Saturday, July 26, 2008

नोट निकले हैं तो दूर तलक जायेंगे…

http://web.archive.org/web/20140419215933/http://hindini.com/fursatiya/archives/483

23 responses to “नोट निकले हैं तो दूर तलक जायेंगे…”

  1. प्रभाकर पाण्डेय
    एक मजदूर को एक सांसद के एक बार बिकने के बराबर कमाई में लगा समय= 15 करोड़/ 15 लाख = 100 जन्म>
    ये प्रश्न भले परीक्षाओं में न पूछे जाएँ पर ये समाज की, जीवन की कड़वी सच्चाई व्यक्त करनेवाले प्रश्न हैं। जैसे कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है वैसे ही ये प्रश्न भी आधुनिक समाज के दर्पण हैं।
    रोचकता के साथ आपने सटीक शैली में इन कथित भारत के कर्णधारों की कलई खोल दी है। कभी-कभी सोचता हूँ कि कैसे भी करके मैं भी नेता बन जाऊँ (पर भगवान न करें की इन नेताओं की लत मुझे भी लगे) और एक दिन पूरी दुनिया को दिखा दूँ इंकलाब फिल्म में अमिताभजी के चरित्र का सजीव चित्रण और जैसे फिल्म का अंत वैसे ही नेताओं की नेतागीरी का अंत। जय हिन्द, जय भारत।
    एक ट्रक के पीछे लिखा हुआ था- सौ में नब्बे बेइमान, फिर भी मेरा भारत महान।
  2. eswami
    वैसे आप तो राजनीति पर लिखने से परहेज़ करते रहे थे. लगता है सांसदों का बिकना ज़रा ज्यादा दु:खी कर गया है. पहले हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे और अब ये! सेंटिया गए क्या?
  3. abha
    इसी बहाने वो जो बात कहे थे ए ब्लागरों बच के रहना और अभिषेक की गणितीय पोस्ट वाली बात तो नहीं .. गुड मानिंग
  4. alok puranik
    भई वाह वाह है जी। बच्चों को नया गणित पढ़ाना शुरु करता हूं।
  5. Gyan Dutt Pandey
    बड़ा कड़ा गणित है। एक सांसद लायक तो हम लोग शायद न जुगाड़ पायें , पर यह मही मक्खीविहीन जरूर कर सकते हैं! :-)
  6. संजय बेंगाणी
    हाँ यह रूचीकर गणित है. बच्चे बच्चपन से ही सीख ले तो अच्छा है :)
  7. Shiv Kumar Mishra
    अच्छा हुआ कि ये सवाल ब्लॉगर से पूछे जा रहे हैं. सोचिये जरा यही सवाल अगर नेता से पूछ लेते तो क्या होता?
  8. दिनेशराय द्विवेदी
    चलिए आप ने बहुत सारे विद्यार्थियों को सर दर्द और अध्यापकों को फुरसत दे दी है।
  9. Dr .Anurag
    बाप रे बाप गुरुदेव …गणित छोड जमाना हो गया ओर आपने नई प्रश्नोत्तरी बनाई है ?देखना उ.प बोर्ड जरूर उठा लेगा अपने पाठ्यकर्म के लिये …..
  10. प्रभात टन्डन
    बच गये :) बायो वालों की गणित जग-जाहिर है कमजोर होती है :)
    वैसे सवाल हैं सोचने वाले , अगला कैरियर नेतागरी को चुनें :)
  11. समीर लाल ’उड़न तश्तरी वाले’
    बचपन से गणित से गुरेज किया और आज आपने पुनः आशा की नई किरण दी है कि शायद हम भी गणित का हिसाब किताब कर पायें.
    १५ मख्खी इसलिये मारी कि उतनी ही थी..सारे ब्लॉगर मिलकर मारें तो भी १५ ही मरेंगी और मारने वाले वो ही ब्लॉगर होंगे बाकी तो हम और आपकी की तरह हवा में पेपर लहराते नजर आयेंगे-नजर क्या आयेंगे, लहरा ही रहे हैं. शायद कभी एकाध बचे और हमसे झटके में लह जाये इस उम्मीद में. :)
    अच्छा गणित.
  12. anitakumar
    इस एकिक नियम पर आधारित गणित की खातिर बचपन में बहुत मार खायी है, आज भी दिमाग में नहीं घुसता, आप की पोस्ट देख हाथ सीधा सर पर चला गया देखने के लिए कि बचपन के घाव भरे कि नहीं, कुछ बीजगणित में से पूछना था न मास्टर जी, आप सोचो तब तक हम मक्खी मार के आते हैं शायद वो करना ज्यादा आसान हो
  13. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    एक सवाल थोड़ा कठिन सा:
    सवा सौ करोड़ जनता में से एक बार में ५४५ सांसद चुने जाते है। इनमें से १२ सांसद ०५ साल में एक बार बिकने का अवसर पाते है। कुल तय कीमत का १०% ही अग्रिम मिल पाता है। शेष धनराशि विवाद में फँस जाती है।
    -गणना करके यह बताइए कि ‘एक औसत भारतीय नागरिक को इस रेट पर बिकने के अवसर की प्रतिवर्ष प्रायिकता (provability) क्या होगी?’
    -यदि उत्तर दशमलव के चार स्थान पर आये तो यह भी बताएं कि ‘ऐसा दुर्लभ अवसर मिलने पर कौन नहीं डोल जाएगा?’
    -इस सौदे को ठुकराने वाले तीन सांसदों के महान त्याग को देखते हुए क्यों न ‘भारतरत्न’ के लिए नाम प्रस्तावित कर दिया जाय?
  14. अशोक पाण्‍डेय
    अभिषेक जी को खुश होना चाहिए कि गणित यहां भी काम आ रहा है। :) अब हिंदिनी कडियों के चिट्ठे मेरे कंप्‍यूटर पर खुल जा रहे हैं। लगता है ईस्‍वामी जी ने मेरे आग्रह पर कुछ जुगाड़ भिड़ाया है। आभार।
  15. डा० अमर कुमार
    .
    अच्छा जी, तो यह बात है…
    बहुत पेट दर्द हो रहा है, हम सबको ?

    नारायण..नारायण, जनता और नेता का रिश्ता इतना अटूट ऎसे ही नहीं है,
    पिट कर भी मज़ूर-किसान गा रहा होता है..
    सौ बार जनम लेंगे…सौ बार फ़ना होंगे, पर ज़ा्न-ए-वफ़ा फिर भी… हमतुम न ज़ुदा होंगेऽऽ
    काहे परेशान हो गुरु ?
    नेता है..तो रेट करोड़ का है, जनता है.. तो रेट कुछ अद्धे पौव्वे और खँस्सी कलिया का है ,
    इन दोनऊ के बीच में फँसे बड़ेबाबू बोनस , अंतरिम राहत वगैरह लेकर ही गदगद हैं ।
    काहे परेशान हो गुरु ?
    जाओ, हाथ मुँह धोके ख़ाना खाओ, अउर तनिक काम वाम लगा के चुप्पे सो जाओ,
    आजकल दफ़्तर रोज़ही देर से पहुँच रहे हो ।
    काहे परेशान हो गुरु ?
  16. Abhishek Ojha
    वाह ! कमाल का गणित लगाए हैं आप ! पाठ्यक्रम के लिए उपयुक्त… आख़िर बच्चे ही तो कल ये सब करेंगे… बिल्कुल जरूरी है ये सब पढाना उन्हें तो.
  17. Shashi singhal
    फुरसतियाजी , बहुत बढि़या गणित पढा़या है……
    मन तो कर रहा है कि इन सवालों को संसद पटल पर रखा जाए और सांसदों से इनका हल करवाया जाए …..
  18. garima
    बाबा… मै गणित की विद्यार्थी नही थी, मुझे माफ करो.. हाँ मेरे हिसाब से सवाल ऐसे बनेंगे।
    एक मध्यम दर्जे के लालची इंसान के औरा मे बाहरी तरफ से भूरा रंग १ cm तक दिखता है। फिर सांसद के औरा मे कितना दिखेगा?
    १०० मे से ९५% लोग अपने औरा मे पहला रंग हरा कराते हैं (लक्ष्मी जी के लिये) पर क्या अब लोग भूरा रंग चाहेंगे, सांसदो की तरह?
    अब तक के मानक सुंदर औरा मे अब क्या फेरबदल होनी चाहिये?
    अपने लिये औरा चुनना हो तो आप किसका चुनना पसंद करेंगे?
    और भी कई सवाल बन रहे हैं.. पर अभी नही फिर कभी :)
  19. Very Nice Article ba Fursatiya Ji
    Apka math ka gyan bahut nik lagal..
    Bahut badhiya se samajhule bani raunaa ke.
    Keep is up…
  20. arun gautam
    जंगल में मोर नाचा सबने देखा किंतु किसी ने यह नहीं देखा कि नोट असली भी थे या नहीं ।
    अरुण गौतम
    akgautam@indiatimes.com
  21. manish
    ..लोग बेवज़ह मुफ़लिसी का सबब पूछेंगे [:-)] – मनीष
  22. sanjay sen sagar
    aapne samjahne me jis tarah ki yukti ka upyog kiya hai bakay .adbhut hai!!
    aapka such sarahna yogye hai!!!
  23. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] नोट निकले हैं तो दूर तलक जायेंगे… [...]

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Saturday, July 19, 2008

ब्लागिंग एक और चिरकुट चिंतन

http://web.archive.org/web/20140419213728/http://hindini.com/fursatiya/archives/480

17 responses to “ब्लागिंग एक और चिरकुट चिंतन”

  1. अरूण
    jamaaye rahiye jI ham padhege .
  2. eswami
    अरे क्या टैलीपैथी हो रही है?
    अपनी लिखी कई सारी पुरानी पोस्ट्स को कल रात बैठ कर हिंदिनी और ई-स्वामी दोनो ही चिट्ठों से मिटा दिया – कुछ श्रेणियों के नाम-वाम बदले – सच कहूं तो अच्छा लगा ये करना!
    बहुत सारे ब्लागर्स स्वीकार करते हैं की वे अपना पुराना माल हटा देते हैं और कई कहते हैं की यह तो वेब-लाग है जो भी है पडा रहे – मुझे मालूम है आप इस दूसरे स्कूल ऑफ़ थॉट के हैं!
    याद है आप शुरु में मेरे लेखन को यूं भी खोमचे वाला कहते थे – तुरंत बना और दो घंटे में पटरी साफ़ – फ़िर भी उम्मीद है कुछ नास्टेल्जियाने के लिये ही सही बचा रहने लायक हो!
  3. प्रमोद सिंह
    पहला ड्राफ्ट है, उस लिहाज से बुरा नहीं. चिरकुट तो कतई नहीं. अलहदा. हां, अलहदा. देबू से भी. ज्ञान तो है ही. शिव का ध्‍यान है तो ज्ञान कैसे नहीं होगा. बिन नाड़े के पैजामे की तरह सरक-सरक जाने की ऊंचाई है. हाथ में उस्‍तरे वाली सफ़ाई तो है ही. भगवान के लिए प्रत्‍यक्षा को घराने में मत ठेलिये, एक बार घराने में धंस जाने के बाद फिर आदमी (औरत भी) ठुमरी, दादरा और ख़याल से बाहर कहां आ पाता है. जैसे मेरे शब्‍द पहाड़ से नीचे. कहां आ पाते हैं?
  4. alok puranik
    जमाये रहिये।
  5. संजय बेंगाणी
    हम तो लिखते रहेंगे…यही चिरकुटाई है….
  6. जीतू
    लगे रहो मियां, ब्लॉगिंग की तीसरी स्थिति को प्राप्त हो रहे हो। इस स्थिति मे ब्लॉगर आत्म चिंतन करता है, अपने लेखन का, अपने व्यवहार का, अपने आस पड़ोस की लेखक बिरादरी का। हालांकि इस आत्मचिंतन से कोई पाजिटिवि/निगेटिव निष्कर्ष नही निकलता (निकले भी तो ब्लॉगर कभी इसकी परवाह नही करता) और ब्लॉगर्स फिर से बेशर्म होकर ब्लॉगिंग करता रहता है। अलबत्ता कुछ नून तेल लकड़ी की परवाह करने वाले ब्लॉगर (थोड़े समय के लिए) किनारा कर लेते है।
    खैर….ये तो एक सामान्य प्रक्रिया है कोई बीमारी नही। अपने समय से ठीक हो ही जाएगा। फिर भी इलाज कराना चाहते हो तो इसका इलाज है, अपना लिखा कम दूसरों का लिखा ज्यादा पढो… कोशिश करो कि नए चिट्ठाकारों को पढो, सुबह शाम पाँच पाँच पोस्ट, लंच ब्रेक मे कविताओं का जोशांदा लेते रहो।
  7. Shiv Kumar Mishra
    बहुत शानदार चिंतन है. बहुत सही.
    ऊंचाई वही अच्छी, जिसपर बार-बार चढ़ते-उतरते रहें. इसीलिए हम भी अपनी पुरानी पोस्ट बीच-बीच में बांचते रहते हैं. हंसी-ठट्ठे वाली टिप्पणियां तो कई तरह से सहारा देती हैं. तो क्यों न किया जाय? मध्यमान को कोई महत्व नहीं दिया जाता.
  8. क
    मस्त ठेला है जी….:)
  9. Dr .Anurag
    पता नही एक तो ये चिरकुट शब्द आज तक पल्ले नही पड़ा ऊपर से मैंने देखा ढेरो लोग ब्लॉग्गिंग किस तरह से करते है ?कुछ लोग समाचार की कतरने लगा देते है ,कुछ गाने चढा देते है ,…फ़िर साथ में हमें भी गरिया देते है सालो तुम्हारा क्या है दो चार शब्द पकड़ कर इधर उधर ठेल दिए ओर उसे कविता का जामा पहनाकर धेकेल दिया ब्लॉग में ……अब सोचिये ज्ञान जी गाड़ी ख़राब हुई ओर वे मोबाइल से फोटो ले रहे है …आस पास से गुजरने वाले क्या सोचते होगे भला ?ये ब्लोगिंग का ही नशा है भाई ?
  10. डा०अ्मर कुमार
    वैसे तो हमें ज़्यादा बोलने की आदत तो है, नहीं ?
    क्योंकि बिना दिमाग लगाये बोलना ठीक नहीं ।
    और दिमाग से बोलो, तो दिमगिये का कबाड़ा होता है..
    लेकिन अनूप सुकुल..आज ?

    नरभसाये नरभसाये से नज़र आते हैं, वितृष्णा हो रही है न,
    मेरा फरवरी का मेल याद करिये, तब आप ही ने कहा था, दिल पर मत लिया करिये..
    वाकई मत लिया करिये…आप भी !
  11. समीर लाल
    कभी कभी सोच कितनी आलोकिक हो जाती है कि खुद को खुद पर विश्वास नहीं होता-यही विचार होगा जब दफ्तर से लौट कर आप अपना यह ड्राफ्ट पढ़ेंगे. :)
    कई बार देर रात पोस्ट चढ़ाकर सोने चले जाते हैं. रात ख्याल आता है कि यार, क्या बकवास लिख डाला. सुबह उठते ही सोचते हैं कि पोस्ट मिटा देते हैं. कम्प्यूटर खोलते ही दिखता है कि ढेरों कमेन्ट आ गये-अब क्या खाक मिटायें..ऐसी न जाने कितनी पोस्ट सजी हैं अपने ब्लॉग पर जिसने धीरे धीरे इन लेखन वर्षों में, अगर इसी को लेखन कहते हैं तब, ढीट बना दिया. :)
    हे हे वाली पोस्टें (गैर फूहड़ हे हे) जहाँ दिन भर की टेंशन से मुक्त कर देती है, वहीं अति संवेदना वाली पोस्टें अपने आप से जोड़ती हैं अतः दोनों का वजन अच्छा रहता है.
    चिन्तन अच्छा किया गया है. अतः इस तरह के ड्राफ्ट ठेलते रहें. शुभकामनाऐं.
  12. anitakumar
    हम तो जी अभी भी खुद को नया ब्लोगर ही मानते हैं जो आप जैसे दिग्गजों से ब्लोगिंग का शऊर सीख रहे हैं, अभी तो दुनिया जहान में ही देखने को इतना है कि खुद को क्या देखें, कभी ज्ञान गंगा में मुंह धोया तो कभी काकेश और पगेंबाज के अंदाज देखे, कभी आप की मौजूं पोस्टों से ख्ट्टी मीठी गोली के चटकारे लिए तो कभी अजीत जी की क्लास में जा कर बैठे, थक कर अपने घर वापस आ कर डब्बे खंगालने का तो वक्र्त ही नहीं मिला। जब आप जैसे सीनीयर हो जायेगे तब शायद सोचें खुद का लिखा पढ़ने को, तब ही बता पायेगें कैसा लगता है।
    तब तक आप चिंतन करते रहिए जी, बाद में शायद हम कह लेगें येईच तो हमें भी लग रहा था। था।
  13. Gyan Dutt Pandey
    वाह! हम तो चिरकुटालीन हो गये!
    चिरकुटस्य का भाषा? किम प्रभाषेत? किम व्रजेत?
    प्रश्नों के उत्तर हेतु फुरसतिया शरणम गच्छ!
  14. abha
    अच्छा गिटार भी शौक में शामिल है , मै इलना ही जानती हूँ फुरसतिया सहजता से सब सबकुछ कह जाते है और व्यहारिक कौन कोई पुछे तो झट से बता दूँ अनूप शुक्ल ….मेरा मानना है जो बात याद रह जाय़ उसमें दम है ,आप की पोस्ट मुझे याद रहती है ……
  15. G Vishwanath
    सचिन जब भी बैटिंग करने निकलता, क्या शतक पूरा करता है?
    कभी कभी तो शून्य का स्कोर होता है उसका।
    इससे हमें कोई फ़र्क नहीं पढ़ता।
    हम तो उसका प्रदर्शन देखने के लिए हमेंशा तैयार हो जाते हैं।
    महान खिलाडी जो हैं।
    आप बस लिखते रहिए।
    हिन्दी ब्लोग जगत में एक से एक बहतर लिखने वालों से मेरा परिचय हो रहा है आजकल। उनमें आप भी शामिल हैं। खेद है कि आपसे मेरा परिचय देर से हुआ।
    आपका लिखने का अंदाज़ अलग है। देख रहा हूँ कि हरएक का अन्दाज़ अलग है।
    हिन्दी ब्लॉग जगत से परिचय करके, पिछले कुछ महीनों में जितनी हिन्दी सीखी है मैंने, उतनी पिछले २५ वर्षों में नहीं सीखी।
    टिप्पणी चाहे करूँ या न करूँ, पढ़ने के लिए हम हमेंशा हाज़िर हैं।
    जमाए रहिए।
    गोपालकृष्ण विश्वनाथ
  16. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] ब्लागिंग एक और चिरकुट चिंतन [...]

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