Wednesday, July 01, 2009

उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए

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34 responses to “उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए”

  1. विवेक सिंह
    “सृजन में दर्द का होना जरूरी है !”- बहुत सुन्दर पंक्ति !
    शास्त्रों में भी कहा गया है ” जब दर्द नहीं था सीने में , तब खाक मज़ा था जीने में ”
    दोनों महानुभावों को जन्मदिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं !इसी के साथ आप लोगों का कीमती समय ज्यादा न लेते हुए मैं अपनी बात को यहीं विराम देता हूँ . धन्यवाद .
    जय हिन्द !
  2. अविनाश वाचस्‍पति
    अच्‍छा लगा पढ़ जानकर।
    और बिना दिये कर
    जी हां जी हां सर
    बिल देगा यदि सूरज भेज
    तो नदियां भी देंगी अपना प्रिंटर खोल
    और हवा क्‍यों रहेगी पीछे
    वो भी पीटेगी ढोल
    बेतोले ही भेजेगी बिल अनमोल
    प्राकृतिक नियामतें भेजेंगी गर बिल
    तो कहां छिपेगा इंसान
    नहीं मिलेगा कहीं ऐसा बिल।
    वो तो प्रकृति का ही है दिल
    जो नहीं भेजतीं, न भेजेंगी बिल
    वो तो इंसान ही भेजेगा और
    भेजता है सदा
    लेकर नाम प्रकृति का
    खुद लेता है भरपूर मजा
    और सब भुगतते हैं सजा।
    पर इसमें भी रखनी पड़ती है सबको रजा
    यदा कदा नहीं, सदा सर्वदा।
  3. ताऊ रामपुरिया
    नन्दनजी और प्रियंकरजी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.
  4. ताऊ रामपुरिया
    बहुत सुंदर रचनाएं दी. बहुत धन्यवाद आपको भी.
    रामराम.
  5. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    subah-सुबह आपने जन्मदिन के बहाने नन्दन जी और प्रियंकर जी की अनूठी रचनाएं पढ़वाकर मन प्रसन्न कर दिया। आपको धन्यवाद और दोनो कवियों को जन्मदिन की मंगलकामनाएं।
    @अरे घबरा न मन
    चुपचाप सहता जा
    सृजन में दर्द का होना जरूरी है.
    निकानोर पार्रा की एक कविता की प्रतिक्रिया में मैंने सृजन को कुछ इस तरह महसूस किया था-
    बस कोरे कागज को बेहतर बना देना है?
    यह शर्त छोटी नहीं।
    काफ़ी कुछ मांगती है कविता;
    अपने जन्म से पहले
    इसका अंकुर फूटता है
    हृदय की तलहटी में,
    जब अंदर की जोरदार हलचल
    संवेगों का सहारा पाकर धर लेती है रूप
    एक भूकंप का;
    जो हिला देता है गहरी नींव को,
    गिरा देता है दीवारें,
    विदीर्ण कर देता है अन्तर्मन के स्रान्त कलश,
    बिंध जाता है मर्मस्थल,
    तन जाती हैं शिरायें,
    फड़कती हैं धमनियाँ
    जब कुछ आने को होता है।
    यह सिर्फ़ बुद्धि-कौशल नहीं;
    आत्मा को पिरोकर
    मन के संवेगो से
    इसे सिंचित करना पड़ता है।
    देनी पड़ती है प्राणवायु
    पूरी ईमानदारी से,
    ख़ुदा को हाज़िर नाजिर जानकर,
    अपने पर भरोसा कायम रखते हुए;
    भोगे हुए संवेगों को
    जब अंदर की ऊष्मा से तपाकर
    बाहर मुखरित किया जाता है,
    तो कविता जन्म लेती है।
    माँ बच्चे को जन्म देकर,
    जब अपनी आँखों से देख लेती है
    उसका मासूम मुस्कराता चेहरा,
    तो मिट जाती है उसकी सारी थकान,
    पूरी हो जाती है उसकी तपस्या
    खिल जाता है उसका मन।
    लेकिन प्रसव-वेदना का अपना एक काल-खण्ड है
    जो अपरिहार्य है।
    कविता पूरी हो जाने के बाद, वह
    मंत्रमुग्ध सा अपलक देखता रहता है
    उस कोरे काग़ज को,
    जिसे अभी-अभी बेहतर बना दिया है
    उसके भीतर उठने वाले ज्वार ने;
    जो छोड़ गया है
    कुछ रत्न और मोती
    इस काग़ज के तट पर।
    या, उसने गहराई में डूबकर
    निकाले हैं मोती।
    किन्तु जो वेदना उसने सही है
    उसका भी एक काल-खण्ड है।
    फिर कैसे कहें,
    कविता में हर बात की इज़ाजत है?
  6. Dr.Manoj Mishra
    नन्दनजी और प्रियंकरजी को जन्मदिन पर मेरी शुभकामनायें ,”"सृजन का दर्द”" ,”"अहसास का घर”" और “”सबसे बुरा दिन “” इन महानुभावों की उत्क्रिस्ट रचनाएँ हैं ,बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको धन्यवाद .
  7. mahendra mishra
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति .नन्दनजी और प्रियंकरजी को जन्मदिन को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई और शुभकामना
  8. Abhishek
    अरे घबरा न मन
    चुपचाप सहता जा
    सृजन में दर्द का होना जरूरी है.
    बेहद खूबसूरत! कमाल की पंक्तियाँ .
    और आपकी Flickr गैलरी का भी जवाब नहीं!
  9. संजय बेंगाणी
    सृजन में दर्द का होना जरूरी है.
    सत्य वचन!
  10. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    बहुत-बहुत बधाई नन्दन जी और प्रियंकर जी को।
  11. parul
    janamdin ki badhayi…kavitaen bahut pasand ki…khasskar तुम मेरे मन का कुतुबनुमा हो
  12. dr anurag
    प्रियंकर जी विनम्र ओर अच्छे इंसान है .उनके पिता को अक्सर पढता आया हूँ ..उनकी कविता अपने आप में कई अर्थ छोडे देती है…
    सबसे बुरा दिन वह होगा
    जब कई प्रकाशवर्ष दूर से
    सूरज भेज देगा
    ‘लाइट’ का लंबा-चौड़ा बिल
    यह अंधेरे और अपरिचय के स्थायी होने का दिन होगा
    ओर ये जैसे आने वाले समय को इशारा ………..
    पृथ्वी मांग लेगी
    अपने नमक का मोल
    मौका नहीं देगी
    किसी भी गलती को सुधारने का
    ये पंक्तिया ….जैसे मानवीय संवेदनाओं ओर भागती दौड़ती जिंदगी पे सवाल उठाती है…
    सबसे बुरा दिन वह होगा
    जब जुड़वां भाई
    भूल जाएगा मेरा जन्म दिन
    नंदन जी तो खैर आपके प्रिय कवि रहे ही है….
    वैसे अमेरिका से लेंडिंग कब हुई ?
  13. kanchan
    लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी,
    शानोशौकत का सामाँ मगर चाहिए।
    bahut achchhe….!
    जगत-जीवन के
    कार्य-व्यापार में
    प्रेम का तुलनपत्र
    अब कौन देखे !
    अपने अधूरे प्रेम के
    जलयान में शांत मन
    चला जाना चाहता हूं
    विश्वास के उस अपूर्व द्वीप की ओर
    जहां मेरी और तुम्हारी कामनाओं
    के जीवाश्म विश्राम कर रहे हैं ।
    bahut khoob…! aap ki pasanda hamesha achchhi hoti hai..!
    aisi rachanaeN likhne vale dono kavi shatjivi hoN
  14. हिंदी ब्लॉगर
    दोनों कविजनों को जन्मदिन की असीम शुभकामनाएँ!
    इतनी अच्छी रचनाओं की प्रस्तुति के लिए धन्यवाद!
  15. दिनेशराय द्विवेदी
    श्रद्धेय नंदन जी को और प्रियवर प्रियंकर जी को जन्मदिन की बहुत बहुत शुभ-कामंनाएँ। यह जान कर कुछ अच्छा नहीं लगा कि नंदन जी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। मैं समझता हूँ कि उन के जैसे नियमित संयमित व्यक्ति को तो स्वास्थ्य समस्या नहीं होनी चाहिए थी। उन से बस एक बार मिलने का अवसर मिला था। तब से वह मुलाकात आज तक स्मरण है। प्रियंकर जी की ससुराल मेरे नगर में है लेकिन उन से भेंट अभी शेष है। कहते हैं इंतजार में बहुत आनंद है।
  16. Dr.Arvind Mishra
    सुरुचिपूर्ण सुन्दर संचयन !
  17. dhiru singh
    उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए
    यह वह लोग है जो एक ही बार आते है इस दुनिया में ,और छा जाते है
  18. Kajal Kumar
    वाह सुंदर. भावपूर्ण. साझा करने के लिए धन्यवाद.
  19. वन्दना अवस्थी दुबे
    इतनी अच्छी रचनाएं पढवाने के लिये साधुवाद.
  20. Abhishek
    बहुत बढ़िया जी !
  21. - लावण्या
    नँदन जी तथा प्रियँकर जी दोनोँ को साल गिरह पर अनेकोँ शुभकामनाएँ -और इतनी सारगर्भित कविता पढवाईँ ये हमारा फायदा हुआ :)
    - लावण्या
  22. amit
    नंदन जी और प्रियंकर जी को जन्मदिन मुबारक। बाकी कविता तो देख ही सकते हैं, समझ सकने लायक अभी हैं नहीं! :)
  23. प्रियंकर
    इस नई कविता के साथ आप सबके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं :
    कृतज्ञ हूं मैं
    जैसे आसमान की कृतज्ञ है पृथ्वी
    जैसे पृथ्वी का कृतज्ञ है किसान
    कृतज्ञ हूं मैं
    जैसे सागर का कृतज्ञ है बादल
    जैसे नए जीवन के लिए
    बादल का आभारी है नन्हा बिरवा
    कृतज्ञ हूं मैं
    जिस तरह कृतज्ञ होता है अपने में डूबा ध्रुपदिया
    सात सुरों के प्रति
    जैसे सात सुर कृतज्ञ हैं
    सात हज़ार वर्षों की सुदीर्घ काल-यात्रा के
    कृतज्ञ हूं मैं
    जिस तरह सभ्यताएं कृतज्ञ हैं नदी के प्रति
    जैसे मनुष्य कृतज्ञ है अपनी उस रचना के प्रति
    जिसे उसने ईश्वर नाम दिया है .
    ***
    अनेकानेक आभार !
    प्रियंकर
  24. K M Mishra
    अनुप जी नमस्कार । आप का फोन टेप करके सारी बातचीत “सुदर्शन” पर प्रकाशित कर दी गई है । एक बार आकर देख लें कि कुछ हिस्सा छूटा तो नहीं है ।
    आपका कृष्ण मोहन
  25. raj sinh
    श्रेष्ठ् रचनाएँ !
    पता चला कानपूर में हैं . अमेरिका से कब लौटे ? :) .
  26. महामंत्री तस्‍लीम
    दोनों साहित्‍यकार बंधुओं को जन्‍मदिन की बधाईयां।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }
  27. रंजना
    कितना सही कहा……..
    सरस सुन्दर पोस्ट के लिए बहुत बहुत आभार.
  28. अनुराग शर्मा - Smart Indian
    नन्दन जी और प्रियंकर जी दोनों को जन्मदिवस की बहुत बहुत मंगलकामनायें!
  29. prasanna vadan cvhaturvedi
    नंदन जी और प्रियंकर जी को जन्मदिन मुबारक…नन्दन जी और प्रियंकर जी की रचनायें प्रस्तुत करने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद…
  30. अमर कुमार

    सृजन में पीड़ा के अनुभूति की अनिवार्यता.. और
    सृजक का आत्मपीड़न एकालाप निर्विवादित रहेगी ।

    सँकलन उत्कृष्ट है, और फुरसतिया व्यक्तित्व का एक अलग पहलू उजाकर करता है ।
    नँदन जी को अधिक जानने की इच्छा रहती है, पर उनकी आत्मकथा बहुत मँहगी है ।

  31. गौतम राजरिशी
    साभार देव इन नायब रचनाओं के लिये।
  32. anita kumar
    बहुत देर से ये पोस्ट देख रही हूँ लेकिन नंदन जी मेरे प्रिय कवि हैं, इतनी देर से भी उन्हें और प्रियंकर जी को जन्मदिन की शुभकामनांए देने का लोभ रोक नहीं पा रही हूँ । भगवान करे ये दोनों आने वाले कई सालों तक यूँ ही अपनी कविताओं से हमारा मन मोहते रहें। नंदन जी के स्वास्थय के लिए विशेष प्रार्थना करती हूँ
  33. Arvind Chaturvedi अरविन्द चतुर्वेदी
    आप की लेखनी का कायल हूं. कनपुरिया होने के नाते एक अलग रिश्ता भी महसूस करता हूं.
    नन्दन जी ने मेरे गज़ल संग्रह ‘चीखता है मन’( अयन प्रकाशन 1999)की भूमिका लिखी है. हुआ यूं कि मेरा पहला कविता संग्रह ‘नक़ाबों के शहर में’ 1995 में प्रकाशित हुआ ( उसकी भूमिका वरिष्ठ हिन्दी कवि केदार नाथ सिंह जी ने लिखी थी). समीक्षा के लिये नन्दन जी को एक प्रति भेजी. नन्दन जी उन दिनों दैनिक जागरण मे ‘मेरी पसन्द’ नाम से एक लघु कालम लिखते थे ( यह उनके मुख्य कालम’जरिया-नज़रिया’ में समाहित होता था) .मेरी पुस्तक ‘नक़ाबों के शहर में’ में से नन्दन जी को एक कविता पसन्द आयी ,उन्होने मेरे परिचय के साथ वह कविता अपने कालम ‘मेरी पसन्द’ में छापी. मैं उनके घर मिलने गया. साथ ही अनुरोध भी किया कि अगली पुस्तक ( गज़ल संग्रह ) की भूमिका वह लिखें. नन्दन जी राज़ी हो गये. मेरी उसी कविता ने बाद में प्रकाशित नन्दन जी की पुस्तक “..इन्द्रधनुष” ( डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित)में भी स्थान पाया. जब में भविष्य निधि एंक्लेव,मालविय नगर में रहता था,तो नन्दन जी एक बार वहां भी पधारे.
    आपकी पोस्ट में नन्दन जी का ज़िक्र पढ्कर मुझे कुछ पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं. पिछले वर्ष एक कविता समारोह में नन्दन जी के साथ एक मंच से पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.मैं धन्य हो गया.
    मैं आपके ब्लोग की पुरानी पोस्ट ढूंढ ढूंढ कर पढ़ रहा हूं विशेषकर कानपुर से सम्बन्धित.
  34. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
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