Tuesday, January 08, 2013

धूप खिली उजाले के साथ

http://web.archive.org/web/20140419155449/http://hindini.com/fursatiya/archives/3828

धूप खिली उजाले के साथ

1. जाड़े में धूप
आहिस्ते से आती है,
धीमें-धीमे सहमती हुई सी।
जैसे कोई अकेली स्त्री
सावधान होकर निकलती है
अनजान आदमियों के बीच से।
धूप सहमते हुये
गुजरती है चुपचाप
कोहरे, अंधेरे और जाड़े के बीच से।
2. बहुत जाड़े में
धूप का स्कूल
बंद हो जाता है।
वह आराम करती होगी,
रजाई में दुबकी,
चाय पीती, टीवी देखती हुई।
अचानक दोपहर में
कभी भेज दिया जाता होगा
धरती पर, उजाले के साथ।
कुनमुनाती धूप
बेमन, अनमनी सी
निकलती होगी धरती के लिये।
देखकर लगता होगा
स्कूल बंद होने पर कोई बच्चा
ट्य़ूशन पढ़ने जा रहा है।
3. धूप को घेर लिया
पहुंचते ही धरती पर
अंधेरे,कोहरे और जाड़े ने।
भाई कहा, हाथ जोड़े
गिड़गिड़ाई, दुहाई दी,
लेकिन कोई बदमाश माना नहीं।
अचानक सूरज ने देखा
बच्ची को अपनी ऊपर से
भेजा फ़ौरन उजाले को।
उजाले ने आकर
हाथ-पांव तोड़े अंधेरे के,
तार-तार किया कोहरे को।
भागा जाड़ा सर पर धरे पांव,
कोहरा तिड़ी-बिड़ी हुआ,
अंधेरा शहर पार।
धूप खिली
उजाले के साथ
किसी निष्कलुष मुस्कान सी।
4. तुम्हारी याद
गुनगुनी धूप सी पसरी है
मेरे चारो तरफ़।
कोहरा तुम्हारी अनुपस्थिति की तरह
उदासी सा फ़ैला है।
धीरे-धीरे
धूप फ़ैलती जा रही है
कोहरा छंटता जा रहा है।

18 responses to “धूप खिली उजाले के साथ”

  1. akash
    चारों ही टुकड़े बहुत शानदार हैं |
    सादर
    akash की हालिया प्रविष्टी..दादा – एक गीत
  2. वीरेन्द्र कुमार भटनागर
    ठिठुरते जाड़े में गुनगुनी धूप सी आपकी यह कविता, और इसी बहाने उनकी याद – क्या बात है !
  3. shikha varshney
    ओह गज़ब ..गज़ब.. गज़ब..जाड़े में एकदम कुनकुनी धूप सी कवितायें हैं.
    shikha varshney की हालिया प्रविष्टी..एक कैपेचीनो और "कठपुतलियाँ"
  4. ajit gupta
    धूप तो तीव्रता के साथ आ रही है लेकिन ठण्‍डे घर तक इसकी पहुंच नहीं है। बहुत अच्‍छी रचना है।
    ajit gupta की हालिया प्रविष्टी..आपको अभी तक याद है आपकी छत?
  5. देवेन्द्र पाण्डेय
    बढ़ता ही जा रहा है दिन-दिन
    कुहरे का आतंक!
    सूरज! तुम कब आओगे?
    तुम नहीं आये तो समझो आग लगेगी धरती पर..
  6. देवांशु निगम
    गज़ब , बहुत बढ़िया :) :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..मारे डर के हालत खराब, और लोग बोलते डर नहीं लगता !!!!
  7. Pradip Kumar
    आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (09-01-13) के चर्चा मंच पर भी है | अवश्य पधारें |
    सूचनार्थ |
  8. सलिल वर्मा
    चारों टुकड़े हमारे लिए तो कलेजे के टुकड़े हैं.. कमाल की बात कही है, कमाल का साम्य प्रस्तुत किया है सुकुल जी!! बधाई!!
    सलिल वर्मा की हालिया प्रविष्टी..इन्साफ का तराजू
  9. Vinay Prajapati
    बहुत सुंदर काव्य!
    Vinay Prajapati की हालिया प्रविष्टी..वह लड़की कौन थी (हासिल)
  10. प्रवीण पाण्डेय
    धूप के साथ साथ मन भी खुल जाता है, बादलों के बाहर चला आता है।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..दिल छीछालेदर
  11. अलावलपुरिया
    बहुत सुन्दर चित्र खींचे हैं आपने जाड़े की धूप के अपनी कविता में . एक दम ताजी इमेजरी है .पढ़ के यहाँ बर्फानी मौसम में बैठे हुए भी थोड़ी गर्माहट पहुँच ही गयी हम तक.
    अलावलपुरिया की हालिया प्रविष्टी..चलो देखते हैं
  12. Anonymous
    बहुत शानदार क्षणिकाएं । खास तौर पर पहली और चौथी ।
  13. गिरिजा कुलश्रेष्ठ
    बहुत ही सुन्दर क्षणिकाएं । विशेष रूप से पहली क्षणिका ।
  14. shefali
    वैसे तो सभी पर, अंतिम वाली बहुत खूबसूरत लगी ….
  15. Rajiv agarwal
    बहुत अच्छा कबिता है सर
  16. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] धूप खिली उजाले के साथ [...]
  17. धूप अलसाई सी लेटी है
    [...] धूप देखकर अपनी तुकबंदी/कविता याद आती है: जाड़े में धूप आहिस्ते से आती [...]
  18. Anonymous
    धूप ओडनी है गरीब की जाड़ों मे….

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