Friday, July 22, 2016

मतलब और हकीकत में अंत र हमेशा से रहा है

आज सुबह सोचा कि कुछ लिख ही डाला जाए। फिर दो तीन आइडिया आकर खड़े हो गए सामने। उनमें से कुछ बहुत पुराने थे, कुछ कम पुराने। कुछ एकदम नए। कुछ पुराने वाले आइडियों के चेहरों पर तो ’मार्गदर्शक आइडिया मंडल ’ में डाल दिये जाने की चिन्ता की सलवटें साफ़ दिख ती थीं। पुराने आइडिये बेचारे चुपचाप आकर खड़े हो जाते हैं। कुछ कहते नहीं लेकिन उनको देखकर ही लगता है -'यार, इसपर कुछ लिख ही दें। नहीं लिखेंगे तो बेचारा कहीं निपट गया तो 'आइडिया हत्या' का पाप लगेगा।' लेकिन चूँकि कई बार टाल चुके हैं तो एक बार फिर टाल देते हैं।

यह कुछ ऐसे ही जैसे संसद में महिला बिल है, लोकपाल बिल है, एक बार लटक गए तो लटके हैं। खैर, हमारा दिमाग कोई संसद थोड़ी है जो अमली जामा पहनाने के लिए कोई सत्र बुलवाना पड़े। जब मन आया लिख डालेंगे।

आइडिया जब ज्यादा हल्ला मचाने लगे तो उठकर चाय बनाने चले गए। पानी डाला, गैस जलाई, दूध डाला, चाय की पत्ती भी डाल दी। चाय उबलने लगी। उबलने लगी मने वही माहौल बन गया भगौने में जो अक्सर ही देश के किसी न किसी बनता ही रहता है। बस गनीमत यही कि भगौने के साइज छोटा था तो कोई बस, ट्रक नहीं जला।

चाय उबलने के बाद जब जब छानने का नम्बर आया तो मन में ख्याल आया कि चीनी डाली कि नहीं। अब यह ख्याल आया तो सबसे आगे आकर खड़ा हो गया। देखकर मानो रूपा फ़्र्ंट लाइन बनियाइन का ब्रांड अम्बेस्डर हो। अब हमने कोई इसका वीडियो तो बनाया नहीं जैसा ' वीरबाँकुरे ' लोग बनाते हैं लोगों की पिटाई/अत्याचार करते हुए, सो तय ही नहीं कर पा रहे थे कि चाय में चीनी डाली कि नहीं।

अब आपको बताएं कि जहां चीनी और वीडियो वाली बात आई तो फ़ौरन और नया आइडिया आकर खड़ा हो गया कि चाय में चीनी डालने वाली बात को वीडियो वाली बात से जोड़कर पोस्ट लिखी जाए। आइडिया नया था और एकदम उबल रहा था जोश में। लाजिमी है वो होश में नहीं था।लेकिन हम उससे यह बात कह भी नहीं सकते थे। कहने में डर था कहीं वो हमारी भी तुड़ईया करके सोशल मिडिया पर अपलोड न कर दे।

अब हम अचकचा कि क्या लिखा जाए। मने सोचा कि लिखें कि चाय बनाते समय वीडियो बनाया जाना चाहिए। अब देखिये कि मंहगाई बढ़ रही है। चीनी के दाम भी बढ़ ही रहे हैं। तो अगर चाय बनाते समय वीडियो बनाते रहेंगे तो चीनी डाली है कि नहीं चाय में यह बात वीडियो में रिवाइंड करके देख लेंगे। डिजिटल इण्डिया का भी प्रचार हो जाएगा। फ़्रीफ़ंड में देशभक्ति भी हो जायेगी। वीडियो देखकर भारत् माता की जय भी बोल देंगे।

लेकिन आइडिया केवल चायचर्चा देखकर गर्मा गया कि इसमें वो हमारा पिटाई वाकया किधर है भाई। उसके गुस्से से हमें लगा कि यह वाकया दोहराने के मूड में है।

हमने फिर कहा -जैसे चाय में चीनी दुबारा न पड़े । चीनी का खर्च अनावश्यक न हो वैसे ही पिटाई का, अत्याचार का भी वीडियो बनाना जरूरी होता है। ताकि सनद रहे। अब पिटाई का क्या वह तो लोग सदियों से करते आये हैं। बरजोर कमजोर की पिटाई करते ही आये हैं। लोग अपने समय के हिसाब से सनद भी इकट्ठा करते रहे हैं। जब लिखा-पढी का जमाना था तब लोग लिखकर सनद रखते थे। इत्ते पीट दिये, इत्ते जला दिये, इत्ते की इज्जत लूट ली, इत्तों का अंग-भंग कर दिया।

लेकिन अब समय के चलते तकनीक नयी हुई तो सनद भी नयी तरह से रखी जायेगी। मार-पिटाई , अत्याचार का वीडियो बना लिया। काम आयेगा। बहुत दिन तक असर रहेगा। चीजें अपना अपना उपयोग कराती है। जब अमेरिका ने बम बनाया बम ने अपना उपयोग कराया, पैटियाट मिसाइल बनाई उसने अपना उपयोग कराया, लोग पिज्जा बर्गर खाते हुये मिसाय ल गिरते हुये देखते, वाऊ वेरी गुड कहते। मने जो भी तकनीक आई नयी उसने अपना अपना उपयोग कराया। अब सोशल मीडिया है तो वो क्यों पीछे रहे। उसने अपना भी उपयोग कराया।

लेकिन क्या होता है न कि नयी तकनीक के साथ पुराने नियम भी पीछा नहीं छोडते। जैसे न्यूटन बाबा का क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम भी हमारी जाति व्यवस्था की तरह अमरौती खाकर आया है। जिनके यहां मिसाइल बरसती हैं वो टावर उडाते हैं। जिनकी मां-बहनों पर अत्याचार होते हैं वे संगठित होकर अत्याचारियों की मां-बहनों से हिसाब बराबर करते हैं।

इस मामले में अभी कोई नयी तकनीक नहीं आई है। मां-बहनों पर अत्याचार का बदला मां-बहनों से ही चुकाने का रिवाज बना हुआ है अभी तक। मजबूरी में मां-बहनों के माध्यम से ही सारी बहादुरी अंजाम होती है। अफ़सोस कि अत्याचारों के नये तरीकों के अभाव में मां-बहन-बेटियां अत्याचारों का शास्वत उचित माध्यम हैं। मने युनिवर्शल प्रापर चैनल।

हम इत्ता लिखते रहे तब तक देखा नौजवान आइडिया अपनी किसी नयी नवेली सहेली से बतियाने लगा। बड़ी मुलायम-मुलायम बातें करते हुये इत्ता तो क्यूट लग रहा था कि क्या बतायें आपको। आप खुदै समझ जाइये।

हम आईडिया और उसकी सहेली को बतियाने के लिये छोड़कर चले आये। बाकी सब आइडियों को फ़ुटा दिये कि अब आज इनका दिन है। इनको आपस में बतियाने दो जित्ता मन करे।

दफ़्तर आते हुये देखा कि जरीब चौकी पर क्रासिंग बंद थी। वहीं पास में कुछ लोग बैठे हुये फ़ाटक खुलने का इंतजार कर रहे थे। एक बच्ची गाड़ी की खिड़की से सटकर भीख मांग रही थी। हम उससे कुछ कहते-सुनते तब-तक क्रासिंग खुल गयी। हम फ़ूट लिये। रास्ते में एक ब च्चा रंगीन गुब्बारे बेंच रहा था। हमको नंदन जी की कविता याद आई:
आंखो में रंगीन नजारे, सपने बड़े-बड़े
भरी धार लगता है, जैसे बालू बीच खड़े ।
मतलब और हकीकत में अंत र हमेशा से रहा है।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10208598232326728

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