Thursday, April 21, 2011

कथनी और करनी का अंतर

http://web.archive.org/web/20140419214328/http://hindini.com/fursatiya/archives/1963

कथनी और करनी का अंतर

कथनी और करनी
कथनी और करनी के बीच अंतर की बात पर अक्सर हल्ला मचता रहता है।
वे कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं।
आपने कहा तो यह था लेकिन कर वो रहे हैं।
उनके काम और बयान में आपस में छत्तीस का आंकड़ा है।
सोचने की बात है कि ऐसा क्यों होता है? कथनी और करनी के बीच देश के चहुंमुखी विकास और आम जनता की स्थिति सरीखा अंतर क्यों होता है?
कहने में केवल जबान हिलानी पड़ती है। करने में शरीर डुलाना पड़ता है। जबान सौ ग्राम की होती है। शरीर सौ किलो का हो सकता है। दोनों के वजन में हजार गुने का अंतर है। जब स्रोत में हजार गुने का अंतर है तो उसके उत्पाद में कुछ न कुछ अंतर तो स्वाभाविक है।
जबान छोटी होती है। उसके मुकाबिले शरीर बड़ा। जबान जो कहती होगी उसकी सूचना शरीर के पास सूचना (बजरिये दिमाग) भेज देती होगी- यह कहा गया है। कृपया इसका निष्पादन सुनिश्चित करिये।
शरीर बड़ा है। वह जबान की सूचना को उसी तरह ग्रहण करता है जैसे दफ़्तर में बड़ा अधिकारी छोटे की सूचना को ग्रहण करता है। कभी-कभी देख लेता है कि कहीं इसमें दिमाग की सिफ़ारिश तो नहीं नत्थी है। सिफ़ारिश होती है तो थोड़ा हिलता-डुलता है। वर्ना सूचना को इधर-उधर सरका देता है। इसके बाद निढाल होकर पड़ जाता है।
इस बीच जबान अगली सूचना भेज देती है। पहले के विपरीत- कृपया इसका निष्पादन सुनिश्चित करिये। इसके लिये बयान जारी किया जा चुका है।
शरीर और निढाल होकर पड़ जाता है। अब तो उसके पास बहाना भी है कि दो बातें एक-दूसरे के विपरीत हैं। शरीर के पास अकल नहीं लेकिन काम न करने का निर्णय लेने भर की समझ उसने विकसित कर ली है। जबान और शरीर में कार्यक्षमता का अभाव है। तारत्मय का अभाव है। जबान जितना फ़ड़फ़डा सकती है, शरीर उतना करने की सोचकर ही लड़खड़ाने लगता है।
कथनी और करनी के बीच अंतर का मूल कारण जबान और शरीर की कार्यक्षमता का अंतर है। उनके बीच तारतम्य का अभाव है।
अक्सर आज के समय की पुराने समय से तुलना कर दी जाती है। आज कथनी और करनी का अंतर पहले के मुकाबले बढ़ गया है।
ऐसा समाज की बढ़ती आधुनिकता और विकास के चलते हुये है। पहले किसी काम की जो योजना बनाता था वही करता था। एक ही व्यक्ति पीर, बाबर्ची, भिस्ती, खर होता था।
आज योजना का प्रस्ताव कोई बनाता है। अनुमोदित कोई दूसरा करता है। करवाता कोई तीसरा है। करता कोई चौथा है। देखता कोई पांचवा है। समीक्षा कोई पांचवा करता है। भुगतान कोई छ्ठा करता है। मजा कोई सातवां करता है। झेलता कोई आठवां है। कथनी और करनी के बीच इतने बिचवानी घुस आये हैं। कथनी करनी का मुंह को देखने को तरस जाती है।
सरल समाज था पहले। एक काम को एक ही आदमी करता था। गड़बड़ी पकड़े जाने पर गड़बड़ी करने वाले को पकड़ना आसान था। आज जटिल समाज है। गड़बड़ करने वाला ही सर्च वारंट लिये गड़बड़ी करने वाले को खोजता रहता है।
बड़े-बड़े देश भी कथनी और करनी के बीच तारतम्य के अभाव में बेचारे बदनाम हो जाते हैं। अमरीका जी देखिये ईराक जी का भला करना चाहते थे। वहां लोकतंत्र की स्थापना करना चाहते थे। वहां गये तो भलाई करने में जो थोड़ा बहुत काम करना होता है। बम-उम बरसाये। लूटपाट हुई। तख्ता-उख्ता पलटा। फ़ांसी-ऊसी दी। ये तो हर भला चाहने वाला देश करता है। बिना लूटतंत्र के कहीं लोकतंत्र स्थापित होता है भला! बिना लूटपाट और गोला-बारूद के भला किसी का भला किया गया है आजतक कहीं। लेकिन वो बेचारा भला देश दुनिया भर में बदनाम हो गया कि वे तो गलत इरादे से वहां घुसे थे।
भाषा और अभिव्यक्ति का अंतर भी कथनी और करनी के बीच अंतर का कारण होता है। परसाईजी ने लिखा है-अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं.बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है!
फ़्रांस लीबिया के लोगों की सहायता करना चाहता है। जनता का भला करने के लिये बम जहाज उड़ा दिये। अब इसको कोई गलत इरादे से घुसना कहे तो यह उसकी समझ है। लोगों को कौन समझाये कि भाई भला करने की फ़ीस तो लेनी ही पड़ती है। न लेव तो लोग और गलत समझते हैं कि इनका क्या इंटरेस्ट है भलाई करने में। भला करने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। मेहनत का फ़ीस तो लेनी ही पड़ती है। बड़े देश जब छोटे देशों की सहायता करते हैं तो अपनी फ़ीस का चेक पहले से काट के धरवा लेते हैं। अक्सर यह फ़ीस कुल भलाई की कीमत से ज्यादा होती है। अच्छा बनने के चक्कर में देश दीवालिया हो जाता है। उसकी हालत तन पर नहीं लत्ता पान खायें अलबत्ता जैसी हो जाती है। लेकिन उसमें भलाई करने वाले का क्या दोष? उसको तो अपना काम करना ही है।
विकसित होते समाज में कथनी और करनी का अंतर होना अपरिहार्य है। किसी समाज की आधुनिकता उसकी कथनी और करनी के अंतर के समानुपाती होती है।
देखिये मोबाइल आने पर हजामत बनवाने वाला अपने को मीटिंग में व्यस्त बताता है। मीटिंग करता आदमी मेसेजिंग में मशगूल रहता है। मेसेजिंग करता आदमी गाना सुनते हुये मुस्कराते हुये अपने साथी को लटके मुंह वाले आइकन को नत्थी करके लिखता है -तुम्हारे बिना मन नहीं लग रहा है। यह कथनी और करनी के अंतर के घराने की ही बातें है। तकनीक आदमी को झूठ बोलने के बहाने मुहैया कराती है।
अब लोग कथनी और करनी के बीच अंतर को परिभाषित करने लगते हैं। कोई कहता है कि कथनी और करनी के पच्चासी पैसे का अंतर है। कोई बढ़ाकर नब्बे पैसे कर देता है। कथनी और करनी के बीच वियोग बता जा रहा है। वे आपस में लैला मजनू हो गये हैं। जालिम जमाना उनको मिलने नहीं देता। कथनी और करनी बिजली के पाजिटिव-निगेटिव फ़ेस से हो गये हैं। इनको लाल-हरे कुचालक की सहायता से अलग रखा जाता है। क्योंकि जहां वे मिलते हैं , फ़ेस उड़ जाता है।
बहुमत कथनी और करनी के बीच अंतर चाहने वालों का है। इस अंतर को पाटने की कोशिश करने वाला मारा जाता है। बदनाम होता है। फ़जीहत झेलता है। इसीलिये कथनी और करनी का अंतर बरकरार है।
है कि नहीं? :)

34 responses to “कथनी और करनी का अंतर”

  1. प्रवीण पाण्डेय
    नदी के दो पाटों की तरह। बड़ी नदी में अन्तर भी बड़ा है।
  2. भारतीय नागरिक
    क्या बात है शुक्ल जी.. कथनी और करनी में अंतर खत्म हो जाये तो फिर मजा भी खत्म हो जायेगा जिन्दगी का..
  3. मीनाक्षी
    पूरा लेख एक ही साँस में पढ गए… “तकनीक आदमी को झूठ बोलने के बहाने मुहैया कराती है।” इनके बिना गुज़ारा भी नहीं है…
  4. Anonymous
    बहुत बढ़िया, शब्दों के द्वारा मानव स्वभाव को द्र्श्यांकित किया है आपने,
    और पूरी सत्यता के साथ बिना अपनी परवाह किये हुए, वाकई बहुत सुंदरता के साथ बड़ी गहरी बात कह दी आपने…
  5. राजेंद्र अवस्थी
    क्या ब्बात है , बहुत ही सुन्दर शब्दों में मानव स्वभाव को आपने द्र्श्यांकित किया है, और अपनी परवाह ना करते हुए बड़ी गहरी बात कह दी आपने….
  6. Amit Srivastava
    “कथनी” और “करनी” आपस में सौतन की तरह हैं , सॊ कैसे पटरी बैठ सकती है भला आपस में ।वो तो दो पत्नियां हैं,आदमी कभी एक को पटाता है तो दूसरे को अनसुना करना पड़ता है ,दूसरे की मन की करे तो पहले को छोड़े ।इन्ही का पुराना नाम “सुनीति” और “सुरुचि” था शायद । (कथनी -सुनीति और करनी -सुरुचि )
    Amit Srivastava की हालिया प्रविष्टी..शब्दों के खनकते सिक्के
  7. arvind mishra
    क्या बात है! कथनी करनी के अंतर का वैज्ञानिक विवेचन!मानव व्यवहार के शोधार्थियों की छुट्टी!
    तन पर नहीं लत्ता पान खायें अलबत्ता का एक देशी वर्जन भी है -
    जहां निज ***वहां भगई नाईं
  8. देवेन्द्र पाण्डेय
    कथनी और करनी के बीच इतने बिचवानी घुस आये हैं। कथनी करनी का मुंह को देखने को तरस जाती है।
    बहुमत कथनी और करनी के बीच अंतर चाहने वालों का है। इस अंतर को पाटने की कोशिश करने वाला मारा जाता है। बदनाम होता है। फ़जीहत झेलता है। इसीलिये कथनी और करनी का अंतर बरकरार है।
    ……एक की करनी दूसरे के लिए कथनी बन जाती है। आपने मेहनत किया, पोस्ट लिखा। मैने कथनी समझा, मजा लिया।
  9. vijay gaur
    अनूप जी बहुत ही सुंदर निबंध है। बधाई। आपके पास इस तरह के ललित निबंधों को लिखने की जो द्रष्टि है वह खूब है। मुझे लगता है यह आपनी यही आपकी स्वाभाविक रचनात्मकता विधा है जिसमें आपकी द्रष्टि, कौशल और आपके भीतर का रचनाकार अपने को व्यक्त करने में ज्यादा सहत दिख रहा होता है। आप ऎसे आलेखों/निबंधो/व्यंग्य को एक जगह इक्कठा कीजिए तो —
    vijay gaur की हालिया प्रविष्टी..नियंत्रित अराजकता के विरोध में
  10. संजय @ मो सम कौन?
    बिल्कुल है जी।
    पर अज्ज कविता कित्थे है जी? ओ नहीं दिखदी अज्ज, न कविता न गज़ल।
    संजय @ मो सम कौन? की हालिया प्रविष्टी..शिकार – एक लघुकथा
  11. सुशील बाकलीवाल
    कथनी और करनी रेल की दे पटरियां बन गई हैं, समानांतर चली जा रही हैं, मिल पाने का तो प्रश्न ही नहीं है ।
  12. ismat zaidi
    विकसित होते समाज में कथनी और करनी का अंतर होना अपरिहार्य है। किसी समाज की आधुनिकता उसकी कथनी और करनी के अंतर के समानुपाती होती है।
    किसी सामाजिक घटना की ऐसी गणितीय विवेचना पहली बार पढ़ी
    मज़ा आ गया ,,,,ये तो सही है कि विरले ही ऐसे होंगे जिन की कथनी और करनी में
    कभी न कभी कोई अंतर न हुआ हो ,,,,लेकिन मनुष्य के इस मनोविज्ञान का इतने रोचक ढंग से आप ही विश्लेषण कर सकते हैं
    बधाई !
  13. sanjay jha
    बहुमत कथनी और करनी के बीच अंतर चाहने वालों का है। इस अंतर को पाटने की कोशिश करने वाला मारा जाता है। बदनाम होता है। फ़जीहत झेलता है। इसीलिये कथनी और करनी का अंतर बरकरार है।……………
    और बढेगा भी……….
    पाई लागूं.
  14. सतीश सक्सेना
    “शरीर बड़ा है। वह जबान की सूचना को उसी तरह ग्रहण करता है जैसे दफ़्तर में बड़ा अधिकारी छोटे की सूचना को ग्रहण करता है। कभी-कभी देख लेता है कि कहीं इसमें दिमाग की सिफ़ारिश तो नहीं नत्थी है। सिफ़ारिश होती है तो थोड़ा हिलता-डुलता है। वर्ना सूचना को इधर-उधर सरका देता है। इसके बाद निढाल होकर पड़ जाता है …इस बीच जबान अगली सूचना भेज देती है। ”
    पिद्दी न पिद्दी का शोरबा ….साली खुद करले जाकर बहुत जरूरी लग रहा है तो …
    हाँ ! दिमाग ( बास ) का आदेश, नत्थी देखकर मजबूर हो जाता हूँ मगर आखिरकार बॉस को भी थोड़ी जद्दोजहद के बाद समझाने में कामयाब हो ही जाता है :-)
    क्या विवेचना की है अनूप भाई ! मान गए आपको गुरु ! क्या फितरती बॉस पाया है आपने :-)
    शुभकामनायें आपको और इस लेख के लिए बधाई !
  15. Nishant
    करनी और कथनी में अंतर होना ही चाहिए. आदमी जीता-जागता प्राणी है कोई पत्थर थोड़े ही है जो अपनी हैसियत से न फिर सके!
    Nishant की हालिया प्रविष्टी..व्यक्तित्व विकास – पाठक व कर्ता में अंतर
  16. बाबा निट्ठल्लानन्द

    कथनी और करनी के अँतर मॆं ही जीवन का सार है, बच्चा ।
    इसे पाटने में सफ़लता प्राप्त कर लेने वाला मोक्षावस्था को प्राप्त होता है, वत्स !
  17. aradhana chaturvedi
    बहुत सही. निशांत जी और बाबा निठल्लानन्द :-) की बात सही है कि कथनी और करनी में अंतर तो होना ही चाहिए, नहीं तो आदमी देवता ना हो जाए. ” तकनीक आदमी को झूठ बोलने के बहाने मुहैया कराती है।” इससे पता चलता है कि तकनीक आदमी को आदमी बनाए हुए है नहीं तो वो देवता हो गया होता :-)
    aradhana chaturvedi की हालिया प्रविष्टी..खुश रहने की कुछ वजहें
  18. अभय तिवारी
    :-)
    अभय तिवारी की हालिया प्रविष्टी..अन्ना – भ्रष्टाचार – लोकपाल
  19. Ghanshyam Maurya
    पोस्‍ट का विषय ही कुछ ऐसा था कि एक बार में ही पूरी पोस्‍ट पढ़ गया। एक आदर्श और वैचारिक विषय पर गजब की व्‍यंग्‍यात्‍मक पोस्‍ट लिखी है आपने। वैसे जो कहावत दी है उसमें ‘अलबत्‍ता’ की जगह ‘कलकत्‍ता’ होता तो और मजा आता क्‍योंकि बनारसी पान की तरह कलकत्‍ता का पान भी मशहूर है और यह शब्‍द ‘लत्‍ता’ के साथ तुकबन्‍दी को भी बरकरार रखता है।
  20. वन्दना अवस्थी दुबे
    एकदम एक नम्बर की पोस्ट. इतने दिनों से लगता है, इस कथनी और करनी के अन्तर को ही झेल रहे थे आप :) तभी तो अकबका के निकल पड़ी, इतने बढिया उदाहरणों के साथ.
    “कथनी और करनी के बीच अंतर का मूल कारण जबान और शरीर की कार्यक्षमता का अंतर है। उनके बीच तारतम्य का अभाव है।”
    सही. जबान कुछ कहती है और शरीर कुछ और करता है. एक भी वादा पूरा नहीं होता जबान का( नेताओं का)
    “कथनी और करनी के बीच इतने बिचवानी घुस आये हैं। कथनी करनी का मुंह को देखने को तरस जाती है।”
    हर जगह बिचवानी हैं, तो यही जगह क्यों छूटे?
    “आज जटिल समाज है। गड़बड़ करने वाला ही सर्च वारंट लिये गड़बड़ी करने वाले को खोजता रहता है।”
    इसीलिये तो गड़बड़ करने वाला पकड़ा नहीं जाता :)
    “परसाईजी ने लिखा है-अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं.बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है!”
    परसाई जी तो ऐसा ऐसा लिख गये हैं, कि बस आदर्श वाक्य बनाने को जी चाहता है :)
    “तकनीक आदमी को झूठ बोलने के बहाने मुहैया कराती है।”
    सही है.हमने भी किया है कई बार ऐसा इस्तेमाल.
    “मुस्कराते हुये अपने साथी को लटके मुंह वाले आइकन को नत्थी करके लिखता है -”तुम्हारे बिना मन लग रहा है।”
    सर जी मन लग रहा है, या मन नहीं लग रहा?? :) :)
  21. hibernating
    अच्छा लेख .तर्क शक्ति पैना करने वाला धारदार लेख!
    ——–
    वैज्ञानिक दृष्टिकोण नज़र आये …एक ओर तंत्रिका तंतु विज्ञान के ज्ञान का प्रयोग ….तो दूसरी ओर …भौतिकी ..के फेज .हरे – लाल चालक कुचालक!..वाकई तकनीक ने बहाने के बहाने सिखा दिए हैं…
    …………………
    अंतर सम्बंधित सभी उदाहरण समझ आये परन्तु पैसे से क्यूँ अंतर नापा गया ..पैसे तो वैसे भी चलने बंद हो गए हैं ..रूपये की बात होनी चाहिए थी.
    ——-
    मेरे विचार में लत्ता वाली लोकोक्ति में अलबत्ता की जगह कलकत्ता होना चाहिए …तभी उसका वज़न बढ़ेगा!
    ———
  22. अजीत कुमार मिश्रा
    सच के आवरण में झूठ को छिपाकर, जबान मे चाशनी लगाई
    कथनी रही हमेशा सच की, पर करनी रही हमेशा झूठ की
    जिससे मतलब सधा सच कहूँ उसी से जीवन में प्रीति लगाई
    तभी तो छोटी सी जिंदगी में, बड़ी बड़ी इमारतें बनाई।
  23. Khushdeep Sehgal, Noida
    हालत तन पर नहीं लत्ता पान खायें अलबत्ता…
    ज़िंदगी झंड बा, फिर भी घमंड बा…
    जय हिंद…
  24. ashish
    कथनी और करनी में अंतर ही तो परमानद की अनुभूति कराता है ,. अब नेगेटिव और पोसिटिव फेस नहीं होता तो बल्ब का फेस वेलू कुछ नहीं होता .
  25. चंद्र मौलेश्वर
    होऽऽऽऽ रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा
    कथनी और करनि का अंतर बढ़ता जाएगा :)
    चंद्र मौलेश्वर की हालिया प्रविष्टी..अज़ीम प्रेमजी – Azim Premji
  26. pawan k mishra
    ई त बड़ा साइंटिफिक अनालिसिस कर दिहे आप
    जबान और शरीर साठवा में सिफारिशी दमागौ का
  27. असली आशीष श्रीवास्तव 'खालीपीली वाले'
    कुछ नहीं जी आजकल रियलिटी नहीं विर्चुअल रीयलिटी का ज़माना है !
    असली आशीष श्रीवास्तव ‘खालीपीली वाले’ की हालिया प्रविष्टी..मानक प्रतिकृति- ब्रह्माण्ड की संरचना भाग ४
  28. ashish
    “जबान सौ ग्राम की होती है। शरीर सौ किलो का हो सकता है। दोनों के वजन में हजार गुने का अंतर है। जब स्रोत में हजार गुने का अंतर है तो उसके उत्पाद में कुछ न कुछ अंतर तो स्वाभाविक है।”
    लाख रुपे की बात है ,आपने फ्री में बता दी |आना और पढना सफल हुआ |
    @ खाली पीली वाले आशीष,
    भई, नकली तो हम भी नहीं ,आप झालिया वाले हो और हम जबलपुर वाले |
    -आशीष श्रीवास्तव
  29. Gyan Dutt Pandey
    कथनी और करनी दो बहने थीं। फिर दोनो की शादी हो गयी। अपने अपने गांव गईं। कभी कभी शीतला माता के थान पर रोट चढ़ाते मिलती हैं। अन्यथा कहां मिलना हो पाता है आजके जमाने में।
    किहनी खतम!
    Gyan Dutt Pandey की हालिया प्रविष्टी..बाल पण्डितों का श्रम
  30. मनोज कुमार
    कथनी और करनी में समरूपता रखना ही महान आत्‍मा का लक्षण है।
  31. Abhishek
    कथनी-वथनी सब करे करनी करे न कोय :)
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..खिली-कम-ग़मगीन तबियत भाग २
  32. सतीश चन्द्र सत्यार्थी
    सही है जी… मस्त रहा…. :) :)
    सतीश चन्द्र सत्यार्थी की हालिया प्रविष्टी..दुनिया की सबसे बेहतरीन और तेज इंटरनेट सेवा
  33. mukesh choudhary
    दिल से निकली एक आवाज़ है ये . आपका दर्द हम समझ और महसूस कर रहें हैं . कुछ और सब्र करे सब ठीक हो जायेगा .
  34. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] कथनी और करनी का अंतर [...]

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