Monday, December 31, 2012

स्टेटस-2012

टैगिंग फ़ेसबुक में विचरते लोगों में सुरक्षा का एहसास देती है।(02-01-12)

टैगिंग से लोगों को सामूहिकता का एहसास होता है। लगता है इत्ते लोग हैं साथ में। सूचना सुरक्षित रहेगी।  (02-01-12)

टैग करने वाले बेचारे सोचते हैं कि अगर कई लोगों को फ़ेसबुक पर टैग करके जुलूस न बनाया तो सूचना अकेली पड़ जायेगी।  (02-01-12)

फ़ेसबुक की टैगिंग भी न हमको ऐसी लगती है जैसी किसी लचर सी घटना में पूरे गांव को किसी मुकदमें में नामजद कर दिया गया हो।  (02-01-12)

दो रुपये मतलब चार अखिलभारतीय हैप्पी न्यू ईयर। लोकल करते तो दस पैसे और लगाकर सात दोस्तियां निभ जातीं।(02-01-12)

देश के सब लोग सचिन के फ़ालोवर हो गये। ऐन टाइम पर क्लिक नहीं करते। (02-01-12)


शायद बीस-पचीस साल बाद कोई जौहरी कहे- ये हीरा देखिये।एक ही बचा है। थोड़ा मंहगा है क्योंकि इसमें पेट्रोल की पालिस की गयी है। (31-05-2012)

ट्विटर/फ़ेसबुक की दुनिया का रोलमाडल चंड़ीगढ़ का रॉकगार्डन है। कूड़ा अभिव्यक्ति को सलीके से पेश किया जाना इसकी ताकत है।(31-05-2012)

फ़ेसबुक/ट्विटर पर आपके मित्रों की संख्या आपकी किसी भी सीधी बात को टेड़े ढंग से कह सकने की काबिलियत के समानुपाती होती है। (31-05-2012)

समझदार व्यक्ति अपनी बेवकूफ़ी के साथ वैसा ही व्यवहार करता है जैसा पुराने जमाने के रईस अपनी अवैध सन्तान से करते थे। (31-05-2012)

” जाने-अनजाने कहीं कोई बेवकूफ़ी न हो जाये” का असुरक्षा भाव हर होशियार व्यक्ति का पीछा वोडाफ़ोन वाले कुत्ते की तरह करता रहता है। (31-05-2012)

किसी भी बात पर फ़ट से सहमत हो जाना समझदार होने का साइनबोर्ड है। (31-05-2012)

दुनिया में बेवकूफ़ी न होती तो अकलवाले के हाल कौड़ी के तीन होते। दुनिया का सारा कारोबार लोगों की बेवकूफ़ी के सहारे चल रहा है।  (31-05-2012)

शुद्ध बेवकूफ़ कभी अपने को ज्ञानी कहलाने के फ़ेर में नहीं पड़ता। शुद्ध बेवकूफ़ पवित्रात्मा होता है। निर्मल। निडर। बेखौफ़।

ट्विटर और फ़ेसबुक की दुनिया बड़ी तेज चलती है। जरा सा चूके नहीं कि अगला आपकी सोच से बड़ी चिरकुटई की बात कहकर चला जाता है। (29-05-12)

सोचते हैं कोई बहुत बड़ी बेवकूफ़ी की बात कह डालें लेकिन फ़िर आलस्य हावी हो जाता है। इस चक्कर में दूसरे बाजी मार ले जाते हैं।  (29-05-12)

कवि ने कविता की पहली पंक्ति का बिम्ब उठाकर दूसरी में धर दिया! पहली पंक्ति ने भागकर कवि के खिलाफ़ हेरा-फ़ेरी और उठाईगिरी की रिपोर्ट लिखा दी। (29-05-12)

वो कवि जो कह रहा था कि महाकाव्य लिखेगा
एक मुक्तक की वाह-वाह में,वो पूरा बहक गया। (29-05-12)

कविता हमारी समझ सके, ये जमाने में दम नहीं ,
बड़े पेचो खम हैं इसमें, किसी की जुल्फ़ों से कम नहीं।(29-05-12)

एक लाइन से इधर से आये
एक लाइन उधर से आये
कालजयी कविता रच जाये!(29-05-12)

रात एक स्टेटस दिमाग में आया। हमने कहा अब ट्विट करेंगे। वो अब दिख नहीं रहा है कहीं दिमाग में। लगता है रूठ कर कहीं छिप गया। नटखट स्टेटस! (22-06-12)

हिंदी ब्लॉगिंग की सबसे मासूम अदाओं में से एक है-"सबसे पहला होने की ललक"। लोग किसी न किस कोण से सबसे पहला होने की मोहर लगाये घूमते रहते हैं। (20-06-12)

भारत में रहने का यह फ़ायदा हुआ कि कम से कम कोई पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद के लिये नाम तो नहीं उछालेगा कोई।  (20-06-12)

पाकिस्तान भारत का सच्चा अनुयायी है। यहां अगला राष्ट्रपति कौन बनेगा की तर्ज पर वहां सवाल उठ गया - अगला प्रधानमंत्री कौन? (19-06-12)

कविता के बिम्ब बड़े नखरेबाज होते हैं। हरजाई टाइप। एकदम निर्दलीय विधायक की तरह होते हैं बिम्ब – जहां सत्ता दिखी उससे संबंद्ध हो जाते हैं। (19-06-12)

कवि: कविता लिखता तो मैं हर रस में हूं श्रंगार, वीर रस, वात्सल्य रस आदि लेकिन सब दोस्त उनको हास्य रस की ही तरह पढ़ते हैं।(19-06-12)

कवि - बेटी उपमा! जमाना बड़ा खराब है। अकेले इधर-उधर मत जाया करो! सत्यमेव जयते देखने भर से लोगों की नीयत ठीक नहीं हो जाती। (19-06-12)

कवि की सबसे बड़ी दौलत उसके बिम्ब होते हैं। कवि बिम्बों को अपने सीने से चिपकाकर रखता है जैसे मां अपने बच्चे को संभालती है। (19-06-12)

हमने गर्मी पर कविता लिखने के तमाम बिम्ब संजोये थे। कल अचानक हुई बरसात में सारे बिम्बों पर पानी फ़िर गया। (19-06-12)

सुबह से देखते-देखते समय न जाने कहां गायब हो गया बिना बताये। दिख नहीं रहा ! मिले तो हुलिया टाइट करते हैं समय का!  (15-06-12)

हमारा ट्विटर खाता हैक होने के चलते हमारे अकाउंट से अंग्रेजी फ़ूट पड़ी। ट्विटर खाता अपहरण का साइड इफ़ेक्ट है यह।  (15-06-12)

अभी सूचना मिली कि हमारा ट्विटर खाता हैक हो गया। क्या इसमें भी कोई फ़िरौती-विरौती मांगने का चलन है? लेकिन ये तो चालू है!(15-06-12)

मन तो करता है कि देश के बारे में खूब सारी चिंतायें करूं लेकिन क्या करूं दफ़्तर का काम बीच में आ जाता है। देश छोड़ दफ़्तर देखना पड़ता है। (24-07-12)

मामला कोई हो, मुद्दा कैसा भी हो , भले ही आपने मेरे मन की ही बात कही हो लेकिन हम मिशनरी आलोचक हैं! आपकी आलोचना करना हमारी मजबूरी है।  (24-07-12)

किसी देश, समाज और संस्कृति का उत्थान और पतन क्या महज सांस्कृतिक ऊर्जा (स्थितिज/गतिज ऊर्जा) का रूपान्तरण है?(24-07-12)

सुबह हो गयी। दू ठो चाय भी पी लिये । अब सोचते हैं देश-काल पर चिंतन शुरु किया जाये। देखते हैं आज कौन समस्या ’टाप’ पर है, उसी को फ़रियायेंगे। (20-07-12)

सुबह भी क्या अजब है। रोज हो जाती है! दफ़्तर जाना होगा अब तो! (19-07-12)

कुछ लोग फ़ेसबुक पर अपने दोस्तों के स्टेटस इतनी तेजी से ’लाइक’ करते हैं मानों बिजली वाले रैकेट से पटापट मच्छर मार रहे हों।  (11-07-12)

अगर फ़ेसबुक न होता तो तमाम लोग अपने निठल्लेपन के चलते निपट गये होते। (08-07-12)

"कविता रचना मेरे लिये प्रसव पीड़ा से गुजरने जैसा है" -एक कवि!
"आपने परिवार नियोजन अपनाया होता तो हम दोनों इतना पीड़ित न होते"- एक पाठक! (08-07-12)

एक कार्टून की प्रसिद्धि से जलकर दूसरे कार्टून ने उसको कोसा- भगवान करे ये विवादास्पद हो जाये। (08-07-12)

घर से निकलने वाले हैं। सोच रहे हैं स्टेटस में घर स्टेशन जाते हुये आटो का फोटो सटायें कि स्टेशन पर रेलगाड़ी का। बताइये संतजन!(11-08-12)

भारतीय हॉकी टीम ने ओलंपिक में पसीना बहाकर अपनी स्थिति नींव की ईंट सरीखी बनाई है। अब उसे वहां से कोई माई का लाल हिला नहीं सकता।(11-08-12)

कल अपन तो दोस्तों को बिना गुडनाइट कहे सो गये। दोस्त क्या सोचते होंगे। खुश ही होंगे कि एक स्टेटस कम हुआ। लाइक करने से बचे।(13-08-12)

आंदोलनों और क्रांतियों का समय प्रबंधन अच्छा होना चाहिये। कुछ ऐसा कि हर वीकेंड में एक क्रांति की जा सके। साल में बावन क्रांतियां।(13-08-12)

जब गीता तक में कहा गया है कि हम कुछ साथ लेकर नहीं आते न कुछ साथ लेकर जाते हैं फ़िर लोग बिना बात के कुछ करोड़ इधर-उधर करने की बात को लेकर हल्ला किसलिये मचाते हैं?- एक जनप्रतिनिधि   (17-10-12)

अभय कुमार दुबे जी ने एन.डी.टी.वी. प्राइम टाइम में कहा- राजनेताओं को बिजनेस और राजनीति को अलग-अलग रखना चाहिये। कोई राजनेताजी सुनेंगे तो यही कहेंगे- ये तो मछली और पानी को अलग-अलग रखने जैसी बात हुई।(17-10-12)

केजरीवाल जी और राजनीतिक पार्टियों में भाषाई मतभेद दिखते हैं। जिसको केजरीवालजी ’ राजनीतिक पार्टियों की मिलीभगत ’ मानते हैं उसे राजनीतिक पार्टियां शायद ’शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व’ मानती हैं।(17-10-12)

केजरीवाल जी के काम करने के तरीके से पता चलता है कि वे पुराने नौकरशाह हैं। जैसे नौकरशाह रोज फ़ाइलें निपटाते हैं वैसे ही वे रोज एक नया घपला निपटा देते हैं।(17-10-12)

अपने देश के जनप्रतिनिधियों को मीडिया की लप्पेबाजी और माननीय अदालतों की गति पर अखंड आस्था है इसीलिये जिस किसी पर भी कोई आरोप लगता है वह तड़ से बयान जारी कर देता है- आरोप साबित होने पर राजनीति छोड़ दूंगा।(15-10-12)

कल पता चला कि एक एन.जी.ओ. को 71 लाख मिले। उसने 77 लाख बांटे। उसके बाद ही मुझे एहसास हुआ कि एन.जी.ओ. वाले हमेशा क्यों झल्लाये रहते हैं। घाटा किसी को भी चिड़चिड़ा बना सकता है।  (15-10-12)

सिर्फ़ स्त्रियां जानती हैं कि किसी जीव को जन्म या पुनर्जन्म कैसे दिया जाता है? -- उदयप्रकाश (13-10-12)

बड़ी आपदाओं से सामना होने पर स्त्रियां सदैव पुरुषों से बहादुर साबित होती हैं।- मो.यान.  (13-10-12)

आजकल देश में घपले-घोटाले फ़ेसबुक स्टेटस की तरह फ़टाफ़ट अपडेट होने लगे हैं। (09-10-12)

सुना है तुम्हारी बेटी ’अभिव्यक्ति’ को फ़िर किसी ने छेड़ा।
हां बहन, हर तरफ़ लफ़ंगे भरे पड़े हैं। सोचती हूं किसी गुंड़े को सिक्योरिटी के लिये किराये पर रख लूं! (25-11-12)

अबे, तुमको हुजूर माईबाप, माफ़ करें, जय हो, जिन्दाबाद, आप देवता हो, राजा हो बोलने की पूरी छूट है- और कित्ती बोलने की आजादी चाहिये तुमको? (21-11-12)

इन दोनों लौंडों को लॉक अप में डाल दो। दरोगा जी बोले थे उठाकर लाने को। उनके पास किसी नेता का फोन आया था। दफ़ा-वफ़ा मुंशी जी आकर बतायेंगे। (21-11-12)

हर गाड़ी के साथ एक पोर्टेबल ओवरब्रिज होना चाहिये। जहां जाम में फ़ंसे गाड़ी उप्पर से निकाल ली।- जाम में फ़ंसे एक आम आदमी का बयान। (19-11-12)

Auto vaale ko hadkane ke liye varta shuru . Ek ne pan masala thooka. Ham usase disccuss karane lage ki peek se parabola bana ya eclips.  (19-11-12)

abhi abhi ek auto vale ne left se overtake kiya hai. Sochate hain usako hadkane ke pahale isko tweet kar den.(19-11-12)

कभी-कभी अनजाने में बड़ी चूक हो जाती है। आज सुबह बिस्तर पर बैठकर आधा घंटा फ़ेसबुकियाने के बाद सोफ़े पर आकर सर्फ़ियाने में इत्ता मशगूल हो गये कि अपने स्टेटस में इस घटना का जिक्र करना भूल गये। क्या किया जाये अब जो हुआ सो हुआ।  (10-11-12)

आज मेरा मन सहमत होने का हो रहा है। कोई कुछ कहे इससे पहले आपै कुछ कह डालिये ताकि हम फ़टाक से सहमत हो सकें -बवाल कटे।(21-12-12)

कल भारतीय क्रिकेटरों का खेल देखकर लगा कि अगर ये अपनी पर उतर आयें तो मैच ड्रा तक करा सकते हैं।(16-12-12)

पिछले आठ साल में भारत की क्रिकेट टीम भारत में किसी विदेशी टीम से नहीं हार पाई तो इसमें भारत की टीम का क्या दोष? हमने किसी को हराने को मना किया था क्या? दूसरे की कमजोरी के लिये अपनी टीम को दोष देने की आदत ठीक नहीं।(13-12-12)

जिस तेजी नामचीन साहित्यकारों पर नकल के आरोप लग रहे हैं उससे हमें तो डर लगने लगा है कि कहीं हम चंद मौलिक लेखकों में न गिने जाने लगें। मेरा डर तब और बढ़ गया जब हमारे एक मित्र ने कहा कि वज्र मूर्ख ही नितांत मौलिक होता है।  (09-12-12)

काटजू जी ने कल कहीं कहा कि नब्बे प्रतिशत भारतीय मूर्ख होते हैं। उससे लोग भन्नाये हुये हैं। मुझे लगता है कि काटजू जी की हिंदी उत्ती मजबूत नहीं है। वे नब्बे प्रतिशत भारतीयों को भोला-भाला कहते तो लोग उनकी बात का समर्थन करते। बेवकूफ़ को अगर भोला कहा जाये तो वो खुश रहता है।(09-12-12)

बीसीसीआई को पैसे की कमी तो है नहीं। उसको अगर सच में जीतनी की ललक है तो टींम में खिलाड़ी भले यही रखें लेकिन खेलने का काम कुछ खेलने वालों को आउटसोर्स कर देना चाहिये।  (09-12-12)

भारत की क्रिकेट टींम सिर्फ़ खेलने के लिये के खेलती है। देश के लोग न जाने क्यों उसके हार जाने पर इत्ता परेशान होते हैं। आखिर खेलभावना भी तो कोई चीज होती है।(09-12-12)

वैसे तो भारत की क्रिकेट टीम इंग्लैंड को आराम से हरा देती लेकिन जब उसको पता चला कि आस्ट्रेलिया ने भारत को हाकी में हरा दिया तो भारतीय क्रिकेट टीम हाकी टीम के समर्थन में हार गयी। ये है आपस में एकजुटता का भाव।(09-12-12)

अंग्रेज बड़े बेमंटे हैं। मीडिया की मांग पर भारत की टीम अंग्रेजों की टीम की पुंगी बजा रही थी । इस बीच अंग्रेजों ने खेल शुरु कर दिया। धोखे में खूब रन बना डाले। भारत को हरा दिया। बताओ कहीं ऐसा करना चहिये उनको खेल में। चीटर कहीं के ।  (09-12-12)

भारत की क्रिकेट टीम इंगलैंड की टीम से बहुत अच्छी है। लेकिन क्या हुआ कि मीडिया के बहकावे में आकर भारत की टीम इंगलैंड की टीम की पुंगी बजाने में बिजी हो गयी इसबीच इंगलैंड ने भारत को काफ़ी रन से हरा दिया।  (09-12-12)

देश में विकास की इत्ती योजनायें चल रही हैं कि आम आदमी की नींद उड़ गयी है। बेचारा डरा हुआ कि कहीं नींद में ही उसका विकास न हो जाये। पता चला सुबह उठा तो विकसित हो गया है और कोई उसको पहचान नहीं पा रहा है।(09-12-12)

दुनिया भर की सरकारें गरीबों का भला करने को जित्ता बेताब दिखती हैं उससे लगता है कि आने वाले समय में लोग प्रार्थना न करने लगें कि हे भगवान अगले जन्म में मुझे किसी गरीब के ही घर में जन्म देना ताकि सरकार के किसी काम आ सकूं।(04-12-12)

कभी-कभी सोचते हैं कि देश के बारे में चिंता करें कि देश किधर जा रहा है। लेकिन फ़िर सोचते हैं कि देश कहीं बुरा न मान जाये उसकी प्राइवेसी में दखल दे रहे हैं हम। इसलिये मटिया देते हैं।(02-12-12)

भ्रष्टाचार समाज में ऐसे घुल-मिल गया है जैसे भारत में बांगलादेशी। अलग करना मुश्किल हो गया है।(02-12-12)

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2 comments:

  1. यह तो, फुरसतिया का सोशल मीडिया के संकलित नियम (मरफ़ी के नियम की तरह) हो गया. इसे तो री-ब्लॉग करना होगा. :)

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  2. किसी भी बात पर फ़ट से सहमत हो जाना समझदार होने का साइनबोर्ड है। (31-05-2012)

    sahi hai..........sachhi-muchhi.......

    pranam

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