Wednesday, June 17, 2009

सोचते हैं चले ही जायें अगले हफ़्ते कलकत्ते

http://web.archive.org/web/20140419220249/http://hindini.com/fursatiya/archives/650

25 responses to “सोचते हैं चले ही जायें अगले हफ़्ते कलकत्ते”

  1. लावण्या
    कलकत्ते से तुक मिलाते
    आप पहुँच भी गये होँगेँ रस्ते ..
    अब हुई समझो ..फत्ते !!
    - लावण्या
  2. anitakumar
    आज कहें या काल्हि सुन, है बड़े काम की बात,
    मुंह लटका यदि आपका, होगा बहुत बड़ा व्याघात!
    सही
  3. चक्षु बेचैन  ’ ज़ँज़ाली ’

    प्रस्थान तिथि की सूचना अविलम्ब दें,
    रिजेक्टेड टिप्पणियों के कुछ गत्ते इधर भी पड़े हैं,
    फ़त्ते को दे दीजियेगा, बिल्कुल मुफ़्त !

  4. anil pusadkar
    सः,तौ,ते,स्कूल की याद दिला रहे हो भैया।संस्कृत से जितना डर लगता था उतना तो अमेरिकियों को ओसामा से भी नही लगता होगा।
  5. नीरज रोहिल्ला
    अब संस्कृत की बात की है तो रूप भी सुनो, बिना किताब देखे स्मृति से सुना रहे हैं
    स: तौ ते,
    तम् तौ तान्
    तेन् ताभ्याम् तै
    तस्माय ताभ्याम् तेभ्य:
    तस्मात् ताभ्याम् तेभ्य:
    तस्य तयो तेषाम्
    तस्मिन तयो तेषु
    कहो तो बालक, बालिका और पठति के पांचों विभक्तियों में रूप सुना दें, भूतकाल वाला सबसे कठिन होता था :-)
    वैसे क्या बात हैं, आज फ़ुरसतिया मिजाज अलग नजर आ रहे हैं। सब खैरियत तो है? आप भी कहीं निरापद लेखन के चक्कर में तो नहीं फ़ंस गये :-)
  6. समीर लाल
    सभी निरापद लेखन की अलग अलग मिसालें कायम करने में लगे हैं. आपने भी कर ही दिया.
    वैसे कविता कितनी अच्छी कर लेते हैं आप. गौरैय्या पर भी कुछ लिखिये न!! ज्ञान जी का भी मन रह जायेगा. :)
  7. मानसी
    अगले हफ़्ते नहीं दो हफ़्ते बाद…!
  8. ताऊ रामपुरिया
    वाह निरापद लेखन का कितना सटीक उदाहरण दिया आपने. पर आपका चित्र निरापद नही है. रेल्वे आपसे रायल्टी की मांग कर सकता है अत: आपको सलाह दी जाती है कि साभार का प्रदर्शन करें. इस तरह रेल पटरियों का उपयोग दंडनिय है.
    और गौरैया पर लिखने की कोशीश भी कापीराईट का उल्लंघन होगा. इसका कापी राईट ज्ञानजी ने हमको किया है. आप अपने लिये कोई अन्य निरापद सबजेक्ट मांग लिजिये.
    रामराम.
  9. puja
    चले ही जाइए…फुर्सत का इससे अच्छा इस्तेमाल कहाँ होगा :) फिर हमें कलकत्ता की बातें बताइयेगा, छौंक मसाला मार के :)
  10. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    बच्चा बोले हम भी देखेंगे नई जगहें,नये-नये रस्ते,
    ट्रेन में संस्कृत के रूप भी रट लेंगे स:,तौ, ते।

    ———-
    इतनी सुन्दर कविता का करते हम सम्मान।
    तम् तौ तान्, तम् तौ तान्!
  11. Shiv Kumar Mishra
    कलकत्ते ज़रूर आईये. बढ़िया शहर है. लेकिन;
    गर्मी से बेहाल हुए सब
    झुलस रहा पूरा कलकत्ता
    लिए पसीना घूम रहे सब
    भीगा रहता कपड़ा-लत्ता
    बिजली भी अब गायब रहती
    पूरे दिन में छ-छ घंटे
    जीवन जाने कैसे गुजरे
    गले पड़े हैं कितने टंटे
    फत्ते को कुछ समय दीजिये
    ताकि कर ले कुछ तैयारी
    बारिश की भी कृपा रहे गर
    जीवन से जाए दुस्वारी
  12. कुश
    तबियत तो ठीक है ना जी ?
  13. neeraj1950
    फुर्सत में बहुत बढ़िया कविता कर लेते हैं आप…कलकत्ते वाली कविता पढ़ कर गोपाल प्रसाद व्यास जी की ये कविता याद आ गयी…
    “हवा चली डाल हिली
    गिरा एक पत्ता
    दिल्ली से उड़ा उड़ा
    पहुंचा कलकत्ता
    वाह रे रंगीले पिया
    ये तुमने क्या किया
    बासंती मौसम में
    ले आये छत्ता”
    नीरज
  14. Abhishek Ojha
    नीरज की टिपण्णी पढ़ी तो सोचा हमभी लगे हाथो दो-चार सुना जाएँ. कुश की पढ़ी तो हंसी आ गयी :)
  15. amit
    वाह, क्या बात है, एक ही में चार ठेल दी, बिना गद्य के??!! कुछ हम जैसे कविता रस से अछूते लोगों का भी ख्याल करते महाराज! :)
  16. dr anurag
    चार चार कविताये ???? देखिये चार बार प्रशन चिन्ह लगाया है …पहेली पूछते तो अच्छा लगता या किसी कीडे मकोडे के काटने का इलाज़ बताते पर आप ठहरे कवि…
    औसत हिन्दुतानी कविता के बोझ से नहीं मारा जा रहा है मी लोर्ड …वो बेचारा अभिव्यक्ति के बोझ से मरा जा रहा है …..आपकी इन प्रतीकात्मक चेष्टाओं से कोई उपाय नहीं निकलने वाला हे कवि .क्यूंकि अभिव्यक्ति का कोई मेनिफेस्टो नाही होता …..इ बात समझने में ओर समझाने में …दोनों में बहुत टाइम लगता है…..
    पुनाश्चा :गौरया पे लिखी कविता की प्रतीक्षा रहेगी
  17. गौतम राजरिशी
    अहा..देव का अलबेलापन…!!!
  18. कौतुक
    आपने लिखा इसीलिये अच्छा लगा.
  19. Shama
    Bade dinon baad tippanee denekee himmat juta payi hun..lekin alfaaz nahee hain !
    Meree URLs de rahee hun..
    http://lalitlekh.blogspot.com
    http://kavitasbyshama.blogspot.com
    http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com
  20. sajal
    kaafi mazedaar soch hai…ek nayaapan saaf dikha is post me..kaafi lambe break ke baad laute aap :)
    http://www.pyasasajal.blogspot.com
  21. sciblog
    इत्ती गर्मी में तो घर में ही रहना ठीक है, बाकी आपकी मर्जी।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }
  22. K M Mishra
    Itti Dher Sari kavitayen ek bar mein likh di. Yatra mein to Darzan bhar likh marenge. Vaise Garmi Bahut pad rahi hai. Meri maniye to T.V. par hi Culcutta dekh lijiye.
  23. वन्दना अवस्थी दुबे
    चलो बढिया है अनूप जी, अब कविता भी करने लगे आप. कलकत्ता से होते हुए गर्मी पर टूट पडे? असल में अब गर्मी की चर्चा हम सब की बातों का स्थाई भाव हो गया है. उसके बिना बात पूरी ही नहे होती.
  24. विवेक सिंह
    कलकत्ते में बैठकर, करें रेल की सैर . बच्चे को ले जाइये, उससे क्या है बैर ?
  25. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] सोचते हैं चले ही जायें अगले हफ़्ते कलकत… [...]

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