कोई गम नहीं, बारिश हो या बाढ़
    कविता में भी आप तो, सबको दये पछाड़.
    –बहुत बढ़िया भीगे, महाराज बारिश में. और भीगये. शुभकामनाऐं.
  17. अनूप भार्गव
    सुन्दर …
    भीग गये अन्दर अन्दर तक …
  18. anitakumar
    ह्म्म तो बरसात का रंग फ़ुरसतिया जी पर भी चढ़ गया, कविताई पर उतर आए…।बहुत खूब बहुत खूब, क्या खूब रंग जमा दिए
    पानी बरसत देखिकर, गैयन करी पुकार,
    चलौ बैठकी करन को, चौराहा रहा पुकार।
    वाह क्या कल्पना है…:)
  19. rajni bhargava
    क्या कहने कविराय!बरसात का खूब मज़ा ले रहें हैं आप। बहुत दिनो बाद आपको फ़ुर्सत से बैठ कर पढ़ा है।
  20. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] पानी बरसा जोर से [...]

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