Wednesday, September 05, 2012

कविताओं के बीच में एक दिन

http://web.archive.org/web/20140420082017/http://hindini.com/fursatiya/archives/3357

कविताओं के बीच में एक दिन

सितम्बर का महीना देश में हिन्दी का महीना होता है। हिन्दी नहीं, राजभाषा का। देश भर में राजभाषा माह, पखवाड़ा, सप्ताह, दिवस मनाया जाता है। श्रद्धा और औकात के हिसाब से। क्या पता कल को राजभाषा घंटा, मिनट या फ़िर सेकेंड भी मनाया जाने लगे। नेशनल लैंगुयेज को रिच बनाया जाता है। अपन के यहां भी कल राजभाषा पखवाड़े का फ़ीता कटा।
हम जिधर बैठे थे उधर ही दीप प्रज्ज्वलित हुआ था। दीप बुझ न जाये इसलिये अपन की तरफ़ का पंखा बन्द कर दिया गया था। इसलिये दूरी के बावजूद दीप की गर्मी हमें महसूस हो रही थी। हम फ़ुल गर्मजोशी के साथ राजभाषा प्रसार की कार्यवाही के गवाह बने।
उद्घाटन भाषण में दक्षिण भारतीय महाप्रबंधक ने मिली-जुली लेकिन समझ में आ जाने वाली हिन्दी में हिन्दी की महत्ता बतायी। जिस शब्द की हिन्दी उनको नहीं आई उसका अंग्रेजी शब्द बोला। जनता ने उसकी हिन्दी बताई। उसको उन्होंने बोला और अपनी बात कही। यह भी बताया कि पहले उनको लगता था हिन्दी कविता में हर पांचवी लाइन के बाद वाह-वाह बोला जाता है।
उद्धाटन के बाद कवियों की बारी थी। शुरुआत हास्य कवि से हुई। कवि चुटकुले शुरु करें उसके पहले महाप्रबंधक ने अपना हिन्दी के बारे में एक अनुभव बताया। एक कवि ने अपनी किसी कविता में ’कड़ी’ शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने उसको ’कढ़ी’ समझकर ग्रहण किया और कल्पना करते रहे कि क्या स्वादिष्ट कल्पना है। हमको अपने बी.एच.यू. के मित्र यादव जी याद आये जिनको मैंने जब एक कविता सुनाई थी:
अजब सी छटपटाहट,
घुटन,कसकन ,है असह पीड़ा
समझ लो
साधना की अवधि पूरी है।
अरे घबरा न मन
चुपचाप सहता जा
सृजन में दर्द का होना जरूरी है।
यादव जी को कविता पसन्द आ गयी तो उन्होंने सुनकर लिख ली। तीन दिन बाद मुझे सुनायी जिसकी अंतिम पंक्ति थी-
सूजन में दर्द का होना जरूरी है।
वे शायद कवि से ज्यादा सटीक थे। सृजन में दर्द हो या न हो लेकिन सूजन में दर्द की सौ प्रतिशत गारंटी होती है।
कवि लोग शुरु हुये तो मां भारती के चरणों में कई कवितायें निवेदित करते गये। एक हास्य कवि ने नेता पहाड़ा पढ़ा। नेता एकम नेता, नेता दूनी चोर, ….। इसके बाद पुलिस पर भी एक हास्य कविता पढ़ी। मुझे लगा कि आज अगर नेता, पुलिस पर कविता लिखना बैंन हो जाये तो आधे हास्य कवि या तो बेरोजगार हो जायें। या फ़िर वे आपातकाल के कवियों की तरह बतायें ये देखो ये सूरज नहीं नेता है, ये फ़ूल नहीं गुंडा है, चांद यहां दरोगा का प्रतीक है, चांदनी का मतलब जनता है आदि-इत्यादि, वगैरह-वगैरह। सुना है आपातकाल में तमाम लोगों ने इस तरह की कवितायें लिखीं जिनके व्यापारियों के खातों की तरह दो मतलब होते थे। एक जो सारी जनता समझती थी दूसरा वह जिसे सिर्फ़ वे समझते थे। अपना मतलब उन्होंने दुनिया भर को आपातकाल के बाद बताया और अपने लिये क्रांतिकारी कवि का तमगा गढ़कर खुदै ग्रहण कल्लिया।
इरफ़ान झांस्वी रिटायर हो गये हैं। वे भी आये थे। उनकी ये पंक्तियां मुझे याद हैं:
संपेरे बांबियों में बीन लिये बैठे हैं,
सांप चालाक हैं दूरबीन लिये बैठे हैं।
उन्होंने संचालन किया और कुछ एक गीत सुनाया। जिसमें कल्पना के पत्ते पर शब्दों के दोने में कुछ भाव परोसने की बात थी। कवि की भूख इन्हीं से मिटती है भाई।

एक कवियत्री ने कुछ सुन्दर गीत सुनाये। सोचा कि उनका मोबाइल वीडियो बना लूं लेकिन फ़िर यह सोचकर कि मोबाइल हिलेगा, ज्यादा दिखेगा कम आइडिया मटिया दिये।

सिद्ध कवियों के बाद काव्य पाठ प्रतियोगिता शुरु हुयी। बीस-बाइस प्रतिभागी थे। वे अपनी या अपने पसंदीदा कवियों की रचना सुना रहे थे। पसंदीदा कवि की रचनायें तो याद होनी चाहिये लेकिन यहां सारी पसंद कागजों पर थी। प्रतिभागी लोग राष्ट्राध्यक्षों के संबोंधन की तरह कवितायें प्रसारित कर रहे थे। आधे के विषय थे कि हिन्दी हमारी राजभाषा है। इसको सम्मान दिला के रहना है। कुछ बच्चों ने दहेज की बुराई की। कुछ ने पाकिस्तान को भी गरियाया। पाकिस्तान को गरियाते हुये एक ने तो इत्ती जोर से कविता पढ़ी कि मुझे लगा कि अगर पाकिस्तान कहीं उसको सुन लेता तो एकाध फ़ुट अफ़गानिस्तान की तरफ़ सरक जाता। मुझे अपने शाहजहांपुर के ख्यालबाज लल्लनजी याद आये जो कहते हैं:
फ़ूंक देंगे पाकिस्तान लल्लन,
दो सौ ग्राम पीकर देखो।
मुझे पक्का यकीन हैं कि पाकिस्तान में भी हिन्दुस्तान के विरोध में वीर रस की कवितायें लिखीं और चिल्लाई जाती होंगी। सोचता हूं कि क्या ही अच्छा हो कि दोनों देश की वीर रस की कविताओं की ऊर्जा को मिलाकर अगर कोई टरबाइन चल सकता तो इत्ती बिजली बनती कि अमेरिका चौंधिया जाता। ऐसा हो सकता है। दोनों देशों के वीर रस के कवि जिस माइक से कविता पाठ करें उसके आवाज बक्से के आगे टरबाइन फ़िट कर दी जाये। इधर कविता शुरू हो उधर टरबाइन के ब्लेड घर्र-घर्र करके चलने लगें और दनादन बिजली उत्पादन होने लगे। बिजली के तारों पर सूखते कपड़े जलकर खाक हो जायें। हर तरफ़ रोशनी से लोगों की आंखें चमक जायें।
इस बीच पांच बजे वाला हूटर बजा। सारी महिला श्रोता अपने-अपने झोले उठाकर घर की तरफ़ चल दीं। इससे एक बार फ़िर सिद्ध हुआ कि कविता का श्रोता कविता केवल फ़ुरसत में ही सुनता है। उनकी छुट्टी हो गयी वे चलीं गयीं। कुछ देर बाद आदमियों वाला हूटर बजा वे भी चल दिये। हाल में केवल हम और कवि बचे थे। कवि अपनी कवितापाठ के परिणाम सुनने थे। हमें सुनाने थे। हमारी कापी में सभी कवियों के लगभग एक जैसे नंबर थे। वो तो भला हो हमारे हिंदी अधिकारी का जिन्होंने कुछ मूल्यांकन सरीखा कर रखा था। एक कविता हमें कुछ ठीक सा लगी लेकिन वो इनाम से गायब थी। हमने अपने प्रभाव का उपयोग करके उसके दो नंबर बढ़वाये और उसको तीसरे नंबर का संयुक्त विजेता घोषित किया। हर जगह इनाम इसी तरह से बंटते हैं। अपनी पसंद को कोई निर्णायक कैसे उपेक्षा कर सकता है।

परिणाम सुनते ही हाल खाली हो गया।

वापस आकर पता चला कि हमारी अनुपस्थति के बावजूद वह मीटिंग संपन्न हुई जिसमें हमारी भागेदारी जरूरी थी। न सिर्फ़ मीटिंग हुय़ी बल्कि निर्णय भी हुये। हम होते तो शायद बहसबाजी में समय बिता देते।

इस तरह कविताओं के बीच में बीता एक दिन।
सूचना: ये दोनों चित्र फ़्लिकर से। ऊपर वाला चित्र राकेश खंडेलवाला जी का है-साथ में कवि कुंवर बेचैन। नीचे वाला चित्र नेट पर मिला जिसमें आज से शायद पांच साल पहले की सूचना है जिसमें कहा गया है नेट पर हिंदी ब्लागरों के भरोसे है।

मेरी पसंद

खाली दिन
स्साला टीन के डिब्बे सा खाली दिन
फिर आ गया
सूरज को भी साथ लाया है!
फिर वही
गर्मी, खालीपन और घुटन
धीरे-धीरे
दिन और सूरज
दोनों चढ़ आये
मैंने भी
तापमान नियंत्रित कर परदे गिरा
दोनों को हटा दिया।

यह कविता और फ़ोटो मनोज अग्रवाल का है। मनोज हमारे तीस साल से भी ज्यादा पुराने दोस्त हैं। इतने साल बीतने के बाद भी वे हमको उतना ही गैरजिम्मेदार और नाकारा मानते हैं जितना कालेज के दिनों में समझते थे। यह सच्ची दोस्ती है जिसमें समय के साथ दोस्त बदलते नहीं। अकल से जहीन, शकल से हसीन मनोज ने अपनी कुछ कवितायें मुझे कुछ दिन पहले भेजी देखने के लिये। हमने उनमें से एक यहां सटा दी। पहले भी एक कविता पोस्ट की थी उनकी। आगे भी करने का इरादा है।

38 responses to “कविताओं के बीच में एक दिन”

  1. sonal rastogi
    संपेरे बांबियों में बीन लिये बैठे हैं,
    सांप चालाक हैं दूरबीन लिये बैठे हैं।
    gazab… :-)
    sonal rastogi की हालिया प्रविष्टी..नीला उजास
  2. मनोज कुमार
    जबलपुर में और इरफ़ान झांसवी के संचालन में जबलपुर से बाहर भी कई कवि-गोष्ठियों में शिरकत करने का मौक़ा मिला है। बांबी, बीन और दूरबीन के कमाल का साक्षी रहा हूं।
    हिंदी पखवाड़े का सहज हास्य के साथ जो उद्घाटन आपने किया है, वह बड़ा ही रोचक लगा। बीच-बीच में ली गई आपकी कल्पना की उड़ान ने इस लेख में जान फूंक दी है।
    मुझे यह लेख आला दर्ज़े का लगा। पर्रफ़ेक्ट!!
    मनोज कुमार की हालिया प्रविष्टी..ख़्वाजा हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
  3. सन्तोष त्रिवेदी
    चकाचक है….!
    …कवियत्री को कवयित्री पढ़ा जाय.
    सन्तोष त्रिवेदी की हालिया प्रविष्टी..गुरु,चेला और गुरुघंटाल !
  4. ashish rai
    हा हा , सही है , देश वैसे भी उर्जा संकट से गुजर रहा है , एक प्रस्ताव भेजना चहिये संस्कृति मंत्रालय को उर्जा मंत्रालय को पाकिस्तान से बात करने के लिए इस बारे में . ग़ज़ब .
  5. देवेन्द्र पाण्डेय
    आपने इतने रोचक ढंग से लिखा कि पूरा पढ़ गया और अच्छा भी लगा। मेरी पसंद कौन सी है? मित्र का चित्र या कविता? समझ नहीं पाया।:)
  6. वीरेन्द्र भटनागर
    सरकारी कार्यालयों में ऐसे अवसरों पर जैसी रस्म अदायी की जाती है उसका बहुत सही चिञण आपने किया है। मेरे संस्थान में ऐसे आयोजनों में अधिकाधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये सभी यूनियनों, एसोसियेशनों आदि के पदाधिकारियों को भी निमन्ञित किया जाता था ताकि हॅाल भरा-भरा दिखे तथा अधिकांश उपस्थित लोग़ों के लिये मुख्य आकर्षण, कार्यक्रम के अन्त में मिलने वाला बढ़िया जलपान था ।
  7. Alpana
    हिंदी दिवस की तैयारियाँ ….यहाँ हमने भी शुरू कर दी हैं.
    ‘कढ़ी ‘और ‘कड़ी’वाला किस्सा मजेदार लगा….वैसे अमूमन आम आदमी यही समझता है कि सम्मेलनों में हर ४-५ पंक्तियों के बाद वाह-वाही करनी होती है या वाह-वाही-करने की रवायत है.
    राजभाषा पखवाड़े के उद्घाटन की अच्छी लगी रिपोर्ट.
    ——————–
    कुंवर बैचेन जी को देखकर अच्छा लगा.मेरे प्रिय कवियों में से एक हैं.
    वे दिन याद आये जब एक कविता प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए उनका मार्गदर्शन लिया था.
    ……………………
    ‘सारी महिला श्रोता अपने-अपने झोले’
    !झोले?मुझे लगा आज कल झोलों का रिवाज़ खतम हो गया है.
    ‘पर्स’ का ही चलन है ऐसा ज्ञान था और झोले पर कवि /लेखक /पत्रकार का एकाधिकार होता है.
    ——————————-
    Alpana की हालिया प्रविष्टी..दुनिया की सबसे बड़ी ……..
  8. Kajal Kumar
    सरकारी हि‍न्‍दी में भी चहुँ ओर ठस्‍से की सूजन ही सूजन है
    Kajal Kumar की हालिया प्रविष्टी..कार्टून :- ना, नहीं दूँगा..
  9. प्रवीण पाण्डेय
    सच्चे पारखी तो मित्र ही होते हैं, हीरा परख ही लेते हैं।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..हे प्रसन्नमना, प्रसन्नता बाँटो न
  10. arvind mishra
    चित्र लीजेंड देकर अच्छा किया आपने -मैंने तो सोचा था पूरी पोस्ट पढ़ जायेगें और यह विवरण नहीं आया और इसी बात को लेकर पूरी पोस्ट भी पढ़ गया :-)आखिर में राहत मिल ही गयी !
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..छूटी काशी, अब ब्लागिंग के ब्रह्मचर्य की ओर …….
  11. Abhishek
    टर्बाइन वाला कांसेप्ट मस्त है :)
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..संसकीरित के पर्हाई (पटना १५)
  12. amit srivastava
    आपके कारखाने में हूटर ‘जेंडर बायस’ क्यों है ?? महिलाओं के लिए अलग आवाज़ और पुरुषों के लिए अलग | ब्लॉग-जगत का कोई महिला प्रहरी सुन लेगा तो हूटर को संकट का सामना करना पड़ सकता है |
    amit srivastava की हालिया प्रविष्टी.." हँसना मना है…….."
  13. aradhana
    सहज हास्य बोध आपकी पोस्ट में सर्वत्र छाया हुआ है. आद्यन्त वर्णन और कल्पना का अद्भुत सामंजस्य है, जो कि पाठक को बाँधे रहता है और हास्य रस से सराबोर कर देता है…;) (मजाक है, इसको सीरियसली ना लिया जाय)
    पोस्ट सच में अच्छी है. कुछ लाइनें तो एकदम ‘हँसी का बम’ हैं….
    -”उन्होंने संचालन किया और कुछ एक गीत सुनाया। जिसमें कल्पना के पत्ते पर शब्दों के दोने में कुछ भाव परोसने की बात थी। कवि की भूख इन्हीं से मिटती है भाई।”
    -”दोनों देश की वीर रस की कविताओं की ऊर्जा को मिलाकर अगर कोई टरबाइन चल सकता तो इत्ती बिजली बनती कि अमेरिका चौंधिया जाता।” इ वाला पैराग्राफ पढ़कर तो हम इत्ता हँसे कि हमारी गोली आकर हमें सूँघने लगी कि कहीं कोई दौरा तो नहीं पड़ गया है :)
    aradhana की हालिया प्रविष्टी..Freshly Pressed: Editors’ Picks for August 2012
  14. सतीश पंचम
    बहुत ही शानदार पोस्ट….एकदम मजईत :-)
    सतीश पंचम की हालिया प्रविष्टी..‘स्वर्ग’ में भी मैगी !
  15. blog-pathak
    नेता तिया गुंडा औ नेता चौके डाकू नेता पंचे कल्मारी नेता छके राजा नेता सत्ते पवार….अट्ठे मनमोहन नवें औ दशे ‘सोनिया’…………….
    प्रणाम.
  16. shefali pande
    पाकिस्तान को गरियाते हुये एक ने तो इत्ती जोर से कविता पढ़ी कि मुझे लगा कि अगर पाकिस्तान कहीं उसको सुन लेता तो एकाध फ़ुट अफ़गानिस्तान की तरफ़ सरक जाती …..
    इधर कविता शुरू हो उधर टरबाइन के ब्लेड घर्र-घर्र करके चलने लगें और दनादन बिजली उत्पादन होने लगे। बिजली के तारों पर सूखते कपड़े जलकर खाक हो
    ……पढ़ कर आनंद आ गया |
  17. सतीश चंद्र सत्यार्थी
    “पाकिस्तान को गरियाते हुये एक ने तो इत्ती जोर से कविता पढ़ी कि मुझे लगा कि अगर पाकिस्तान कहीं उसको सुन लेता तो एकाध फ़ुट अफ़गानिस्तान की तरफ़ सरक जाता। ”
    इसको पढ़के कल हम मेट्रो में इत्ती जोर से हँसे कि आसपास वाले मुझे ही देखने लगे… ;)
  18. देवांशु निगम
    फ़ूंक देंगे पाकिस्तान लल्लन,
    दो सौ ग्राम पीकर देखो।
    भौकाल है !!!!
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..अजनबी, तुम जाने पहचाने से लगते हो !!!
  19. Gyandutt Pandey
    हम तय नहीं कर पा रहे कि बीन खरीदें कि दूरबीन!
    अरविन्द मिश्र जी ने क्या खरीदा होगा?
    Gyandutt Pandey की हालिया प्रविष्टी..खजूरी, खड़ंजा, झिंगुरा और दद्दू
  20. vishun dayal
    सर आज हमारे एहन पर भी काव्य पाठ की प्रतियोगिता थी हिंदी पखवाड़े के लिए हमारी ईमानदारी का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है की कविता के जज के लिए हिंदी ट्रांसलेटर एक कनिस्थ कार्य प्रबंधक ऐसे जिनकी सिक्षा क्लास सात तक है
    और वे कविता के भाव रचना और शैली के आधार पर मूल्याकन करने के लिए आये थे जो परिणाम श्रोता के तौर पर हमने सोचा था वास्तविक परिणाम उसके उलट आया था शायद हमारे यहाँ पर भी आपके यहाँ वाला ही तरीका आमल मई लाया गया होगा
  21. ghughutibasuti
    शेफाली जी से सहमत. मुझे भी आनन्द आ गया. यह टरबाईन वाला आइडिया पेटेंट करवा लीजिए.
    घुघूतीबासूती
    ghughutibasuti की हालिया प्रविष्टी..टु सर, विद लव
  22. घनश्‍याम मौर्य
    ऑफिशियल लैंग्‍वेज वीक का ऑंखों देखा हाल पढकर अच्‍छा लगा।
  23. shikha varshney
    शानदार , जानदार ,चकाचक .
  24. mahendra mishra
    संपेरे बांबियों में बीन लिये बैठे हैं,
    सांप चालाक हैं दूरबीन लिये बैठे हैं।
    रोचक अभिव्यक्ति … आभार
  25. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
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